पथ के साथी

Friday, December 15, 2023

1390

 

मन

संध्या झा

 


मन भावनाओं का शृंगार चाहता है।

हर क्षण तुम्हें आस-पास चाहता है।

हृदय की व्याकुलता कोई ना समझे।

तुम समझो बस इतना सा व्यवहार चाहता है।

प्रेम के अतिरिक्त जीवन में हैं भी क्या ?

चंचल मन केवल प्रेम का प्रवाह चाहता है।

ह्रदय के साथ जीवन भी अर्पित किया तुम्हें

मन तुमसे भी थोड़ा समर्पण,अधिकार चाहता हैं।

वाद-विवाद यह सब हैं तुच्छ- सी बातें ।

इन सबसे ऊपर उठे , प्रेम तो बस प्रेम का आधार चाहता हैं।

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 बेली रोड, मौर्य पथ, पटना (बिहार ) 800014 

 Email -sandhyajha198@Gmail.com

Saturday, December 9, 2023

1389

    मंथन

शशि पाधा

 

अपना-अपना भाग्य लिखाए

धरती पर हैं आते लोग

विधना जो भी संग बँधाए

गठरी भर- भर लाते लोग

 

किस स्याही से खींची उसने

हाथों की अनमिट रेखाएँ

वेद_ पुराण पढ़े हर कोई

भाग्य नहीं पढ़ पाते लोग

 

बीते कल की पीड़ा बाँधे

आज’ तो जी भर जी न पा

भावी की चिंता में डूबे

जीवन-स्वर्ण लुटाते लोग

 

रिश्तों  के इस  मोहजाल में

मन पंछी व्याकुल- सा रहता

जग जंजाल छोड़के सारा 

मुक्त नहीं हो पाते लोग

 

कौन है अपना, कौन पराया

किसने कैसी रीत निभाई

मन तराजू मन ही पलड़े  

तोल- मोल कर जाते लोग

 

सुंदर मन सुंदर यह जगति

सुंदर सृष्टि रूप-अनूप

मन दर्पण हो जिसका जैसा

वैसा चित्र   बनाते   लोग

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Email: shashipadha@gmail.com

Monday, December 4, 2023

1388

 विजय का नाद

 सुरभि डागर 


कितने बड़े योद्धा हो तुम

अर्जुन की भाँति

क्या सारथी भी माधव‌ ही है

लड़ रहे हो बरसों से 

अपनों के विरुद्ध ही 

अदृश्य चक्र तुमको 

विजय की ओर अग्रसर

कर रहा है।

विफल हो रहीं हैं मारण क्रिया

और चूक रहे हैं विषैले वाण

ध्वस्त हो चले हैं सभी षड्यन्त्र

तुम खड़े हो अपने राज्य के समक्ष

हानि अधिक हुई; परन्तु

निःसंकोच तुम बढ़ते रहो

माना कठिन वक्त पर 

डटे रहना हथियार लिये

आगे बढ़ते रहना।

शकुनि वार छुपके ही कराएगा

और तुम निकल जाना

लाक्षागृह से सकुशल

लगा लेंगे हृदय से गिरधारी

झलक उठेंगे उनके भी नयना

कसके पकड़ लेना बाँह गिरधारी की

वे नहीं सोएँगे तुम्हारे लिए रात भर

केशव को सौंप दो स्वयं को 

और विजय का नाद सुनो 

Thursday, November 30, 2023

1387

 तुम कहो.. मैं लिखूँ (सॉनेट)

अनिमा दास

 

मैं जीवन लिखता हूँ तुम मृत्यु लिखो, मैं उत्तर लिखता हूँ तुम पश्चिम लिखो

संताप का अर्थ एक ही है...जीवंत हो अथवा मृत..अभिशाप भी एक ही है

स्वतः आ जाए गीत तो..हर्ष व उल्लास लिखो..अथवा अधर रक्तिम लिखो

सीमाओं में परिबद्ध आशाओं का...ध्वस्त होने की कहानी... अनेक भी हैं।

 

कोई भी पर्व तुम्हे यदि प्रेम पर्व प्रतीत हो..मेरी प्रतीक्षा ही होगी चतुर्दिश

तुम म्लान मुख्यमंडल से न देखना दर्पण..गवाक्ष पर होगी एक प्रतिछाया 

उस प्रतिछाया की भाषा में मेरे कुछ अक्षर होंगे,उनकी ध्वनि होगी अहर्निश

तुम कहोगी 'मैं गाती हूँ गीत..तुम सुनो'..मैं कहूँगा 'तुम्हारे शब्दों में है माया'

 

उस मायापाश में होगी मेरी आत्मा बद्ध..करूँगा प्रश्न मैं 'क्या यह था छल?'

तुम्हारी मौनता से अजंता की मूर्तियों में होगा कंपन..क्या तुम रहोगी मौन?

कहूँगा,'न तुम जीवन लिखो..मृत्यु नहीं है समीप..न है इसकी कामना सरल

क्या तुम तथापि रहोगी मौन?... इस जम्बूद्वीप में प्रेम से सिक्त...होगा कौन?

 

इस उत्सव को कर मुखरित..प्रणय पाश में कर बद्ध..तुम हो जाओ जीवित 

मानवरूप में दैवत्य हो किंवा दैत्य..इस काव्यकलश में रहेगी मृत्यु निश्चित।

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Sunday, November 12, 2023

1386

 

थोड़ा सा नेह

कमला निखुर्पा

 
भरा थोड़ा सा नेह

औ छलक उठा 

मन दीपक।

दिप-दिप जल उठी

सोई थी जो बाती।

लगन की लौ 

लहककर जल उठी 

लगने लगी 

हवा से होड़ 

जलने की 

बुझने की।

हवा चलती रही

दिया जलता रहा

नन्ही एक हथेली  

 करती रही ओट 

भरती रही नेह 

मन दीपक में।

Monday, November 6, 2023

1385

 सुकून

स्वाति शर्मा

 


सुकून की खातिर

घर से दूर आ गए

अपने छोड़े,

रातों के सपने छोड़े

जीवन में तन्हाई

गमों में गहराई,

ना खाने का होश

ना पीने की सुध

बस चलते जा रहे

पाई- पाई जोड़ रहे

दोस्ती टूटी

रिश्ते छूटे

बस इक सुकून की खातिर

 

सबसे दूर आ गए

सुकून की खातिर

घर से दूर आ गए।

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Wednesday, November 1, 2023

1383

 

जय भारती

 डॉ. सुरंगमा यादव

 

देश वही जग का सरताज है,

हिमगिरि का पहने जो ताज है

            जय भारती, जय- जय भारती

             मिलकर उतारेंगे  आरती

              जय भारती,जय- जय भारती

 वेदों के गूँजें यहाँ मंत्र हैं

 रामायण- गीता- से ग्रंथ हैं

 ऋषियों ने दिये गूढ़मंत्र हैं

 यहीं हैं अपाला और गार्गी

                जय भारती, जय- जय भारती            

बंसी बजाई यहाँ श्याम ने

मर्यादा सिखलाई राम ने

 पावन किया चारों धाम ने

 प्रयाग-धार भव से उतारती

                 जय भारती, जय-जय भारती

 चरणों को सागर पखारता

 दिग्दिगंत ओम ही उचारता

 स्वर्ग से है इसकी समानता

 ऋतुएँ भी रूप आ निखारतीं

                 जय भारती, जय-जय भारती

 नदियों का माँ जैसा मान है

 अतिथि यहाँ देवता समान है

 वीरों ने वार दिये प्राण हैं

 जब-जब वसुंधरा पुकारती

                  जय भारती, जय- जय भारती।

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Monday, October 30, 2023

1382

 

प्रेम की प्रतीक्षा में... (सॉनेट)

अनिमा दास

  


प्रेम की प्रतीक्षा में तपोवन की तपस्विनी कह रही क्या सुन

मेदिनी वक्ष में कंपन मंद- मंद, ऐसी तेरे स्पंदन की धुन

बूँद-बूँद शीतल-शीतल तेरे स्पर्श से सरित जल कल-कल

मंदार की लालिमा- सा क्यों दमकता तपस्वी मुखमंडल?

 

रहे तम संग जैसे शृंग गुहा में खद्योत, ऐसे ही रहूँ त्रास संग

अयि! तपस्वी,मंत्रित कर अरण्य नभ,भर वारिद में सप्तरंग

शतपत्र पर रच काव्यचित्र मेरी काया को कर अभिषिक्त

अयि! तपस्वी,त्रसरेणु- सी विचरती,कर स्वप्न में मुझे रिक्त।

 

कह रही तपस्विनी, तपस्वी हृदय की अतृप्त तरुणी

रौप्य-पटल पर कर चित्रित मुग्ध मर्त्य,दे दो मुक्त अरुणी!

तपस्या हुई तृप्त, नहीं है क्षुधा का क्षोभ क्षरित स्वेदबिंदु में

समाप्ति के सौंदर्य से झंकृत बह रही निर्झरिणी सिंधु में।

 

अयि तपस्वी! मोक्ष की इस सूक्ष्म धारा में है समय,कर्ता

स्मृति सहेजती तपस्विनी के द्वार पर मोह है मनोहर्ता।

 

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कटक, ओड़िशा 

 

 

 

 

Tuesday, October 24, 2023

1381

 

छलिया सपने

 सविता अग्रवाल 'सवि'

 

जब सारा जग सो जाता है

मैं सपनों से ही लड़ती हूँ

बंद नयन के द्वारों पर

क्यों दस्तक देकर आते हो ?

साकार नहीं होना होता

तो क्यों नयनों में सजते हो?

तुम कौन देश से आते हो?

और कौन दिशा को जाते हो?

छलिया बन मुझको छलते हो

परदेसी बन चल देते हो

मेरी नींदों को मित्र बना

मुझसे ही शत्रुता करते हो

बालक को लालच देते हो

फिर छीन सभी कुछ लेते हो

मन में मेरे एक दीप जला

क्यों आँधी बन आ जाते हो

उषा की किरणों में मिल कर

क्यों धूमिल से हो जाते हो  

शबनम की बूँदों की भांति

क्यों मिट्टी में सो जाते हो

मन मेरे में एक आस जगा

नव ऊर्जा सी भर देते हो

 

 पल भर में क्यूँ शैतान से तुम

 

मुझे चेतनाहीन बनाते हो

जब सारा जग सो जाता है

मैं सपनों से ही लड़ती हूँ

छलिया सपनों संग रोज़ रात

मैं यूँ ही झगड़ा करती हूँ |

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1380

 


हरसिंगार

सुरभि डागर

 


हरी-हरी डालियों पर 

भरे  हरसिंगार के  फूलों से

वायु भी सुरभित हो

हृदय को स्पर्श कर

मन को सिंचित कर देती,

मानों रात ही महक उठी हो ।

सुवह की भोर में शा से झरकर

बिखर जाते हैं धरा की गोद‌ में,


जा प
हुँचते हैं

किसी की पूजा की  थाली में

हो जाते हैं महादेव पर समर्पित

और पूर्ण हो जाती है

गंगाजल में विसर्जित होकर

हरसिगार की जीवन-यात्रा।

बस ये ही जीवन है ! !

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