
पथ के साथी
Sunday, April 18, 2010
वक़्त नहीं

Monday, April 5, 2010
Kathmandu
Friday, March 26, 2010
SOME IDEAS FOR MOTIVATIONG STUDENTS TO PERFORM WELL
Monday, March 1, 2010
पिचकारी की धार, रंगों की बौछार
अपनों का प्यार, यही है होली को त्यौहार
होली की शुभकामनाएं
खुशियाँ ढेरों लाई होली।
राजा रंक सभी घर होली,
पकवानों सी मीठी होली।
बैर भाव मिटाए होली,
सबको गले लगाए होली।
होली की शुभकामनाएं
मधुर, नीलम, श्रेयांशी एवं श्रेयांश
गुना
तीन वर्ष पूरे
होली की शुभकामनाओं के साथ लेखनी का होली -विशेषांक भेज रही हूँ, उम्मीद है पसंद आएगा।
यहाँ इंगलैंड में भले ही अभी पातहीन वृक्षों पर कोपलें न फूटी हों, परन्तु चिड़ियों ने घोसले बनाने शुरु कर दिए हैं। सृजन और संरक्षण की इस एक और नई नवेली ऋतु में...बाहर बर्फ़ हो या बासंती बयार, आइये लेखनी के इन पन्नों पर हम आप खेलते हैं फाग। मनाते हैं एक बार फिरसे वही रूप और रंग का महोत्सव...रंग और रूप जिसके बिना व्यंजन ही नहीं, जीवन भी स्वादहीन है...जिसके हम-आप, हमारी संस्कृति और सभ्यता, सभी चिर दीवाने-से दिखते है।
Friday, January 1, 2010
शुभकामना !
मन से उर -कम्पन से
लिखूँ शुभकामना ।
उँगली तुम जीवन में
स्नेह की थामना ।
उगते रहें
सूरज
नित द्वार तुम्हारे ।
तुम नहीं
हारना
जग चाहे ये हारे ।
करना न पड़े कभी
दु:खों का सामना ।
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
Saturday, December 19, 2009
1-चक्रव्यूह
‘‘मँझले को देखो न, कितना कमज़ोर हो गया है।’’ सुबह पत्नी ने कहा।
‘‘देख तो मैं भी रहा हूँ। पर करूँ भी तो क्या? कलकत्ता में रहे हैं। वहाँ गरम कपड़ों की ज्यादा ज़रूरत नहीं पड़ी। अधिक न भी हों तो तीनों बच्चों के लिए एक–एक फुल स्वेटर ज़रूरी है। मैं चप्पल पहनकर ही आफिस जा रहा हूँ। कम–से–कम दो सौ रुपए हाथ में हों, तब मँझले का इलाज फिर शुरू कराऊँ।’’
‘‘मैं पिछले आठ साल से देख रही हूँ कि आपके पास महीने के अन्तिम दिनों में दो रुपए भी नहीं बचते।’’ पत्नी तुनक उठी।
कोई खांसी–जुकाम का इलाज तो कराना नहीं। लंग्स की खराबी है। साल–भर दवाई खिलाकर देख ली। रत्ती–भर फर्क नहीं पड़ा। संतुलित भोजन भी कहाँ मिल पाता है मंझले को।
मैंने देखा, पत्नी की आँखें भर आईं–‘‘तीनों बेटों में मँझला ही तो सुन्दर भी लगता है।....’’ उसने एक ओर मुँह घुमा लिया। मैं बिना खाए ही आफिस चला गया। मँझले का झुरता हुआ चेहरा दिन–भर मेरी आँखों में तैरता रहा। शाम को बोझिल कदमों से घर लौटा। पिताजी का पत्र आया था कि एक हज़ार रुपए भेज दूँ। अब उनको क्या उत्तर दूँ? महीने–भर की कमाई है आठ सौ रुपए। कहीं डाका डालूँ या चोरी करूँ? साल–भर में भी कभी एक हज़ार रुपए नहीं जुड़ पाए। वे बूढ़ी आँखें आए दिन पोस्टमैन की प्रतीक्षा करती होंगी कि मैं हज़ार न भेजता, तीन–चार सौ ही भेज देता।
एक पीली रोशनी मेरी आँखों के आगे पसर रही है जिसमें जर्जर पिताजी मचिया पर पड़े कराह रहे हैं और अस्थि–पंजर सा मेरा मँझला बेटा सूखी खपच्ची टांगों से गिरता–पड़ता कहीं दूर भागा जा रहा है। और मैं धरती पर पाँव टिकाने में भी खुद को असमर्थ पा रहा हूँ।
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2-चक्र
मोना को सुबह ही सुबह खेलते देखकर महेश ने पत्नी को कनखियों से इशारा किया–''देखो, मोना की रात भी कितना समझाया था कि सोने का वक्त हो गया है। खेल बंद करके होमवर्क पूरा कर लो। अब फिर सुबह ही सुबह......'' वह क्रौंध से होंठ चबाता हुआ दूसरे कमरे में चला गया। सहमा हुआ मोना नल पर जाकर ब्रश करने लगा। आठ बज गए। स्कूल जाने में सिर्फ़ आधा घंटा है। महेश की नज़रें मोना को तलाश रही थीं। उड़ती–सी नज़र बरामदे की ओर चली गई। पत्नी रसोईघर में व्यस्त थी। मोना दीवार के किनारे इमली के बीज फैलाकर निशाना साध रहा था। महेश इस बार संयम खो बैठा। उसने लपककर मोना को पकड़ लिया। एक के बाद एक थप्पड़ पड़ने लगे। उस पर जैसे पागलपन सवार हो गया था। उसने मोना को लाकर पलंग पर पटक दिया। एक चीख के साथ वह उछलकर खड़ा हो गया । पत्नी रसोईघर से दौड़कर आई। उसने पत्नी को एक तरफ धकेल दिया।
''मत मारो पापा.....'' उसने हाथ जोड़ दिए। डर के मारे पेशाब निकल जाने से उसकी पैण्ट गीली हो गई। सुबकियों के साथ उसका पूरा शरीर पत्ते की तरह काँप रहा था। महेश चीखा–''तुमको रात भी समझाया फिर भी तुम बात क्यों नहीं मानते?'' और थप्पड़ मारने के लिए हाथ उठाया। पत्नी ने हाथ पकड़ लिया–''अब जाने भी दो या जान ही लोगे इसकी।''
दफ्तर पहुचने पर उसका मन और व्याकुल हो गया। जब काम में मन नहीं लगा तो वह छु्ट्टी लेकर घर लौट आया।
मोना को बुखार चढ़ गया था। पत्नी सिरहाने बैठी थी। मोना ने धीरे से आँखें खोलीं। ''पापा''–कहकर फिर आँखें मूँद लीं।
''मैंने आज अपने बेटे को बहुत पीटा है न?'' महेश ने मोना के बालों में उँगलियाँ चलाते हुए कहा।
''मैंने भी तो आपकी बात नहीं मानी?'' मोना ने अपना हाथ पिता की गोद में रख दिया।
दोनों की आँखें भीग चुकी थीं।
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3-जहरीली हवा
आँख खुली। किशोर हड़बड़ाकर उठ बैठा। गला सूख रहा था। पानी पीकर थोड़ी राहत मिली। हाशिम गहरी नींद सोया हुआ था। उसे भयंकर सपने पर हैरत हुई। सपने उसे कभी–कभार ही आते हैं पर इस तरह का सपना तो कभी नहीं आता। पूरा शहर पागलपन की आग में धू–धू कर जल रहा है।
सोते समय उसने हाशिम से पूछा था–''इस पागलपन का अंत कैसे होगा?''
देखो भाई किशोर, पागलपन आदमी की फितरत बन गया है। फितरत कभी खत्म नहीं होती। हम जैसों की मित्रता ही इसका उत्तर है।''
''प्राण रहते मैं तुम्हारा बाल भी बाँका नहीं होने दूँगा।'' किशोर ने हाशिम का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा।
उसके बाद दोनों सो गए थे।
''मुझे ऐसा सपना क्यों आया? हे प्रभु!'' किशोर ने दीर्घ उच्छ्वास छोड़ा। हाशिम की नींद उचट गई। किशोर को बैठा देखकर वह उनींदे स्वर में बोला–''क्यों, क्या बात है? नींद नहीं.....आ रही है?''
''यूँ ही बस।''
''तुम फिर सोचने लगे?'' हाशिम ने मीठी झिड़की दी।
किशोर ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। हाशिम करवट बदलकर अबोध शिशु की तरह सो गया।
वह बेखबर सोते अपने जिगरी दोस्त को एकटक देखता रह गया था। भला वह सपने में भी अपने मित्र पर चाकू का वार कैसे कर गया।
रह–रहकर गोली चलने की आवाज़ वातावरण में दहशत भर रही थी।
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4-दूसरा सरोवर
एक गाँव था। उसी के पास में था स्वच्छ जल का एक सरोवर। गाँववाले उसी सरोवर का पानी पीते थे। किसी को कोई कष्ट नहीं था। सब खुशहाल थे।
एक बार उजले-उजले कपड़े पहनकर एक आदमी गाँव में आया। उसने सब लोगों को मुखिया की चौपाल में इकट्ठा करके बहुत अच्छा भाषण दिया। उसने कहा-"सरोवर आपके गाँव से एक मील की दूरी पर है। आप लोगों को पानी लाने के लिए बहुत दिक्कत होती है। मैं जादू के बल पर सरोवर को आपके गाँव के बीच में ला सकता हूँ। जिसे विश्वास न हो वह मेरी परीक्षा ले सकता है। मैं चमत्कार के बल पर अपना रूप-परिवर्तन कर सकता हूं। गाँव के मुखिया मेरे साथ चलें। मेरा चमत्कारी डंडा इनके पास रहेगा। मैं सरोवर में जाऊँगा। ये मेरे चमत्कारी डंडे को जैसे ही ज्ञमीन पर पटकेंगे, मैं फिर आदमी का रूप धारण कर लूँगा।"
लोग उसकी बात मान गए। उजले कपड़े किनारे पर रखकर वह पानी में उतरा। मुखिया ने चमत्कारी डंडा ज्ञमीन पर पटका। वह आदमी खौफनाक मगरमच्छ बनकर किनारे की ओर बढ़ा। मुखिया सिर पर पैर रखकर भागा। डंडा भी उसके हाथ से गिर गया।
अब उस सरोवर पर कोई नहीं जाता। उजले कपड़े आज तक किनारे पर पड़े हैं। गाँववाले चार मील दूर सरोवर पर जाने लगे हैं।
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Friday, November 27, 2009
मुक्तक
बघनखे पहनए हुए, पुरोहित अपने गाँव के ।
शूल अब गड़ने लगे हैं अधिक अपने पाँव के ।
दूर तक है रेत और गर्म हवा के थपेड़े
यहाँ पहुँच झुलसे सभी साथी ठण्डी छाँव के ।-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
Tuesday, November 17, 2009
शुभकामना !
जिंदगी आपकी खुशियों से भरी रहे ,
संगीता पुरी
Saturday, November 7, 2009
मैं उजाला हूँ
मैं उजाला हूँ ,उजाला ही रहूँगा ।
अँधेरी गलियों में ज्योति-सा बहूँगा ।
चाँद मुझे गह लेंगे कुछ पल के लिए ,पर मैं रोशनी की कहानी कहूँगा ॥
