पथ के साथी

Friday, February 14, 2020

956-यादों-सा बिखरके


पूनम सैनी

यादों-सा बिखरके मुझसे
वो कही लम्हों-सा सँवर रहे है
और खुद को सँभालते,देखो
हम तिल-तिल बिखर रहे है। 

खाली किताब पर आखर 
बस दो ही लिखे हमने
कोई कहे उनसे,हम तो
धीमे से निखर रहे है

म की महफ़िल में मेरी
नाव डूब ही तो जाती
पर हौसलों के मेरे सदा
ऊँचे ही शिखर रहे हैं।
-0-

Monday, February 10, 2020

955


1-अँधेरे में-शशि पाधा
***
अँधेरे में टटोलती हूँ
बाट जोहती आँखें
मुट्ठी में दबाए
शगुन
सिर पर धरे हाथ का
कोमल अहसास
सुबह के भजन
संध्या की
आरतियाँ
रेडियो पर लोकगीतों की
मीठी धुन
मिट्टी की ठंडी
सुराही
दरी और चादर का
बिछौना
इमली, अम्बियाँ
चूर्ण की गोलियाँ
खो-खो , कीकली
रिब्बन परांदे
गुड़ियाँ –पटोले --
फिर से टटोलती हूँ
निर्मल, स्फटिक सा
अपनापन
कुछ हाथ नहीं आता
वक्त निगल गया
या
उनके साथ सब चला गया
जो खो गए किसी
गहन अँधेरे में ।
-0-18 जनवरी , 2020
-0-
2-बस तुम  पुकार लेना /सत्या शर्मा ' कीर्ति '

हाँ , ऊँगी लौटकर
बस तुम  पुकार लेना मुझको
जब बरस रही हो यादे
कुहासे संग किसी  अँधेरी
सर्द रात में
और वह ठंडा एहसास जब
कँपकँपाए तुम्हारे वजूद को
पुकार लेना मुझको

जब संघर्षों की धूप
झुलसाने लगे तुम्हारे आत्मविश्वास को
उग आएँ फफोले
तुम्हारे थकते पाँवों में
जब मन की पीड़ा हो
अनकही
हाँ , पुकार लेना मुझको

जब उम्र की चादर होने लगे छोटी
जब आँखों के सपने
कहीं हो जाएँ गुम
जब हाथो की पकड़
होने लगे ढीली
जब सम्बन्धों की डोर
चटकने से लगें
हाँ पुकार लेना मुझको
मैं आऊँगी लौटकर
हाँ, बस एक बार पुकार लेना मुझको।।

Sunday, February 9, 2020

954-आओ लें संकल्प


कृष्णा वर्मा

होश सँला नहीं कि कराने लगते हो
र्त्तव्यों का बोध 
सिखाने लगते हो हदें 
पनपती सोच में उठान से पहले ही
ठूँस देते हो व्यर्थ के भेद
उठने बैठने चलने फिरने हँसने मुसकाने पर भी
जड़ देते हो सदियों पुराना ज़ंग लगा ताला
घर की आबरू थमा कर कैसे
ताक पर रख देते हो उसकी सब चाहतें
कितनी बेदर्दी से कुतर देते हो उसके स्वप्न
घर भर की इज़्ज़त का कच्चा घड़ा
क्यों रख देते हो उसके निर्बल  काँधों पर
कभी सोचा है, तुम्हारी इज़्ज़त पर आँच न आने देने की
ज़िम्मेदारी तले दब के रह जाती हैं उसकी ख़ुशियाँ
उसके विकास का क़द
क्यों मान लेते हो गुनाह उसका लड़की होना
क्यों लाद देते हो असंतुलित दायित्वों का बोझ
जा ज़रा भाई के लिए चाय बना दे
पापा को खाना परोस दे
कभी माँ का हाथ भी बँटा लिया कर चौके में
जब देखो किताबों में मुँह दिए रहती है
अरे, सीख ले कुछ काम-काज अगले घर जाना है
नाक न कटवा दियो हमारी
अपनी नाक की चिंता के अलावा कभी बेटी की
खुशी की चिंता क्यों नहीं सताती
क्यों उसके ही बलिदान की प्यासी रहती है इनकी नाक
क्यों दिन-रात नसीहतों की मूसल से 
कूटते हो उसके कोमल मन का ओखल
हम जन्में तो घर भर को घेर लेता है मातम
और वह जनमे तो पीटते हो थाली
वह तुम्हारा अभिमान और हम अपमान
वह आँख का तारा हम कंकरी
वह आँखों पर पलकें हम बोझ की गठरी
उसकी जवानी को छूट हमारी पर पहरे
हमारे लिए नकेल और ज़ंजीरें
और उसको एक लगाम तक नहीं
हमारे हाथों में इज़्ज़त का भारी पुलिन्दा
और उसके हाथ पर ज़ायदाद के काग़ज़
तुम्हारी अपनी ही खींची भेद की लकीरों का हैं यह अक्स
जो शर्मिंदगी बनकर आज खिंच रहा हैं तुम्हारे माथे पर
समय रहते कसते जो उसकी लगाम
तो आज इन हाथों को मलना न पड़ता पछतावे से
खुशी से थाली पीटते आपके यह हाथ आज
पीट न रहे होते अपना सिर
संस्कारों के सही विभाजक होते तो
लुटती न खुले आम तुम्हारे घरों की इज़्ज़त
यह कैसी बेरुख़ी है
क्यों नहीं  बाँट पाते समादर संतान को
अपनी ही परछाई से पक्षपात क्यों
कैसे संभव होगी स्वस्थ संसार की कामना
चलो न माँ हम दोनों मिलकर लें
ऐसा दृ संकल्प
जो कर दे आधी आबादी को भयमुक्त
और पलट कर रख दें संसार का दृष्टिकोण।
-0-

Wednesday, February 5, 2020

953-सैनिक की पाती


रचना श्रीवास्तव 

मेरे लहू की गर्मी से जब बर्फ पिघलने लगे
पानी जब लाल रंग में बहने लगे 
तब समझ लेना तेरा एक और बेटा शहीद हो गया 
तेरी रक्षा की खातिर एक और हमीद खो गया 

लौटना चाहता हूँ घर मैं भी माँ पर देश को मेरी जरूरत है 
सिखाया था तूने ही इस माँ से पहले वह माँ है 
मारते हैं सैनिक ही चाहे इस पार  हो या उस पार 
फिर है ये कौन जो बीज नरत के बो गया 

तिरंगे में लिप लौटूँ, तो गले मुझको लगा लेना 
आँसू एँ आँखों में तो आँचल में उनको समा लेना 
मान से उठे पिता के मस्तक पर तिलक लगा देना 
हर जाता सैनिक रख बंदूक पर सर सो गया। 

सावन की हरियाली जब घर तेरा महकाए 
राखी पर जब बहन कोई घर लौटकर आए 
यादों के झुरमुट से तब चेहरा मेरा झाँकेगा 
समय की धार ने था जिसको अभी धो दिया ।


Saturday, February 1, 2020

952-उसको दूँ मैं फूल

उसको  दूँ मैं फूल

गिरीश पंकज

जो भी मुझको शूल चुभोए,
उसको दूँ मैं फूल ।
बना रहे यह ऊपरवाले,
हरदम मेरा उसूल।

स्वाभिमान की सूखी रोटी,
है मुझको मुझको स्वीकार।
नकली वैभव अर्जित करने,
खोजूँ ना  दरबार ।
जीवन भर गुमनाम रहूँ पर,
बिके नहीं तो किरदार ।
दो पल जीऊँ खुद का सर्जित,
हो ऐसा हर बार।
राजमहल की चौखट पर थू!
तन पर लेपूँ  धूल ।
बना रहे यह ऊपरवाले,
हरदम मेरा उसूल।।

माना कि पग-पग पर यारो,
है साजिश का दौर।
बिना फरेबी धंधे के अब,
मिले कहीं ना ठौर।
प्रतिभा कम, पर घात अधिक है ,
हाँ, अब तो चहुँ ओर ।
जो है जितना नकली उतना,
बन जाता सिरमौर ।
लेकिन मेरी राह अलग हो,
हिले न मन की चूल।
जो भी मुझको शूल चुभोए,
उसको दूँ मैं फूल।

मेरा मन हो निर्मल जैसे,
बच्चे की मुस्कान ।
एक रहे मेरी नज़रों में,
अल्ला औ भगवान।
सच बोलूँ तो खाऊँ गाली,
पर न डिगे ईमान।
जीवन भर करते जाऊँ मैं,
पीड़ित-जन-कल्यान।
मुझे लगानी है अमराई,
बोएँ सभी बबूल।
बना रहे यह ऊपरवाले,
हरदम मेरा उसूल।
जो भी मुझको शूल चुभोए,
उसको दूँ मैं फूल।।

उनके जैसा नहीं बनूँ मैं,
करूँ मैं इस पर गौर।
बाँटूँ सबको खुशियाँ सारी,
दे दूँ अपने कौर।
नेक राह पर चलता जाऊँ,
हिले न मन की चूल।।
-0-
सम्पर्क : सेक्टर- 3, एचआईजी -2/2,
दीनदयाल उपाध्याय नगर,
रायपुर 492010



Wednesday, January 29, 2020

950-यह पूछना फ़िजूल

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
दर्द कहाँ है यह पूछना फ़िजूल
पूछिए यह कि कहाँ नहीं है दर्द।
2
हम तो वफ़ा करके पछताए ताउम्र
उन्हें  बेवफाई का ज़रा मलाल नहीं।


चित्रःहिमांशु


3
कभी पूछना न झील  कि अब तक कहाँ रहा
डूबता जब दिल तुम्हारे पास आता हूँ।





4
चित्रःहिमांशु

ग़म न कर  कि  पत्ते सब गए हैं छोड़कर।
कल आएगी बहार सब लौट आएँगे।






चित्रःहिमांशु
5
सूख गए पर साथ नहीं छोड़ा है आज तक
बुरे दिनों के दोस्त हैं ,जाते भी तो कैसे
6
दुआओं का असर हो न हो यह तो मुमकिन
बद्दुआएँ मगर कभी पीछा न छोड़ती

Sunday, January 26, 2020

949


लहरा लो तिरंगा प्यारा
डॉ0 सुरंगमा यादव

देश है अपना सबसे प्यारा
इसकी माटी चंदन है
हर उपवन वृंदावन है
भारत माँ का उन्नत भाल
कहता सुन लो मेरे लाल !
धरती से अम्बर तक
लहरा लो तिरंगा प्यारा
शान देश की अमर रहे
सीना ताने वीर कहें-
शीश सुमन से कर दें अर्पित
चहुँ  दिशि गूँजे यह जय गान
लहरा लो तिरंगा प्यारा
समता अपना प्यारा मंत्र
दुश्मन का हम हर षड्यंत्र
पल में चकनाचूर करें
राष्ट्रभाव से मिलकर सारे
लहरा लो तिरंगा प्यारा
कण-कण में बसते हैं राम
सबसे प्यारा भारत धाम
नैसर्गिक सुषमा अभिराम
पंछी गाते हैं अविराम
लहरा लो तिरंगा प्यारा

Thursday, January 23, 2020

948


1-डॉ.पूर्णिमा राय

1
सहज भाव से सुख मिले,कब मनमाना रोज
बाहर काहे  ढूँढता ,भीतर ही सुख खोज।।
2
रिश्ते महकें फूल -से ,दिल में हो जब प्यार।
चंदन सी खुशबू मिले ,दूर अगर तकरार।।
3
भाई तेरे प्यार पर ,सौ जीवन कुर्बान।
माथे करती तिलक हूँ, पूरे हों अरमान।।
4
उजली-उजली धूप का, छू रहा एहसास
शीत लहर का आगमन ,प्रेम भरा विश्वास।।
5
नफ़रत की दीवार से,कैसे होगा पार।
पास नहीं जब प्रेम की, दौलत अपरंपार।।
-0-डॉ. पूर्णिमा राय, पंजाब
ईमेल :
drpurnima01.dpr@gmail.com
-0-
2-मंजूषा मन
1.
मोती जग को बाँटती, नन्ही -सी इक सीप।
उजियारे का मोल भी, नहीं माँगता दीप।।
2.
सारा जग हर्षा रहा, कलियों का यह नूर। 
पवन सुवासित कर रही, सुख देतीं भरपूर।।
3.
तृण-तृण पल-पल में रहें, मन में बसते राम।
पावन सब संसार से, राम तुम्हारा धाम।।
4.
सूरज कोने में छुपा, बैठा होकर शाँत।
सकल जीव ठिठुरे फिरें, सबके मन हैं क्लांत।।
5.
हिम कण बन गिरने लगी, हाड़ जमाती शीत।
शीतल तरल बयार भी, गाए ठिठुरे गीत।।
6.
सूरज कोने में छुपा, बैठा होकर शाँत।
सकल जीव ठिठुरे फिरें, सबके मन हैं क्लांत।।
-0-
3-सविता अग्रवाल 'सवि' (कैनेडा)
1
आसमान है सज रहा, तारों की बारात ।
पवन मगन हो नाचता, लहरें देतीं साथ ।।
मानव -जीवन बुलबुला, चार दिनों का खेल ।
बात प्रेम की बोलिए, कर लो सबसे मेल ।।
3
 धर्म- दया सबसे बड़े , कर सबका उपकार ।
गा न दुःख कभी,  नाव लगेगी पार ।।
4
पंख लगा कर प्रेम के, ऊँची  भरो उड़ान ।
वैर- द्वेष न संग धरो, होगा तेरा मान ।।
5
लेकर कुंजी प्यार की, खोलो मन के द्वार ।
साफ़ करो सब मैल को, करो दिल से बाहर ।। 
 सरिता देती ही रही, चलने की ही सीख ।
 पालन इसका जो करे,  माँगे ना वो भीख ।।
7
राम नाम मुख से कहें, फिर भी करते घात ।
मंदिर गिरिजा बैठके , चुगली करते साथ ।।
8
कल -कल पानी बह रहा ,झरने करते शोर ।
सावन की बरसात में , बगिया  नाचे मोर ।।
9
डगमग करती नाव भी ,पार लगाती छोर ।
नाविक बैठा देखता , सुख से तट की  र ।।
  -0- ईमेल : savita51@yahoo.com

4-शशि पुरवार 
1
तन को सहलाने लगी, मदमाती- सी धूप
सरदी हंटर मारती,हवा फटकती सूप 
2
दिन सर्दी के आ गए, तन को भा धूप
केसर चंदन लेप से, ख़ूब निखरता रूप  
3
पीले पत्रक दे रहे, शाखों को पैगाम
समय चक्र थमता नहीं, चलते रहना काम
4
रोज कहानी में मिला , एक नया किरदार
सुध -बुध बिसरी जिंदगी, खोजे अंतिम द्वार
5
क्या जग में तेरा बता ,आया खाली हाथ
साँसो की यह डोर भी, छोडे तन का साथ 
6
तन्हाई की कोठरी , यादें तीर कमान
भ्रमण करे मन काल का, जादुई विज्ञान 
7
जीवन के हर मोड पर, उमर लिखे अध्याय
अनुभव के सब खुश रंग, जीने का पर्याय 
8
जहर हवा में घुल गया, संकट में है जान
कहीं मूसलाधार है, मौसम बेईमान   
9
तेवर तीखे हो गए, अलग अलग प्रस्ताव
गलियारे भी गर्म हैं, सत्ता के टकराव
 10
रोज समय की गोद में, तन करता श्रम दान
मन ने गठरी बाँध ली, अनुभव के परिधान
11
नजरों से होने लगा, भावों का इजहार 
भूले -बिसरे हो गए, पत्रों के व्यवहार  
12
तनहाई डसने लगी, खाली पड़ा मकान
बूढी साँसें ढूँढती , जीने का सामान
-0-