पथ के साथी

Thursday, July 14, 2011

चिन्ता करना

-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

चिन्ता करना
खुलते घोटालों की
रक्षा करना
सत्ता के दलालों की
आम आदमी
मरता मरने दो
अपराधी को
लॉकर भरने दो
भूखे तड़पें
उनकी फ़िक्र नहीं
अन्न सड़ाओ
गड्ढों में भरने दो
देश है रोता
तुम कभी न रोना
लाशों को देख
धीरज नहीं खोना
भाषण देना
खुछ भी न करना
छुप जाना तू
ऊँची कुर्सी के नीचे
बैठे रहना
अपनी आँखें मीचे
सारी बाधाएँ
खुद टल जाएँगी
जनता का क्या
यूँ ही जल जाएगी
चिथड़े उड़ें
तुझको क्या डर है
परमपापी !
तू सदा अमर है
जो सच बोले
अगवा करवा दो
गुण्डों के बल
उनको मरवा दो
खा लेना सब
स्वीकार नहीं लेना
डकार  नहीं लेना
-0-


Friday, July 8, 2011

गुलमोहर की छाँव में


 रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
[ केन्द्रीय विद्यालय कटनी मध्य प्रदेश में जुलाई 2001 में गुलमोहर के पेड़ लगवाए थे । ये पेड़ अप्रैल 2005 में खिलने लगे थे ।इन पेड़ों से मेरा बहुत लगाव था । पूर्णिमा वर्मन जी के कहने पर अप्रैल 2006 में यह कविता लिखी गई । आगरा के रेलवे  स्टेशन के वेटिंग रूम में  यह कविता लिखी गई थी जो 16 जून को अनुभूति के गुलमोहर संकलन  में छपी थी ।डायरी कहीं गुम हो गई। अनुभूति में 2006 की रचनाएँ नहीं मिली तो पूर्णिमा जी से निवेदन किया । उन्होंने कल कविता का लिंक भेज दिया ।कटनी फोन करके मैंने इनका हालचाल भी पूछा ।अब आप सबके लिए ]
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

 गर्म रेत पर चलकर आए,
 छाले पड़ गए पाँव में
आओ पलभर पास में बैठो, गुलमोहर की छाँव में

नयनों की मादकता देखो,
गुलमोहर में छाई है
हरी पत्तियों की पलकों में
कलियाँ भी मुस्काईं हैं
बाहें फैला बुला रहे हैं ,हम सबको हर ठाँव में

चार बरस पहले जब इनको
रोपरोप हरसाए थे
कभी दीमक से कभी शीत से,
कुछ पौधे मुरझाए थे
हर मौसम की मार झेल ये बने बाराती गाँव में

सिर पर बाँधे फूल -मुरैठा
सजधजकर ये आए हैं
मौसम के गर्म थपेड़ों में
जी भर कर मुस्काए हैं
आओ हम इन सबसे पूछें -कैसे हँसे अभाव में
-0-

Wednesday, July 6, 2011

अमलतास के झूमर



        रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

धरती तपती लोहे जैसी
गरम थपेड़े लू भी मारे।
अमलतास तुम किसके बल पर
खिल-खिल करते बाँह पसारे।

पीले फूलों के गजरे तुम
भरी दुपहरी में लटकाए।
चुप हैं राहें, सन्नाटा है
फिर भी तुम हो आस लगाए।

कठिन तपस्या करके तुमने
यह रंग धूप से पाया है।
इन गजरों को उसी धूप से
कहकर तुमने रंगवाया है।

इनके बदले में पत्ते भी
तुमने सबके सब दान किए।
किसके स्वागत में आतुर हो
तुम मिलने का अरमान लिये?

तुझे देखकर तो लगता है-
जो जितना तप जाता है।
इन सोने के झूमर जैसी
खरी चमक वही पाता है।

जीवन की कठिन दुपहरी में
तुझसे सब मुस्काना सीखें।
घूँट-घूँट पी रंग धूप का
सब कुंदन बन जाना सीखें।
-0-

Monday, June 27, 2011

हाइगा

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
‘हाइगा’ जापानी पेण्टिंग की एक शैली है,जिसका शाब्दिक अर्थ है-'चित्र-कविता' ।यह पेण्टिंग हइकु के सौन्दर्यबोध पर आधारित है।जापानियों के जन -जीवन में इसका बहुत प्रचलन है ।इसे-कलाकार पेण्टिंग, फोटोग्राफ़ और अन्य कला के साथ हाइगा को जोड़ते हैं ।प्रसिद्ध हाइकुओं को पत्थरों पर उकेरकर स्मारक बनाने की कला को कुही कहा जाता है।यह कला शताब्दियों से प्रसिद्ध है । 

Saturday, June 25, 2011

हाइकु-पलाश -फूल



रचना श्रीवास्तव
1

 पलाश -फूल
खिले,घाटियों का

सजा आँगन   



2
रंगे प्रेम में
लालिमा  पलाश की
दोनों ही जून
3
मले हवाएँ
सूरज के गाल पे
टेसू के फूल
4
मौसम बैठे
खटिया, हाथ लिये
पलाश फूल
5
जंगल -आग
है या प्रेम प्रतीक
पलाश फूल
6
धूप छुए जो
पलाश के फूलों को
हो जाये  लाल
7
हवाएँ खेलें
ये गुट्टक पलाश
 के फूलों पर
 


8
टेसू के रंगों
से, सूरज सजाये
माँग रात की ।
-0-

Monday, June 20, 2011

खिल गए फूल पलाश के !



रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

निर्जल घाटी के सीने पर
आखर लिख दिये प्यास के ।
जंगल में भी शीश उठाकर
खिल गए फूल पलाश के ।


निर्गन्ध कहकरके ठुकराया
मन की पीर नही जानी 
छीनी किसने सारी खुशबू
बात न इतनी पहचानी
इसकी भी साथी थी खुशबू
दिन थे कभी मधुमास के ।
पाग आग की सिर पर बाँधे
कितना कुछ यह सहता है
तपता है चट्टानों में भी
कभी नहीं कुछ कहता है
सदियाँ बीती पर न बीते
अभागे दिन संन्यास के ।
यह योगी का बाना पहने
बस्ती में ता कैसे ?
कितना दिल में राग रचा है
 सबको बतलाता कैसे ?
धोखा इसने जग से खाया
जल गए   अंकुर आस के ।
इसकी पीड़ा एकाकी थी
सुनता क्या बहरा जंगल
इसके  आँसू दिखते कैसे
मिलता कैसे इसको जल
न बुझी प्यास मिली जो इसको
न बीते दिन  बनवास के ।
-0-
[फोटो:गूगल से साभार]




Thursday, June 16, 2011

मन का दर्पन -2 [चोका]


रामेश्वर काम्बोज हिमांशु’
भरम हुआ
यह न जाने कैसे
दरक गया
है मन का दर्पन ।
धुँधले नैन
ये देख नहीं पाए
कौन पराया
कहाँ अपनापन ?
मुड़के देखा-
थी  पुकार वो चीन्हीं
पहचाना था
प्यारा-सा सम्बोधन ।
धुली उदासी
पहली बारिश में
धुल जाता ज्यों
धूल-भरा आँगन ।
आँसू नैन में
भरे थे डब-डब
बढ़ी हथेली
पोंछा हर कम्पन ।
थे वे अपने
जनम-जनम के
बाँधे हुए थे
रेशम-से बन्धन ।
प्राण युगों से
हैं इनमें अटके
यूँ ही भटके
ये था पागलपन ।
तपता माथा
हो गया शीतल
पाई छुअन
मिट गए संशय
मन की उलझन ।
-0-

Tuesday, June 14, 2011

पिता के चरण


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

हाथ की रेखाओं में
 होता है कर्मों का लेखा -जोखा;
क्योंकि हाथ में पड़े गट्टे
दिखाते हैं कर्म करने की दृढ़ता
लेकिन
चरण भी बताते हैं अपनी पहचान
दिखाते हैं ज़िन्दग़ी का मुकाम
चरण ही बनाते हैं आचरण
किधर जाते हैं चरण?
वही दिशाएँ
सारा लेखा-जोखा रखती हैं
आचरण का मधुर फल चखती हैं।
वे चरण  जो मेरी दिशा तय करते
बरसों पहले
चुपचाप , बिना बताए
अचानक अँधेरे में गुम हो गए
उन्हें तो अभी नापने थे
ढेर सारे रास्ते
पाने थे बहुत सारे मुकाम
वे चरण इतने प्यारे थे कि
तारों के बीच जाकर
आकाश गंगा में खो गए
और हम उनको छूने के लिए
सिर्फ़ माथा झुकाए रह गए

पर आज चारों तरफ़ महसूस होता है-
उन चरणों के निशान,
उनकी खुशबू,
रास्ता खोजने में मदद करती है
आज भी उन चरणों से
प्यार-दुलार की आवाज़ आती है-
’शाबाश ! बढ़े चलो पुत्तर
ये धरती तुम्हारी है
जिसके चरण सही दिशा में बढ़ते हैं
उसका मज़मून
सारी दुनिया वाले
सदियों तक पढ़ते हैं।”
टप्- टप्- टप्-­ टप्
आँखों का गरम जल
उन निशानों पर टपकता है
वे चरण
और भी उजाला करने लगते हैं
साफ़-शफ़्फ़ाक़ दिखने लगती हैं -
सारी दिशाएँ,
महकने लगती हैं फिज़ाएँ
मेरे शुभ आचरण वाले पिता
आज भी बसे हैं मेरे तन-मन में
फेरते हैं हाथ आज भी
सोते -जागते ,थकान में ,सपन में
देते हैं हल्ला शेरी-
“बढ़े चलो पुत्तर
ये धरती तुम्हारी है
तुम्हें बनानी है दुनिया की नई तस्वीर
तुम्हें लिखनी है एक नई इबारत
और तुम्हें बनाना है
एक नई पगडण्डी
जिससे होकर लोग जा सकें,
जीवन का सत्य पा सकें।”
-0-

इस कविता के सन्दर्भ के लिए  शब्दों का उजाला पर क्लिक कीजिए 

Saturday, June 11, 2011

रेतीले रिश्ते !


डॉ हरदीप कौर सन्धु
कोई गम नहीं
रेतीले ही सही
वो रिश्ते तो हैं ....
हम अकेले नहीं
नाम के ही सही
वो रिश्ते तो हैं .....
उम्र भर प्यार
दिया है जिनको
वो रिश्ते तो हैं .....
प्यार
के आँचल में
भीग जाएँगे जब
ये रेतीले रिश्ते .....
प्यार ही प्यार
बरसाएँगे ये
रेतीले रिश्ते !
-0-

Thursday, June 9, 2011

चार कविताएँ : स्वाति


नवागत-परिचय

नाम - स्वाति वल्लभा राज,
जन्म-तिथि- 22-4-1987
पिता- श्री विनोद कुमार तिवारी (वाणिज्य लिपिक- रेलवे)
माता- श्रीमती अनीता तिवारी (शिक्षिका)
मूल रूप से मै सिवान(बिहार) की निवासी हूँ | स्नातक इलाहाबाद  से की है |
साहित्य से लगाव बचपन से ही है पर अब भावनाओ और अनुभवों को शब्दों का लिबास देना चाहती हूँ |

1-फुर्सत के पल

फुर्सत के पल
आज काटते है बेहिसाब
कभी इन्ही के आगोश में 
ज़िदगी आबाद थी |
2-सीलन 
गुजरे वक़्त की सीलन ,
अब भी मौजूद है दीवारों  में .
रंगों की कई परत भी
निशान न मिटा सकी |
3-राजनीति
अहिंसा,सत्याग्रह के दत्तक ही
भूल चले उस राह को.
नत-मस्तक हूँ मै
हे राजनीति !
तेरे काया-कल्प पर !
स्वर्णिम इतिहास रचने वाले
पोत रहे अब स्याही,
नत-मस्तक हूँ  मै हे! राजनीति
तेरे नव रूप पर ! 
4-नाकाम कोशिश
कर गबेपर्दा 
अनकहे ज़ख्मो को ये आँसू,
कोशिश तो की थी हमने
ता-उम्र मुस्कुराने की |
-0-
स्वाति