पथ के साथी

Sunday, June 24, 2012

फिर से नन्हीं बच्ची बना दो मुझे माँ |


कमला निखुर्पा
मन में उमडी है यादों की घटा
फिर तेरे नेह की  आयी है याद माँ,
तेरे गोदी में मिला बचपन को जो सुकून,
नहीं नसीब वो वातानुकूलित कमरों में माँ |
जाने किस माटी से गढा था विधाता ने ,
चैन से जीते  तुझे देखा नहीं कभी माँ |
सुलाए मुझे  सुनाके मीठी लोरियाँ ,
कब से गीले बिछौने पे सोई रही माँ|  
दुपहरी की धूप में तन को जला के ,
चाँद की शीतलता आँचल में भर लाई माँ |
समेट समंदर को अपनी उनींदी आँखों में,
नित नेह की गंगा में नहलाए मुझे माँ |







रिश्तों के वन में भटका जीवन हिरन,
कस्तूरी बन फिर से महका दो मुझे माँ |
कुट्टी कर आयी हूँ खुशियों से अपनी ,
आँचल में अपने  छुपा लो  मुझे माँ |
दिला  दे मुझे मेरी गुडिया और गुड्डा
फिर से नन्हीं बच्ची बना दो मुझे माँ |

Monday, June 4, 2012

बाबुल तुम बगिया के तरुवर


बाबुल तुम बगिया के तरुवर
गोपाल सिंह नेपाली
गोपाल सिंह नेपाली
[ 12 दिसम्बर 2010,पटना के माध्यमिक शिक्षा मण्डल के हॉल में स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की भतीजी  सविता सिंह नेपाली ने जब यह गीत गाया तो गहन सन्नाटा खिंच गया ।सभी की आँखें तरल थीं । नेपाली जी की जन्मशती पर यही गीत राष्ट्रपति भवन में भी सविता सिंह नेपाली ने गाया ।आह्वान -21 से साभार]
बाबुल तुम बगिया के तरुवर, हम तरुवर की चिड़ियाँ रे  ।
दाना चुगते उड़ जाएँ हम, पिया मिलन की घड़ियाँ रे  ।
उड़ जाएँ तो लौट न आएँ , ज्यों मोती की लडियाँ  रे
सविता सिंह नेपाली : फोटो-हिमांशु
बाबुल तुम बगिया के तरुवर …….

आँखों से आँसू निकले तो पीछे तके नहीं मुड़के
घर की कन्या बन का पंछी, फिरे न डाली से उड़के
बाजी हारी हुई त्रिया की
जनम -जनम सौगात पिया की
बाबुल तुम गूँगे नैना, हम आँसू की फुलझड़ियाँ रे  ।
उड़ जाएँ तो लौट न आएँ ज्यों मोती की लड़ियाँ रे ।

हमको सुध न जनम के पहले
अपनी कहाँ अटारी थी
आँख खुली तो नभ के नीचे , हम थे, गोद तुम्हारी थी
ऐसा था वह रैन -बसेरा
जहाँ साँझ भी लगे सवेरा
बाबुल तुम गिरिराज हिमालय , हम झरनों की कड़ियाँ रे ।
उड़ जाएँ तो लौट न आएँ , ज्यों मोती की लड़ियाँ  रे  

छितराए नौ लाख सितारे , तेरी नभ की छाया में
मंदिर -मूरत , तीरथ देखे , हमने तेरी काया में
दुःख में भी हमने सुख देखा
तुमने बस कन्या मुख देखा
बाबुल तुम कुलवंश कमल हो , हम कोमल पंखुड़ियाँ  रे  
उड़ जाएँ तो लौट न आएँ , ज्यों मोती की लड़ियाँ  रे  

बचपन के भोलेपन पर जब , छिटके रंग जवानी के
प्यास प्रीति की जागी तो हम , मीन बने बिन पानी के
जनम -जनम के प्यासे नैना
चाहे नहीं कुँवारे रहना
बाबुल ढूँढ फिरो तुम हमको , हम ढूँढें बावरिया रे  
उड़ जाएँ तो लौट न आएँ , ज्यों मोती की लड़ियाँ  रे  

चढ़ती उमर बढ़ी तो कुल -मर्यादा से जा टकराई
पगड़ी गिरने के दर से , दुनिया जा डोली ले आई
मन रोया , गूँजी शहनाई
नयन बहे , चुनरी पहनाई
पहनाई चुनरी सुहाग की , या डाली हथकड़ियाँ  रे  
उड़ जाएँ तो लौट न आएँ , ज्यों मोती की लडियाँ  रे  

मंत्र पढ़े सौ सदी पुराने , रीत निभाई, प्रीत नहीं
तन का सौदा कर के भी तो , पाया मन का मीत नहीं
गात फूल- सा , काँटे पग में
जग के लिए जिए हम जग में
बाबुल तुम पगड़ी समाज के , हम पथ की कंकरियाँ  रे  
उड़ जाएँ तो लौट न आएँ , ज्यों मोती की  लड़ियाँ  रे  

माँग रची आँसू के ऊपर , घूँघट गीली आँखों पर
ब्याह नाम से यह लीला ज़ाहिर करवाई लाखों पर

नेह लगा तो नैहर छूटा , पिया मिले बिछुड़ी सखियाँ
प्यार बताकर पीर मिली तो, नीर बनीं फूटी अँखियाँ
हुई चलाकर चाल पुरानी
नई जवानी पानी पानी
चली मनाने चिर वसंत में , ज्यों सावन की झड़ियाँ रे  ।
उड़ जाएँ तो लौट न आएँ , ज्यों मोती की लड़ियाँ रे  

देखा जो ससुराल पहुँचकर , तो दुनिया ही न्यारी थी
फूलों- सा था देश हरा , पर काँटो की फुलवारी थी
कहने को सारे अपने थे
पर दिन दुपहर के सपने थे
मिली नाम पर कोमलता के , केवल नरम कांकरियाँ रे  ।
उड़ जाएँ तो लौट न आएँ , ज्यों मोती की लड़ियाँ रे  

वेद-शास्त्र थे लिखे पुरुष के , मुश्किल था बचकर जाना
हारा दाँव बचा लेने को , पति को परमेश्वर जाना
दुल्हन बनकर दिया जलाया
दासी बन घर बार चलाया
माँ बनकर ममता बाँटी तो , महल बनी झोंपड़ियाँ रे  ।
उड़ जाएँ तो लौट न आएँ , ज्यों मोती की लड़ियाँ रे  

मन की सेज सुला प्रियतम को , दीप नयन का मंद किया
छुड़ा जगत से अपने को , सिंदूर बिंदु में बंद किया
जंजीरों में बाँधा तन को
त्याग -राग से साधा मन को
पंछी के उड़ जाने पर ही , खोली नयन किवड़ियाँ रे  ।
उड़ जाएँ तो लौट न आएँ , ज्यों मोती की लड़ियाँ रे  

जनम लिया तो जले पिता -माँ , यौवन खिला ननद -भाभी
ब्याह रचा तो जला मोहल्ला , पुत्र हुआ तो बंध्या भी
जले ह्रदय के अन्दर नारी
उस पर बाहर दुनिया सारी
मर जाने पर भी मरघट में , जल - जल उठीं लकड़ियाँ रे  ।
उड़ जाएँ तो लौट न आएँ , ज्यों मोती की लड़ियाँ  रे  

जनम -जनम जग के नखरे पर , सज -धजकर जाएँ वारी
फिर भी समझे गए रात -दिन, हम ताड़न के अधिकारी
पहले गए पिया जो हमसे अधम बने हम यहाँ अधम से
पहले ही हम चल बसें , तो फिर जग बाँटें रेवड़ियाँ  रे
उड़ जाएँ तो लौट न आएँ , ज्यों मोती की लड़ियाँ  रे
-0-


Friday, June 1, 2012

खुशबू है आँगन की (माहिया)


 रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1
मिलने की मज़बूरी
पास बहुत मन के
फिर कैसी है दूरी
2
बेटी धड़कन मन की
दीपक मन्दिर का
खुशबू है आँगन की
3
आँसू सब पी लेंगे
जो दु:ख तेरे हैं
उनको ले जी लेंगे
4
मन की तुम मूरत हो
जितने रूप मिले
उनकी तुम सूरत हो

Friday, May 18, 2012

यादों की लोई(हाइकु)


डॉoसुधा गुप्ता जी के हाइकु
 [आज आप 78 वर्ष पूरे करके  79 वें वर्ष में प्रवेश कर रही हैं ।सभी सहृदय  रचनाकारों की  अशेष शुभकामनाओं  आपके साथ हैं ]
1
काँटों की खेती
जीवन जोत दिया
चुभे तो रोती ?
2
मेघ मुट्ठी में
क़ैद चाँद , फिसला
निकल भागा ।
3
कौन पानी पी
बोलती री चिड़िया
इतना मीठा !
4
पूनो की रात
चाँद ने बहकाया
लहरें उड़ीं ।
5
गुल्लक फोड़
चुलबुली रात ने
बिखेरे सिक्के ।
6
धुली चादर
चटक चाँदनी की
बैठे हैं तारे ।
7
धुआँ चिलम
नशाखोर शाम ने
लगाया दम ।
8
फूलों का सही
टूट गई कमर
बोझ उठाते ।
9
काली चादर
उजाले के फूल से
काढ़ती रात ।
10
धूप से डर
पीली छतरी ओढ़े
खड़ा वैशाख ।
11
बेसुध पड़ी
नींद के घोंसले में
पाखी -बिटिया ।
12
यादों की लोई
खूँटी पर टँगे-टँगे
कीड़े कुतरी ।
( चुलबुली रात ने-हाइकु संग्रह-2006)

Tuesday, May 1, 2012

जीवन -राग ( हाइकु)



रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
धोखा दे नेता
लुटती है जनता
ठौर न  मिले ।
2
खा गए देश
गरीब बदहाल
कौर न मिले ।
3
हरे न भूख
आँकड़ों का खेल
चिढ़ाता रोज़ ।
4
भोर समीर
परसे जब तन
हरसे मन ।
5
कितनी पीर !
कोकिल हो अधीर
दिल दे चीर
 6
जीवन -राग
लगता जब दाग़
गूँजे संगीत
7
कच्ची कली-सी
कच्ची नींद जो टूटे
सपने रूठे
8
जीवन-नैया
तूफ़ानों में जो घिरी
छूटे किनारे
9
नहीं कुसूर
हम हैं कोसों दूर
मन के पास 

Thursday, April 19, 2012

हाइकु हो ना ?


कमला निखुर्पा


1
गागर छोटी 
भरूँ मैं तो सागर 
हाइकु हो ना ?
2
बहती जाए 
नयनों से नदियाँ 
सागर हो क्या ?
3
महक उठा
मोरा  माटी- सा तन 
फुहार हो क्या ?
4
डूब चली मैं 
नेह- ज्वार उमड़ा
चन्दा हो क्या ?
5
तिरती जाऊँ 
ज्यों लहरों पे नैया 
खिवैया हो  क्या ?
6
तुमने छुआ 
क्या से क्या बन चली 
पारस हो क्या ?
7
कुछ यूँ लगा 
उमंगित है मन 
त्योहार हो क्या ?
8
कौन हो तुम ?
कितने रंग तेरे ?
चितेरे हो क्या ?
9
जो भी हो तुम
हो जनमों के मीत 
कह भी दो हाँ !
10
मैं नहीं बोली -
बोल पड़ी कविता 
छंद ही हो ना ?
-0-




Wednesday, April 18, 2012

साथी


सीमा स्‍मृति

जिन्‍दगी करती है सवाल हमसे
क्‍या है गम
और
है क्‍या खुशी ?
अतल सागर में
तलशाता है क्‍यों कोई निधि
प्रश्‍न, लहरो से उठते हैं निगाहों में
छू कर किनारा
कभी शांत- श्‍वेत मेघ से
लौट जाते हैं
और
कभी तोड़ डालना चाहते हैं किनारा
कठोर वक्‍त बन
सोचती हूँ-
उत्तर दूँ या नहीं
खुशी और गम की
कोई सीमा नहीं
हर बदलते क्षण में
ये बंध जाते हैं
प्रश्‍न करने से पूर्व
और
उत्तर की प्रतीक्षा में
संवेदना के ये साथी
रंग बदल जाते हैं।
-0-

Wednesday, April 11, 2012

उपचार


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
      नेताजी कई दिन से बीमार थे । अस्पताल के कई बड़े डॉक्टर परिचर्या में लगे  हुए थे । दवाइयाँ भी बदल-बदलकर  दी जा रही थीं। नेताजी की मूर्च्छा फिर भी न टूट पाई  । चिन्ता बढ़ती जा रही थी । गण व्याकुल हो उठे । प्रमुख गण को एक उपाय सूझा । वह दौड़ा-दौड़ा एक दूकान पर गया । वहाँ पार्टी के प्रान्तीय अध्यक्ष की कुर्सी  मरम्मत के लिए आई थी । वह घण्टे भर के लिए कुर्सी माँग लाया । चार लोगों ने भारी-भरकम नेता जी को कुर्सी पर बिठा दिया । उनकी चेतना लौट आई ।
डॉक्टरों ने राहत की साँस ली ।
-0-

Thursday, April 5, 2012

पीर- तरी(चोका)


 रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

पीर-तरी से
निकले सागर में
तुमसे कैसे
अपने दु:ख बाँटूँ !
घोर अँधेरा
पथ है अनजाना
बोलो कैसे मैं
दर्दीले पल काटूँ ।
जितने मिले
हमें प्राण से प्यारे
न चाहकर
वे हर बाजी  हारे
गहन गुफ़ा
पग-पग है खाई
कैसे इनकी
गहराई पाटूँ !
जो दिखते हैं
महामानव ज्ञानी
उनकी लाखों
हैं कपट कहानी
रोती दीवारें
सन्तापों की हिचकी
लाक्षगृह में
घिरे जीवन भर
बूँद-बूँद को
तरस गए तुम
सुने न कोई
सागर -सी गाथा
दूँ प्यार किसे ?
सब पर पहरा
हर द्वारे पे
है सन्नाटा गहरा
कोई न बूझे
जले मन की ज्वाला
राह न सूझे
किस -किस पथ के
मैं सब काँटे छाँटूँ  ।
-0-

Sunday, April 1, 2012

नये सेतु


सीमा स्मृति
1-संघर्ष
न्धकार से लड़ने की परिभाषा से दूर,
रोशनी से आवरित उस भीड में,
जिसकी चकाचौंध में मिचमिचाने लगी है आँखें,
धुँधलाने लगे है रास्ते,
खो गई है शक्ति,
स्त हो गई है सारी धारणाणाएँ,
संर्षसामर्थ्य और चेतना के संग
निकल पडा है जीवन
किसी नये सेतु के सहारे
उस पार
समकालीन जीवन -मं‍‍‍‍‍थन करने ।
-0-

2-मुलाकात

तुझसे मिलना
इक रवायत नहीं
किसी उम्र का
महकता सुरूर भी नहीं
बदली हवाओं में
थमा सा कोई नशा भी नहीं ।
तुझ से मिलना
जिन्दगी में मिले छालों को,
अपने ही हाथों से मरहम लगाना -सा
दर्पण में अक्स की पहचान सा
रात के बाद दिन से मुलाकात -सा
यथार्थ के टुकडों को सजोना -सा
अतीत में थमे एहसास सा लगता है मुझे ।
-0-