पथ के साथी

Thursday, December 8, 2016

695



1-क्षणिकाएँ - शशि पाधा
1
अब
ना वो कौड्डियाँ
ना गीट्टियाँ
ना परांदे
ना मींडियाँ
ना टप्पे
ना रस्सियाँ
ना इमली
ना अम्बियाँ
कहाँ गई
वो लडकियाँ !!!!!!
2
आज फिर
बचपन आ बैठा
सिरहाने
और मैं
झिर्रियों से झाँकती
धूप को
मुट्ठियों में
भरती रही ।
3
हवाएँ
तेज़ चलती रही
सर्दी
बदन चीरती रही
धूप बदली की ओट
छिपती रही
और यह
इकलौता फूल
सूखी टहनी पर
इठलाता रहा
कितना जिद्दी है ना वो
मेरी तरह ।
-0-
*कौड्डियाँडोगरी भाषा  में कोड़ियों के लिए प्रयुक्त शब्द
-0-
2-आवारा-डॉ. मधु त्रिवेदी

मैं बन जाऊँ पंछी आवारा
आवारा ही रहना चाहूँ
मद मस्त चाह है मेरी
नील गगन में ही रहना चाहूँ
जब  याद आये धरती
इस पर रहने वालों की
तो मिलने चला आऊँ
देख सुन्दर धरती यही बस जाऊँ
इतने सुंदर लोग यहाँ के
पर बँधन में नहीं बँधना
आवारा हूँ
आवारा ही रहना चाहता हूँ
बैठ डाल पात पर
मीठे फल कुतरता
हर गली मुहल्ले और शहर
दुनियाँ दूर देश की सैर करता
दुनिया में डोल -डोल
सुंदर- सुंदर देशों को देख आऊँ
ना कोई कुछ कहने वाला
न कोई कुछ सुनने वाला
मन मर्ज़ी करने वाला
रोक -टोक ,मान -मर्यादा की
न मैं चिन्ता करने वाला
आवारगी में रहता मैं हर वक्त
ना अपनी चिंता करूँ
ना करूँ किसी ओर की
मिले जन्म धरती पर मुझे
तोता मुझे बनाना
बैठ जाऊँ- ऊँची डाल
फिर न बुलाना
मैना से ब्याह रचाऊँ
ना कोई दीवार जाँति-पाँति की हो
ना कोई भेदभाव हो
न कोई ढोंग- दिखावा हो
न मजहब के नाम पर
कोई खून राबा हो
बस एक इन्सानियत का रिश्ता हो
जीवन का अटूट बन्धन हो
-0-

3-मुश्किलों को देखकर- डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्माअरुण


मुश्किलों  को  देख कर  जो हारता है।
दुश्मन है अपना,वो खुद को मारता है।

कर्मवीर चलते सदा,लेके सरपे कफ़न,
कमबख्त है जो मुश्किलों से हारता है।

जिसको मिली हिम्मत वही आगे चला,
जो है बुज़दिल वो तो बहाने मारता है।

डरने वाला डूबता है नाव के संग भी,
साहसी तो सब को लेकिन तारता है।

मंज़िल हमेशा ही मिली बस वीर को,
जो डरा वो तो 'अरुण' नित हारता है।
-0-पूर्व प्राचार्य,74/3,न्यू नेहरू नगर,रुड़की-247667
-0-
4-भोर-भोपुरी गीत
 श्वेता राय

चिरईंन के बोली मचावे ला शोर
किरनियाँ! लावे ले जब भोर

ऊषा अइलिन लेहले भाँवर।
शोभे उनकर रूपवा साँवर।
ललकी टिकुलिया छिटकावे अँजोर
किरनियाँ! लावे ले जब भोर

राह चनरमा गई लें भुलाइल।
जोन्हीं सगरी फिरत लुकाइल।
शीतल बयरिया बहे ला झक झोर
किरनियाँ! लावे ले जब भोर

साजल बाजल सगरी नगरिया।
महकल फुलवा भर के डगरिया।
दिन दुपहरिया लागे ला चित चोर
किरनियाँ! लावे ले जब भोर

पायल कनिया रुनझुन बाजे।
घरवा दुअरवा  निम्मन साजे।
मन्दिर के घंटी बाजे ला पुरजोर
किरनियाँ! लावे ले जब भोर
-0-
 

Saturday, December 3, 2016

694



1-भोर प्यारी तुम सुहानी
श्वेता राय

श्वेता राय
भोर प्यारी तुम सुहानी मैं प्रखर दिनमान हूँ।
साँझ बनकर तुम ढलो  जब दीप का प्रतिमान हूँ।।
दीप्ति कंचन तन तुम्हारा, हृदय गंगा धार है।
मन महकता बन चन्दनी,प्रेम का अभिसार है।।
आभ हीरक तुम प्रिये मैं, विधु जनित मुस्कान हूँ।
साँझ बनकर तुम ढलो  जब दीप का प्रतिमान हूँ।।
लालिमा ललना तुम्हारी, शोभती बन कर किरण।
लग रहे चंचल नयन ये, भागते वन में हिरण।।
धार हो सरि की सजल तुम, मैं जलधि अभिमान हूँ।
साँझ बनकर तुम ढलो  जब दीप का प्रतिमान हूँ।।
देख कर तेरी हँसी को, झूमते हैं बाग़ वन।
मधु छलकता है अधर से, देह चन्दन का सदन।।
राग सरगम से सजी तुम, मैं प्रकृति का गान हूँ।
साँझ बनकर तुम ढलो  जब दीप का प्रतिमान हूँ।।
-0-विज्ञान अध्यापिका,देवरिया,उत्तर प्रदेश-274001
-0-
2-प्रेम और तुम
श्वेता राय

प्रेम का प्यारा कुसुम जब, मन धरा कुसुमित हुआ।
हो गया सुरभित जगत ये, मौन भी मुखरित हुआ।।
कामनाएं मन गगन पर, तारिकाएँ बन गईं।
बन गईं कुछ फूलतारा, चाँदनी सम ठन गईं।।

खुल गए दृग- द्वार के पट, कंठ उर कोकिल हुआ।
बिन तुम्हारे एक पल भी, प्रिय सुनो! बोझिल हुआ।।
तितलियों के पंख जैसे, स्वप्न अंतस में पले।
बिन कहे कुछ बिन सुने कुछ, प्रीत में छुप के ढले।।

सब दिशाएं झूमती थीं, सुन भ्रमर के गान को।
नाचती पागल पवन थी, सुन पिपिहरी तान को।।
क्या हुआ जो भीत के क्षण, पास आ जुड़ने लगे।
फूल से सुरभित जगत् में, धूल बन उड़ने लगे।।

थक गए क्यों भ्रमर सारे, शांत क्यों ये जग हुआ।
स्नेह पगती वर्तिका को, आँधियों ने क्यों छुआ।।
सह रहा मन ताप भीषण, झेल कर हर वार को।
माँगता अब जेठ से क्यों, फागुनी अधिकार को।।
सावनी मनुहार को,प्रेम के संसार को
माँगता अब जेठ से क्यों, प्यार ही बस प्यार को...
-0-

Wednesday, November 30, 2016

693



1-नहीं होता  -डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर।


अश्कों का आजकल कोई दाम नहीं होता।
दिल टूट भी जातो कोहराम नहीं होता।।

परदेस में जाकर वो हो गया है निकम्मा ;
देश में आकर फिर उससे काम नहीं होता।।

बाट जोहते-जोहते माँ दिखती है पत्थर;
अखियों के नूर का अब पैगाम नहीं होता।।

विष बेल बीजकर लूट लिया अपना ही देश;
आतंकवादियों का कोई राम नहीं होता।।

भाषण देते और जो सिर्फ बातें ही करें ;
उन नेताओं सा और बदनाम नहीं होता।।

झकझोर दिया भारत की नस-नस को पाक ने;
बिना बात किसी का कत्लेआम नहीं होता।।

छीनते हैं जो औरों के मुँह से निवाला;
पूर्णिमामें उन लोगों का नाम नहीं होता।।

-0-
2-गीतिका- डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर
दुनिया में सबका ही खून लाल होता है।
फिर भाई-भाई में क्यों बवाल होता है।।

खनक चंद सिक्कों की नित बढ़ती ही जाए;
माँ-बापू के रहते  इंतकाल होता है।।

बढ़ने लगी नफरतें मिटने लगा है प्यार ;
टूट रहे नाज़ुक रिश्ते मलाल होता है।।

जमाखोर करते देखो कंजूसी कितनी ;
जेब भरी नोटों से बुरा हाल होता है।।

अपने हाथ हुनर से जो जीतेगा दुनिया;
भारत माँ का सच्चा वही लाल होता है।।

भिखमंगों का जीवन देखो वे भी इन्साँ;
सुनो 'पूर्णिमा' उनका भी सवाल होता है।।

Monday, November 28, 2016

692



नन्हा भरतू  और भारतबन्द
डा कविता भट्ट
(दर्शन शास्त्र विभाग,हे०न० ब० गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड)
सुबह से शाम तक, कूड़े से प्लास्टिक-खिलौने बीनता नन्हा भरतू
किसी कतार में नहीं लगता, चक्का जाम न भारत बंद करता है
दरवाजा है न छत उसकी वो बंद करे भी तो क्या
वो तो बस हर शाम की दाल-रोटी का प्रबंध करता है
पहले कुछ टिन-बोतलें चुन जो दाल खरीद लेता था
अब उसके लिए कई ग्राहकों को रजामंद करता है
बचपन से सपने बुनते- बैनर इश्तेहार बदलते रहे
गिरे बैनर तम्बू बना, सर्द रातों में मौत से जंग करता है
सड़क पर मिले चुनावी पन्नो के लिफाफे बनाकर
मूँगफली-सब्जी-राशन वालों से रोज अनुबंध करता है
कूड़े की जो बोरी नन्हे कंधे पर लटकते-लतकते फट ग
बस यही खजाना उसका, टाँके से उसके छेद बंद करता है
इतनी बोतलें- हड्डियाँ कूड़े में, यक्ष प्रश्न है- उसके जेहन में
बेहोशी-मदहोशी या नुक्कड़ की हवेली वाला आनंद करता है
निश्छल भरतू पूछ बैठा, कूड़े में नोट? आखिर क्या माजरा है?
तेरे सवाल का पैसा नहीं मिलना, अम्मा बोली- काहे दंद-फंद करता है ?
एक सवाल लाखों का उनका, तेरे से क्या उनकी क्या तुलना?
बापू तेरे बूढ़े हो गए हैं अब
उम्र ढली कूड़े में, तू क्यों अपना धंधा मंद करता है
इसीलिए नन्हा भरतू कूड़े, दाल और रोटी में ही खोया है
किसी कतार में नहीं लगता, चक्का जाम न भारत बंद करता है