पथ के साथी

Saturday, August 5, 2023

1345- मुझसे ही बस माना करना

अनिल पाराशर ‘मासूम’

 

मुझसे ही बस माना करना

सारे जग से रूठा करना

 

भारी दिल को हल्का करना

सीखो सबको अच्छा करना

 

नफ़रत जैसी भी कर लेना

प्यार तो मेरे जैसा करना

 

झूठ नहीं मैं कह पाऊँगा

हाल मेरा मत पूछा करना

 

उम्र गुजारी ये सुन-सुनकर

ऐसे जीना ऐसा करना

 

मुझको कसम कभी मत देना

सच मेरा मत झूठ करना

 

मैं क्‍या हूँ परछाई हूँ बस

तुम साये का पीछा करना

 

जब अम्बर से तारा टूटे

मुझको उससे माँगा करना

 

मेरी याद दिलाएँगे ये

आँसू मत तुम पोंछा करना

 

कभी देखना मेरे सपने

कभी रात भर जागा करनी

क्‍या मासूम में ख़म देखा है

अच्छे  को अच्छा क्या करना

( तेरे जाने के बाद  काव्य-संग्रह से)


-0-

Friday, August 4, 2023

1344-संताप

अनीता सैनी 'दीप्ति'

 




उन्होंने कहा-

उन्हें दिखता है, वे देख सकते हैं

आँखें हैं उनके पास।”

होने के

संतोष भाव से उठा गुमान

उन सभी के पास था 

वे अपनी बनाई व्यवस्था के प्रति

सजगता के सूत कात  रहे थे

सुःख के लिए किए कृत्य को

वे अधिकार की श्रेणी में रखते  

उनमें अधिकार की प्रबल भावना थी 

 नहीं सुहाता उन्हें!

वल्लरियों का स्वेच्छाचारी विस्तार

वे इन्हें जंगल कहते 

उनमें समय-समय पर

काट-छाँट की प्रवृत्ति का अंकुर

फूटता रहता 

वे नासमझी की  हद से 

पार उतर जाते, जब वे कहते-

उसके पास भाषा है।”

मैं मौन था, भाषा से अनभिज्ञ नहीं 

वे शब्दों के व्यापारी थे, मैं नहीं

मुझे नहीं दिखता!

वह सब जो इन्हें दिखा देता  

नहीं दिखने के पैदा हुए भाव से 

मैं पीड़ा में था, परीक्षित  मौन 

यह वाकया- बैल ने गाय से कहा।

-0-

Thursday, August 3, 2023

1343-मेघा भेद न खोल दें

 

जनक छंद - विभा रश्मि  

1

मेघा भेद न खोल दें ।

देस - डगर को नापकर 

भीगे अश्रु ना मोल दें ।

2

मनवा का दुखड़ा सुना ।

सुलझेंगी गाँठें छ्ली 

जिनको तूने ही चुना ।

3

बरखा जल ने भर दि

खुश है धरती भीगती 

पत्तों के दिल तर कि

4

चिड़िया डैने मारती ।

बौछारों में उड़ चली

चिकलों पर सब वारती ।  

5

बूँदों की इक माल हूँ ।

मैं जोहड़ में जा मिली

लहरों की लय - ताल हूँ ।

6

हरियल शुक रस घोल दे ।

मीठी वाणी कर्ण में  

नेहिल सा अब बोल दे । 

Wednesday, August 2, 2023

1342

 

[जनक छन्द दोहे के प्रथम चरण की तेरह मात्राओं  की लय के वैज्ञानिक ऽ ऽ ऽ, ऽ, ऽI ऽ विभाजन पर आधारित ‘सम मात्रिक छन्द’ है, अर्थात् जनक छन्द के तीनों चरणों में 13-13-13 मात्राएँ होती हैं। एक गुरु ऽ के स्थान पर दो लघु I I का प्रयोग(ऽ या II) किया जा सकता है। पहले और तीसरे चरण तुकान्त होते हैं। तीनों चरण भी तुकान्त हों तो कोई दोष नहीं। अन्त में लघु-गुरु( I ऽ) की अनिवार्यता है।-डॉ ओम्प्रकाश भाटिया ‘अराज’]

जनक छंद


उमेश महादोषी

1.

बोल जमूरे! बोल ना!

दिखला कोई खेल तू

जीवन में रस घोल ना!

2.

तू नदिया की धार-सी।

मैं पत्थर-सा बह रहा

तू कल-कल करताल-सी।

3.

राजाजी क्यों ठंड में।

आज गली-गली

हार ग-से जंग में!

4.

साथ-साथ तेरे बहा।

तू तो गंगाजल बना

पत्थर मैं पत्थर रहा!

5.

पुष्पों में भी आग है।

और आग में बस रहा

देवों का अनुराग है।

6.

डाँट रहा सूरज उसे।

शीत लहर काँपे खड़ी

देख-देख धरती हँसे।

7.

कैसी है ये वेदना!

आँखों में आँसू नहीं,

ना ही तन में चेतना।

8.

संघर्ष यह थमे नहीं।

अन्तस में जो जल चुकी,

वो ज्योति अब बुझे नहीं।

9.

सर्पीली पगडंडियाँ।

हरियाते अरु खेत वे,

निगल गईं ये मंडियाँ।

10.

जब-जब उफनी है नदी।

जल में घुल बहती हुई,

पर्वत की पीड़ा मिली।

11.

प्रश्न बड़े बेताल के।

उत्तर देता है समय

सोच-समझ समकाल के।

12.

बँटा देश, जीवन बँटा।

देख जमूरे! देख ना!

बँटी बँटी है हर छटा।

 

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