पथ के साथी

Wednesday, January 17, 2018

789

विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र
1-माँ-         
कभी वो हाथ
सुकोमल से
फेरती थी
मेरे सर पर
तो मैं कहता
माँ !
क्यों बिगाड़ती हो मेरे बाल
समझ नहीं पाता था
उसके भाव
पर, आज वो ही हाथ
सूखकर पिंजर हो ग

अब मैं चाहता हूँ
वो मेरे सर पर
फिर से
फेरे हाथ
चाहे मेरे बाल
क्यों ना बिगड़ जा
एँ
बस, ये ही तो अंतर है
बालपन में
और आज की समझ में |
पर अब माँ
बिगाड़ना नहीं चाहती
सरके बाल
वो चाहती है
मैं ,बैठूँ उसके पास
देना नहीं, लेना चाहती
मेरा हाथ अपने हाथ में
बिताना चाहती है कुछ
पल
बतियाना चाहती मुझसे,
पा लेना चाहती है,
      अनमोल निधि जैसे...
-0-
2-गुनगुनी सी धूप में

जनवरी की गुनगुनी सी धूप में
क्या निखार आया है तेरे रूप में
थोथा -थोथा उड़ गया है देखिए
भारी दाना रह गया है सूप में
रात रानी बनी दिन राजा हुए
सुबह-शाम दोनों बने प्रतिरूप में
ओस की बूँदें मोती सी लगे
धुँध छाई प्रीति के स्वरूप में
अलग-अलग लबादे ओढ़े हुए
आदमी कैसा बना बहुरूप में
कैसा उड़ रही 'व्यग्र' पानी से  धुँ
आग जैसे लगी हो सारे कूप में

-0-
विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र',  कर्मचारी कालोनी,गंगापुर सिटी (राज.)322201,  मोबा : 9549165579
ई-मेल :-vishwambharvyagra@gmail.com

Tuesday, January 16, 2018

788

सत्या शर्मा ' कीर्ति ' की कविताएँ
1-मेरी इच्छाएँ

मेरी तमाम जीवित इच्छाओं
में एक यह भी है
कि किसी दिन
सूरज अपनी रोशनी
की लंबी चादर  बुन लें
और रात की गहरी कालिमा
को भी उजालों से भर दे
ताकि अँधेरी सुरंग- सी
जिंदगियों में भी
प्रकाश के कण भर सके....

कि कभी बादल
अपने गुब्बारे से शरीर में
भर ले ढेर सारा पानी
और तृप्त कर दे धरती का
सतरंगी आँचल
ताकि तप्त होती गर्मियों में भी
बुझती रहे हर कंठ की प्यास...

कि ठिठुरती रातें
अपनी सर्द हवाओं को
बाँधकर रखे
किसी गर्म खूँटे से
ताकि कँपकँपाती रातें
छीन न ले अनमोल जाने...

हाँ , मेरी तमाम जीवित
इच्छाओं के बीच ये भी है
की इसे मैं होते हुए
देखना चाहती हूँ....
-0-
 2-हम - तुम

हाँ
फिर आऊँगी
तुम्हारी यादों में

अपने दिल
के कमरे को
रखना तुम
ख़ाली

सुनो बाहर
शोर होगा
ज़माने का
और
दुखों की तेज
धूप में
पीले हो जाएँगे
हमारे रिश्ते के
कोमल पत्ते

पर, फिर भी आऊँगी

तब मेरी धड़कनों की
आहटों पर

तुम खोल देना
अपने मन में
चढ़ी वेदना की
साँकल को .....
-0-

Thursday, January 4, 2018

787

1-कविता
प्रियंका गुप्ता

लो,
आज सौंप रही हूँ तुम्हें
तुम्हारे दिए सभी वादे;
खोल रही हूँ
अपना नेह-बंधन
मेरे प्यार के पिंजरे का
ताला खुला है
जाओ,
खूब ऊँची परवाज़ भरो
दूर तक विस्तार करो
अपने पँखों का
और जब कभी थक जाना
तो लौटना नहीं
मैं तक न सकूँगी तुम्हारी राह,
इंतज़ार भी नहीं करूँगी
तुम्हारे लौट आने का
क्योंकि
तुमने शायद
कभी ठीक से देखा ही नहीं;
मैं बसेरा थी तुम्हारा
कोई सराय नहीं...।
-0-
2-हँसते जाना है
मंगल यादव
    हर पल हँसते जाना है
उम्मीद नहीं किसी से करना है
बस आगे ही बढ़ते जाना है
मिलेंगी रुकावटें राह में
मुश्किलों से लड़ते जाना है..
हर पल हँसते जाना है
ये ठान लो काम करके ही रहना है
ना मुमकिन कुछ भी नहीं
हर काम होता है नया
रोजाना कुछ न कुछ नया करना है
हर पल चलते जाना हैं
हर पल हँसते ते जाना है
ये मानकर चलो अकेले चलते जाना है
साथ में केवल आत्म विश्वास ही रहना है
बस आगे ही बढ़ते जाना है
हर पल हँसते सते जाना है
शिकवा-शिकायतें रहेगी बहुत
दरकिनार करते जाना है
लोगों को पढ़ते जाना है
प्यासे पक्षी की तरह
लक्ष्य पर आगे बढ़ते जाना है
जो भी मिले गले लगाते जाना है
हर पल हँसते जाना है।

-0-

Monday, January 1, 2018

786

1-नवगीत
रिश्ते बेनाम करे
डॉ.शिवजी श्रीवास्तव

आभासी दुनिया
सारे रिश्ते बेनाम करे
नेह भरे सम्बोधन,
बीते कल के नाम करे।

गली गली में बच्चे बैठे
इंटरनेट चलाते
दिन भर चैटिंग- वैटिंग करते
जाने क्या बतियाते,
रिश्तों की मर्यादा का
नया व्याकरण पढ़कर
मम्मी-पापा,दादी-बाबा,
सबको फ्रेंड बनाते,

कौन छुए अब चरण किसी के
कौन प्रणाम करे।

हरिया के बेटे- बेटी भी
हाट -बज़ार न जाते,
बैठे ही बैठे घर मे
सब ऑनलाइन मँगाते,
चना-चबैना लइया सत्तू
लगता उनको फीका
बड़े शौक से बैठ मॉल में
पिज्जा बर्गर खाते।

हाड़ तोड़ता हरिया दिन दिन
कर्जा कौन भरे।
-0-






                                          [उपर्युक्त फोटो-रश्मि शर्मा , राँची के सौजन्य से]                                                               

Sunday, December 31, 2017

785

1-डॉ0 कविता भट्ट  

रात का रोना तो बहुत हो चुका ,
नई भोर की नई रीत लिखें अब।

नहीं ला सकता  है समय बुढ़ापा ,
युगल पृष्ठों पर  हम गीत लिखें अब ।

नहीं हों आँसू  हों नहीं  सिसकियाँ,
प्रेम-शृंगार और प्रीत लिखें अब।

दु:ख- संघर्षों  से हार न माने ,
वही भावाक्षर मन मीत लिखें अब।

समय जिसे  कभी  बुझा  नहीं  पाए
हम वह जिजीविषा पुनीत लिखें अब

कभी हार न जाना ठोकर खाकर,
पग-पग पर वही उद्गीत लिखें अब।

काल -गति से  कभी बाधित न होंगे
आज कुछ इसके विपरीत लिखें अब।

यही समय हमारा नाम लिखेगा ,
सोपानों पर नई जीत लिखें अब।
-0-[हे0न0ब0गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर (गढ़वाल),उत्तराखण्ड]

2-सुनीता काम्बोज

नए साल में, नई धुनों पर
नए तराने गाएँगे
आगे बढ़ते जाएँगे

लक्ष्य निर्धारित कर अपना
दृढ़ निश्चय से बढ़ते जाना
आशाओं की  पकड़ी डोरी
घोर निराशा से टकराना
जिसे ज़माना याद करेगा
काम वही कर जाएँगे
नए---

मुरझाए रिश्तों में साँसें
भरने का दम रखते हैं
ठान लिया जो मन में उसको
करने का दम रखते हैं
नई चुनौती नई योजना
 ऊर्जा से भर जाएँगे
नए--

कुछ नूतन किसलय फूटेंगे
सूने मन की डाली पर
जो हैं सूखे ताल ,सरोवर
देंगे अब कर्मों से भर
तम को अपना दास बनाकर ,
नया सवेरा लाएँगे
नए--

-0-

Thursday, December 28, 2017

784

रामेश्वर  काम्बोज 'हिमांशु'
1
पलकों पर तुम रात दिन,उर में हर पल वास।
रोम-रोम में प्यार का,होता है आभास।।
2
झरने-सी तेरी हँसी,तिरती हरदम पास।
जीवन के पल चार में,तुम ही मेरी प्यास।।
-0-
चौपाई

आँसू 
ज्योत्स्ना प्रदीप


आँसू की जननी है  पीड़ा
करती है पर  कैसी  क्रीड़ा ।।
जनम दिया पर तज देती है 
आँखों के पथ  रज देती हैं ।।

आँसू का बस दोष बता दो 
रहे जहाँ ये वही  पता  दो ।।
आँखों से ये बह  जाते हैं
मौन व्यथा पर कह जाते हैं ।।

आँसू  जल का जीवन न्यारा
नयनों  चमके  मानों तारा ।।
ये भी जीवन के बलिदानी 
दूजों की पीड़ा  के  मानी  ।।
-0-

2-दिव्य - बिंदु 

नभ ,गिरि ,कानन तुम वसुधा हो
जनम - जनम की तीव्र क्षुधा हो ।।
रजत- चाँद हो तपस स्वर्ण से 
नील कमल के सरल पर्ण से ।।
  
तुम हो बादल  शांत  -सिंधु से 
पार न कुछ हो दिव्य - बिंदु से ।।
नयन अमिय को तुम  छलकाते
करुणा पाकर   कर  जुड़ जाते ।।
  
शिशु की कोमल किलकारी हो
सुरभित कुसुमों की क्यारी हो||
जानें अब किस देश बसे हो
किस नाते में  हमें  कसे  हो ।।
  
जग में जितना रहता छल है
इन आँखों से गिरता  जल है ।।
मन ना लगता है इस जग में
मन में रख लो या फिर दृग  में ||

-0-

Friday, December 8, 2017

783

तुम्हारी प्रतीक्षा में 
डॉ.कविता भट्ट

ठंडी रातों को पेड़ों के पत्तों से टपकती व्यथा है
बसन्त की आगन्तुक रंगीन परन्तु मौन कथा है                                                                                           तुम्हारी प्रतीक्षा में......
चौंककर जागती हूँ जब कभी रात में
पास अपने न पाती हूं तुम्हें रात में
विरहिणी बनी मैं न अब सोऊँगी
इसी पीड़ा के कड़ुवे सच में खोऊँगी
                   तुम्हारी प्रतीक्षा में......
बसंत है परन्तु उदास है बुरांसों की लाली
रंगों की होली होगी फीकी खाली थी दिवाली
खुशियाँ खोखली और हथेलियाँ हैं खाली
राहें देख लौटती आँखें उनींदी ,बनी हैं रुदाली
                   तुम्हारी प्रतीक्षा में......
प्रेमी पर्वत के सीने पर सिर रखकर सोती नदी ये
धीमे से अँगड़ाई लेकर पलटती सरकती नदी ये
कहती मुझे चिढ़ा कहाँ गया प्रेमी दिखाकर सपने झूठे 
चाय की मीठी चुस्कियाँ बिस्तर की चन्द सिलवटें हैं
                   तुम्हारी प्रतीक्षा में......   
अब तो चले आओ ताकि साँसों में गर्मी रहे
मेरे होंठों पर मदभरी लालियों की नर्मी रहे
चाहो तो दे दो चन्द उष्ण पलों का आलिंगन
बर्फीली पहाड़ी हवाओं से सिहरता तन-मन
                   तुम्हारी प्रतीक्षा में......    
अपने प्रेमी पहाड़ के सीने पर
सिर रखकर करवटें बदलती नदी,
बूढ़े-कर्कश पाषाण-हृदय पहाड़ संग,
बुदबुदाती, हिचकती, मचलती नदी।
तुम्हारी प्रतीक्षा में......
-0-

Tuesday, December 5, 2017

782

स्वप्न सभा में प्रिय तुम आना
डॉ कविता भट्ट

रात्रि-प्रहर की इस स्वप्न सभा में प्रिय तुम आना
सतरंगी विश्राम- भवन से कभी नहीं जाना

आज तक कभी मैंने मन का  द्वार नहीं उढ़काया
अहं-सांकल  न चढ़ाई न ताला कभी लगाया

खुले झरोखे बिछे प्रेम दरीचे सजे  दर्पण
देखो सीढ़ी चढ़कर, खाली राजा का आसन

नवकुसुमित अधर लिये हूँ शोभा तुम्ही बढ़ाना
पदचाप रहित  मंद-मंद पग-पग बढ़ते जाना

युग बीते प्रेम घट रीते,  इन्हें भरते जाना
कभी  रनिवास जीते, षोडश शृंगार सजाना

सप्त सुरों की ध्वनियों में गलबहियाँ पहनाना
रोम-रोम झंकृत हो ऐसा तुम  साज बजाना

         रात्रि-प्रहर की  इस स्वप्न सभा में प्रिय तुम आना
 सतरंगी विश्राम- भवन से कभी नहीं जाना

Sunday, December 3, 2017

781

 परिवर्तन की बेला है?
शरद सुनेरी
  
सच लटक रहा है खूँटी पर!
मूल्य फोड़ते  अब माथा!
रो-रो हर पल दोहराता है
बीते कल की गौरव गाथा!
जब गला घोंटकर रिश्तों ने
अपनों के दिल से खेला है।
ये परिवर्तन की बेला है?

कुछ सिक्कों की झनकारों में
अस्मत-इज़्ज़्त जब बिकते हैं
कलदारों की चमकारों में
ना दर्द जगत के दिखते हैं
इस युग की दानवताओं को
बेबस मानव ने झेला है
ये परिवर्तन की बेला है?

अधनंगे अंगों मे सिमटी
सभ्यता यहाँ सिंगार बनी
मदिरा, अधरों को छू-छूकर
दुनिया में शिष्टाचार बनी
आधुनिकता की चकाचौंध,
अय्याशों का मेला है।

ये परिवर्तन की बेला है?