पथ के साथी

Tuesday, December 18, 2012

भूले-बिसरे शब्द



रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
1
सगे ही छोड़कर आए
हमें सुनसान जंगल में ।
पराया था जिन्हें समझा
उन्हीं से प्यार पाया है ।
2
जीवन में कुछ मिल जाते हैं
यूँ ही चलते-चलते  ।
जैसे मिलती धूप सुहानी
सूरज ढलते -ढलते ।
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Wednesday, December 12, 2012

कहानी


 सीमा स्‍मृति

कल देर रात
मोहब्‍बत,शबाब,शराब के
जाम छलके होगें
आर्केस्ट्रा की धुन पर,
थिरकते कदमों,
तालियों की गरगराहट, के बीच
नव दम्‍पती नव सूत्र में बँध
वर्तमान पर भविष्‍य की नींव,
रख रहे होंगे 
तभी
इतनी सुबह
शामियाने के उस पिछले
कोने में,
चावल के ढेर
पनीर के चन्‍द टुकडे
अधखाए भल्‍ले
फैली चटनी
सूखी होती पूरियों के
पिज्जा के टुकडे़,नूडल की गंध
ऊपर भिनभिनाती मक्खियॉं
टेडी दुम वाले कुत्‍ते
और
कागज बीनते लड़कों का झु़ड़
अपने अपने हिस्‍से
बटोरते सुना रहे हैं
कल रात की अनदेखी कहानी ।
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Thursday, November 22, 2012

वह परिन्दा है



सुदर्शन रत्नाकर

खुली खिड़की से उड़ कर
वह अंदर आया
मैंने पकड़ कर सहलाया तो
वह सिमट गया

मेरी हथेली पर रखे दाने
चोंच भर खा गया
मेरी आँखों में उसने
प्यार का समन्दर देखा
और उड़ना भूल गया

मैं उसे फिर सहलाऊँगी
और -दोनों हाथों से उड़ाऊँगी
वह उड़ तो जाएगा
पर कल फिर आएगा
दाना खाएगा
उड़ना भूल जाएगा

वह रोज़ ऐसा करेगा
खुली खिड़की से आएगा
छुअन का एहसास करेगा
सिमटेगा
खाएगा

वह मेरे हाथों के स्पर्श को एहसासता है
वह मेरे प्यार की भाषा समझता है
वह परिन्दा है
वह सब जानता है
इन्सान नहीं
जो प्यार की गहराई को नहीं समझता
जो अपनों को भूल
अपने लिए जीता है
         और
अवसर मिलते ही
उड़ जाता है
कभी लौट कर आने के लिए
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Wednesday, November 14, 2012

बौने दिन


प्यारी गौरैया



डॉ• ज्योत्स्ना शर्मा

नन्हीं प्यारी गौरैया
रोज़ मेरी खिड़की पर करती
फुदक -फुदककर ता-ता -थैया

कितनी सुबह -सुबह जग जाती
तुम मीठे सुर साज़ सजाती
बजे अलार्म भले मेरा
मुझे समय से आन जगाती
तुम ना हो तो फिर पक्का है
कान खिंचें और मारे मैया

छुट्टी के दिन सोने देना
सुख सपनों में खोने देना
देखो बात बढ़ने पाए
बहुत देर मत होने देना
दाना- पानी दूँगी तुमको
मान करूँगी सोन चिरैया
मेरी प्यारी गौरैया
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Wednesday, November 7, 2012

सिर्फ़ बचा अपमान


दोहे
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
1
कुटिया रोई रात भर , ले भूख और प्यास ।
महल बेहया हो गए , करते हैं  परिहास । ।
2
दीमक फ़सलें चट करें ,घूम -घूम घर द्वार ।
गाँव- नगर लूटे सभी, लूटे सब बाज़ार  । ।
3
इज़्ज़त लुटी गरीब की , लूट लिया हर कौर ।
डाकू  तो बदनाम थे , लूटे कोई और  । ।
4
पोथी से डरकर  छुपा , जेबों में कानून ।
जिसकी जेबें हों भरी , उसको चढ़े जुनून  । ।
5
कर्ज़ चढ़ा हल तक बिका, बिके खेत खलिहान ।
दो रोटी की भूख थी, सिर्फ़ बचा अपमान । ।
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