पथ के साथी

Thursday, August 24, 2023

1364-नानी का घर

 शशि पाधा

 

चंद्रयान  पर बैठ आज मैं 

नानी के घर आई हूँ 

धरती माँ ने भरी  जो झोली 

सब भेंट  बाँधके लाई हूँ

 

दूर देस से रातों को नित 

देखा करती चन्दा मामा 

माँ की लोरी, कथा पिता में 

तुम ही तुम थे प्यारे मामा 

 

बरसों से जो पहुँच न पाई 

माँ की राखी लाई हूँ 

तेरे माथे रोली चन्दन 

आज सजाने आई हूँ

 

घटते-बढ़ते तुझे देख कर 

माँ को चिंता होती थी 

देख तेरी वो छवि सलोनी 

सुखद चैन से सोती थी 

 

मटकी  भर जो भेजी माँ ने 

खीर खिलाने  आई हूँ 

आशीषों से भरी पिटारी 

बड़े दूर से लाई हूँ 

 

खोल के गठरी देख तू मामा 

और क्या माँ ने भेजा है 

 थोड़ी सी आँगन की  मिट्टी

 और तिरंगा  भेजा है 

  

स्वीकार करो सब भेंट ओ मामा 

 बड़े गर्व से लाई हूँ 

  भारत माँ का गौरव गान 

  तुझे सुनाने आई हूँ 

 

द्वार खोल एक बार मैं अपनी 

नानी का चरखा तो देखूँ

जितना  सूत कता है अब तक 

सब अपनी गठरी में भर लूँ 

 

जाते ही पूछूँगी माँ से 

बूझो क्या-क्या लाई हूँ 

नानी और मामा का सारा 

प्यार बाँधके लाई हूँ

 

खुश हूँ आज, कितनी  खुश हूँ 

नानी के घर आई हूँ  

 मामा से मिलने आई हूँ 

(23 अगस्त , 2023)

 

*चाँद पर चंद्रयान के सफलता पूर्वक पैर रखने का दृश्य देखते हुए मन में उमड़े उदगार मैंने शब्दों में बाँध लिये।

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Monday, August 21, 2023

1363

 

1-मुझको सुननी हैं

डॉ. सुषमा गुप्ता

 


 

 मुझको अपने होने को जुनूँ की हद तक मिटाना है।

मुझे जीने हैं किरदार बहुत सारे,

और नकार देना है मेरा, मुझ जैसा होने को।

 

अपनी आँखों में रखनी है मुझे हज़ार आँखें ।

उन सबकी आँखें, जो धोखा देते भी हैं, धोखा खाते भी हैं।

 जो प्रेम करते भी हैं और बेज़ार भी हो जाते हैं

जो लुटते हैं शिद्दत से, जो शिद्दत से लूट भी जाते हैं ।

 

मुझको उन सबके दिल रखने हैं अपने सीने में ।

 

मुझको सुननी हैं हज़ार हा धड़कनें,

मुझको सुननी हैं सर्द आहें और ठंडी चीखें ।

 मुझको जलाने हैं अपने ही माँस के टुकड़े,

मुझको सेंकना हैं उन पर नरम हाथों की दिलफरेब लकीरों को ।

 

मेरे मन का तार मेरी नाभि से नहीं जुड़ता,

वो जुड़ता है मेरे पैर के तलवे के तिल से कहीं ।

मेरे जिस्म की रंगों से लहू निकालो ज़रा,

उनमें ग़मज़दा हारों का बयां बहने दो ।

मुझको बस मेरे ही जैसा नहीं रहना,

मेरे अंदर हज़ार- हा किरदारों को रहने दो

 

मुझको मेरे ही भीतर तकसीम हो जाना है

मुझको इस गंध की स्याही से हरफ़ बनाने दो

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2-शिव सावन हो तुम

सुरभि डागर 

 

हर श्वास- श्वास में शिव समाया

शिव संग सावन झूम- झूमके आया

 मैं इठलाती बलखाती -सी

शिव का जाप लगाती ,

कर सोलह शृंगार

शिव से मिलने जाती ।

हाथों में पूजा की थाली 

नयनों में दर्शन की तीव्र अभिलाषा

बन त्रिलोकी नाथ विराजे

बिल्वपत्र में तीन 

देव त्रिलोक दर्शाते

कर शृगार शिव और भी 

मनमोहक हो जाते।

लगा त्रिपुण्ड बैठे ।

भोलेनाथ !

मेरे घर क्यों नहीं आते ।

आज चलो हठ कर बैठी

अशोकसुंदरी- सी मैं भी तेरी बेटी हूँ

थाम लिया हाथ तुम्हीं ने 

भाव से तुम्हें मनाती हूँ

बीत रहा है सावन 

ले कोथली  बाबा  बेटी के

घर आता है।

प्रेमपूर्ण है निमंत्रण

तुम्हें बुलाने को जी 

चाहता है

नन्दी संग बाबा 

द्वार पर तुम मेरे आना

आ गया बेटी बाबा तेरा

ऐसे टेर लगाना।’

 

 

 

Wednesday, August 16, 2023

1362

1-छूटे थे हाथ 

कृष्णा वर्मा 

 

छूटे थे हाथ 

बँटे थे मन 

कटे थे अनगिन 

तन-बदन 

प्यार- मोहब्बत 

चाहतें- ख़्वाब 

मिले थे मिट्टी में 

होने को ख़ाक 

छूटे थे पुरखे 

औ माँ- सी ज़मीन 

लम्हा-लम्हा यादें 

हो गईं तक़्सीम 

यूँ पाई आज़ादी 

बने स्वाभिमानी 

सिंचीं थीं जड़ें 

रक़्त के खाद-पानी

हुए आज़ाद 

देके कितने बलिदान 

हैं कुर्बानियों की 

लम्बी दास्तान 

भारत के सपूतों 

पले मन में अरमान 

थामें रखना कस के 

तिरंगे की लगाम 

लहराए सदा 

एकता के दम से 

हमारे प्यारे भारत की  

आन -बान शान 

जय हिन्द जय भारत। 

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2-कोशिशों में कशिश

डॉ. सुरंगमा यादव
1
कोशिशों में कशिश तो होती है
मंज़िलें खुद ही चली आती हैं
इत्तिफ़ाक़न मंजिल न भी मिले तो-
कोशिशें तजुर्बा तो बढ़ाती हैं।
2
ज़िन्दगी इतनी आसान भी नहीं-
जितनी हम समझ लेते हैं
ज़िन्दगी इतनी मुश्किल भी नहीं
जितनी हम बना लेते हैं।

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Monday, August 14, 2023

1361-सॉनेट

 

विनीत मोहन औदिच्य 

 


1-पन्द्रह अगस्त (सॉनेट)

  

पन्द्रह अगस्त पन्द्रह अगस्त आ गया पुनः पन्द्रह अगस्त

ध्वज स्वतंत्रता का फहराने निकला सूरज कर तिमिर पस्त

इस दिन के लिए ही वीरों ने कर खून स्वयं कामनाओं का

अपना सर्वस्व न्योछावर कर इतिहास लिखा बलिदानों का।

 

गांधी,सुभाष,आजाद,तिलक,सरदार,भगत सिंह,मौलाना

गोखले, जवाहर, मालवीय, सबने पहना था एक बाना

सन सैंतालिस पीछे छूटा  पर जंग अभी तक जारी है

इस देश से ज्यादा, अब अपनी आजादी सबको प्यारी है।

 

जनसंख्या बढ़ती दिन प्रति दिन है रोजगार आसान नहीं

विकराल समस्याओं से घिर, खोयी मानव पहचान कहीं

अनुभूति है यद्यपि कड़वी ये क्यों मिली देश को आजादी

जिनको संवारना था भविष्य वो ही कर बैठे बरबादी।

  

परमार्थ स्वार्थ से गौण हुआ हक कर्तव्यों पर भारी है

है भ्रष्ट व्यवस्था अधिकारी जनता बेहद दुखियारी है।।

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 2-भारत वर्ष (सॉनेट)

 

वर्ष का सूरज बनकर, प्रभु कृपा दृष्टि कर दे

तिमिर हटाकर जीवन पथ को, आलोकित कर दे

दैविक, भौतिक संतापों से, मुक्त हों भारत के वासी

रहें प्रफुल्लित सब जन गण कभी न छाये यहाँ उदासी।

 

पुण्य सलिल से सिंचित खेत सब , स्वर्ण धान्य उपजाएँ

शस्य श्यामला धरा, बाग, फल - फूलों से खिल जायें

रहे न बचपन कोई अभागा, छाँव मिले ममता की

नारी का सम्मान करें सब, सेवा भी मात पिता की।

 

हो किसान ऋण मुक्त, सुखी, संपन्न यही वर लेना

दिशा हीन को दिशा दिखा और बेघर को घर देना

जन।-जन में स्फूर्ति चेतना, नव यौवन अब भर जाये

मिट जाये आतंक, शांति का, शाश्वत स्वर मिल पाये।

  

मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर से, गूँजे बस एक ही नारा

प्रेम की भाषा बोल एक है, भारत वर्ष हमारा प्यारा।।

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3-स्वर्णिम भारत(सॉनेट)

 

सार्थक जीवन का साथियों हैं यही परम उद्देश्य

विकसित और संपन्न हों गाँव प्रदेश और यह देश

भ्रूण की हत्या छुआछूत और जात - पाँत की रीत

जुआ शराब नशे के व्यसन से कोई न करना प्रीत।

 

कन्या लक्ष्मी रूप मान कर घर घर हो उनका सम्मान

नारी शक्ति को पहचानें, करे न अब कोई अपमान

हों शिक्षित समस्त नर नारी, धरम करम में पक्के

राष्ट्रभक्ति और संस्कारों से, हों पोषित देश के बच्चे।

 

उन्नत खेती पर हो निर्भर  रहें प्रसन्न अन्नदाता किसान

श्रम की शक्ति को अपनाये, शहरी और ग्रामीण युवान

अधुनातन विज्ञान की धारा, अब लाये चहुँ दिस क्रांति

जन - जन के आंगन में खेले, सुख, समृद्धि और शांति।

 

शहर की अंधी दौड़ बंद कर सब जन लाएं नवीन समग्र विकास

गाँव,नगर वासी मिलजुल कर लिखें स्वर्णिम भारत का इतिहास।

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Saturday, August 12, 2023

1360-समय की विसंगतियों से टकराती 'समीप' की गज़लें

 

समय की विसंगतियों से टकराती 'समीप' की गज़लें
                             -शिवजी श्रीवास्तव
समीक्ष्य कृति-हरेराम समीप चयनित ग़ज़लें, संस्करण-2023, मूल्य: 200₹, पृष्ठ:108
प्रकाशक-न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन,   नई दिल्ली-110012

आज के हालात बतलाना जरूरी हो गया
इसलिए मुझको ग़ज़ल गाना ज़रूरी हो गया।
         अनेक विधाओं के सिद्धहस्त रचनाकार  श्री हरेराम 'समीप' जी की एक ग़ज़ल का यह मतला उनके 

रचना-सरोकारों को स्पष्ट करने का एक उदाहरण मात्र है। समीप जी एक प्रतिबद्ध रचनाकार हैं,उनकी प्रतिबद्धता जन सामान्य की बेहतरी और खुशहाली के प्रति है।जन सामान्य की पीड़ाओं,बदहाली,जीवन-संघर्षों और व्यवस्था के छल से उपजे द्वंद्वों को उनकी ग़ज़लें प्रभावी ढंग से स्वर प्रदान करती हैं। अभी हाल ही में 'न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन' ने समकाल की आवाज शृंखला के अंतर्गत उनकी सौ प्रतिनिधि ग़ज़लों का एक संग्रह 'हरेराम समीप चयनित गज़लें' शीर्षक से प्रकाशित किया है।संग्रह में संकलित  सभी ग़ज़लों मे उनकी ये प्रतिबद्धता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। संग्रह की समस्त गज़लें वर्तमान के विद्रूप को उद्घाटित करती हुई  समय के ज्वलंत प्रश्नों से लगातार जूझती दिखलाई देती हैं।अपनी गज़लों के विषय मे उन्होंने स्वयं ही संग्रह की भूमिका में लिखा है-
              आज ये जो भयावह स्थितियाँ हमारे सामने हैं-सृजन पर विध्वंस का आक्रमण हो रहा है,संरक्षण से अधिक विनाश की शक्तियाँ बलवती हो रही हैं,छल,कपट,लालच,आतंक और क्रूरता मूल्यों में बदल रहे हों,जहाँ जीवन पर हमारा दृढ़ विश्वास भी दरकने लगा हो,आस्थाएँ खण्डित हो रही हों और बाज़ार तथा कट्टरता ने बर्बरता की सभी सीमाएँ लाँघ दी हों, तब ये गज़लें क्रूर वास्तविकताओं की पड़ताल करते हुए अपने समय से टकराना चाहती हैं और मानवता की रक्षा करना चाहती हैं।
     इसमें कोई शक नहीं कि समीप जी की ग़ज़लें समय की भयावह सचाइयों को न केवल सामने लाती हैं अपितु उनसे टकराती भी हैं। उनकी ग़ज़लें व्यवस्था के छद्म को बेनकाब करने का प्रयास करती हैं,वे स्पष्ट कहते हैं-
''समय का रावणी अब आचरण है
जहाँ देखो सीताहरण है।
सियासत की चलो पर्तें उधेड़ें
जहाँ अब आवरण ही आवरण है।

     सियासत में आवरण ही आवरण इसलिए हैं; क्योंकि सत्ता में चाहे जो हो व्यवस्था का चरित्र वही रहता है। नेतृत्व किसी का हो उसे पहले व्यवस्था के हितों का पोषण करना होता है-
ये रहे या वो रहे अंतर नहीं है,
आज सच्चा कोई भी लीडर नहीं है।
इक सफर के बाद हम पहुँचे जहाँ पर
उस जगह भी ज़िंदगी बेहतर नहीं है।

         वर्तमान परिदृश्य ऊपर से भले ही मोहक दिखलाया जा रहा हो पर वस्तुस्थिति भिन्न है।ये बाज़ार का युग है।पूँजीवाद का ये सबसे विकृत  और छली रूप है। बाजार का विस्तार  मनुष्य की निजता को खण्डित करते हुए उसे अकेला कर रहा है।बाज़ार अपने सम्मोहन में व्यक्ति को वैसे ही उलझा रहा है जैसे मकड़ी अपने जाल में शिकार को उलझाती है, विडम्बना यह है कि लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सत्ताएँ भी बाज़ार के पक्ष में खड़ी नजर आती हैं-
लोग धोखा खा गए इस बार फिर मतदान में
फँस गए मजदूर जैसे कोयले की खान में
जाल मकड़ी बुन रही है यूँ निराले ढंग से
हर कोई फँसता मिला बाजार की मुस्कान में।

                 लोकतंत्र में आम जन चुनी हुई सरकार पर विश्वास करता है,वह वोट देकर अपने हितों की सरकार चुन लेने  के भ्रम में जीता है पर वह जिन्हें अपना रहनुमा समझता है जिन पर अटूट विश्वास करता है वे भी बाज़ार के साथ  खड़े नजर आते  हैं-
सूरज दिखाके हमको नए इश्तिहार में
ले जा रहा वो रहनुमा अंधकार में।
सब कुछ तो बेचने पे तुला है वो आजकल
पानी, हवा, प्रकाश, ज़मीं कारोबार में।
       बाज़ार के विस्तार ने मनुष्य को बहुत अकेला करके उसे त्रासद स्थितियों में जीने को अभिशप्त कर दिया है। वर्तमान की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि व्यक्ति ने स्वयं को सामाजिक सरोकारों से पृक् कर लिया है।भीड़ भरे स्थलों पर,सड़कों पर नृशंस अपराध होते रहते हैं पर चलती हुई भीड़ सबसे निरपेक्ष बनी रहती है कहीं कोई संवेदना  नही दिखती,कहीं कोई हलचल नहीं, अपराध और अपराधियों के प्रतिरोध में कहीं एक स्वर नही उठता-
तमाचा मार लो, बटुआ छुड़ा लो, छ भी कर डालो,
ये दुनियादार शहरी हैं ,इन्हें गुस्सा नहीं आता।

            आदमी के मनोबल के गिरने का मूल कारण यही है कि उसे धीरे-धीरे अकेला किया गया है उसे समस्याओं में उलझाया गया,परस्पर लड़ाते हुए कमजोर किया गया इसके साथ ही भ्रष्ट तंत्र को खाद-पानी देकर पुष्ट किया गया। ये सिलसिला लंबे अंतराल से चल रहा है, सत्ता कोई भी हो व्यवस्था के चरित्र में बदलाव नहीं आया। ऐसी अवस्था में आम आदमी असहाय और कमजोर हुआ है-
एक लंबी यात्रा उपरांत जो ये घर मिला
उसके हर कोने में हमको सिर्फ डर ही डर मिला।
वो मिला तो हमने समझा हो गई पूरी मुराद
देवता की शक्ल में लेकिन वो सौदागर मिला।
     झूठ,लो लुपता और परस्पर के झगड़े वर्तमान की तीखी सच्चाइयाँ हैं। अकाल हो या दंगे अर्थसत्ता अपने लाभ के रास्ते खोज लेती है, इस तथ्य को समीप जी बड़ी सादगी से कह देते हैं-
क्या हुआ जो अकाल है यारो
शेयरों में उछाल है यारो।
वक्त का ये कमाल है यारो
झूठ अब मालामाल है यारो।

    समाज में बढ़ता वैमनस्य और विद्वेष रोज ही नए झगड़ों को जन्म दे रहा है। लोग परस्पर अनावश्यक मुद्दों पर उलझ रहे हैं, झगड़ रहे हैं । इन झगड़ो की जड़ें कहाँ है कोई नहीं जानना चाहता। इस तथ्य को समीप जी बड़े प्रतीकात्मक ढंग से व्यक्त करते है-
क्या हुआ क्यों बाग के सारे शज़र लड़ने लगे,
आँधियाँ कैसी हैं, जो ये घर से घर लड़ने लगे।
मेरा साया तेरे साये से बड़ा होगा इधर,
बाग में इस बात पर दो गुलमोहर लड़ने लगे।
    ऐसे भयावह समय मे साहित्यकार का दायित्व कुछ और बड़ा हो जाता है।एक साहित्यकार ही है जो आम आदमी के हक की लड़ाई लड़ सकता है,व्यवस्था के विरोध में खड़ा हो सकता है ,पर विडम्बना यह है कि साहित्यकारों का एक बड़ा वर्ग भी अपने दायित्त्व से विमुख होकर चारणों की भूमिका में आ गया है। समीप जी अपने वर्ग के इस चरित्र पर भी तीखा कटाक्ष करते हैं-
हमको सोने की कलम,चाँदी की स्याही चाहिए,
शेर कहने के लिए साकी, सुराही चाहिए।
रख दिए हैं ताक पर सबने ही अब जलते सवाल,
आज के फनकार को बस वाहवाही चाहिए।।
          समस्या इतनी ही नहीं है कि एक बड़ा वर्ग चारण-मुद्रा में है बल्कि जो लोग  सच के पक्ष में अपनी आवाज उठा रहे  हैं उन्हें हतोत्साहित करते हुए उस मार्ग से विरत करने की कोशिशें हो रही हैं; पर सच्चे साहित्यकार को मालूम है कि व्यवस्था से लड़ने के पास उसके पास यही अब आखिरी हथियार है; अतः उसे छोड़ना सम्भव नहीं-
शाम होते ही हमेशा सुबह का पीछा करूँ,
रोशनी की खोज में चलता रहूँ चलता रहूँ।
दोस्तों की राय है मैं शायरी अब छोड़ दूँ
जंग में ये आखिरी हथियार कैसे डाल दूँ।

   जिसे शायर आखिरी हथियार कह रहा है ,वह उसके पास एकमात्र ऐसा हथियार है, जिससे व्यवस्था को भय लगता है। उसी हथियार से वह व्यवस्था पर भरपूर चोट करते हुए उनके छद्म चेहरे को सामने लाता  है। व्यवस्था के चरित्र पर प्रहार करते हुए शायर कहता है-
देखना फ़रमान ये जल्दी निकाला जाएगा,
जुर्म होते जिसने देखा मार डाला जाएगा।
मसखरों के स्वागतम में गीत गाए जाएँगे,
शायरों को बज़्म से बाहर निकाला जाएगा।
  समीप जी की ग़ज़लों में कथ्य के साथ ही कहने के अंदाज़ की सादगी भी दिल मे उतर जाती है।उनके कुछ बिम्ब सर्वथा अनूठे हैं। यथा-
सादगी अब हो गई घर का पुराना रेडियो
जिसको दादाजी चलाएँ शून्य में खोए हुए।

इसी प्रकार आज की स्त्री के तेज को चित्रित करता यह शेर-
होठों पर मुस्कान समेटे रोष दमकती आँखों में
आज बगावत का है दफ्तर हर औरत की आँखों में।

अपनी बात कहने के लिए समीप जी भारी भरकम शब्दों का सहारा नही लेतेउनकी हर ग़ज़ल में सीधी सादी शब्दावली का प्रयोग होता है जहाँ आवश्यक होता है वे प्रचलित अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग भी खूबसूरती के साथ करते हैं-
वक्त के इस 'शार्पनर' में ज़िंदगी छिलती रही,
मैं बनाता ही रहा इस पेंसिल को नोकदार।
इसी प्रकार-
कोई 'आल्टरनेट' उसका है नहीं अब,
ये समय के प्रश्न का उत्तर नहीं है।
    कथ्य और शिल्प के साथ ही समीप जी की ग़ज़लों का वैशिष्ट्य उनके सरोकारों में है जिसके विषय मे वे स्वयं लिखते हैं-..प्रत्येक रचनाकार का सबसे बड़ा सरोकार यथास्थिति को बदलना है। मैं भी अपनी गज़लों के जरिए जनमानस के मन मे जीवन के प्रति आस्था,आत्मीय भाव और प्रगतिशील चेतना को जगाते रहना अपना अभीष्ट समझता हूँ।
   इसी आस्था और चेतना जगाने के प्रयास में जुटे समीप जी कहते हैं-
आइए कुछ देर बैठें प्यार की बातें करें,
ख्वाब में देखे नए संसार की बातें करें।
सोचिए कैसे बचे खूशबू हमारे बाग की,
हर शिकस्ता पेड़ के उपचार की बातें करें।
  दुष्यंत कुमार ने तो घोषणा की थी-चलो यहाँ से चलें और,उम्र भर के लिए।...पर समीप जी कुछ आगे की बात करते हुए नया स्वप्न देखते हैं-
चलो ज़माने का नक्शा नया बनाते हैं
बिगड़ गया है अब ये दूसरा बनाते हैं
बनी बनाई किसी राह पर चलें कब तक
चलो सफर का नया मसविदा बनाते हैं।
    निःसन्देह समीप जी की ग़ज़लें ज़माने का नया नक्शा बनाने के लिए नई राहों को खोजने की यात्रा पर हैं।
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Email.  shivji.sri@gmail.com


Friday, August 11, 2023

1348-लिली मित्रा की कविताएँ

 लिली मित्रा

 


1- ठोकरों की राह पर

 

 

ठोकरों की राह पर

और चलने दो मुझे

पाँव छिलने दो ज़रा

दर्द मिलने दो मुझे 

 

फ़र्क क्या पड़ता है चोट,

लगी फूल या शूल से

रो पड़ी है या नदी 

लिपट अपने कूल से

घाव सारे भूलकर 

नई चाह बुनने दो मुझे 

 

पाँव छिलने दो ज़रा 

दर्द मिलने दो मुझे... 

 

खटखटाता द्वार विगत के

क्यों रहे मन हर समय

घट गया जो, घटा गया है

कालसंचित कुछ अनय

पाट नूतन खोलकर

नई राह चुनने दो मुझे 

 

पाँव छिलने दो ज़रा

दर्द मिलने दो मुझे.. 

 

कौन जाने क्या छिपा है

आगतों की ओट में?

निर्माण की अट्टालिका

फिर धूसरित विस्फोट में

अवसाद सारे घोलकर

नई आह सुनने दो मुझे 

 

पाँव छिलने दो ज़रा

दर्द मिलने दो मुझे..

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 2-उमस

 

टहलते हुए पार्क के

पाथ वेपर

उतरती शाम को देखा

थोड़ा और ध्यान से

छुटपुट बारिश से 

बुझी नहीं थी तपती जमीन की प्यास

भाप उगल रही थी व

धुंध बनाकर ओढ़े बैठी थी 

अपनी ही उमसती कुनमुनाहट को

पेड़ स्तब्ध थे,

उनमें साहस नहीं था कि 

हिला सकें अपनी एक भी पात,

एक तरफ रह -रहकर  महकते कुटज 

अपनी ही धुन में बेसुध अनचाहे प्रयास करते,

उमस की धुंध महक से जाती है क्या??

नीम की कसैली कड़ुवी महक हावी थी हर बार उनके 

सहृदयी सुगंधित प्रयासों पर

धरती ने खींचकर भर ली थी सारी कड़ुवाहट 

चबा लिये थे नीम उमसती तिलमिलाहट के चलते

विद्रोह के ये शांत स्वर 

शाम की लालिमा पर कालिमा से फैल रहे थे

रात रोई होगी रातभर 

पर मुझे पता है आज भी 

वैसी ही खुद में उफनती 

नीम चबाती

पड़ी रहेगी ... 

-0-

 

3- निकलने तो दीजिए दुर्गा को 

 

क्या शातिर सारा ज़माना?
क्यों डर के साए में ही
सतर्कता का अलख जगाना?
सशक्तीकरण का औजार
थमाते हुए ,
क्या जरूरी है विद्रूपताओं
के घृणित रूप दिखाना?
विश्वास के धरातल  पर
आत्मविश्वास का अंकुर क्यों
नहीं बोते?
अच्छाइयाँ भी हैं... 
बुराइयों के दलदल में ही क्यों भिगोते?
घूँघट से निकल
गरदन उठाकर मुस्कुराती
कलियाँ,
ना समझिए निमत्रंण इसे
नहीं ये पैगाम ए रंगरलियाँ 
समझ इनमें भी है
जरा भरोसा तो रखिए
रेशम- सी हैं तो क्या
गरदन पर इनकी

जकड़ भी परखिए,
जूझने तो दीजिए इन्हें 
परिवेश से 
निकलने तो दीजिए दुर्गा
को निज आवेश में । 

-0-

 

4-देवी



प्रेम विस्तार पा चुका है
इंसान से देवी बनाई जा चुकी हूँ
आराध्या हूँ
मानवीय आचरण अब
निषेध हैं
अभयदान की मुद्रा
और चेहरे पर
करुणा भाव सदा के लिये
चिपकाए रखना है
शी झुकाए आते
जाएँगे श्रद्धालु
अपनी फ़रियाद लिये,
बस सुनते रहना है
अपनी सभी इच्छाएँ,
अभिलाषाएँ, कुंठाएँ,
अभिव्यक्तियाँ,अनुभूतियाँ
प्रतिमा की प्रस्तर
वर्जनाओं में कैद कर लेनी है

सुनो लोगो!
देवी बनना
इतना भी आसान नहीं..