पथ के साथी

Thursday, June 16, 2011

मन का दर्पन -2 [चोका]


रामेश्वर काम्बोज हिमांशु’
भरम हुआ
यह न जाने कैसे
दरक गया
है मन का दर्पन ।
धुँधले नैन
ये देख नहीं पाए
कौन पराया
कहाँ अपनापन ?
मुड़के देखा-
थी  पुकार वो चीन्हीं
पहचाना था
प्यारा-सा सम्बोधन ।
धुली उदासी
पहली बारिश में
धुल जाता ज्यों
धूल-भरा आँगन ।
आँसू नैन में
भरे थे डब-डब
बढ़ी हथेली
पोंछा हर कम्पन ।
थे वे अपने
जनम-जनम के
बाँधे हुए थे
रेशम-से बन्धन ।
प्राण युगों से
हैं इनमें अटके
यूँ ही भटके
ये था पागलपन ।
तपता माथा
हो गया शीतल
पाई छुअन
मिट गए संशय
मन की उलझन ।
-0-

Tuesday, June 14, 2011

पिता के चरण


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

हाथ की रेखाओं में
 होता है कर्मों का लेखा -जोखा;
क्योंकि हाथ में पड़े गट्टे
दिखाते हैं कर्म करने की दृढ़ता
लेकिन
चरण भी बताते हैं अपनी पहचान
दिखाते हैं ज़िन्दग़ी का मुकाम
चरण ही बनाते हैं आचरण
किधर जाते हैं चरण?
वही दिशाएँ
सारा लेखा-जोखा रखती हैं
आचरण का मधुर फल चखती हैं।
वे चरण  जो मेरी दिशा तय करते
बरसों पहले
चुपचाप , बिना बताए
अचानक अँधेरे में गुम हो गए
उन्हें तो अभी नापने थे
ढेर सारे रास्ते
पाने थे बहुत सारे मुकाम
वे चरण इतने प्यारे थे कि
तारों के बीच जाकर
आकाश गंगा में खो गए
और हम उनको छूने के लिए
सिर्फ़ माथा झुकाए रह गए

पर आज चारों तरफ़ महसूस होता है-
उन चरणों के निशान,
उनकी खुशबू,
रास्ता खोजने में मदद करती है
आज भी उन चरणों से
प्यार-दुलार की आवाज़ आती है-
’शाबाश ! बढ़े चलो पुत्तर
ये धरती तुम्हारी है
जिसके चरण सही दिशा में बढ़ते हैं
उसका मज़मून
सारी दुनिया वाले
सदियों तक पढ़ते हैं।”
टप्- टप्- टप्-­ टप्
आँखों का गरम जल
उन निशानों पर टपकता है
वे चरण
और भी उजाला करने लगते हैं
साफ़-शफ़्फ़ाक़ दिखने लगती हैं -
सारी दिशाएँ,
महकने लगती हैं फिज़ाएँ
मेरे शुभ आचरण वाले पिता
आज भी बसे हैं मेरे तन-मन में
फेरते हैं हाथ आज भी
सोते -जागते ,थकान में ,सपन में
देते हैं हल्ला शेरी-
“बढ़े चलो पुत्तर
ये धरती तुम्हारी है
तुम्हें बनानी है दुनिया की नई तस्वीर
तुम्हें लिखनी है एक नई इबारत
और तुम्हें बनाना है
एक नई पगडण्डी
जिससे होकर लोग जा सकें,
जीवन का सत्य पा सकें।”
-0-

इस कविता के सन्दर्भ के लिए  शब्दों का उजाला पर क्लिक कीजिए 

Saturday, June 11, 2011

रेतीले रिश्ते !


डॉ हरदीप कौर सन्धु
कोई गम नहीं
रेतीले ही सही
वो रिश्ते तो हैं ....
हम अकेले नहीं
नाम के ही सही
वो रिश्ते तो हैं .....
उम्र भर प्यार
दिया है जिनको
वो रिश्ते तो हैं .....
प्यार
के आँचल में
भीग जाएँगे जब
ये रेतीले रिश्ते .....
प्यार ही प्यार
बरसाएँगे ये
रेतीले रिश्ते !
-0-

Thursday, June 9, 2011

चार कविताएँ : स्वाति


नवागत-परिचय

नाम - स्वाति वल्लभा राज,
जन्म-तिथि- 22-4-1987
पिता- श्री विनोद कुमार तिवारी (वाणिज्य लिपिक- रेलवे)
माता- श्रीमती अनीता तिवारी (शिक्षिका)
मूल रूप से मै सिवान(बिहार) की निवासी हूँ | स्नातक इलाहाबाद  से की है |
साहित्य से लगाव बचपन से ही है पर अब भावनाओ और अनुभवों को शब्दों का लिबास देना चाहती हूँ |

1-फुर्सत के पल

फुर्सत के पल
आज काटते है बेहिसाब
कभी इन्ही के आगोश में 
ज़िदगी आबाद थी |
2-सीलन 
गुजरे वक़्त की सीलन ,
अब भी मौजूद है दीवारों  में .
रंगों की कई परत भी
निशान न मिटा सकी |
3-राजनीति
अहिंसा,सत्याग्रह के दत्तक ही
भूल चले उस राह को.
नत-मस्तक हूँ मै
हे राजनीति !
तेरे काया-कल्प पर !
स्वर्णिम इतिहास रचने वाले
पोत रहे अब स्याही,
नत-मस्तक हूँ  मै हे! राजनीति
तेरे नव रूप पर ! 
4-नाकाम कोशिश
कर गबेपर्दा 
अनकहे ज़ख्मो को ये आँसू,
कोशिश तो की थी हमने
ता-उम्र मुस्कुराने की |
-0-
स्वाति

Sunday, June 5, 2011

क्षणिकाएँ



रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
डरीडरी आँखों में
तिरते अनगिन आँसू
इनको पोंछो
वरना जग जल जाएगा ।
2
उम्र तमाम
कर दी हमने
रेतीले रिश्तों के नाम ।
3
औरत की कथा
हर आँगन में
तुलसी चौरेसी
सींची  जाती रही व्यथा ।
4
स्मृति तुम्हारी-
हवा जैसे भोर की
अनछुई , कुँआरी ।
5
माना कि
झुलस  जाएँगे हम,
फिर भी सूरज को
धरती पर लाएँगे हम ।
-0-

Thursday, June 2, 2011

नींव के पत्थर

मंजु मिश्रा , कैलिफ़ोर्निया

नींव के पत्थर
दिखते नहीं,
 सहते हैं, सारा बोझ
इमारत का.
और दरवाज़े, खिड़की,कँगूरे
बस यूँ ही इतराते रहते हैं  ।                                                                                                         *मंजु मिश्रा जी की और अधिक कविताएँ 'मनुकाव्य' पर पढ़ें ।

Tuesday, May 31, 2011

मन दर्पन [चोका]


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

मन दर्पन
दरक गया जब,
बिखर गया
सारा सुख-जीवन ।
पाती अनाम
आती है आजकल
लूटे किसने ?
वे प्यारे सम्बोधन ।
आदि बेनामी
नहीं कुछ भीतर ,
लिये उदासी
हो रहा समापन ।
कोई न जाने
वह चुप्पी का दंश,
खूब रुलाए
साँसों पर बन्धन ।
सपने खोए
ज्यों गर्म तवे पर
थे आँसू बोए
किया सब तर्पण ।
कहाँ कन्हैया ?
गुम कहाँ बाँसुरी
भटके राधा
शापित वृन्दावन ।

मज़बूरी जो
हम वह भी जाने
व्याकुलता से
भरे, नयन करें
दु:ख का आचमन ।
-0-
*चोका की अधिक जानकारी के लिए हिन्दी हाइकु देखिएगा । 


Saturday, May 28, 2011

व्यंग्य–दोहे


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1
मन में कपट -कटार है, मुख पर है मुस्कान ।
गलीगली में डोलते, ऐसे  ही  इंसान ।।
2
नफ़रत सींची रातदिन , खेला नंगा खेल ।
आग लगाकर डालते, खुद ही उस पर तेल ।।
3
जनता का जीना हुआ, दो पल भी दुश्वार ।
गर्दन उनके हाथ में, जिनके हाथ कटार ।।
4
ऊँची ऊँची कुर्सियॉं, लिपटे काले नाग ।
डॅंसने पर बचना नहीं, भाग सके तो भाग ।।
5
रातअँधेरी घिर गई, मुश्किल इसकी भोर ।
भाग्य विधाता बन गए, डाकूलम्पटचोर ।।
6
गुंडों के बल पर चला , राजनीति का खेल ।
भले आदमी रो रहे,   ऐसी पड़ी नकेल ।।
7
बनी द्रौपदी चीखती,अपनी जनता आज ।
दौर दुशासन का चला, कौन बचाए लाज ।।
8
अफसरअजगर दो खड़े , काको लागौ पाँय ।
बलिहारी अजगर तुम्हें ,अफ़सर दियो बताय ।।
9
बाती कौए , ले उड़े , चील पी गई तेल ।
बाज देश में खेलते , लुकाछिपी का खेल ।।
10
बिना खाद पानी बढ़ा, नभ तक भ्रष्टाचार ।
सदाचार का खोदकर, फेंका खरपतवार ।।
11
जनता की गर्दन सहे, झटका और हलाल ।
जन सेवक जी खा रहे, रोजरोज तर माल ।।
12
छल करने का लग सके, जरा न तन पर दाग ।
आस्तीन में रहा करो, बनकर काला नाग ।।
13
मित्रों में हमने लिखा, जबसे उनका नाम ।
धोखा खाने का किया , खुद एक इन्तजाम ।।