सदानंद कवीश्वर
अंजू खरबंदा के साथ मेरा 5 वर्षों का परिचय मुझे यह बताने के लिए पर्याप्त है कि वह न केवल भावनाओं को महत्त्व देने वाली, कोमल हृदया, हँसमुख और मेहनती महिला है अपितु उसका सतत सान्निध्य मुझे यह भी बताता है कि वह अत्यंत अनुशासित एवं दृढ-प्रतिज्ञ भी है। वह नितांत गंभीरता से अपना काम तब भी करती थी जब वह एक कोचिंग सेंटर चलाती थी और उतनी ही गंभीरता से अब भी कर रही है जब वह पूरी तन्मयता से लेखन के क्षेत्र में उतर गई है। अंजू ने अपना लेखन कविताओं से प्रारंभ किया। मन की विभिन्न भावनाओं को शब्दों के माध्यम से कागज़ पर उतारने का काम वह लगातार करती रही। वर्ष 2017 का ही कोई समय था जब अंजू ने गद्य-लेखन के क्षेत्र में पदार्पण किया और लघुकथाएँ लिखने लगी। परिणाम स्वरूप सन् 2021 में उसका एक लघुकथा संकलन ‘उजली होती भोर’ पाठकों के समक्ष आया, जिसे सभी का प्यार-दुलार और सराहना मिले।
वर्ष 2020
में कोविड के कारण कोचिंग सेंटर का बंद होना अंजू के लेखकीय
व्यक्तित्व को निरंतर कोंच-कोंच कर स्मृतियों के महासागर में खींचता रहा। अवचेतन
में उन कटु-मधुर स्मृतियों में डूबते-उतराते अंजू अक्सर किंग्ज़वे कैंप की उन
गलियों में पहुँच जाती, जहाँ
वह बचपन में रही थी। उस समय की असंख्य स्मृतियाँ उसके मन को स्पर्श करते हुए कभी
हँसाती, कभी
रुलाती,
कभी गुदगुदाती और कभी विचलित कर देती। उसके अन्दर की लेखिका
बार-बार उन स्मृतियों को शब्दों का परिधान पहना, मूर्त रूप देना चाहती थीं किन्तु उसी समय अंजू अपने प्रथम
संकलन के कार्य में व्यस्त थी। तत्पश्चात एक अन्य संकलन के संपादन ने अंजू को
व्यस्त कर दिया। जब सामने के सारे अवरोध हट गए तो सभी संचित स्मृतियाँ शब्दों के
रूप में सामने आती गईं,
जिन्होंने अंततोगत्वा एक रोचक पुस्तक का आकार ले लिया। उस परिवेश का प्रभाव लेखिका
के मन पर इतना दृढ़ था कि इन संस्मरणों के संकलन का नाम ही ‘किंग्ज़वे कैंप –
दिल्ली-9’ रख दिया गया।
संस्मरण हिंदी
साहित्य की नूतन विधा है। डॉ. शांति स्वरूप गुप्त के शब्दों में कहा जाये तो – ‘भावुक कलाकार जब अतीत की अनंत स्मृतियों में
कुछ स्मरणीय अनुभूतियों को अपनी कोमल कल्पना से अनुरंजित कर व्यंजनामूलक संकेत
शैली में व्यक्त करता है तब उसे संस्मरण कहते हैं। इसका सम्बन्ध देशकाल तथा पात्र
दोनों से होता है, इसमें लेखक वर्ण्य विषय के साथ अपने बारे में भी कुछ कहता
चलता है। इसमें किसी शैली विशेष के स्थान पर लेखक जैसा देखता है,
अनुभव करता है,
वैसा ही वर्णन करता
चलता है।’ संस्मरण प्रायः अतीत की अनंत घटनाओं में से अत्यंत स्मरणीय
घटनाओं को लेखक द्वारा रोचक शैली में यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया जाता है। संस्मरण
में लेखक निजी अनुभव की उन स्मृति को साकार रूप प्रदान करता है,
जो उसके मन को अन्दर ही अन्दर कुरेदती रहती है तथा
अभिव्यक्ति के लिए उसके प्राणों को उद्वेलित करती रहती हैं।
भावुक मन की स्वामिनी
अंजू खरबंदा ने कठिन बाल्यकाल देखा है। उनका
कहना है ‘समय की एक अच्छी आदत है, जैसा भी हो बीत ही जाता है ।’ उनके बाल्यकाल का समय भी बीत ही गया किन्तु अपने पीछे ढेरों
यादें छोड़ गया। यादों का स्वरूप सदा सुखद, मनभावन या मधुर ही हो यह आवश्यक नहीं। वह कई बार स्वयं में
बीते हुए समय की कठिनाईयाँ, जीवन का संघर्ष और अनेक दुखद तथा उदासी भरे पल भी लिए होता है।
भारत-पाकिस्तान
बँटवारा अपने आप में एक भयंकर त्रासदी है। लेखिका ने बँटवारे की विभीषिका को स्वयं
न तो देखा न प्रतीत किया किन्तु उसके बाद की यातनाओं को पिता से अक्सर सुना और
गहराई से प्रतीत किया। बँटवारे के शिकार उनके पिताजी व अन्य परिजनों के उस संघर्ष
को प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देखा जो उन्हें परिवार के लालन-पालन के लिए करना पड़ा। उस
कठिन समय में अभावों की बीच पाँच बहन-भाईयों का पालन-पोषण यथासंभव संतोषजनक ढंग से
करने के प्रयास के बीच समय का कठोरतम आघात पाँचों बच्चों को मातृविहीन कर गया। यहीं
से अंजू के जीवन का कठिन काल प्रारंभ होता है। और यहीं से प्रारंभ होती है उनके
द्वारा लिखित संस्मरणों की कड़ियाँ। अंजू खरबंदा ने बहुत प्रमाणिकता से उन दिनों का
वर्णन कभी विवशताओं के विवरण के रूप में तो कभी बचपन के खेल-मनोरंजन,
कभी शिक्षा, नौकरी, विवाह और विवाहोपरांत के विवरण तथा जीवन-यात्रा में मिले
अनेक विशिष्ट व्यक्तियों से जुड़ी यादों के विवरण के रूप में बहुत रोचक ढंग से किया
है।
पुस्तक की भूमिका के
रूप में लिखी ‘मन की बात’ में लेखिका ने अपने दादाजी,
पिताजी तथा चाचाजी द्वारा बिताए गए कठिन समय तथा कई तरह की
जद्दोजहद का वर्णन किया है। पूरे परिवार द्वारा संयुक्त रूप से की गई कड़ी और
प्रामाणिक मेहनत ने परिवार को अच्छी स्थिति में लाने में सफलता प्राप्त की। एक
सुखी,
संतुष्ट तथा सफल पत्नी और दो बच्चों की माँ,
अंजू खरबंदा एक कोचिंग सेंटर चलाने लगीं। कोविड महामारी ने
जीवन के चलते पहियों को मानों रोक दिया था, फलस्वरूप अंजू जी का कोचिंग सेंटर बंद हो गया और उनके पास
दैनिक उत्तरदायित्व निभाने के बाद भी बहुत-सा समय बच गया। उस समय तक कविताएँ तथा
लघुकथाएँ लिखने वाली लेखिका, अंजू ने जब यादों के पृष्ठ पलटे तो ढेर सारी बातें संस्मरण
के रूप में उनके इर्द-गिर्द मंडराने लगीं। लेखिका का लेखक-मन उन्ही सुधि-पुष्पों
को वर्तमान के पुष्पस्तुवक में सजाता चला गया ।
कुछ संस्मरण परिवार
के निकटतम संबंधों को लेकर लिखे गए हैं, जिनमें ‘मेरी अम्मा’,
‘मेरे पापाजी’,
‘माँ’,
‘झाईजी’,
‘दादका’,
‘नानका’ आदि प्रमुख हैं। ‘मेरी अम्मा’ में लेखिका ने अपनी ममतामयी दादी के बारे में
लिखा है। अल्पायु में ही माँ के निधन के बाद दादी ने ही लेखिका तथा उसके चारों
भाई-बहनों का केवल पालन-पोषण ही नहीं किया अपितु माँ बन कर उनकी हर छोटी-बड़ी बात
का ध्यान रखा। संस्मरण से उद्धृत यह वाक्य इस बात की पुष्टि करता है. ‘उन्हें सदा
इस बात की चिंता लगी रहती थी कि बिन माँ की बेटियाँ बिगड़ न जाएँ ।’
‘मेरे पापाजी’ संस्मरण में अंजू ने
एक कर्मठ,
कर्तव्य-परायण, कठोर श्रम करने वाले तथा स्नेहमय पिता के बारे में लिखा है।
संस्मरण में उल्लिखित है कि कठिन तथा अभावग्रस्त परिस्थितियों में पाँच बच्चों तथा
अन्य सम्बन्धियों के परिवार का मुखिया होना कितना दुष्कर है किन्तु फिर भी लेखिका
के पिता ने कैसे, न केवल अपने कर्तव्यों की पूर्ति करते हुए परिवार का निर्वाह किया अपितु पूरे
मनोयोग से बच्चों की शिक्षा-दीक्षा तथा चरित्र-निर्माण के प्रति सजग रहे तथा
उन्हें दृढ़ता से आगे बढ़ने की प्रेरणा देने वाले आदर्श पिता भी बने। ‘माँ’ संस्मरण में परिवार के प्रति पूर्णतया समर्पित एक
स्नेहमयी माँ का सुन्दर वर्णन है। इसमें लेखिका ने अपनी यादों में सुरक्षित उस समय
के मनोहारी बिम्बों का बड़ी सुन्दरता से वर्णन किया है फिर वो... ‘माँ की सिंदूर की
डिबिया निकाल, उँगली
से गोल बिंदी लगाने का अभ्यास हो अथवा उनके गीले पैरों की छाप देख,
अपने पैर गीले कर ज़मीन पर वैसी ही छाप बनाने का प्रयत्न हो।
‘दादका’ और ‘नानका’ में क्रमशः उस ओर के सम्बन्धियों तथा
उनसे जुड़ी यादों का प्रभावशाली वर्णन है।
जिन दिनों लेखिका
किंग्ज़वे कैंप के उस मोहल्ले में रहती थी उस समय के परिवेश में कुछ काम और
गतिविधियाँ साधारणतया सभी घरो-परिवारों में हुआ करतीं थीं उन गतिविधियों तथा उनसे
सम्बंधित बातों-घटनाओं का वर्णन, फिर चाहे वो कोयले की केरी के गोले बनाने की बात हो या नल
पर जा कर सामूहिक रूप से कपड़े धोने की बात हो। कई संस्मरणों में इन बातों का
उल्लेख मिलता है जैसे... ‘केरी के गोले’, धुले कपडे’, ‘फ्रिज की बर्फ़’ आदि। कुछ ऐसे चरित्र होते हैं जो अनायास ही
हमारे जीवन में आ जाते हैं और अपनी उपस्थिति से हमारे जीवन में न केवल अद्भुत रंग
भर देते हैं अपितु उसमे अनेक मनभावन पल भी जोड़ देते हैं। ऐसे ही कुछ लोगों और उनकी
उपस्थिति तथा उनसे जुड़ी रोचक तथा भावनात्मक बातों को लेखिका ने अनेक संस्मरणों में
बहुत ही उत्तम ढंग से समाविष्ट किया है; जैसे... ‘टिक्की वाले सरदार जी’,
‘मिट्ठू जलजीरे वाला’,
‘भाऊ’,
‘चिज्जी वाली बुआ’,
‘इंद्रा मामीजी,
‘सिकंदर की दुकान’,
‘बत्रा आंटी’,
‘सुमन मैम’,
‘करतार भैया’,
‘बाबू मोशाय’,
‘सुरिंदर’,
‘मुरली’ आदि ।
अंजू खरबंदा मूलरूप
से एक भावुक महिला हैं। उनके जीवन में घटने वाला प्रसंग चाहे दुःख का हो,
ख़ुशी का हो, संतोष प्रदान करने वाला हो अथवा उद्वेलित करने वाला,
उनके अन्दर की भावनाएँ सदैव प्रबल रहती हैं। केवल दस वर्ष
की अल्पायु में माँ से बिछड़ना उनके जीवन की दुखद किन्तु एक महत्त्वपूर्ण घटना थी
जिसने उनके जीवन को बदल कर रख दिया। इसका अत्यंत मार्मिक व हृदयस्पर्शी वर्णन
उन्होंने ‘माँ का जाना’ नामक संस्मरण में किया है। ‘प्याज़ी सूट’ में एक स्नेहिल पिता द्वारा अपनी समझदार तथा
विषम परिस्थिति को समझने तथा स्वीकार करने वाली पुत्री को शादी में जाने के लिए एक नया सूट ला कर
देने का मार्मिक वर्णन है। ‘बँटवारा’ शीर्षक से लिखे संस्मरण में अंजू ने अपने संयुक्त
परिवार के बँटवारे की घटना को बहुत ही हृदयस्पर्शी शब्दों में वर्णित किया है। ‘संजोग’ एक बहुत ही रोचक संस्मरण है जिसमें लेखिका स्वयं
अपनी ही भाभी बन कर अपने विवाह के लिए प्रस्तावित प्रत्याशी से फ़ोन पर बात करती है।
इस संस्मरण में दोनों परिवारों के मंदिर में मिलने तथा विवाह पक्के होने का तथा एक
अन्य संस्मरण ‘पहली डेट’ में लेखिका तथा होने वाले पति के स्वतंत्र रूप से मिलने
का बहुत ही रसमय वर्णन है ।
पुस्तक पढ़ कर ऐसा
लगता है कि मिले हुए प्रत्येक व्यक्ति तथा प्रत्येक परिस्थिति से अंजू खरबंदा का
कोई न कोई संस्मरण जुड़ा हुआ है। सभी संस्मरण घटी हुई घटनाओं तथा भोगे हुए पलों का
प्रामाणिकता से किया हुआ सजीव चित्रण है। अंजू की भाषा सरल तथा सर्वग्राह्य है। आवश्यकतानुसार
हिंदी के साथ अन्य भाषाओं के
शब्दों का समावेश भी है।संस्मरण भले ही आकार में छोटे हैं किन्तु फिर भी चुने हुए
विषय, व्यक्ति
तथा परिस्थिति के साथ पूरी तरह से न्याय करते हैं। पुस्तक का शीर्षक ‘किंग्ज़वे
कैंप दिल्ली-9’ बहुत
ही सार्थक है; क्योंकि जिस
काल-खण्ड के ये संस्मरण हैं उसमें लेखिका दिल्ली के इसी क्षेत्र में रहती थी।
इसकी भूमिका लिखी
है दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर तथा पूर्व विधायक,
दिल्ली विधान सभा, डॉ. हरीश खन्ना जी ने। पुस्तक को बढ़िया आवरण पृष्ठ के साथ
इंडिया नेट बुक्स ने बढ़िया ढंग से
प्रकाशित किया है। यह बिक्री के लिए अमेज़न व क्लिपकार्ट पर भी उपलब्ध है ।
अंजू खरबंदा ने...
सुधि-पुष्पों की यह मनभावन माला, ‘किंग्ज़वे कैंप दिल्ली-9’ के रूप में पाठकों के समक्ष रखी है। इस बेहतरीन संकलन के
लिए हार्दिक बधाई तथा भविष्य के प्रकल्पों के लिए शुभकामनाएँ !
किंग्ज़वे
कैंप – दिल्ली-9 (संस्मरण- संग्रह )-अंजू खरबन्दा, पृष्ठ : 192, मूल्य : 375/-पेपर बैक , प्रथम संस्करण : 2023,ISBN :
978-93-95503-59-4।, प्रकाशक
: इंडिया नेटबुक्स प्राइवेट लिमिटेड, सी 122
सेक्टर
19, नोएडा 201301, गौतम बुद्ध नगर (उ. प्र.)
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