पथ के साथी

Saturday, July 21, 2007

ज़िन्दगी की लहर

आग़ के ही बीच में ,अपना बना घर देखिए ।
यहीं पर रहते रहेंगे ,हम उम्र भर देखिए ॥
एक दिन वे भी जलेंगे ; जो लपट से दूर हैं ।
आँधियों का उठ रहा , दिल में वहाँ डर देखिए ॥
पैर धरती पर हमारे , मन हुआ आकाश है ।
आप जब हमसे मिलेंगे , उठा यह सर देखिए ॥
जी रहे हैं वे नगर में ,द्वारपालों की तरह ।
कमर सज़दे में झुकी है , पास आकर देखिए ॥
टूटना मंज़ूर पर झुकना हमें आता नहीं ।
चलाकर ऊपर हमारे , आप पत्थर देखिए ॥
भरोसे की बूँद को मोती बनाना है अगर ।
ज़िन्दगी की लहर को सागर बनाकर देखिए

वश में है

तुमने फूल खिलाए
ताकि खुशबू बिखरे
हथेलियों मे रंग रचें ।
तुमने पत्थर तराशे
ताकि प्रतिष्ठित कर सको
सबके दिल में एक देवता ।
तुमने पहाड़ तोड़कर
बनाई एक पगडण्डी
ताकि लोग मीठी झील तक
जा सकें
नीर का स्वाद चखें
प्यास बुझा सकें।
तुमने सूरज से माँगा उजाला
और जड़ दिया एक चुम्बन
कि हर बचपन खिलखिला सके
यह तुम्हारे वश में है ।
लोग काँटे उगाएँगे
रास्ते मे बिछाएँगे
लहूलुहान कदमों को देखकर
मुस्कराएँगे ।
पत्थर उछालेंगे
अपनी कुत्सित भावनाओं के
उन्हें ही रात दिन
दिल में बिछाकर
कारागार बनाएँगे।
पहाड़ को तोड़ेंगे
और एक पगडण्डी
पाताल से जोड़ेंगे
कि जो जाएँ
वापस न आएँ।
सूरज से माँगेगे आग
किसी का घर जलाएँगे।
यह उनके वश में है।
यह उनकी प्रवृत्ति है
वह तुम्हारे वश में है ।

बंजारे हम

जनम - ­ जनम के बंजारे हम
बस्ती बाँध न पाएगी ।
अपना डेरा वहीं लगेगा
शाम जहाँ हो जाएगी ।
जो भी हमको मिला राह में
बोल प्यार के बोल दिये ।
कुछ भी नहीं छुपाया दिल में
दरवाजे सब खोल दिये ।
निश्छल रहना बहते जाना
नदी जहाँ तक जाएगी ।
ख्वाब नहीं महलों के देखे
चट्टानों पर सोए हम ।
फिर क्यों कुछ कंकड़ पाने को
रो रो नयन भिगोएँ हम ।
मस्ती अपना हाथ पकड़ कर
मंजिल तक ले जाएगी ।

तिनका­- तिनका

तिनका ­तिनका लाकर चिड़िया
रचती है आवास नया।
इसी तरह से रच जाता है
सर्जन का आकाश नया।
मानव और दानव में यूँ तो
भेद नजर नहीं आएगा ।
एक पोंछता बहते आँसू
जीभर एक रुलाएगा।
रचने से ही आ पाता है
जीवन में विश्वास नया।
कुछ तो इस धरती पर केवल
खून बहाने आते हैं ।
आग बिछाते हैं राहों पर
फिर खुद भी जल जाते हैं ।
जो होते खुद मिटने वाले
वे रचते इतिहास नया ।
मंत्र नाश का पढ़ा करें कुछ
द्वार -द्वार पर जा करके ।
फूल खिलाने वाले रहते
घर­ घर फूल खिला करके।
रहता सदा इन्हीं के दम पर
सुरभि ­ सरोवर पास नया।

Saturday, July 14, 2007

क्षणिकाएँ

1.
सभाओं में बना करते थे
वे प्राय: अध्यक्ष
अब ठूँठ बनकर रह गए ।

2
गुमराहों को है गुरूर
नई पीढ़ी को सिर्फ़ वे ही
रास्ता दिखाएँगे ।

3
इतना ऊँची उड़ी
मॅंहगाई की पतंग
कि जीवन–डोर लील गई ।

4.
वे फैलाकर कड़वाहट
पढ़ाते एकता का पाठ
सिर्फ़ मूर्खो से चलती
उनकी हाट ।

5. आम आदमी हुआ हलाल
आग लगाकर जमालों दूर खड़ी
बजा रही है गाल ।

6.
तोतों का जुलूस निकाल
जागरण लाएँगे,
जनता को इस तरह गूँगा बनाएँगे ।

7
जो कुछ पाया, वही चबाया
चारा नहीं बचा कुछ
तब बेचारा कहलाया ।



8
जनता है हैरान
कल जिसने जोड़े थे
घर–घर जाकर हाथ
वहीं खींचता कान ।

9
राजनीति में अगर
अपराधी नहीं आएँगे
तो अपराध रोकने के
गुर कौैन बताएँंगे ?

10 स्वामी जी यजमान के लिए
संकटमोचन यज्ञ करा रहे हैं
और खुद तिहाड़ जा रहे हैं ।

11.
समाधान हो जब असम्भव
आयोग बिठाइए
पेचीदे मामले
बरसों तक लटकाइए ।

12
वे अपराधियों को इस बार
पार्टी से निकालेंगे
लगता है सारी कीचड़
किसी गंगा में डालेंगे ।

13
बाढ़ भूचाल ,सूखा
सदा सब आते रहें
स्वरोजगार के नित नए
अवसर दिलवाते रहें ।










14.
जब से वे
बाजारू लिखने लगे हैं
प्याज की तरह महॅंगे बिकने लगे हैं ।

15.
सफाई अभिमान में उन्होंने
कमालकर दिखाया
अपने घर का कूड़ा
पड़ोसी के घर के आगे फिंकवाया ।

16.
नए डॉक्टर हैं
तभी अनुभव पाएँगे
जब दो–चार को
परलोक की सैर कराएँगे ।

17.
इस साल बड़ा पुरस्कार
उन्होंने पाया
समिति के सदस्यों को
सिर्फ़ तीन चौथाई खिलाया ।

18. अखबार बालों पर नेताजी
भेदभाव करने का कीचड़
उछाल रहे है,
सुना है–
अपना अखबार निकाल रहे हैं ।

19.
जिनके पैरों के निशान
दफ्तर की गुफा में
ले जाते हैं
वे कभी वापस नहीं आते है ।

20.
मजहब की छुरी
जाति भेद का कॉटा
जितना चाहा, उतना बॉंटा ।





21.
मुल्क को समझ रोटी
` बहुत से खा रहे हैं
खाने से चूके जो
सिर्फ़ वे ही चिल्ला रहे हैं ।

22.
वे बयानबाजी में
बहुत आगे निकल रहे हैं
जो कल कहा था,
उसे आज बदल रहे है ।

23.
जब हो खाली
काम न धंधा
रसीद छपवा
मॉंग ले चन्दा ।

24.
सुर्खियों में रहे रोज नाम
कीजिए पागलपन की बातें
चलाइए कहीं घूँसे कहीं लातें
तोड़िए सब रिश्ते–नाते ।

25.
भ्रष्टाचार बुलेट प्रूफ हो गया
मारने पर भी
रक्तबीज– सा जिन्दा हो गया ।

26.
वे परिवर्तन के दौर से
गुजर रहे हैं
रात–दिन अपनों का
घर भर रहे हे।




27.
कल तक
दूसरों के पैसों पर मौज
कर गया
आज अपना पैसा खाया
तो दर्द हुआ, मर गया ।

28.
फाइल
अंगद का पॉंव बन गई
बिना खाए–पिए
हिलती नहीं,
लाख ढूँढों
सामने रखी होने पर भी
मिलती नहीं ।

29.
साहब जब से
सूखी सीट पर आए हैं
तब से मजनूँ की तरह
दुबलाए हैं ।

30.
सुबह उठते हैं
कीर्तन करते हैं
दफ्तर में जाकर
जितना होता है चरते हैं ।

31.
तिकड़मी को देखकर
खुदा भी हैरान है
शैतान से भी बढ़कर
यह कौन शैतान है ।

32. डिग्रियों का बोझ
पेट है खाली
पीठ झुकी
सामने लम्बी अँधेरी गली ।






33. उम्र भर चलते रहे
पड़ाव
मंजिल का भरम खड़ाकर
छलते रहे ।


34-आग में


गोता लगाती बस्तियॉं
इस सदी की
यह निशानी बहुत खूब ।

35
. आओ लिख लें
नाम उनका दोस्तों में
ताकि वे भी कल
धोखा दे सकें ।

36.
इमारतों का
रोज जंगल उग रहा
मेमने–सा आदमी
हलकान है
जाए कहॉं ?

37.
माना कि
झुलस जाएँगे हम
फिर भी सूरज को
धरती पर लाएँगे हम ।

38. बारूद के ढेर पर खड़ी
मुस्कराती है मौत
एक दिन धरती पर
सिफ‍र् श्मशान रह जाएँगे ।

39. डरी–डरी आँखों में
तिरते अनगिन आँसू
इनको पोंछो
वरना जग जल जाएगा ।






40.
उम्र तमाम
कर दी हमने
रेतीले रिश्तों के नाम ।

41.
औरत की कथा
हर आँगन में
तुलसी चौरे–से
सींची जाती रही व्यथा ।

42.
स्मृति तुम्हारी
हवा जैसे भोर की
अनछुई , कुँआरी ।

43.
ओढ़ न पाए
चार घड़ी हम
ज्यों की त्यों
धर दीनी हमने
आचरण की फटी चदरिया ।

44.
डॉंक्टर झोलाराम
जब से इलाज करने लगे हैं
जिन्हें बरसों जीना था
बे–रोक–टोक मरने लगे हैं ।
आबादी घटाकर
पुण्य कमा रहे हैं
बिना टिकट बहुतों को
स्वर्ग भिजवा रहे हैं ।

45.
एक चादर थी अभावों की
हमारे पास
वह भी खो गई ।
इतने दिनों में सूरतें सब
बहुत अजनबी
हो गईं ।



46-



घर से चले थे हम
बाहर निकल गए,
अब तो दस्तकों के भी
अर्थ बदल गए ।

कमीज

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

महीने की आखिरी तारीख! शाम को जैसे ही पर्स खोलकर देखा, दस रुपए पड़े थे। हरीश चौंका, सुबह एक सौ साठ रुपए थे। अब सिर्फ़ दस रुपए बचे हैं?
पत्नी को आवाज दी और तनिक तल्खी से पूछा, ‘‘पर्स में से एक सौ पचास रुपए तुमने लिए हैं?’’
‘‘नहीं, मैंने नहीं लिए।’’
‘‘फिर?’’
‘‘मैं क्या जानूँ किसने लिए हैं।’’
‘‘घर में रहती हो तुम, फिर कौन जानेगा?’’
‘‘हो सकता है किसी बच्चे ने लिए हों।’’
‘‘क्या तुमसे नहीं पूछा?’’
‘‘पूछता तो मैं आपको न बता देती, इतनी बकझक क्यों करती।’’ हरीश ने माथा पकड़ लिया। अगर वेतन मिलने में तीन–चार दिन की देरी हो गई तो घर में सब्जी भी नहीं आ सकेगी। उधार माँगना तो दूर, दूसरे को दिया अपना पैसा माँगने में भी लाज लगती है। घर में मेरी इस परेशानी को कोई कुछ समझता ही नहीं!
‘‘नीतेश कहाँ गया?’’
‘‘अभी तो यहीं था। हो सकता है खेलने गया हो।’’
‘‘हो सकता है का क्या मतलब? तुम्हें कुछ पता भी रहता है या नहीं’’, वह झुँझलाया।
‘‘आप भी कमाल करते हैं। कोई मुझे बताकर जाए तो जरूर पता होगा। बताकर तो कोई जाता नहीं, आप भी नहीं’’,पत्नी ठण्डेपन से बोली।
इतने में नीतेश आ पहुँचा। हाथ में एक पैकेट थामे।
‘‘क्या है पैकेट में?’’ हरीश ने रूखेपन से पूछा। वह सिर झुकाकर खड़ा हो गया।
‘‘पर्स में से डेढ़ सौ रुपए तुमने लिये?’’
‘‘मैंने...लि्ये’’, वह सिर झुकाए बोला ।
‘‘किसी से पूछा?’’ हरीश ने धीमी एवं कठोर आवाज में पूछा।
‘‘नहीं’’,वह रूआँसा होकर बोला।
‘‘क्यों? क्यों नहीं पूछा’’, हरीश चीखा।
‘‘....।’’
‘‘चुप क्यों हो? तुम इतने बड़े हो गए हो। तुम्हें घर की हालत का अच्छी तरह पता है। क्या किया पैसों का’’, उसने दाँत पीसे ।
नीलेश ने पैकेट आगे बढ़ा दिया- “पंचशील में सेल लगी थी। आपके लिए एक शर्ट लेकर आया हूँ। कहीं बाहर जाने के लिए आपके पास कोई अच्छी शर्ट नहीं है।’’
‘‘फि...फिर...भी...पूछ तो लेते ही’’, हरीश की आवाज की तल्खी न जाने कहाँ गुम हो गई थी। उसने पैकेट की सीने से सटा लिया।
……………………………………॥

Thursday, July 12, 2007

वफ़ादारी

वफ़ादारी

‘द्रौपदी ,भीम अर्जुन ,नकुल ,सहदेव सब एक-एक करके बर्फ़ में गल गए और पीछे छूट गए ।तुम कब तक साथ चलोगे ?लौट जाओ। अभी समय है।’युधिष्ठिर ने अपने साथ चलने वाले कुत्ते से कहा ।
कुत्ता गम्भीर हो गया –‘मैं ऐसा नहीं कर सकता ,बिरादरी में बहुत बदनामी होगी ।’
‘इसमें बिरादरी की बदनामी क्या होगी ?’युधिष्ठिर ने पूछा ।
‘सब कहेंगे-आदमी के साथ रहकर वफ़ादारी छोड़ दी ।’

चोट

चोट


मज़दूरों की उग्र भीड़ महतो लाल की फ़ैक्टरी के गेट पर डटी थी।मज़दूर नेता परमा क्रोध के मारे पीपल के पत्ते की तरह काँप रहा था … "इस फ़ैक्टरी की रगों में हमारा खून दौड़ता है।इसके लिए हमने हड्डियाँ गला दीं ।क्या मिला हमको भूख, गरीबी, बदहाली ।यही न , अगर फ़ैक्टरी मालिक हमारा वेतन डेढ़ गुना नहीं करते हैं तो हम फ़ैक्टरी को आग लगा देंगे।"

परमा का इतना कहना था कि भीड़ नारेबाजी करने लगी … 'जो हमसे टकराएगा ,चूर - चूर हो जाएगा।'

अब तक चुपचाप खड़ी पुलिस हरकत में आ गई और हड़ताल करने वालों पर भूखे भेड़िए की तरह टूट पड़ी।कई हवाई फायर किये।कइयों को चोटें आईं।पुलिस ने परमा को उठाकर जीप में डाल दिया।भीड़ का रेला जैसे ही जीप की और बढ़ा ड्राइवर ने जीप स्टार्ट कर दी।

रास्ते में पब्लिक बूथ पर जीप रुकी।परमा ने आँख मिचकाकर पुलिस वालों का धन्यवाद किया।

परमा ने महतो का नम्बर डायल किया।

"कहो, क्या कर आए"उधर से महतो ने पूछा।

"जो आपने कहा था, वह सब पूरा कर दिया।चार- पाँच लोग जरूर मरेंगे।आन्दोलन की कमर टूट जाएगी।अब आप अपना काम पूरा कीजिए।"

"आधा पेशगी दे दिया था।,बाकी आधा कुछ ही देर बाद आपके घर पर पहुँच जाएगा । बेफि़क्र

रहें।"

घायलों के साथ कुछ मज़दूर परमा के घर पहुँचे तो वह चारपाई पर लेटा कराह रहा था। पूछने पर पत्नी ने बताया " इन्हें गुम चोट आई है।ठीक से बोल भी नहीं पा रहे हैं ।"

Sunday, July 1, 2007

ऊँचाई

ऊँचाई
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
पिताजी के अचानक आ धमकने से पत्नी तमतमा उठी, “लगता है बूढ़े को पैसों की ज़रूरत आ पड़ी है, वर्ना यहाँ कौन आने वाला था। अपने पेट का गड्‌ढा भरता नहीं, घर वालों का कुआँ कहाँ से भरोगे?”
मैं नज़रें बचाकर दूसरी ओर देखने लगा। पिताजी नल पर हाथ-मुँह धोकर सफर की थकान दूर कर रहे थे। इस बार मेरा हाथ कुछ ज्यादा ही तंग हो गया। बड़े बेटे का जूता मुँह बा चुका है। वह स्कूल जाने के वक्त रोज़ भुनभुनाता है। पत्नी के इलाज़ के लिए पूरी दवाइयाँ नहीं खरीदी जा सकीं। बाबू जी को भी अभी आना था।
घर में बोझिल चुप्पी पसरी हुई थी। खान खा चुकने पर पिताजी ने मुझे पास बैठने का इशारा किया। मैं शंकित था कि कोई आर्थिक समस्या लेकर आए होंगे। पिताजी कुर्सी पर उकड़ू बैठ गए। एकदम बेफिक्र, “सुनो” -कहकर उन्होंने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। मैं साँस रोककर उनके मुँह की ओर देखने लगा। रोम-रोम कान बनकर अगला वाक्य सुनने के लिए चौकन्ना था।वे बोले, “खेती के काम में घड़ी भर की फ़ुर्सत नहीं मिलती है। इस बखत काम का जोर है। रात की गाड़ी से ही वापस जाऊँगा। तीन महीने से तुम्हारी कोई चिट्ठी तक नहीं मिली। जब तुम परेशान होते हो, तभी ऐसा करते हो।”
उन्होंने जेब से सौ-सौ के दस नोट निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिए- “रख लो। तुम्हारे काम आ जाएँगे। इस बार धान की फ़सल अच्छी हो गई है। घर में कोई दिक्कत नहीं है। तुम बहुत कमज़ोर लग रहे हो। ढंग से खाया-पिया करो। बहू का भी ध्यान रखो।”
मैं कुछ नहीं बोल पाया। शब्द जैसे मेरे हलक में फँसकर रह गए हों। मैं कुछ कहता इससे पूर्व ही पिताजी ने प्यार से डाँटा- “ले लो। बहुत बड़े हो गए हो क्या?”“नहीं तो” - मैंने हाथ बढ़ाया। पिताजी ने नोट मेरी हथेली पर रख दिए। बरसों पहले पिताजी मुझे स्कूल भेजने के लिए इसी तरह हथेली पर इकन्नी टिका दिया करते थे, परन्तु तब मेरी नज़रें आज की तरह झुकी नहीं होती थीं।

Thursday, June 28, 2007

रिश्तों की खातिर



(कविता -मेरी पसन्द)       डॉ० भावना कुँअर


बहुत दुखी हूँ मैं
इन रिश्ते नातों से
जो हर बार ही दे जाते हैं-
असहनीय दुःख,
रिसती हुई पीडा,
टूटते हुए सपने,
अनवरत बहते अश्क
और मैंने---
मैंने खुद को मिटाया है
इन रिश्तों की खातिर।
पर इन्होंने सिर्फ--
कुचला है मेरी भावनाओं को,
रौंद डाला है मेरे अस्तित्व को,
छलनी कर डाला है मेरे दिल को।
लेकिन ये मेरा दिल है कोई पत्थर नहीं---
अनेक भावनाओं से भरा दिल
इसमें प्यार का झरना बहता है,
सबके दुःखों से निरन्तर रोता है,
बिलखता है, सिसकता है
और उनको खुशी मिले
हरदम यही दुआ करता है।
पर उनका दिल ,दिल नही
पत्थरों का एक शहर है
जिसमें कोई भावनाएं नही
बस वो तो तटस्थ खडा है
पर्वत की तरह
उनके दामन को बहारों से भर दो
तो भी उनको कोई फर्क नहीं पडता।
मैं हर बार हार जाती हूँ इन रिश्तों से
पर,फिर भी हताश नहीं होती
फिर लग जाती हूँ इनको निभाने में
इस उम्मीद से कि कभी तो सवेरा होगा
कभी तो ये पत्थरों का शहर
भावनाओं का शहर होगा
जिसमें मेरे लिए भी
अदना -सा ही सही
पर इक मकां होगा।
-0-

डॉ० भावना कुँअर

Friday, June 15, 2007

शिक्षा

भाषा एक संस्कार

- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

एक पुरानी कथा है । एक राजा शिकार खेलने के लिए वन में गया । शेर का पीछा करते करते बहुत दूर निकल गया। सेनापति और सैनिक सब इधर उधर छूट गए। राजा रास्ता भटक गया। सैनिक और सेनापति भी राजा को खोजने लगे।सभी परेशान थे। एक अंधा भिखारी चौराहे पर बैठा था। कुछ सैनिक उसके पास पहुँचे। एक सैनिक बोला 'क्यों बे अंधे ! इधर से होकर राज गया है क्या?'
'नहीं भाई !' भिखारी बोला। सैनिक तेजी से आगे बढ गए।
कुछ समय बाद सेनापति भटकते हुआ उसी चौराहे पर पहुँचा।उसने अंधे भिखारी से पूछा 'क्यों भाई अंधे ! इधर से राज गए हैं क्या?'
'नहीं जी, इधर से होकर राजा नहीं गए हैं ।'
सेनापति राजा को ढूँढने के लिए दूसरी दिशा में बढ़ ग़या।

इसी बीच भटकते-भटकते राजा भी उसी चौराहे पर जा पहुँचा। उसने अंधे भिखारी से पूछा - 'क्यों भाई सूरदास जी ! इस चौराहे से होकर कोई गया है क्या?'
'हाँ महाराज ! इस रास्ते से होकर कुछ सैनिक और सेनापति गए हैं।'
राजा चौंका - 'आपने कैसे जाना कि मैं राजा हूँ और यहाँ से होकर जाने वाले सैनिक और सेनापति थे ?'
'महाराज ! जिन्होंने 'क्यों बे अंधे' कहा वे सैनिक हो सकते हैं। जिसने 'क्यों भाई अंधे' कहा वह सेनापति होगा। आपने 'क्यों भाई सूरदास जी !'कहा.आप राजा हो सकते हैं।आदमी की पहचान उसकी भाषा से होती है और भाषा संस्कार से बनती है। जिसके जैसे संस्कार होंगे, वैसी ही उसकी भाषा होगी ।

जब कोई आदमी भाषा बोलता है तो साथ में उसके संस्कार भी बोलते हैं। यही कारण है कि भाषा शिक्षक का दायित्व बहुत गुरुतर और चुनौतीपूर्ण है। परम्परागत रूप में शिक्षक की भूमिका इन तीन कौशलों - बोलना, पढ़ना और लिखना तक सीमित कर दी गई है। केवल यांत्रिक कौशल किसी जीती जागती भाषा का उदाहरण नहीं हो सकते हैं। सोचना और महसूस करना दो ऐसे कारक हैं जिनसे भाषा सही आकार पाती है। इनके बिना भाषा गूँगी एवं बहरी है, इनके बिना भाषा संस्कार नहीं बन सकती, इनके बिना भाषा युगों-युगों का लम्बा सफर नहीं तय कर सकती; इनके बिना कोई भाषा किसी देश या समाज की धड़कन नहीं बन सकती। केवल सम्प्रेषण ही भाषा नहीं है। दर्द और मुस्कान के बिना कोई भाषा जीवन्त नहीं हो सकती। सोचना भी केवल सोचने तक सीमित नहीं । सोचने में कल्पना का रंग न हो तो क्या सोचना। कल्पना में भाव का रस न हो तो किसी भी भाषा का भाषा होना बेकार। भाव ,कल्पना और चिन्तन भाषा को उसकी आत्मा प्रदान करते हैं।

2

भाषा-शिक्षक खुद ही पूरे समय बोलता रहे,यह शिक्षण की सबसे बडी क़मजोरी है। प्रायः यह देखने में आता है कि बहुत से बच्चों को वर्ष में एक बार भी भाषा की कक्षा में बोलने का अवसर नहीं मिल पाता है। बिना बोले भाषा का परिष्कार एवं संस्कार कैसे हो सकता है? बच्चों के आसपास का संसार बहुत बड़ा एवं व्यापक है। दिन भर बहुत कुछ बोलने वाले वाले बच्चों को कक्षा में मौन धारण करके बैठना पड़ता है। यह किसी यातना से कम नहीं। बच्चों के भी अपने कच्चे-पक्के विचार हैं । उन्हें अभिव्यक्त करने का अवसर मिलना चाहिए। अभिव्यक्ति का यह अवसर ही भाषा को माँजता और सँवारता है। 'खामोश पढ़ाई जारी है' की स्थिति भाषा के लिए शुभ संकेत नहीं है। हमें इस प्रवृत्ति में बदलाव लाना पडेग़ा। दुनिया के अधिकतर झगड़े भाषा के गलत प्रयोग,गलत हाव-भाव के कारण पैदा होते हैं। बिगड़े सम्बन्ध भाषा के सही प्रयोग से सुलझ भी जाते हैं। बहुत से 90 प्रतिशत अंक पाने वाले बच्चे भी कमजोर अभिव्यक्ति के चलते अपनी बात सही ढंग से नहीं कह पाते। अतः आज के परिप्रेक्ष्य में यह आवश्यक है कि बच्चें को बोलने का भरपूर मौका दिया जाए ; तभी अभिव्यक्तिकौशल में निखार आएगा।
छोटी कक्षाओं से ही इस दिशा में बल दिया जाना चाहिए। संवाद, समूह-गान एकालाप, कविता पाठ, कहानी कथन, दिनचर्या-वर्णन के द्वारा बच्चों की झिझक दूर की जा सकती है।
पाठ्य-पुस्तकें केवल दिशा निर्देश के लिए होती हैं .उन्हें समग्र नही मान लेना चाहिए। अतिरिक्त अध्ययन के द्वारा भाषा की शक्ति बढाई जा सकती। बच्चों को निरन्तर नया पढ़ने के लिए प्रेरित करना जरूरी है। यह तभी संभव है, जब शिक्षक भी निरन्तर नया पढ़ने की ललक लिए हुए हों।

भाषा के शुद्ध रूप का बच्चों को ज्ञान होना चाहिए। इसके लिए निरन्तर अभ्यास जरूरी है। अशुद्ध शब्दों का अभ्यास नहीं कराना चाहिए। कुछ शिक्षक अशुद्ध शब्दों को लिखवाकर फिर उनका शुद्ध रूप लिखवाकर अभ्यास कराते हैं। ऐसा करना उचित नहीं है। बच्चों को दोनों प्रकार के शब्दों का बराबर अभ्यास हो जाएगा। वे सही और गलत दोनों का समान अभ्यास करने के कारण शुद्ध प्रयोग करने में सक्षम नहीं हो पाएँगे। संशोधित किये गए सही शब्दों की सूची अलग से बनवानी चाहिए.इससे यह पता चल सकेगा कि कौन छात्र किन -किन शब्दों की वर्तनी गलत लिखता रहा है। निर्धारित अन्तराल के बाद वर्तनी की अशुद्धियों में क्या कमी आई है। श्रुतलेख के माध्यम से अशुद्धियों में आई कमी का आकलन किया जा सकता है।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि सभी कौशलों का निरन्तर अभ्यास भाषा को प्रभावशाली बनाने की भूमिका निभा सकता है।
o रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
प्राचार्य, केन्द्रीय विद्यालय

आयुध उपस्कर निर्माणी, हजरतपुर
जि0 फिरोजाबाद ( उ0प्र0)283103














WWW http://www.srijangatha.com


नहीं मिला


ज्ञानेन्द्र ‘साज़’

ढूँढा किए जिसे वो उमर भर नहीं मिला
चलता रहा मगर तो सफर पर नहीं मिला ।
जब से उधार ले गया वह हमसे माँगकर
चक्कर पे चक्कर काटे पर घर पर नहीं मिला ।
छत पर किसी से बात में मशगूल था इतना
कितना पुकारा नीचे उतर कर नहीं मिला ।
वह मिलना चाहता था अपने समाज से
दहशतज़दा था इस कदर डरकर नहीं मिला ।
महफ़िल में उसकी हम गए फिर भी वो ऐंठ में
बैठा ही रहा हमसे वो उठकर नहीं मिला ।
कैसा अजीब दौर है ऐ दोस्त क्या कहूँ
दिल भी मिलाया था मगर दिलबर नहीं मिला ।
होली हो, ईद हो मगर ये देखिए कमाल
जो भी मिला गले से , वह खुलकर नहीं मिला ।
हुआ जवान तो हिस्से की बात को लेकर
बचपन के जैसा ,भाई भी हँसकर नहीं मिला।
मन्दिर में,मस्ज़िदों में,गिरजों में कहीं भी
ढूँढा तो बहुत था कहीं ईश्वर नहीं मिला ।
कुण्ठित है मगर जी रहे हैं फिर भी शान से
हमको किसी के धड़ के ऊपर सर नहीं मिला ।
रहज़न मिले,लुटेरे मिलें नक़बज़न मिले
ऐ साज़ मेरे देश को रहबर नहीं मिला ।

Saturday, June 9, 2007

मरुस्थल के वासी



श्याम सुन्दर अग्रवाल





गरीबों की एक बस्ती में लोगों को संबोधित करते हुए मंत्रीजी ने कहा, “इस साल देश में भयानक सूखा पड़ा है। देशवासियों को भूख से बचाने के लिए जरूरी है कि हम सप्ताह में कम से कम एक बार उपवास रखें।”
मंत्री के सुझाव से लोगों ने तालियों से स्वागत किया।
“हम सब तो हफते में दो दिन भी भूखे रहने के लिए तैयार हैं। भीड़ में सबसे आगे खड़े व्यक्ति ने कहा।
मंत्रीजी उसकी बात सुनकर बहुत प्रभावित हुए और बोले, “जिस देश में आप जैसे भक्त लोग हों, वह देश कभी भी भूखा नहीं मर सकता।
मंत्रीजी चलने लगे जैसे बस्ती के लोगों के चेहरे प्रश्नचिह्न बन गए हों।
उन्होंने बड़ी उत्सुकता के साथ कहा, ‘अगर आपको कोई शंका हो तो दूर कर लो।’
थोड़ी झिझक के बाद एक बुजुर्ग बोला, ‘साब! हमें बाकी पाँच दिन का राशन कहाँ से मिलेगा ?’
*******

रिश्ता


डा श्याम सुन्दर 'दीप्ति'


"मोगा से रास्ते की सवारी कोई न हो, एक बार फिर देख लो।" कहकर रामसिंह ने सीटी बजाई और बस अपने रास्ते पड़ गई।
बस में बैठे निहालसिंह ने अपना गाँव नजदीक आते देख, सीट छोड़ी और ड्राइवर के पास जाकर धीमे से बोला, "डरैवर साब जी, जरा नहर के पुल पर थोड़ा-सा ब्रेक पर पाँव रखना।"
"क्या बात है? कंडक्टर की बात नहीं सुनी थी?" ड्राइवर ने खीझकर कहा।
"अरे भई, जरा जल्दी थी। भाई बनकर ही सही। देख तू भी जट और मैं भी जट। बस जरा-सा रोक देना।" निहालसिंह ने गुजारिश की।
ड्राइवर ने निहालसिंह को देखा और फिर उसने भी धीमे से कहा, "मैं कोई जट-जुट नहीं, मैं तो मजबी हूँ।"
निहाले ने जरा रुककर कहा,"तो क्या हुआ? सिख भाई हैं हम, वीर [भाई] बनकर रोक दे।"
ड्राइवर इस बार जरा-सा मुसकाया और बोला, "मैं सिक्ख भी नहीं हूँ, सच पूछे तो।"
"तुम तो यूँ ही मीन-मेख में पड़ गए हो। आदमी ही आदमी की दवा होता है। इससे बड़ा भी कुछ है।"
जब निहाले ने इतना कह तो ड्राइवर ने खूब गौर से उसको देखा और ब्रेक लगा दी।
"क्या हुआ?" कंडक्टर चिल्लाया, "मैंने पहले नहीं कहा था? किसलिए रोक दी?"
"कोई नहीं, कोई नहीं। एक नया रिश्ता निकल आया था।" ड्राइवर ने कहा और निहालसिंह तब तक नीचे उतर गया था।
*******

Sunday, June 3, 2007

अधर पर मुस्कान

अधर पर मुस्कान दिल में डर लिये

लोग ऐसे ही मिले पत्थर लिये।

आँधियाँ बरसात या कि बर्फ़ हो

सो गये फुटपाथ पर ही घर लिये।

धमकियों से क्यों डराते हो हमें

घूमते हम सर हथेली पर लिये।

मिल सका कुछ को नहीं दो बूँद जल

और कुछ प्यासे रहे सागर लिये ।

हार पहनाकर जिन्हें हम खुश हुए

वे खड़े हैं सामने पत्थर लिये ।


..............

कितनी बड़ी धरती

कितनी बड़ी धरती ,

बड़ा आकाश है !

बाँट दूँ वह सब ,

जो मेरे पास है

बहुत दिया जग ने

मैंने दिया कम ।

कैसे चुकाऊँ कर्ज़

इसी का है ग़म ।

अपने या पराए कौन ,

यह आभास है ।

…………

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

19मार्च 07

Tuesday, May 1, 2007

बहुत बोल चुके

बहुत बोल चुके

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

बहुत बोल चुके अब न बोलो
अपने मन की गाँठ न खोलो ।

गाँठ खोलकर अब तक तुमने
जितना भी था सभी गँवाया ।
मेरे यार ज़रा बतलादो
बदले में तुमने क्या पाया ?

बहुत तोल चुके अब न तोलो।

जिनको अब तक तुमने तोला
उन सबको पाया है पोला ।
वार किया उसने ही छुपकर
जिसको तुमने समझे भोला ।।

अब सबके मन अमृत न घोलो ।

अमृत घोला जिसके मन में
उसका मन विष-बेल हो गया ।
धोखा देकर खिल-खिल हँसना
उन लोगों का खेल हो गया ।।

बहुत बोल चुके अब न बोलो
अपने मन की गाँठ न खोलो ।
…………………………

Monday, April 23, 2007

अन्तर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलन


अन्तर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलनपंजाबी साहित्य अकादमी,लुधियाना एवं त्रैमासिक पत्रिका ‘मिन्नी’ के संयुक्त तत्त्वाधान में 15 अप्रैल 2007 को पंजाबी साहित्य अकादमी के सभागार में लघुकथा सम्मेलन का शुभारम्भ हुआ । अकादमी के अध्यक्ष डा॰सुरजीत पातर ,महासचिव श्री रविन्दर भट्टल डा॰अरुण मित्रा (मुख्य अतिथि) , श्री भगीरथ (कोटा) ,श्री सूर्य कान्त नागर (इन्दौर) ,श्री सुकेश साहनी (बरेली),श्री श्याम सुन्दर अग्रवाल (कोटकपूरा), डा॰श्याम सुन्दर ‘दीप्ति’ (अमृतसर) मंच पर उपस्थित थे ।इनके अतिरिक्त देश के विभिन्न भागों से आए हिन्दी एवं पंजाबी के कथाकार -समीक्षक मौजूद थे ।इनमे थे –सर्वश्री सुभाष नीरव ,बलराम अग्रवाल (दिल्ली) सुरेश शर्मा (इन्दौर) ,अशोक भाटिया (करनाल) , डा॰सुरेन्द्र मंथन (बंगा) , डा॰अनूप सिंह(बटाला),हरभजन सिंह खेमकरणी(अमृतसर), विक्रमजीत सिंह ‘नूर’(गिद्द्ड़बाहा),सुरिन्दर कैले (ठक्करवाल), रत्नेश (चंडीगढ़) ,जसवीर चावला ,हरप्रीत राणा निरंजन बोहा,रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ आदि। इस सम्मेलन की अध्यक्षता की सुप्रसिद्ध पजाबी कवि एवं पंजाबी साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डा॰सुरजीत सिंह पातर ने । हिन्दी –पंजाबी का यह सम्मेलन श्री श्याम सुन्दर अग्रवाल एवं डा॰श्याम सुन्दर ‘दीप्ति’के प्रयासों से निरन्तर 18-19 वर्षों से आयोजित किया जा रहा है । यह सम्मेलन हिन्दी एवं पंजाबी का संयुक्त प्रयास होने के कारण दिल्ली , पंजाब ( अमृतसर ,कोटकपूरा,मोगा ,कपूरथला,बटाला) हरियाणा (सिरसा , करनाल) ,हिमाचल(डलहौजी) उत्तर प्रदेश(बरेली) आदि विभिन्न स्थानों पर आयोजित हो चुका है ।इस सम्मेलन का उद्देश्य है हिन्दी –पंजाबी भाषा के लेखकों के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों को एक- दूसरे के निकट लाना और एक साझी लेखकीय समझ और विचार –विमर्श को विकसित करना ।
डा॰सुरजीत पातर ने विश्व लघुकथा संग्रह ‘मिन्नी कहाणी दा संसार’ या । जसवीर चावला की दो हिन्दी पुस्तकों- ‘सच के सिवा’ और ‘आतंकवादी’ का विमोचन किया गया ।


डा॰कुलदीप सिंह ‘दीप’और डा॰अनूप सिंह ने पजाबी-हिन्दी लघुकथाओं का विश्लेषण करते हुए वर्तमान सामाजिक सरोकारों की ज़रूरत पर बल दिया,। डा॰दीप ने ‘मिन्नी कहाणी दे ग्लोबली सरोकार’ में खुले बाज़ार के समर्थन एवं विकास के छद्म प्रचार को रेखांकित करते हुए आने वाले ख़तरों से आगाह किया कि यह सब नियोजित ढंग से किया जा रहा है ,आने वाले समय में जिसके दुखद परिणाम होंगे । लघुकथाओं के सन्दर्भ में डा॰दीप ने अपनी बात की पुष्टि की ।इनमें सूर्यकान्त नागर (प्रदूषण) ,निरंजन बोहा (शीशा) ,धरम पाल साहिल (सोच) ,विक्रम सोनी (छित्तर की जात-जूते की जात) श्याम सुन्दर अग्रवाल (रांग नम्बर) आदि का उल्लेख किया ।
इसी क्रम में डा॰अनूप सिंह ने लघुकथा के विषय एवं रूप पक्ष पर अपनी सधी हुई भाषा में विचार व्यक्त किए । डा॰ सिंह ने विश्व की विभिन्न भाषाओं के उदाहरण देकर अपनी बात की पुष्टि की ।उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा-भाषण , दोस्तों के साथ की गई गपशप लघुकथा का विषय नहीं बन सकते हैं । चुश्त संवाद एवं व्यंग्य की विशिष्टता रचना को प्रभावशाली बनाने में सहायक होते हैं।
तत्पश्चात डा॰ अशोक भाटिया , सुभाष नीरव निरंजन बोहा ,सूर्यकान्त नागर सुकेश साहनी , बलराम अग्रवाल ने अपने विचार प्रकट किए । सुभाष नीरव ने वाह ! से आह ! तक विस्तार पाने वाले बाज़ारवाद के भयावह परिणाम से सचेत किया । लघुकथाओं में इन नवीन विषयों की प्रस्तुति पर संतोष प्रकट किया ।
श्री सुकेश साहनी ने आज विश्व लघुकथा की विमोचित पुस्तक ‘ मिन्नी कहाणी दा संसार’ पर अपने विचार प्रकट किए ।उन्होंने कहा-दीप्ति-अग्रवाल एवं नूर द्वारा सम्पादित इस पुस्तक में विश्व भर की चुनी हुई श्रेष्ठ रचनाएँ आश्वस्त करती हैं कि लघुकथाओं का भविष्य उज्ज्वल है।लघुकथाओं में पिछले तीस वर्षों से परिवर्तन देखने को मिलता है । सजग लेखक भविष्यद्रष्टा होता है ।समय की पदचाप उसकी रचनाओं मे महसूस होने लगती है ।रचना का सन्देश महत्त्वपूर्ण होता है। यदि ऐसी रचना शिल्प के स्तर पर कमज़ोर है तो उस पर मेहनत करने की ज़रूरत है ।
डा॰सूर्यकान्त नागर ने सचेत किया कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने उत्पादों के साथ अपने विचारों को भी हमारे मन-मस्तिष्क पर थोप रही हैं। रचना कला एवं रचनात्मक कल्पना के साथ हमारे सामने आए। रचना में जो कुछ अनकहा होता है , वही रचना की सबसे बड़ी ताकत है।
इस अवसर पर श्री भगीरथ को उनके लघुकथा में किए गए अवदान के लिए सम्मानित किया गया ।इसी अवसर पर पंजाबी लघुकथा प्रतियोगिता के विजेताओं को भी पुरस्कृत किया गया ।
डा॰सुरजीत पातर ने विश्व लघुकथा संग्रह ‘मिन्नी कहाणी दा संसार’ का विमोचन किया । जसवीर चावला की दो हिन्दी पुस्तकों- ‘सच के सिवा’ और ‘आतंकवादी’ का विमोचन भी इस अवसर पर किया गया ।डा॰पातर ने
अपने अध्यक्षीय भाषण में डा॰सुरजीत पातर ने कहा-‘सरल लिखना बहुत कठिन है (सोखा लिखणा बहुत ओखा) हमारे जीवन की हर छोटी-बड़ी घटना-बात का बहुत महत्त्व होता है ।हम समाज को बदल पाएँ या न बदल पाएँ ;हमें कोशिश तो ज़रूर करनी चाहिए। डा॰पातर ने जलते पेड़ की आग बुझाने का असफल प्रयास करने वाली चिड़िया का उदाहरण देकर अपने विचार को रेखांकित किया।सबके अनुरोध पर डा॰पातर ने मधुर स्वर में ‘कभी दरिया इकल्ला तै नहीं करदा दिशा अपणी’ ग़ज़ल सुनाई ,जिसके प्रभावशाली अशआर ने श्रोताओं को भाव –विभोर कर दिया।कार्यक्रम का संचालन डा॰ श्यामसुंदर ‘दीप्ति’ ने किया ।श्री श्याम सुन्दर अग्रवाल के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ ।


प्रस्तुति:- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
प्राचार्य
केन्द्रीय विद्यालय आयुध उपस्कर निर्माणी
हज़रतपुर ज़ि0 फ़ीरोज़ाबाद (उतर प्रदेश) 283103

Tuesday, March 27, 2007

बाल-जगत

हम चाँद बनेंगे

हम चाँद बनेंगे
अँधियारे में
पथ दिखलाएँगे
हम बन कर तारे
सूने नभ में
फूल खिलाएँगे ।

हम बनकर सूरज
नया उजाला
लेकर आएँगे ।
हम बनकर भौंरे
उपवन-उपवन
गीत सुनाएँगे ।

हम फूल बनेंगे
प्यारी खुशबू
रोज लुटाएँगे ।
अब हमने ठाना
इस धरती को
स्वर्ग बनाएँगे ।
…………………………………………

सूरज का गुस्सा

सूरज को गुस्सा आता
धरती को जड़ता चाँटे ।
मन में जितनी आग भरी
सारी दुनिया को बाँटे ।

झुलसे पेड़ों के पत्ते
पौधे सारे कुम्हलाए ।
प्यासे गैया-बकरी भी
पानी-पानी चिल्लाए ।

चीख सुनी जब बादल ने
दौड़ा-दौड़ा वह आया ।
दशा देखकर धरती की
जीभर पानी बरसाया ।
……………………………………………

सबसे प्यारे

सूरज मुझको लगता प्यारा
लेकर आता है उजियारा ।
सूरज से भी लगते प्यारे
टिम-टिम करते नन्हें तारे।
तारों से भी प्यारा अम्बर
बाँटे खुशियाँ झोली भर-भर।
चन्दा अम्बर से भी प्यारा
गोरा चिट्टा और दुलारा ।
चन्दा से भी प्यारी धरती
जिस पर नदियाँ कल-कल करती ।
पेड़ों की हरियाली ओढ़े
हम सबके है मन को हरती ।
हँसी दूध –सी जोश नदी –सा
भोले मुखड़े मन के सच्चे ।
धरती से प्यारे भी लगते
खिल-खिल करते नन्हें बच्चे ।
इन बच्चों में राम बसे हैं
ये ही अपने किशन कन्हाई ।
इन बच्चों में काबा-काशी
और नहीं है तीरथ है भाई ।
०००००००००००००००

खेल-गीत -
अक्कड़-बक्कड़

अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो
आसमान में बादल सौ ।
सौ बादल हैं प्यारे
रंग हैं जिनके न्यारे ।

हर बादल की भेड़ें सौ
हर भेड़ के रंग हैं दो ।
भेड़ें दौड़ लगाती हैं
नहीं पकड़ में आती हैं ।

बादल थककर चूर हुआ
रोने को मज़बूर हुआ ।
आँसू धरती पर आए
नन्हें पौधे हरषाए ।