पथ के साथी

Wednesday, June 28, 2023

1337

1-बहुत दिनों के बाद

कमला निखुर्पा

 


बहुत दिनों के बाद

खिलखिलाकर हँसे हम

सृष्टि  हुई सतरंगी ...

दूर क्षितिज पे 

चमका इंद्रधनुष..

कि हाथों में पिघलती गई आइसक्रीम ...

मीठी बूँदें  जो गिरी आँचल पे

परवाह नहीं की..

चटपटी नमकीन संग

मीठे जूस की चुस्की भर

गाए भूले बिसरे गीत ।

नीले अम्बर तले

बादलों के संग-संग 

हरी-भरी वादियों में

डोले जीभर

झूले जीभर

बिताए कुछ  यादगार पल ..

तो हुआ  ये यकीं ..

ओ जिंदगी ! सुनो जरा

सचमुच तुम तो हो बहुत हसीं ..

बस हमें ही जीना नहीं आया कभी...

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2-चैत की रातनंदा पाण्डेय


चैत की रात का उत्साह ऐसा कि ,

बिना किसी अनुष्ठान के उसने

अपनी अतृप्त कामनाओं में

रंग भरने का निश्चय कर लिया

 

आज पहली बार

आँगन में बह रही

पछुआ हवा के

 विरुद्ध जाकर वह

अपनी तमाम दुविधाओं को

सब्र की पोटली में बाँधकर

मौन की नदी में गहरे गाड़ आई,

 

बहा आई आस्थाओं, संस्कारों ,

परम्पराओं और नैतिकताओं के उस

भारी भरकम दुशाले को भी

जिसे ओढ़ते हुए उसके काँधे झुकने लगे थे

 

ढिबरी की लाल-लाल रोशनी

और ढोल मंजीरों की आवाजों के बीच

सबसे नजरें बचाकर

अपने वक्ष में गहरे धँसी सभी कीलों को

चुन-चुनकर उखाड़कर फेंकती गई

अंत कर  दिया उसने अँधेरों के प्रारम्भ को ही

 

अब आंगन का मौसम बदल गया

टूटी हुई वर्जनाओं और मूल्यों की रस्साकसी में खींचते

सदियों से उजड़े उस आँगन की रूह

आज फिर से धड़क उठी थी

 

वर्षों से जो ख्वाब ! उसकी बंद मुठ्ठी में कसमसा रहे थे

अब उसमें पंख उग आ हैं...!

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3-रश्मि लहर

1-सुनो कवि!

 


विषमताओं की कोख से उपजी

निर्धनता की ऑंतों से उलझकर

वेदना की तीव्रता को सहती हुई

अपने स्वरूप को टटोलते हुए

सचेत हो  पड़ी है कविता!

 

युवाओं के

तिलमिलाते शब्दों से गुथी

नहीं सजना चाहती है

लबराते अधरों पर!

न रुकना चाहती है

प्रणय के प्रकंपित स्वरों पर..

आज!

 

व्यवस्था से खिसियाए

संपूर्ण युग की

सहकार बनना चाहती है कविता।

ज़मींदोज़ सिद्धांतों को ललकारती

संवेदना की

यर्थाथवादी काया के साथ..

कविता

करती है शंखनाद!

 

सुनो कवि!

शब्दों का

अवसादी निनाद!

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3-अनियंत्रित स्वप्न

 

झाँक रहे हैं नयनों के

कोने-कोने से

स्वप्न।

 

छिपे कांख में थे यथार्थ की,

कसमसाए वे कब?

पुलकित-पवन उम्मीदों की भी,

वे पाए थे कब??

 

दौड़ रहे मन के कानन

में, मृगछौने-से

स्वप्न।

 

गलबहियाँ कर के मिलतीं,

कुछ स्मृतियाँ  चंचल।

रंगत बदले फिर कपोल,

मल दें बतियाॅं सन्दल।।

 

खूब लुभाते हैं माखन-

मिश्री  दोने-से

स्वप्न।

 

रूप सजाता मन, अतीत के

विरही वादों का।

पुनर्जन्म ज्यों होता भूली-

बिसरी यादों का।।

 

कर लेते मन को वश में,

जादू-टोने-से

स्वप्न।।

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रश्मि लहर, इक्षुपुरी कालोनी, लखनऊ-226002

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4- अनिमा दास

 


 

कलंक भी है सौंदर्य (सॉनेट)

 

मंजुरिम सांध्य कुसुम. मधुर ज्योत्स्ना में है दीर्घ प्रतीक्षा

तुम्हारा आगमन एक भ्रमित कामना मात्र लेती है परीक्षा

दृगंचल में शायित इच्छा..व इच्छा में है अनन्य अभिसार

कल्पना ही कल्पना है..हाय! वर्णिका में है यह अभ्याहार।

 

 

अस्ताचल की अरुणिमा में...मंत्रमुग्ध सा यह मुखमंडल

कृत्रिम क्रोध से स्पंदित हृदय में जैसे नव प्रणय पुष्पदल

द्वार से द्वारिका पर्यंत है कृष्णछाया, हाँ ! क्यों कहो न ?

ऐ ! लास्य-लतिका, ऐ ! मानिनी मदना, शून्य में बहो न।

 

 

कलंक भी सौंदर्य है..यह कहा था मुझे सुनयना ने कभी

सौम्य-मृदु अधरों से छद्म -शब्दों का मधु झर गया तभी 

देहान्वेषी ने उसके अंगों का अग्नि से किया था अभिषेक

तथापि निरुत्तर प्रतिमा में शेष नहीं था मुक्ति का अतिरेक।

 

स्वप्नाविष्ट प्रकृति,अद्य अंतर्मुखी विवेचना में है पुनः संध्या

तिक्त वासना में है चीत्कार करती क्यों शताब्दी की बंध्या?

 

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Tuesday, June 27, 2023

1336

 पुलिया 

भीकम सिंह 

 


गाँव के सिवानों पे 

खेतों के बीचों- बीच 

ईंट और सीमेंट से 

सम्बंध तोड़ चुकी

एक पुलिया थी।

 

इस पुलिया पर 

घास के गट्ठर ढोते 

धूप में तपते बैल

जुआ उतारकर

अपना मुँह धोते

 

इस पुलिया से ही

खेतों की रंगीनी 

परवान चढ़ती 

और सड़क की दौड़ 

रफ्तार पकड़ती।

 

इस पुलिया से ही 

खाँसते बूढ़ों की

बेरुखी के ढोल बजते 

और उनमें डर की

बारात चती 

 

सब अपने-अपने बूते

पुलिया पर ही रोते 

पुलिया के कंधों पर

बहते ही रहते 

आँसुओं के सोते।

 

रात के नंगे पैर 

यहीं पर गायब होते 

सूर्य के घोड़े 

किरणों के बीज

इसी पुलिया से बोते

 

एक तरह से पुलिया 

गाँव की तिथि रेखा-सी

सबका समय बदलती

खेतों का आर्त्तनाद  

नाली से बयाँ करती 

 

निरर्थक और मिथ्या 

सार्थक और समृद्ध 

पुलिया के जबड़ों तक

जब पहुँचता पानी

तो फाइलें ही भरतीं 

 जब -जब सारा गाँव 

दुःख की तरह टूटता 

ये पुलिया ही एक ,

ठौर थी

यह बात और थी।

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2-अनुपमा त्रिपाठी सुकृति


1

काँपते हाथों से लिखे अक्षर

कह गए बीते हुए जीवन की

अधूरी -सी पूरी कहानी

कहीं वो छिपा- छिपा सा दर्द

कहीं वो नदिया की बहती- बहती सी रवानी

 

कौन है जो जीवन की धूप में मुझे

छाँव देता है

जीवन की नदिया में उस पार जाने

मुझे नाव देता है

 

भटक- भटकके जब थक जाते कदम

फिर सपनों को पनाह

मेरी लेखनी को ठाँव देता है

2

सुरभिमय फाल्गुन की उन्मद बयार

बहती भर लाती युग- युग जीवन सार

प्रस्फुटित पल्लवित धरा का रुप मनोहर

सुगुम्फित भावों का हो रहा शृंगार

और लेता मन पंख पसार

अभिनव गीत गाता खुश हो बार- बार

बार- बार !!

 

श्यामल बादल से आच्छादित घन

नव स्वप्न उल्लसित मन

घन घन घनन घनन

बिजुरिआ चमके

थिरके ये तन

सखीरी आज घर आए सजन !!

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3

विपदा की असंख्य सीढियाँ लाँघते हुए

मुखरित होता है जब मौन

चंद शब्दों में सिमटा- सिमटा -सा

भावों में बिखरा- बिखरा- सा

तुम्हारे और मेरे बीच का वही सेतु

सजीव हो उठता है

और नारंगी आसमान चहक उठता है

नीड़ की ओर

उड़ते हुए पंछियों से.....!!!

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Monday, June 26, 2023

1335

 

डॉ. सुरंगमा यादव

(  एरिक जेम्स टकर कैप्टन एरिक जेम्स टकर ,  (21 अक्टूबर 1927 - 2 अगस्त 1957) भारतीय सेना के एक अधिकारी थे, जिन्हें मरणोपरांत नागालैंड में वीरतापूर्ण कार्य के लिए सर्वोच्च वीरता पुरस्कार, अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था।)



1

दिन न् सत्ताईस का, अक्टूबर था मास।

 ‘जेम्स टकर’ के जन्म से, घर में हुआ उजास।।

2

वीर ‘टकर’ के शौर्य का, चमक रहा दिनमान।

सत्तावन में हो गया,  भले देह अवसान।।

3

 ‘वीरा’ के वे पुत्र थे, ‘एरिक’ उनका नाम।

 साँसें अपनी कर गए, भारत माँ के नाम।।

4

वीर शिरोमणि थे टकर, शत्रु ना पाया पार।

 दुश्मन को ललकार कर, विफल किया हर वार।।

5

आजादी के बाद का, पहला था विद्रोह।

 नागा दल से भिड़ ग, छोड़ ‘टकर’ सब मोह।।

6

 नागा विद्रोही बड़े, गुरिल्ला हैवान।।

 उनके सर्वविनाश का, जेम्स लिया मन ठान।।

7

दुश्मन की घुसपैठ थी, नागा हिल्स के पास।

एरिक ने कौशल किया, हुआ विद्रोह हताश।।

8

दुश्मन को ललकारते, ठहरे ना एक ठाँव।

 देह हताहत थी मगर, बढ़ते जाते पाँव।।

9

 प्राणों की चिंता नहीं, पथ बीहड़ अंजान ।

 शीश हथेली पर रखा, मातृभूमि का मान।।

10

 भूखे प्यासे लड़ रहे, सरहद पर जो वीर।

 उनके कारण ही सजे, दीपक और अबीर।।

11

 वीरों के वीरत्व से, भारत माँ का मान।

  वक्त पड़े चूके नहीं, अर्पण कर दें प्राण।।

12

दृढ़ता और संकल्प से, किया सफल नेतृत्व।

 अचरज में जग देख कर, मूर्तिमान वीरत्व।।

13

चेहरे पर आभा नई, रक्त रगों में वीर।

 दुर्गम पथ, जंगल घने, हुआ न विचलित वीर।।

14

 पदक वीरता का मिला, शौर्य प्रतीक ‘अशोक’।

 अंबर पर गाथा लिखे, उनका यश आलोक।।

15

भूल गया इतिहास जो, वीरों का बलिदान।

 व्याकुल चैन न पाएँगे, भारत माँ के प्राण।।

16

सैनिक ही वह था नहीं, था माँ का भी लाल।।

 उसका भी परिवार है, इसका रहे ख्याल।।

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