पथ के साथी

Saturday, April 6, 2019

समय की नदी

 2-डॉ.कविता भट्ट

1

 कसमसाकर सो जाना

        उस स्पर्श से लिपटकर।

धीरे से कुछ कह जाना

       वो धड़कनों में सिमटकर।

हर अनुभव अनुपम था-

           हर उपमा भी निराली।

प्रेयसी की आँखों को संज्ञा

           ब्रह्माण्ड की; दे डाली।

प्रेम क्या है- नहीं पता

           किन्तु प्रश्न गम्भीर है।

प्रियतमा की आँखों में-

           ब्रह्माण्ड है या नीर है?

प्रेमी आँखों से न उबर सका

       प्रेयसी ब्रह्माण्ड में ठहरी है।

प्रेम तटों- सा चुप है खड़ा

       समय की नदी भी गहरी है।

-0—

Wednesday, April 3, 2019

887


2- दो  कुण्डलियाँ, 
रमेशराज
1
बोतल के सँग बाँटते, फिरें करारे नोट
नेताजी को चाहिए, मतदाता का वोट।
मतदाता का वोट, सभी से मीठा बोलें
तज अपराधी-रूप, सभा में अमृत घोलें
सबसे जोड़ें हाथ, कहें चुपके से पल-पल
हमें दीजिये वोट, लीजि गड्डी-बोतल।
2
दीखे है हर ओर अब, अजब तमाशा हाय
हाथी लेकर साइकिल, सरपट दौड़ लगाय।
सरपट दौड़ लगाय, कमल की कला निराली
पीट रहे हैं भक्त, सभा में जमकर ताली।
चतुराई के पेंच, हाथ ने भी कुछ सीखे
राजनीति की भाँ, पिए मतदाता दीखे।
-0-


Friday, March 29, 2019

886


साँझ खिली है- अनिता ललित
1
तपती धरा पे
बूँदों जैसे,
क्यों तुम आए,
कहाँ गए?
2
मेघ-मल्हार के
गीतों जैसी,
गूँज रही मैं
सदियाँ बीती।
3
बहती हूँ
ख़ामोश नदी सी,
कंकड़ बन क्यों
आ गिरते हो?
4
झील बनी हैं
आँखें मेरी,
चाँद के जैसे
तुम ठहरे हो!
5
रात हो गई
फिर से भारी,
खुली यादों की
बंद अलमारी।
6
मुस्काऊँगी
खिलूँगी,  मेरा वादा!
फूल -सा चेहरा
ओस का पहरा।
7
सहरा जीवन
तुम हो मंज़िल,
पाँव थके
न छाले फटते।
8
साँझ खिली है
दूर गगन में,
माँग पे मेरी
अधर तुम्हारे।
-0-

(26/03/2019, 19.40)


Saturday, March 23, 2019

885


इंसान पेड़ नहीं बन सकता कभी
रश्मि शर्मा

पेड़ अपने बदन से 
गिरा देता है 
एक-एक कर सारी पत्तियाँ
फिर खड़ा रहता है 
निस्संग
सब छोड़ देने का अपना सुख है
जैसे
इंसान छोड़ता जाता है
पुराने रिश्ते-नाते
तोड़कर निकल आता है
उन तन्तुओं को
जिनके उगने, फलने, फूलने तक
जीवन के कई-कई वर्ष
ख़र्च किए थे
पर आना पड़ता है बाहर
कई बार ठूँठ की तरह भी
जीना होता है
मोह के धागे खोलना
बड़ा कठिन है
उससे भी अधिक मुश्किल है
एक- एककर
सभी उम्मीदों और आदतों को
त्यागना
समय के साथ
उग आती है नन्ही कोंपलें
पेड़ हरा-भरा हो जाता है
पर आदमी का मन
उर्वर नहीं ऐसा
भीतर की खरोंचें
ताज़ा लगती है हमेशा
इंसान पेड़ नहीं बन सकता कभी।

-0-

Tuesday, March 19, 2019

884


कैसे आज मनाऊँ होली
भावना सक्सैना

कैसे आज मनाऊँ होली
सरहद पर फिर चली है गोली,
धरा का आँचल लाल हुआ 
मूक बाँकुरों की हुई बोली।

क्या उल्लास पर्व का दिल में
आँगन उजड़े, टूटी टोली,
लाल गँवाकर जानें अपनी 
खून से खेल गए हैं होली।

आँख गड़ाए कुर्सी पर जो
गिद्ध न समझे खाली झोली,
कानों में पिघले सीसे- सी
उतरे नेताओं की बोली।

अश्रुधार निरन्तर बहती
तीखा लवण जिह्वा पर घोली,
पकवानों का स्वाद कसैला
शान्त पड़े हैं सारे ढोली।

रंग तीन बस दिए दिखाई
सुबह आज जब आँखें खोलीं,
श्वेत, हरे केसरिया जग में
कोयल जयहिंद कूकती डोली।
-0-

Saturday, March 16, 2019

883


कलम गा उनके गीत
डॉ. सुरंगमा यादव

कलम गा उनके गीत
जिन्होंने बदली रीत
दीपक बनकर
अँधियारों से लड़ते
मरहम बन
पीड़ाएँ हरते
समय भाल पर
अंकित करते जो पद-चिह्न
बढ़ाते सबसे प्रीत
स्वकी अंधी दौड़ छोड़कर
परहित में सर्वस्व त्यागकर
नष्ट-भ्रष्ट कर जीर्ण पुरातन
सिंचित करते हैं मानव-म
जग के हित जिनका
मौन हुआ जीवन संगीत
तूफानों से घिरे रहे जो
फिर भी सदा अडिग रहे जो
औरों को करने को पार
मोड़ गये नदिया की धार
बाधाओं को करें सदा जो
साहस से विपरीत
-0-

Tuesday, February 26, 2019

882


1-सौ-सौ नमन !
भावना सक्सेना

सौ-सौ नमन उन्हें जो लिख आए
जय हिंद’, धरा पर दुश्मन की।
कर आए हस्ताक्षर अपने 
भर उड़ानें हौसलों की।
जग सोया नींद चैन की जब
वो थर्रा आए उस माटी को
पोषित करती जो कलुषित मन
है जननी आतंक के कर्दम की।
वो वीर बाँकुरे वायुपुत्र बाँच आए
दर्प देश के बल का अरि देहरी,
सौ नमन उन्हें जो लिख आए
'जय हिंद', धरा पर दुश्मन की।
-0-
2-जो काश्मीर माँगा अबके
विपन कुमार

जिस धरा की रक्षा को
दिन रात को दाव लगा बैठे
शिव की पावन माटी पे
हम लाखों वीर लुटा बैठे। 
भारत के मस्तक की गरिमा
जब भी संकट में आई है
इस पर चलने वाली गोली
हमने सीने पर खाई है। 
शहीदों की सींची माटी को
जब भी पाना चाहोगे
कारगिल जैसा  दोहराओगे
 तो हर बार मुँह की खाओगे। 

जन्नत की इस माटी का
क्या तुमने हाल बनाया है
लाखों के भाई छीने हैं, 
अनगिन का का सिंदूर मिटाया है। 
याद  रहे जिस दिन पानी
सिर के ऊपर चढ़ जाएगा
भारत का  हर एक विरोधी
सूली पर लटकाया जाएगा। 
भारती की संतान हैं हम
यही भाव मन में रखना होगा
जो आँख दिखाएगा हमको, 
उसे फल मौत का चखना  होगा। 

याद करो जब भी तुमने
घाटी पर अत्याचार  किया
तुम ज्जैसे गीदड़ झुंडो का
सिंहों ने  है शिकार किया। 
वो कैसे भूल हो  गए तुम , 
जब आतंक मचाया था
भारत के वीर सपूतों ने
झंडा लाहौर तक तुम्हें दौड़ाया था। 
चुल्लू भर पानी डूब मरो
कोई अपमान नहीं होगा
जो काश्मीर माँगा अबके 
तो पाकिस्तान नहीं होगा। 
-0-

Monday, February 18, 2019

881-दहशत का रास्ता


मंजु मिश्रा  

सरहदों पर यह लड़ाई
न जाने कब ख़त्म होगी
क्यों नहीं जान पाते लोग
कि इन हमलों में सरकारें नहीं
परिवार तबाह होते हैं

कितनों का प्रेम
उजड़ गया आज
ऐन प्रेम के त्योहार के दिन
जिस प्रिय को कहना था
प्यार से हैप्पी वैलेंटाइन
उसी को सदा के लिए खो दिया
एक खूँरेज़ पागलपन और
वहशत के हाथों

अरे भाई!
कुछ मसले हल करने हैं
तो आओ न...
इंसानों की तरह
बैठें और बात करें
सुलझाएँ साथ मिलकर
लेकिन नहीं, तुम्हें तो बस
हैवानियत ही दिखानी है
तुम्हें इंसानियत से क्या वास्ता
तुमने तो चुन ही लिया है
दहशत का रास्ता ....
तुम्हारी मंज़िल तो केवल तबाही है।
-0-
मंजु मिश्रा 
#510-376-8175

Thursday, February 14, 2019

880-मुक्ताकण

डॉ.कुमुद रामानन्द बंसल
  •  
विविधता -भरे जग में मत रोको सृजन
मत बाँधो सीमाओं में हृदय-स्पन्दन
प्रार्थना बना दो इस जग का हर क्रन्दन
तप,सत्य-साधना में बन जाओ कुन्दन
  •  
ज़िन्दगी की ढीली तारों को कस दे
या रब !जीवन में कुछ तो रस  दे ।
  •  
उम्मीद नहीं, मंज़िल नहीं,कारवाँ नहीं
सत्य हो साथ तो किसी की परवाह नहीं
  •  
जग की कटुता ने जब -जब रुलाया
परिन्दे को नई परवाज़ का ख़्याल आया।
-0-