पथ के साथी

Tuesday, December 20, 2011

मान -सम्मान


कैनेडियन पंजाबी साहित्य सभा’टरांटो’ द्वारा पंजाबी और  हिन्दी के  दो प्रसिद्ध विद्वानों डा0  करनैल सिंह   थिन्द  और  रामेश्वर काम्बोज हिमांशु का मान -सम्मान

ब्रैम्पटन : (बलबीर मोमी/डा0सुखदेव झंड) रविवार 18 दिसम्बर को   ‘कैनेडियन पंजाबी साहित्य सभा टरांटो’  द्वारा अपनी  मासिक-संगोष्ठी में  पंजाबी और हिन्दी के दे दो प्रसिद्ध विद्वानों ‘गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर के  -रजिस्ट्रार और  प्रोफैसर हैड (डा0) करनैल सिंह   थिन्द  और  दिल्ली से पधारे प्राचार्य रामेश्वर काम्बोज हिमांशु को उनके द्वारा शिक्षा भाषा , साहित्य और सभ्याचार और लोक साहित्य के क्षेत्र में  किए गए  योगदान हेतु  सम्मान पत्र ,  घड़ियाँ और शॉल भेंट करके सम्मानित किया।
   सभा के आरम्भ में पिछले दिनीं पंजाबी भाषा के दिवंगत कलाकारों औए  लेखकों  कुलदीप माणक, देवानन्द ,पुष्पा हंस, सवरन चन्दन और  गुरमेल मडाहड़ को एक  इक मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि  भेंट की गई। इसके उपरान्त, सभा के  प्रधान प्रिंसिपल पाखर सिंह   और संरक्षक  प्रो0 बलबीर सिंह   मोमी नें दोनों विद्वानों का स्वागत करते हुए  सदस्यों को उनके बारे में संक्षिप्त जानकारी दी । । दोनों विद्वानों  ने   अपने -अपने  क्षेत्र में किए गए योगदान के बारे में  सभा के सदस्यों को विस्तारपूर्वक बताया । डा0 थिन्द  ने अपने  व्याख्यान में  फोकलोर (लोकसाहित्य) की परम्परा से मिलने वाली जानकारी दी  ।उन्होंने कहा कि  इसका  दायरा बड़ा विशाल है और  इसमें  लोक-गीत, लोक-धर्म, लोक-बोलियां ,टप्पे,  लोककथा , पहेलियाँ लोक-कला, रस्मो-रिवाजवहम-भ्रम, दवा-दारू, आदि सब कुछ आ जाता है। उन्होंने  पंजाबी भाषा को  अंगरेज़ी और अन्य  भाषाओं के सम्भावित ख़तरे से सावधान होने की बात भी  पूरा ज़ोर देकर की।
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु ने हिन्दी लघुकथा के बारे में चर्चा  करते हुए  अपनी  पुस्तकों के बारे में तथा  हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं  खास तौर से पंजाबी में एक दूसरे के सहयोग से हो रहे कार्यों के बारे में जानकारी दी । । उन्होंने कहा कि आज कम्प्यूटर -साफ़्टवेयर (कन्वर्टर) तैयार हो गए हैं , जिनकी  मदद से  अलग-अलग  भाषाओं के साहित्य को एक लिपि से दूसरी लिपि में बदलना और  लिखना-पढना सम्भव हो गया  है। उन्होंने अपने कुछ दोहे सुनाए और एक लघुकथा का भी पाठ किया।
सभा के दूसरे सत्र में कई सदस्यों ने अपनी  कविताएँ, गज़ल और  गीत सुनाए। सभा में  महिन्दर दीप ग्रेवाल, श्रीमती  दुग्गल, जगीर सिंह   काहलों, सुखिन्दर, कर्नल एस 0पी0सिंह  , प्रो: मदन बंगा, परमजीत ढिल्लों, अंकल दुग्गल, प्रिंसिपल चरन सिंह   भोरशी, मलूक सिंह   काहलों, डा0 सुखदेव झंड, तलविंदर मंड, मनजीत झम्मट, गुरदिआल सहोता, श्री  ग्रेवाल तथा कई और व्यक्ति उपस्थित थे।

काँच के घर ( ताँका)


छाया:हिमांशु

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
1
काँच के घर
बाहर सब देखे
भीतर है क्या
कुछ न दिखाई दे
न दर्द सुनाई दे ।


2
काँच के घर
काँपती थर-थर
चिड़िया सोचे-
हवा तक तरसे
जाऊ कैसे भीतर।
3
छाया: हिमांशु
बिछी है द्वार
बर्फ़ की ही चादर
काँच के जैसी
चलना सँभलके
गिरोगे फिसलके ।

Wednesday, December 14, 2011

आती न पाती(हाइकु)


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1

आती न पाती
हूक -सी उठ तेरी
याद रुलाती

2
घायल पाखी
उड़ा न गगन में
मिलता कैसे

3
सागर पार
बिन कश्ती कठिन
ज्यों इन्तज़ार।

4
जीवन-साँझ
सिमट गई धूप
बची है रात।

Tuesday, December 13, 2011

सर्दी


सीमा स्‍मृति

सर्दी का अर्थ,
गरम रजाई में
कविता करते शब्‍दों में नहीं, ठिठुरता,
ए सी कारों  के दरवाजों से नहीं  झाँकता,
शरीरों की गर्मी से नहीं मिटता,
सर्दी के लिए सरकारी इंतज़ामों की डींगों से नहीं, ढकता
सर्दी का अर्थ,
भूखे पेट
सूखे बदन,
बिना छप्‍पर,
फटी शाल लिये,
सुबह अखबार और इंटरनेट के किसी कोने में
'शीत लहर से पाँच की मृत्‍यु '
सिर्फ़ अपने अर्थ खोजता है।
-0-

Wednesday, December 7, 2011

झरना बहाएँगे (ताँका)


झरना बहाएँगे (ताँका)
-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
1
किसे था पता-
ये दिन भी आएँगे
अपने सभी
पाषाण हो जाएँगे
चोट पहुँचाएँगे।
2
जीवन भर
रस ही पीते रहे
वे तो जिए
हम तो मर-मर
घाव ही सीते रहे।
3
वे दर्द बाँटें
बोते रहे हैं काँटे
हम क्या करें?
बिखेरेंगे मुस्कान
गाएँ फूलों के गान।
4
काटें पहाड़
झरना बहाएँगे
भोर लालिमा
चेहरे पे लाएँगे
सूरज उगाएँगे ।
5
उदासी -द्वारे
भौंरे गुनगुनाएँ
मन्त्र सुनाएँ-
जब तक है जीना
सरगम सुनाएँ।
6
ओ मेरे मन !
तू सभी से प्यार की
आशा न रख
पाहन पर दूब
कभी जमती नहीं ।
7
मन के पास
होते वही हैं खास
बाकी जो बचे
वे ठेस पहुँचाते
तरस नहीं खाते
8
ये सुख साथी
कब रहा किसी का
ये हरजाई
थोड़ा अपना दु:ख
तुम मुझको दे दो।
9
पीर घटेगी
जो तनिक तुम्हारी
मैं हरषाऊँ
तेरे सुख के लिए
दु:ख गले लगाऊँ ।
-0-

Saturday, December 3, 2011

ओस है ये जिंदगी


ओस है ये जिंदगी
स्वाति वल्लभा राज

ओस की बूँदों की तरह ये जिंदगी,
रात की कोशिशों में बनती और
सूरज की पहली किरण में बिखर जाती

अगले पल से फिर वही नाकाम कोशिश,
खुद को बनाने की
बनने के बाद कुछ वक़्त ठहरने की|
ठहराव के बाद कुछ पल जीने की
पर जीने से पहले ही एक डर गुम जाने का
फिर डर  के सच्चाई का सामना

ओस की तरह दूब पे बिखर कर
चमकना चाहे ये ज़िन्दगी
पल भर को ही निडर हो,
जी जाना चाहे ये जिंदगी।
-0-

Friday, November 25, 2011

आँखों में दरिया (माहिया)


माहिया पंजाब के प्रेम गीतों का प्राण है । पहले इसके विषय प्रमुख रूप से प्रेम के दोनों पक्ष- संयोग और विप्रलम्भ रहे  हैं।वर्तमान में इस गीत में सभी सामाजिक सरोकारों का समावेश होता है । तीन पंक्तियों के इस छ्न्द में पहली और तीसरी पंक्ति में 12 -12 मात्राएँ तथा दूसरी पंक्ति में 10 मात्राएँ
होती हैं। पहली और तीसरी पंक्तियाँ तुकान्त होती है ।
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
आँसू जब बहते हैं
कितना दर्द भरा
सब कुछ वे कहते हैं।
2
ये भोर सुहानी है
चिड़ियाँ मन्त्र पढ़ें
सूरज सैलानी है ।
3
मन-आँगन  सूना है
वो परदेस गए
मेरा दु:ख दूना है।
4
मिलने का जतन नहीं
बैठे चलने को
नयनों में सपन नहीं।
5
यह दर्द नहीं बँटता
सुख  जब याद करें
दिल से न कभी हटता ।
6
नदिया यह कहती है-
दिल के कोने में
पीड़ा ही रहती है ।
7
यह बहुत मलाल रहा
बहरों से अपना
क्यों था सब हाल कहा।
8
दिल में तूफ़ान भरे
आँखों में दरिया
हम इनमें डूब मरे।
9
दीपक -सा जलना था
बाती प्रेम -पगी
कब हमको मिलना था।
10
तूफ़ान-घिरी कलियाँ
दावानल लहका
झुलसी सारी गलियाँ।
21/11/11

Monday, November 21, 2011

हाइकु मुक्तक


हाइकु मुक्तक
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
1
सपने लाख / जतन से पालना / टूट जाते हैं
प्यार करते / जान से ज्यादा भी / रूठ जाते हैं
हमें न डर / कि अनजान धोखा / दे सकता है
घेरे हमें जो / रात -दिन सगे ही / लूट जाते हैं । ।
2
मिलेंगे रास्ते / या भटकाव होगा / झेलना होगा
मिलेंगे फूल /या अंगार उनसे / खेलना होगा
चौराहे पर / गले रोज़ मिलतीं / हमें बाधाएँ
चुनौती बनी / ज़िन्दगी पापड़ तो /बेलना होगा
3
लौटेंगे वो भी / मौसम भी ,आवाज़ / लगाके देखो
दिल दरिया / से दो घूँट प्यार के /पिलाके देखो
दुश्मनों की भी / मिलती सरहदें / मज़बूरी है
दर्द समझो / इस बार दिल भी / मिलाके देखो । ।
4
दु:ख सहके /आखिरी दम तक /निभाए रिश्ते
हम थे अच्छे /सभी को उम्रभर /थे भाए रिश्ते
आज हमने । दो घूँट पानी माँगा /तो यह जाना
द्वार थे बन्द / जरा भी किसी काम /न आए रिश्ते
5
परदेस में /ज़रा -सी हूक उठी / भीगे नयन
जान ही लिया / उसने, रोया होगा / मेरा ये मन
इस जहाँ में / कभी बाधक नहीं / दूरियाँ होतीं
भाव का रिश्ता / पढ़ लिया करता/ हर कम्पन । ।
6
मिले हैं रोज़ /चौराहों पर लाखों / मिटाने वाले
नौसीखिए भी / बन गए हैं पाठ / पढ़ाने वाले
साथ तुम हो /परस का जादू है / प्यार तुम्हारा
चलेंगे साथ / तो हार ही जाएँगे / झुकाने वाले । ।
7
टकरा गया / सुधियों के तट से / भाव का जल
खिल उठे थे / कुछ एक पल में / सारे कमल
मुस्कुरा उठी / चाँदनी-सी निर्मला /झील मन की
शीतल हुए / तुम्हारे दरस से / नैन बेकल । ।
8
स्वार्थ का बोझ / शिला बन जाए तो /भार हैं रिश्ते
नेह के मेघ/ न बरसे तो बनें / थार हैं रिश्ते
इस जग में / अगर चाहो रहे / आदमी ज़िन्दा
सूखते दिल /सींच दो मिलकर / प्यार हैं रिश्ते । ।
-0-

Wednesday, November 16, 2011

एक उदास लड़की के लिए


एक उदास लड़की के लिए
छाया:रोहित काम्बोज
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
आँधी आई धूल उड़ाती
पेड़ों के कान मरोड़ती ,
उन पेड़ों के
जो धरती की छाती पर
पैर रखकर बरसों से खड़े थे
धरती में बहुत गहरे गड़े थे,
डालियाँ झकझोरतीं
टहनियों की बाहें मरोड़ती ;
पेड़ कराह उठे
कुछ जड़  से उखड़ गए
कुछ की डालियाँ झूल उठी
टूट गईं
कुछ की नई टहनियाँ
कुछ ही झोकों में रूठ गईं
देखते ही देखते
हरे -भरे उपवन उजड़ गए।
पत्ते -
कुछ झोंको में झड़ गए ,
नन्हीं -सी घास
आँधी की मार से हर बार
झोंकों के सामने सिर झुका लेती
तूफ़ान टकराता
साँड की तरह डकराता
लाल -लाल आँखे किए
धूल के गुबार उड़ाता
घास मुस्कराती,
बार -बार लचक जाती
अन्धड़ हो जाता पसीने -पसीने
और वह नन्हीं -सी निमाणी -सी घास
ज़मीन की सतह तक झुककर भी
छाया:रोहित काम्बोज
तूफ़ान के गुज़र जाते ही
उठकर खड़ी हो जाती
इस तरह
वह नन्हीं-सी निमाणी -सी घास
बड़े -बड़े दरख्तों से
बड़ी हो जाती ।
तूफ़ान के थमते ही
आ जाती नन्हीं -सी गिलहरी
पा जाती कुछ दाना-पानी ;
खिड़की के पास बैठी
गूगल से साभार
उदास लड़की
देखती यह सब एकटक
उदासी की धूल झाड़कर
हौले से मुस्करा देती
सुबह की दूब पर बिखरी
ओस की तरह !
-0-

Sunday, November 13, 2011

मुखौटा



रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
नेताजी को चुनाव लड़ना था। जनता पर उनका अच्छा प्रभाव न था। इसके लिए वे मुखौटा बेचने वाले की दूकान में गए। दूकानदार ने भालू, शेर, भेडिए,साधुसंन्यासी के मुखौटे उसके चेहरे पर लगाकर देखे। कोई भी मुखौटा फिट नहीं बैठा। दूकानदार और नेताजी दोनों ही परेशान।
दूकानदार को एकाएक ख्याल आया। भीतर की अँधेरी कोठरी में एक मुखौटा बरसों से उपेक्षित पड़ा था। वह मुखौटा नेताजी के चेहरे पर एकदम फिट आ गया। उसे लगाकर वे सीधे चुनावक्षेत्र में चले गए।
परिणाम घोषित हुआ। नेताजी भारी बहुमत से जीत गए। उन्होंने मुखौटा उतारकर देखा। वे स्वयं भी चौंक उठेवह इलाके के प्रसिद्ध डाकू का मुखौटा था।