पथ के साथी

Monday, January 22, 2018

792


मुकद्दमा
-डॉ. कविता भट्ट 

अरे साहेब! 
एक मुकद्दमा तो उस शहर पर भी बनता है
जो हत्यारा है–
 सरसों में प्रेमी आँख-मिचौलियों का 
और उस उस मोबाइल को भी घेरना है कटघरे में  
जो लुटेरा है–
 सरसों सी लिपटती हँसी-ठिठोलियों का 
 हाँ- 
उस एयर कंडीशन की भी रिपोर्ट लिखवानी है
जो अपहरणकर्त्ता है- 
गीत गाती पनिहारन सहेलियों का
और उस मोबाइल को भी सीखचों में धकेलना है
जो डकैत है- 
फुसफुसाते होंठों-चुम्बन-अठखेलियों का 
उस विकास को भी थाने में कुछ घंटे तो बिठाना है
जिसने गला घोंटा
बासंती गेहूं-जौ-सरसों की बालियों का;
लेकिन इनका वकील खुद ही रिश्वत ले बैठा है
फीस इनसे लेता है
और पैरोकार है शहर की गलियों का
ओ साहेब! 
आपकी अदालत में पेशी है इन सबकी 
कुछ तो हिसाब दो -
उन मारी गयी मीठी मटर की फलियों का 
                   _0_

Saturday, January 20, 2018

791

1-अब लिखती नहीं कविताएँ
सत्या शर्मा ' कीर्ति '

कि आजकल मैं 
लिखती नहीं हूँ कविताएँ
क्योंकि रोप दिए हैं मैंने
उसके नन्हे बीज
अपने हृदय की उर्वर भूमि में ।
जहाँ निकलते हैं रोज नाजुक-सी कोंपल ,
चटकती हैं कलियाँ और खिलते हैं फूल

फिर महक-सी जाती हूँ मैं
चम्पा और गेंदे की खुशबू से ।

सूरज की नन्ही-सी किरणें खेलती है 
जब उन पंखुड़ियों से और 
सहलाती है शब्दों की
किसी नई पौध को
तो खिल सी जाती हूँ मैं और
फिर नहीं लिखती हूँ कविताएँ
रोप देती हूँ भावों को
देती हूँ पनपने गुलमोहर डालियों को
देखती हूँ छुपकर
आता है चन्दा
उतरता है पालकी से
और बिखेरता है रंग
उन नन्ही कोंपलों पर ।
फिर मैं मूँद लेती हूँ आँखें
बहने देती हूँ शब्दों को
अपनी ही सुगंधित बयार में

कई बार चुपके से आती है लहरें
छुपकर अपनी सखी नदियों से
और निखार देती भावों की
कच्ची पंखुड़ियों को
धो देती है उन पर लिपटे निरर्थक
जज्बात को ।

हाँ , अब लिखती नहीं हूँ
कविताएँ, देती हूँ उन्हें पनपने और 
खिलकर निखरने ।

फिर ....
उन्हें हौले से तोड़कर
बनाती हूँ कोमल भावों का
एक खूबसूरत गुलदस्ता।

--0—
2-ज्योत्स्ना प्रदीप की कविताएँ
सरस्वती वंदना (चौपाई)

 विद्यारूपे !  श्लोक ,मंत्र में ,
तेरी लय हर वाद्य यंत्र में।
वेद, ऋचा हर मधु प्रसाद सा,
आखर -आखर ताल नाद सा ।

हे शुभदे ! तुम नभ -भूतल में,
नग ,पर्वत में सागर जल में ।
अमिट मधुर सी  इक सरगम है,
हर पल तेरा  आराधन है ।

जग छल से माँ  आँसू छ्लके,
आँखें ना ही दोषी पलकें ।
फिर से ना हो सुख ये कीलित,
शान्ति कान्ति दो सुखद अपरिमित।

जीवन जब भी सघन निशा है,
तेरे पग-तल  दिव्य -दिशा है।
मिटे तिमिर वो  विमल छंद दो,
महातारिणी   महानंद   दो ।
-0-
 सवाल देश मान का!(प्रमाणिका छंद)
ज्योत्स्ना प्रदीप

चलो -चलो रुको नहीं
कभी नहीं झुको नहीं।।
उमंग   है   तरंग  है
उछाह अंग -अंग है ।।
हिया बना चिराग है।
बड़ी अजीब आग है।।
नहीं कभी हताश हो ।
सुदूर भी प्रकाश हो ।।

सलीम या दिनेश है
अनेक वेश ,भेष है।
मिले सभी  गले चलो
नहीं छलो बढ़े चलो।।

पुकार प्रीत की सुनो
न फूल ,शूल को चुनो।
 न वेदना  ,न पीर हो
हिया नहीं अधीर  हो।

न द्वेष ,लोभ ,क्रोध हो
न जात का विरोध हो।
 सवाल देश आन का  
 सवाल देश मान का ।।
-0-

3- तुम और कविता

मंजूषा मन


पता नहीं क्या हो जाता है
आजकल
कि जब भी सोचा
लिखू कोई कविता...
खों में तैरने लगी
तुम्हारी ही तस्वीर
तुम ले लेते हो कविता का रूप।

तुम चाँद की तरह बने रहे
मन के आकाश में,
मन पर जब छाए दर्द के बादल
तुम चाँद बन जगमगाते रहे।
अब अधेरा छुप गया है
काजल की डिबिया में।

हवा बनकर तुम ही
बहते रहे साँसों के आने और जाने में
तुम खुशबू बनकर महकते रहे जीवन में।

मन के जंगल में तुम्हारे ही सपने
नन्हे नन्हे हिरन के छौने बन
धमाचौकड़ी मचाते हैं...
और तुम्हारी ही आहट पाकर
छुप जाते हैं किसी ओट में।

तुम सिखा रहे हो जीना
उन आशाओं को
जो छोड़ चुकी थी उम्मीदों का दामन।

-0-

Thursday, January 18, 2018

790

मैं लुटेरा
8 बजे -18 जनवरी-2018-
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

मैं लुटेरा था सदा ही
आज भी बदला नहीं हूँ
लूटने निकला ख़ज़ाना
जो छुपा रक्खा है तुमने
सबकी नज़रों से बचाया
राज़ है सबसे छुपाया
कब भला किसको बताया!
सुना है- तुम्हारे पास गहरा
दर्द का दरिया अनोखा है
सुना है-जब दिया किसी ने
वह दिया है सिर्फ़ धोखा है
तुम्हारे पास बहुत सारे
दर्द के ही ख़त आए हैं
उन पर सभी ने इल्ज़ाम के
दस्तख़त बनाए हैं
चुपचाप रोकर दु:ख छुपाया
यही तेरी तो रियासत है
निश्छल मन को वे समझे
कि वह कोई सियासत है।
तन का हर इक पोर तेरा
दर्द की ही दास्ताँ कहता
सोते और जागते भी
सिर्फ़ यह दर्द ही सहता
सुना है -आँसुओं का पलकों पर
सजा  इक आशियाना है
सुना है अधरों का झुलसा
तुम्हारा हर तराना है
तुम्हें कोमल समझकरके कभी
जो तोड़ना चाहा
किसी मनचाहे मार्ग पर तुम्हें
जो जोड़ना चाहा
तुम्हें मंजूर नहीं था कभी
किसी का झूठ, छल -सम्बल
तुम्हें मंजूर नहीं था
फ़रेबों से भरा आँचल।
चैन की साँस कब ली थी
नहीं तुझको पता अब तक
मिला था दण्ड तो तुमको
थी गैरों की ख़ता अब तक
मैं  तो हूँ बहुत लोभी
मिला है आज ही मौका-
दर्द का दरिया ,दर्द के ही ख़त
दु:ख सारे,आँसुओं का आशियाना
झुलसे तराने,हर पोर की पीड़ा
मैं लूटने आया हूँ।
नहीं रोको , मुझे मेरे प्रिय
मैं यह सह नहीं सकता
तुम्हारे दर्द को लूटे बिना
मैं रह नहीं सकता
मैं नहीं पराया हूँ
सिर्फ़ छाया तुम्हारी हूँ
झेलती जो पीर
वह काया तुम्हारी हूँ
व्याकुल जो हुआ करते
वही मैं प्राण तेरे हूँ
इसलिए मन-प्राण से  हरदम
मैं तुमको  ही घेरे हूँ।
इसलिए
सबकी नज़रों से बचाया
दर्द जो सबसे छुपाया
उसी को लूटने आया
मुझे मत रोकना प्रिय !
अब नहीं  टोकना प्रिय !

-0-

Wednesday, January 17, 2018

789

विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र
1-माँ-         
कभी वो हाथ
सुकोमल से
फेरती थी
मेरे सर पर
तो मैं कहता
माँ !
क्यों बिगाड़ती हो मेरे बाल
समझ नहीं पाता था
उसके भाव
पर, आज वो ही हाथ
सूखकर पिंजर हो ग

अब मैं चाहता हूँ
वो मेरे सर पर
फिर से
फेरे हाथ
चाहे मेरे बाल
क्यों ना बिगड़ जा
एँ
बस, ये ही तो अंतर है
बालपन में
और आज की समझ में |
पर अब माँ
बिगाड़ना नहीं चाहती
सरके बाल
वो चाहती है
मैं ,बैठूँ उसके पास
देना नहीं, लेना चाहती
मेरा हाथ अपने हाथ में
बिताना चाहती है कुछ
पल
बतियाना चाहती मुझसे,
पा लेना चाहती है,
      अनमोल निधि जैसे...
-0-
2-गुनगुनी सी धूप में

जनवरी की गुनगुनी सी धूप में
क्या निखार आया है तेरे रूप में
थोथा -थोथा उड़ गया है देखिए
भारी दाना रह गया है सूप में
रात रानी बनी दिन राजा हुए
सुबह-शाम दोनों बने प्रतिरूप में
ओस की बूँदें मोती सी लगे
धुँध छाई प्रीति के स्वरूप में
अलग-अलग लबादे ओढ़े हुए
आदमी कैसा बना बहुरूप में
कैसा उड़ रही 'व्यग्र' पानी से  धुँ
आग जैसे लगी हो सारे कूप में

-0-
विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र',  कर्मचारी कालोनी,गंगापुर सिटी (राज.)322201,  मोबा : 9549165579
ई-मेल :-vishwambharvyagra@gmail.com

Tuesday, January 16, 2018

788

सत्या शर्मा ' कीर्ति ' की कविताएँ
1-मेरी इच्छाएँ

मेरी तमाम जीवित इच्छाओं
में एक यह भी है
कि किसी दिन
सूरज अपनी रोशनी
की लंबी चादर  बुन लें
और रात की गहरी कालिमा
को भी उजालों से भर दे
ताकि अँधेरी सुरंग- सी
जिंदगियों में भी
प्रकाश के कण भर सके....

कि कभी बादल
अपने गुब्बारे से शरीर में
भर ले ढेर सारा पानी
और तृप्त कर दे धरती का
सतरंगी आँचल
ताकि तप्त होती गर्मियों में भी
बुझती रहे हर कंठ की प्यास...

कि ठिठुरती रातें
अपनी सर्द हवाओं को
बाँधकर रखे
किसी गर्म खूँटे से
ताकि कँपकँपाती रातें
छीन न ले अनमोल जाने...

हाँ , मेरी तमाम जीवित
इच्छाओं के बीच ये भी है
की इसे मैं होते हुए
देखना चाहती हूँ....
-0-
 2-हम - तुम

हाँ
फिर आऊँगी
तुम्हारी यादों में

अपने दिल
के कमरे को
रखना तुम
ख़ाली

सुनो बाहर
शोर होगा
ज़माने का
और
दुखों की तेज
धूप में
पीले हो जाएँगे
हमारे रिश्ते के
कोमल पत्ते

पर, फिर भी आऊँगी

तब मेरी धड़कनों की
आहटों पर

तुम खोल देना
अपने मन में
चढ़ी वेदना की
साँकल को .....
-0-

Thursday, January 4, 2018

787

1-कविता
प्रियंका गुप्ता

लो,
आज सौंप रही हूँ तुम्हें
तुम्हारे दिए सभी वादे;
खोल रही हूँ
अपना नेह-बंधन
मेरे प्यार के पिंजरे का
ताला खुला है
जाओ,
खूब ऊँची परवाज़ भरो
दूर तक विस्तार करो
अपने पँखों का
और जब कभी थक जाना
तो लौटना नहीं
मैं तक न सकूँगी तुम्हारी राह,
इंतज़ार भी नहीं करूँगी
तुम्हारे लौट आने का
क्योंकि
तुमने शायद
कभी ठीक से देखा ही नहीं;
मैं बसेरा थी तुम्हारा
कोई सराय नहीं...।
-0-
2-हँसते जाना है
मंगल यादव
    हर पल हँसते जाना है
उम्मीद नहीं किसी से करना है
बस आगे ही बढ़ते जाना है
मिलेंगी रुकावटें राह में
मुश्किलों से लड़ते जाना है..
हर पल हँसते जाना है
ये ठान लो काम करके ही रहना है
ना मुमकिन कुछ भी नहीं
हर काम होता है नया
रोजाना कुछ न कुछ नया करना है
हर पल चलते जाना हैं
हर पल हँसते ते जाना है
ये मानकर चलो अकेले चलते जाना है
साथ में केवल आत्म विश्वास ही रहना है
बस आगे ही बढ़ते जाना है
हर पल हँसते सते जाना है
शिकवा-शिकायतें रहेगी बहुत
दरकिनार करते जाना है
लोगों को पढ़ते जाना है
प्यासे पक्षी की तरह
लक्ष्य पर आगे बढ़ते जाना है
जो भी मिले गले लगाते जाना है
हर पल हँसते जाना है।

-0-

Monday, January 1, 2018

786

1-नवगीत
रिश्ते बेनाम करे
डॉ.शिवजी श्रीवास्तव

आभासी दुनिया
सारे रिश्ते बेनाम करे
नेह भरे सम्बोधन,
बीते कल के नाम करे।

गली गली में बच्चे बैठे
इंटरनेट चलाते
दिन भर चैटिंग- वैटिंग करते
जाने क्या बतियाते,
रिश्तों की मर्यादा का
नया व्याकरण पढ़कर
मम्मी-पापा,दादी-बाबा,
सबको फ्रेंड बनाते,

कौन छुए अब चरण किसी के
कौन प्रणाम करे।

हरिया के बेटे- बेटी भी
हाट -बज़ार न जाते,
बैठे ही बैठे घर मे
सब ऑनलाइन मँगाते,
चना-चबैना लइया सत्तू
लगता उनको फीका
बड़े शौक से बैठ मॉल में
पिज्जा बर्गर खाते।

हाड़ तोड़ता हरिया दिन दिन
कर्जा कौन भरे।
-0-






                                          [उपर्युक्त फोटो-रश्मि शर्मा , राँची के सौजन्य से]