पथ के साथी

Friday, November 11, 2022

1257

 डॉ. शिप्रा मिश्रा

भोजपुरी कविताएँ

1-हम मजूर हई

 


झंडा आ रैली हमार ना ह

ई गरजे के सैली हमार ना ह

 

आन्ही पानी में टूटल बा केतना मचान

जोरत चेतत भेंटाईल ना आटा पिसान

केतना रतिया बीतल पेट कपड़ा से बान्ह

छूंछे चिउड़े जुड़ाईल ई देहिया जवान

 

अब ई जोगिया के भेली हमार ना ह

ई झंडा आ रैली हमार ना ह

 

हमार जघे जमीनवें हेरा ग‌ईलें

एगो ब‌एला के जोड़ी बिका ग‌ईलें

करजा भरत ई एड़ियां खिया ग‌इलें

फिफकाली से मुँहवा झुरा ग‌ईलें

 

अब ई टूटही झपोली हमार ना ह

ई झंडा आ रैली हमार ना ह

 

हम त च‌ईतो में बिरहा के राग गावेनी

हम त जेठ के दुपहरी में फाग गावेनी

हम त चूअत छप्परवा के फेर उठावेनी

हम त करिया अन्हरिया में लुत लगावेनी

 

ई सवारथ के खेली हमार ना ह

ई झंडा आ रैली हमार ना ह

 

हमरा खेतवे अगोरे से साँस ना मिलल

हमरा दूबर मवेसी के घास ना मिलल

ए क‌उवन में हियरा कहियो ना खिलल

लबराई के बजार से जियरा ना जुड़ल

 

ई गोबरा के ढेली हमार ना ह

ई झंडा आ रैली हमार ना ह                    

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 2-दुखड़ा

 



ए मलकीनी अब त हमर मजूरिया छूटल

कथी-कथी दुखड़ा रोईं हमर भाग बा फूटल

 

घोठा-घारी छोड़-छाड़ पियवा ग‌ईलें परदेस

असरा ताके एन्हरी-गेन्हरी लईहें कौनो सन्देस

 

रहिया चलत घमवे-घमवे उनकर मुंहवां मुरझ‌ईलें 

पेट अईठे ख‌ईला-ख‌ईला बिनू ई जिनगी ओझर‌ईले

 

का कहीं आपन बिपतिया सगरी जहान बा रूठल

ए मलकीनी अब त हमर मजूरिया छूटल

 

प‌ईसा-क‌ऊड़ी दाना-पानी के मोहताज हो ग‌ईलें

तर-तर लहू बहत गोड़वा में पीरा केतना भ‌ईलें

 

भोटवा बेरी केतना-केतना मुफुत के माल खिअवलें

अब केहू पुछव‌या न‌ईखे जीयले कि मरी ग‌ईलें

 

याद परल अब बनीहारी के फेर ढेंकी के कूटल

ए मलकीनी अब त हमर मजूरिया छूटल

 

मुँवाँ चिरलें काहें बरह्मा जे ना पेटवा के जोरलें

हमनी अभागा क‌ईसे जीएम कौन खेत के कोड़ले

 

फिफकाली सगरो जवार में मिले ना लौना-लाठी 

माड़-भात पर आफत भ‌ईलें आज बिक‌ईलें पाठी

 

कहिया ले ई भार ढोवाई अब असरा ई टूटल

ए मलकीनी अब त हमर मजूरिया छूटल

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2-पूनम सैनी

हुनर

 

 


मरहम एक यही यादों के ज़ख्म पर

सीख लीजिए फ़क़त भूलने का हुनर

 

देख ले ना कही अक्स उसका कोई

पलकों से मूँद लूँ मैं अपनी नज़र 

 

सूनी सी सारी है गलियाँ यहाँ अब

छोड़ चल दीजिए अब तो उनका शहर

 

हमसे पूछे कोई रूदाद दिल की

गम से होता यहाँ धड़कनों का बसर

 

कब थमा कारवाँ जीवन का यहाँ पर

हो ही जाता सभी का अकेले गुज़र 

 

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Friday, October 28, 2022

1255-करवाचौथ के बहाने..

 डॉ. सुरंगमा यादव

 

तुम न होतीं तो मेरे लिए


करवाचौथ व्रत रखता कौन

तुम न होतीं तो मेरे अँगना

चूड़ी- पायल खनकाता कौन

तुम न होतीं तो मेरे जीवन का

एकाकीपन भरता कौन

तुम न होतीं तो आलता लगाकर

मेरा आँरंग जाता कौन

तुम न होतीं तो घर के दर्पण पर

माथे की बिंदिया चिपकाता कौन

तुम न होतीं तो नित फरमाइश कर

मान- मनौव्वल करता कौन

तुम न होतीं तो बिखरे रिश्तों को

सीता और पिरोता कौन

तुम न होतीं तो जीवनभर

सुख- दु:ख में साथ निभाता कौन

तुम न होतीं तो व्याकुल मन की

बिन बोले पीड़ा पढ़ लेता कौन

मैं कहूँ भले ही न मुख से

तुम मेरे मन का हो  संबल

ये  हृदय जानता है मेरा

मुझको तुमसे है कितना बल

तुम से ही मान बढ़ा मेरा

तुमने परमेश्वर माना है

तुम अगर न होगी पास मेरे

घर क्या मन भी उजाड़ हो जाना है

तुमको खोने से डरता हूँ

व्रत भले नहीं मैं रख पाता

पर कुशल कामना करता हूँ

तुम जीवन रण में ढाल मेरी

निरंकुश मन का अंकुश हो

शब्दों में अधिक नहीं कह पाता हूँ

पर सच है तुम मेरा सब कुछ हो ।

-0-

Wednesday, October 26, 2022

1254

 इस दीवाली

 शशि पाधा

 

इस दीवाली दीप माल में 

आस की ज्योत जलाना मीता  


हर घर में उजियारा छाए
 

प्रेम की लौ बिखराना मीता 

 

दीपों की लड़ियों में हम- तुम 

धूप किरन को गूँथेंगे

झिलमिल तारों की लड़ियों को 

कंदीलों में बुन लेंगे

 

परहित जलती सूरज -ज्योति 

धरती पर ले आना मीता 

दीप वही जलाना मीता 

 

वैर-द्वेष की लाँघ दीवारें 

मिल-जुल पर्व मनाएँगे

हर देहरी रंगोली होगी 

मंगल- कलश सजाएँगे 

 

नीले अम्बर की बदली से 

नेह गगरी भर लाना मीता 

अँगना में बरसाना मीता 

 

चलो कहीं विश्वास जगाकर 

अधरों पे मुस्कान धरें 

चलो कहीं बाँटें फुलझड़ियाँ 

मिश्री मेवे थाल भरें 

 

आज किसी खाली झोली को 

खुशियों से भर जाना मीता 

ऐसा पर्व मनाना मीता 

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Tuesday, October 25, 2022

1253-मैं अदृश्या.. सॉनेट

 अनिमा दास

 उज्ज्वल नक्षत्रों में लुप्त जीवन का एक अन्वेषण


करती रही मैं अर्धशतक आयु पर्यंत निरीक्षण

मंत्र ध्वनि-मंगल ध्वनि से गूँजता रहा.. शून्यमंडल

दिवा-निशि आत्म-क्रंदन स्तब्ध किया पुष्प दल।

 

"तमिस्र तमिस्र" कहा; किंतु नहीं लाया कभी प्रकाश

अपितु तमस की परिधि में समग्र स्वप्न हुए नाश

शून्य को घोर शून्य होते करता रहा वह प्रतीक्षा

किंतु कहा नहीं अमृत मुहूर्त की भी हो अन्वीक्षा।

 

आज का ज्योति पर्व..मुखर हुआ शताब्दी पश्चात्

रघुवीर का प्रत्यागमन..अथवा विश्वास का भूमिसात्

किंतु हुआ था पुरुष पुरुषोत्तम... वैदेही हुई थी रिक्त

किंतु ज्योतिर्मय है अयोध्या..अंतर्मन हुआ प्रेम-सिक्त।

 

न न... कोई प्रतिवाद अथवा नहीं है कोई परिवाद

मैं सदा रहूँगी अदृश्या किंतु मुझसे ही होगा शंखनाद।

-0-कटक, ओड़िशा 

 

Friday, October 14, 2022

1252--कवि के घर में चोर

 रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

 

घुस गए चोर कवि जी के घर में

सोते-सोते सुना रहे थे कविता

वे ऊँचे स्वर में ;

संयोजक उन्हें बार-बार  कुर्ता खींचकर

टोक रहे थे ,

हर कविता के बाद घण्टी बजाकर  भी

उन्हें रोक रहे थे।

कवि जी झल्लाए,

और गला फाड़ आवाज़ में चिल्लाए-

‘यह मेरा घर है, मैं बार -बार बता रहा हुँ

आखिरी बार  तुम्हें अब समझा रहा हूँ-

यहाँ पर तुम्हारी दाल हरगिज़ न गलेगी

और कहीं चलती होगी तुम्हारी चाल

यहाँ पर बिल्कुल न चलेगी।’

 यह चेतावनी सुनकर

सिर पर रखकर पैर, चोर वहाँ से भागे

भगदड़ सुनकर कवि जी गहरी नींद से जागे।

कविता के फ़ायदे कवि जी को जँच गए

कविता के कारण ही वे लुटने से बच गए।

-0-8-9-1985


Saturday, October 8, 2022

1251

 1-हिन्दी है पहचान हमारी

डॉµ सुरंगमा यादव

     हिन्दी है पहचान हमारी
      हिन्दी है हम सबकी प्यारी
      इसके स्वर-व्यंजन में लहके
      नाना भावों की फुलवारी
हिन्दी ने छेड़ी जब तान
स्वतंत्रता का उत्कट गान
गूँज उठा बस एक राग
अंग्रेजों छोड़ो हिन्दुस्तान
      मीठी -मधुर बोलियाँ प्यारी
      हिन्दी की सखियाँ हैं सारी
      सूर कबीर औ' तुलसीदास
      हिन्दी है इन पर बलिहारी
आजादी को देख सिहाई
हिन्दी हँसी और मुस्कायी
जाने कैसी नीति बनी पर
हिन्दी करती है भरपाई
    शिक्षा और न्याय की भाषा
      बन अंग्रेजी करे तमाशा
       हिन्दी के सर चढ़कर बोले
       मैं ही हूँ भविष्य की आशा
अपनों का भी हाल अजब है
अंग्रेजी की बड़ी तलब है
'हिंग्लिश' ही अब बोल रहे हैं
अंग्रेजी ही स्टेट्स अब है
     लिपि से भी अब तोड़ें नाते
      रोमन लिपि में हिन्दी लिखते
      ए-बी-सी को बड़ा समझकर
       क-ख-ग से नाक चढ़ाते
लेकिन हिन्दी बढ़ती जाती
हिन्दुस्तान का दिल कहलाती
हिन्दी को बिन सीखे-समझे
संस्कृति नहीं समझ है आती

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2-खुशी/ पूनम सैनी

 

कहो कब है खुशियाँ मिली

मयखानों के द्वार

बहाने बहुत है बहने को,

बहकने को भी हज़ार

कोई डूबा बोतलों की आब में

कोई आँसुओं के सैलाब में

गम सदा रहा जलता मगर

दिल के कोमल चिराग में

ला लबों पर तू किसी के

महकी सी मुस्कान

छेड़ दे दिल तार पर तू

उल्लसित -सी तान

भरे नयन से बहता नीर

बाँटेगा बस केवल पीर

तेरे अधरों की मुस्कान

किन्हीं लबों की होगी शान

हृदय बरसते सावन को तू

बना बसंत का बाग खिला

बाँट सकोगे केवल उतना

जो भी खुद भीतर मिला

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Friday, October 7, 2022

1251

 कृष्णा वर्मा

1

चेहरे से कहाँ लगता है

असल का अंदाज़ा 

लोग तो परतों में 

खुला करते हैं।

2

दुख की जड़ों में ही होती है

सुख की पौध

ज्यों-ज्यों दुख काटते जाओगे 

सुख उगता आएगा। 

3

उँगलियाँ निभा रही हैं

रिश्तों को आज

जाने क्यों मार गया है काठ

ज़ुबानों को।

4

पल में ले लेते हैं जान

मख़मली लहजे

रखना परहेज़ 

शीरी ज़ुबानों से।

5

बूढ़ी माँ को बच्चे

समझें सौदाई

बात समझ के कहते 

समझ नहीं आई। 

6

चुप्पी का करें सम्मान 

गुरु होती है यह 

आवाज़ों की। 

7

बेग़ैरत लोग अक्सर 

उसी को डुबोते हैं 

जिससे सीखा होता है 

उन्होंने तैरना। 

8

बात तो आचरण की होती है

वरना 

क़द में तो साया भी 

इंसान से बड़ा होता है।

9

बेफिक़्री की डोर बाँधकर 

उड़ा दो आसमान में

परेशानियों की पतंग   

कोई न कोई तो 

कर ही देगा 

बो काटा। 

10

आसान नहीं होता

घरों को बसाना

पता नहीं 

कितनी परीक्षाओं से

गुज़रे होते हैं

बसे हुए घर। 

11

जिस ख़ास के लिए 

आप ख़ास नहीं हैं

उसे आम कर दो 

जिस आम के लिए  

आप ख़ास हो

उसे ख़ास कर दो।

13

व्यस्तता ही भली

तनिक खाली बैठे नहीं कि

बीते को दोहराने लगती हैं

तनहाइयाँ।

14

अच्छे लोग उन उजालों से होते हैं 

जो फासले तो कम नहीं कर सकते

लेकिन 

मंज़िल को आसान बना देते हैं।

15

आँसुओं की ताकत  

बेरंग होते हुए भी 

कर देती है आँखों को लाल।  

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