पथ के साथी
Friday, January 1, 2010
शुभकामना !
मन से उर -कम्पन से
लिखूँ शुभकामना ।
उँगली तुम जीवन में
स्नेह की थामना ।
उगते रहें
सूरज
नित द्वार तुम्हारे ।
तुम नहीं
हारना
जग चाहे ये हारे ।
करना न पड़े कभी
दु:खों का सामना ।
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
Saturday, December 19, 2009
1-चक्रव्यूह
‘‘मँझले को देखो न, कितना कमज़ोर हो गया है।’’ सुबह पत्नी ने कहा।
‘‘देख तो मैं भी रहा हूँ। पर करूँ भी तो क्या? कलकत्ता में रहे हैं। वहाँ गरम कपड़ों की ज्यादा ज़रूरत नहीं पड़ी। अधिक न भी हों तो तीनों बच्चों के लिए एक–एक फुल स्वेटर ज़रूरी है। मैं चप्पल पहनकर ही आफिस जा रहा हूँ। कम–से–कम दो सौ रुपए हाथ में हों, तब मँझले का इलाज फिर शुरू कराऊँ।’’
‘‘मैं पिछले आठ साल से देख रही हूँ कि आपके पास महीने के अन्तिम दिनों में दो रुपए भी नहीं बचते।’’ पत्नी तुनक उठी।
कोई खांसी–जुकाम का इलाज तो कराना नहीं। लंग्स की खराबी है। साल–भर दवाई खिलाकर देख ली। रत्ती–भर फर्क नहीं पड़ा। संतुलित भोजन भी कहाँ मिल पाता है मंझले को।
मैंने देखा, पत्नी की आँखें भर आईं–‘‘तीनों बेटों में मँझला ही तो सुन्दर भी लगता है।....’’ उसने एक ओर मुँह घुमा लिया। मैं बिना खाए ही आफिस चला गया। मँझले का झुरता हुआ चेहरा दिन–भर मेरी आँखों में तैरता रहा। शाम को बोझिल कदमों से घर लौटा। पिताजी का पत्र आया था कि एक हज़ार रुपए भेज दूँ। अब उनको क्या उत्तर दूँ? महीने–भर की कमाई है आठ सौ रुपए। कहीं डाका डालूँ या चोरी करूँ? साल–भर में भी कभी एक हज़ार रुपए नहीं जुड़ पाए। वे बूढ़ी आँखें आए दिन पोस्टमैन की प्रतीक्षा करती होंगी कि मैं हज़ार न भेजता, तीन–चार सौ ही भेज देता।
एक पीली रोशनी मेरी आँखों के आगे पसर रही है जिसमें जर्जर पिताजी मचिया पर पड़े कराह रहे हैं और अस्थि–पंजर सा मेरा मँझला बेटा सूखी खपच्ची टांगों से गिरता–पड़ता कहीं दूर भागा जा रहा है। और मैं धरती पर पाँव टिकाने में भी खुद को असमर्थ पा रहा हूँ।
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2-चक्र
मोना को सुबह ही सुबह खेलते देखकर महेश ने पत्नी को कनखियों से इशारा किया–''देखो, मोना की रात भी कितना समझाया था कि सोने का वक्त हो गया है। खेल बंद करके होमवर्क पूरा कर लो। अब फिर सुबह ही सुबह......'' वह क्रौंध से होंठ चबाता हुआ दूसरे कमरे में चला गया। सहमा हुआ मोना नल पर जाकर ब्रश करने लगा। आठ बज गए। स्कूल जाने में सिर्फ़ आधा घंटा है। महेश की नज़रें मोना को तलाश रही थीं। उड़ती–सी नज़र बरामदे की ओर चली गई। पत्नी रसोईघर में व्यस्त थी। मोना दीवार के किनारे इमली के बीज फैलाकर निशाना साध रहा था। महेश इस बार संयम खो बैठा। उसने लपककर मोना को पकड़ लिया। एक के बाद एक थप्पड़ पड़ने लगे। उस पर जैसे पागलपन सवार हो गया था। उसने मोना को लाकर पलंग पर पटक दिया। एक चीख के साथ वह उछलकर खड़ा हो गया । पत्नी रसोईघर से दौड़कर आई। उसने पत्नी को एक तरफ धकेल दिया।
''मत मारो पापा.....'' उसने हाथ जोड़ दिए। डर के मारे पेशाब निकल जाने से उसकी पैण्ट गीली हो गई। सुबकियों के साथ उसका पूरा शरीर पत्ते की तरह काँप रहा था। महेश चीखा–''तुमको रात भी समझाया फिर भी तुम बात क्यों नहीं मानते?'' और थप्पड़ मारने के लिए हाथ उठाया। पत्नी ने हाथ पकड़ लिया–''अब जाने भी दो या जान ही लोगे इसकी।''
दफ्तर पहुचने पर उसका मन और व्याकुल हो गया। जब काम में मन नहीं लगा तो वह छु्ट्टी लेकर घर लौट आया।
मोना को बुखार चढ़ गया था। पत्नी सिरहाने बैठी थी। मोना ने धीरे से आँखें खोलीं। ''पापा''–कहकर फिर आँखें मूँद लीं।
''मैंने आज अपने बेटे को बहुत पीटा है न?'' महेश ने मोना के बालों में उँगलियाँ चलाते हुए कहा।
''मैंने भी तो आपकी बात नहीं मानी?'' मोना ने अपना हाथ पिता की गोद में रख दिया।
दोनों की आँखें भीग चुकी थीं।
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3-जहरीली हवा
आँख खुली। किशोर हड़बड़ाकर उठ बैठा। गला सूख रहा था। पानी पीकर थोड़ी राहत मिली। हाशिम गहरी नींद सोया हुआ था। उसे भयंकर सपने पर हैरत हुई। सपने उसे कभी–कभार ही आते हैं पर इस तरह का सपना तो कभी नहीं आता। पूरा शहर पागलपन की आग में धू–धू कर जल रहा है।
सोते समय उसने हाशिम से पूछा था–''इस पागलपन का अंत कैसे होगा?''
देखो भाई किशोर, पागलपन आदमी की फितरत बन गया है। फितरत कभी खत्म नहीं होती। हम जैसों की मित्रता ही इसका उत्तर है।''
''प्राण रहते मैं तुम्हारा बाल भी बाँका नहीं होने दूँगा।'' किशोर ने हाशिम का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा।
उसके बाद दोनों सो गए थे।
''मुझे ऐसा सपना क्यों आया? हे प्रभु!'' किशोर ने दीर्घ उच्छ्वास छोड़ा। हाशिम की नींद उचट गई। किशोर को बैठा देखकर वह उनींदे स्वर में बोला–''क्यों, क्या बात है? नींद नहीं.....आ रही है?''
''यूँ ही बस।''
''तुम फिर सोचने लगे?'' हाशिम ने मीठी झिड़की दी।
किशोर ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। हाशिम करवट बदलकर अबोध शिशु की तरह सो गया।
वह बेखबर सोते अपने जिगरी दोस्त को एकटक देखता रह गया था। भला वह सपने में भी अपने मित्र पर चाकू का वार कैसे कर गया।
रह–रहकर गोली चलने की आवाज़ वातावरण में दहशत भर रही थी।
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4-दूसरा सरोवर
एक गाँव था। उसी के पास में था स्वच्छ जल का एक सरोवर। गाँववाले उसी सरोवर का पानी पीते थे। किसी को कोई कष्ट नहीं था। सब खुशहाल थे।
एक बार उजले-उजले कपड़े पहनकर एक आदमी गाँव में आया। उसने सब लोगों को मुखिया की चौपाल में इकट्ठा करके बहुत अच्छा भाषण दिया। उसने कहा-"सरोवर आपके गाँव से एक मील की दूरी पर है। आप लोगों को पानी लाने के लिए बहुत दिक्कत होती है। मैं जादू के बल पर सरोवर को आपके गाँव के बीच में ला सकता हूँ। जिसे विश्वास न हो वह मेरी परीक्षा ले सकता है। मैं चमत्कार के बल पर अपना रूप-परिवर्तन कर सकता हूं। गाँव के मुखिया मेरे साथ चलें। मेरा चमत्कारी डंडा इनके पास रहेगा। मैं सरोवर में जाऊँगा। ये मेरे चमत्कारी डंडे को जैसे ही ज्ञमीन पर पटकेंगे, मैं फिर आदमी का रूप धारण कर लूँगा।"
लोग उसकी बात मान गए। उजले कपड़े किनारे पर रखकर वह पानी में उतरा। मुखिया ने चमत्कारी डंडा ज्ञमीन पर पटका। वह आदमी खौफनाक मगरमच्छ बनकर किनारे की ओर बढ़ा। मुखिया सिर पर पैर रखकर भागा। डंडा भी उसके हाथ से गिर गया।
अब उस सरोवर पर कोई नहीं जाता। उजले कपड़े आज तक किनारे पर पड़े हैं। गाँववाले चार मील दूर सरोवर पर जाने लगे हैं।
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Friday, November 27, 2009
मुक्तक
बघनखे पहनए हुए, पुरोहित अपने गाँव के ।
शूल अब गड़ने लगे हैं अधिक अपने पाँव के ।
दूर तक है रेत और गर्म हवा के थपेड़े
यहाँ पहुँच झुलसे सभी साथी ठण्डी छाँव के ।-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
Tuesday, November 17, 2009
शुभकामना !
जिंदगी आपकी खुशियों से भरी रहे ,
संगीता पुरी
Saturday, November 7, 2009
मैं उजाला हूँ
मैं उजाला हूँ ,उजाला ही रहूँगा ।
अँधेरी गलियों में ज्योति-सा बहूँगा ।
चाँद मुझे गह लेंगे कुछ पल के लिए ,पर मैं रोशनी की कहानी कहूँगा ॥
Wednesday, October 28, 2009
विजया दशमी मंगलमय हो !
Sunday, October 25, 2009
दो कविताएँ
1 मजदूर
मधुर कुलश्रेष्ठ
शहर के व्यस्ततम चौराहे पर
लगी है हाट मजदूरों की
लोग आलू, प्याज की तरह
हाथों की मछलियाँ देख-देखकर
छाँट रहे हैं मजबूत मजदूर
ताकि मजदूर के पसीने की बूँदों से
चमक उठे
उनके सपनो का महल.
2-अपना अपना दर्द
झोपड़ी को दर्द है
कि वह कभी
अपना सिर उठाकर
सीना ताने
आसमान से बातें नहीं कर पाई
और महलों को दर्द है
कि वह हमेशा
अपना सारा अस्तित्व
समेट कर भी
धरती की गोद में
सिमटकर सोने में
नाकामयाब रहा है।
Sunday, October 18, 2009
शत-शत दीप जलाएँ
Wednesday, September 16, 2009
हिन्दी
हिन्दी! ना बनना तुम केवल माथे की बिन्दी,
जब चाहा सजाया माथे पर,
जब चाहा उतारा फेंक दिया।
हिन्दी! तुम बनना हाथों की कलम,
और जनना ऐसे मानस पुत्रों को,
जो कबीर बन फ़टकारे,
जाति धर्म की दीवारें तोड़ हमें उबारे।
जो सूर बन कान्हा की नटखट केलियाँ दिखलाए,
जीवन के मधुवन में मुरली की तान सुनाए।
जो मीरा बन हृदय की पीर बताए,
दीवानी हो कृष्ण की और कृष्णमय हो जाए।
हिन्दी! मत बनना तुम केवल माथे की बिन्दी,
जन-जन की पुकार बनना तु्म ।
छा जाना तुम सरकारी कार्यालयों में भी,
सभाओं में, बैठकों में, गोष्ठियों में
वार्तालाप का माध्यम बनना तुम।।
हर पत्र-परिपत्र पर अपना प्यारा रूप दिखाना तुम।
हिन्दी! छा जाना तुम मोबाइल के स्क्रीनों पर
रोमन के रंग में न रँगना
देवनागरी के संग ही आना।
केवल रोज डे या फ़्रेंडशिप डे पर ही नहीं
ईद, होली और बैशाखी पर भी,
शुभकामनाएँ देना तुम,
भावों की सरिता बहाना तुम ।
हिन्दी! तुम बनना
की पैड पर चलती उँगलियाँ
अंतरजाल के अनगिनत पृष्ठ बनना तुम,
रुपहले पर्दे को अपना स्नेहिल स्पर्श देना तुम,
उद्घोषिका के चेहरे की मुसकान में
संवाददाता के संवाद में
पत्रकार की पत्रकारिता में
छा जाना तुम
रुपहले पर्दे को छूकर सुनहरा बना देना तुम।
हिन्दी! तुम कभी ना बनना केवल माथे की बिन्दी,
तुम बनना जन गण मन की आवाज,
पंख फ़ैलाना अपने
देना सपनों को परवाज।
Tuesday, September 15, 2009
संस्कार है हिन्दी ।
Monday, September 7, 2009
बच्चों के मन में सेंध लगानी होगी
31 अगस्त ,2009,प्रगति मैदान का प्रगति ऑडिटोरियम, अवसर दिल्ली पुस्तक मेला । नेशनल बुक ट्रस्ट इण्डिया ने विचार गोष्ठी-'बच्चों के लिए पुस्तकों का लेखन ,चित्रांकन ,विपणन : वर्त्तमान चुनौतियाँ' का आयोजन किया । गोष्ठी की अध्यक्षता देवेन्द्र मेवाड़ी ने की ।विचार गोष्ठी में अलका पाठक , मधु पन्त , और दिनेश मिश्र ने अपने विचार प्रकट किए ।साथ ही 'सौर मण्डल की सैर'( लेखक-देवेन्द्र मेवाड़ी, चित्रांकन-अरूप गुप्ता ),हमारे जल -पक्षी ( राजेश्वर प्रसाद नारायण सिंह),अंजाम (मौलवी क़मर अब्बास,चित्रांकन:हाज़ी बिन सुहेल)पुस्तकों का लोकार्पण किया गया। पुस्तक लोकार्पण विभिन्न विद्यालयों के बच्चों ने किया ।
Friday, August 21, 2009
शिक्षकों के लिए ई-मंच - टीचर्स आफ इंडिया
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 में भी शिक्षक की भूमिका पर विशेष रूप से चर्चा की गई है। इसमें कहा गया है कि शिक्षक बहुमुखी संदर्भों में काम करते हैं। शिक्षक को शिक्षा के संदर्भों,विद्यार्थियों की अलग-अलग पृष्ठभूमियों,वृहत राष्ट्रीय और खगोलीय संदर्भों,समानता,सामाजिक न्याय, लिंग समानता आदि के उत्कृष्ठता लक्ष्यों और राष्ट्रीय चिंताओं के प्रति ज्यादा संवेदनशील और जवाबदेह होना चाहिए। इन अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए आवश्यक है कि शिक्षक-शिक्षा में ऐसे तत्वों का समावेश हो जो उन्हें इसके लिए सक्षम बना सके।
इसके लिए हर स्तर पर तरह-तरह के प्रयास करने होंगे। टीचर्स आफ इंडिया पोर्टल ऐसा ही एक प्रयास है। गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की प्राप्ति के लिए कार्यरत अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन (एपीएफ) ने इसकी शुरुआत की है। महामहिम राष्ट्रपति महोदया श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने वर्ष 2008 में शिक्षक दिवस इसका शुभांरभ किया था। यह हिन्दी,कन्नड़, तमिल,तेलुगू ,मराठी,उडि़या, गुजराती तथा अंग्रेजी में है। जल्द ही मलयालम,पंजाबी,बंगाली और उर्दू में भी शुरू करने की योजना है। पोर्टल राष्ट्रीय ज्ञान आयोग द्वारा समर्थित है। इसे आप www.teachersofindia.org पर जाकर देख सकते हैं। यह सुविधा नि:शुल्क है।
क्या है पोर्टल में !
इस पोर्टल में क्या है इसकी एक झलक यहाँ प्रस्तुत है। Teachers of India.org शिक्षकों के लिए एक ऐसी जगह है जहाँ वे अपनी पेशेवर क्षमताओं को बढ़ा सकते हैं। पोर्टल शिक्षकों के लिए-
1. एक ऐसा मंच है, जहां वे विभिन्न विषयों, भाषाओं और राज्यों के शिक्षकों से संवाद कर सकते हैं।
2. ऐसे मौके उपलब्ध कराता है, जिससे वे देश भर के शिक्षकों के साथ विभिन्न शैक्षणिक विधियों और उनके विभिन्न पहुलओं पर अपने विचारों, अनुभवों का आदान-प्रदान कर सकते हैं।
3. शैक्षिक नवाचार,शिक्षा से सम्बंधित जानकारियों और स्रोतों को दुनिया भर से विभिन्न भारतीय भाषाओं में उन तक लाता है।
Teachers of India.org शिक्षकों को अपने मत अभिव्यक्त करने के लिए मंच भी देता है। शिक्षक अपने शैक्षणिक जीवन के किसी भी विषय पर अपने विचारों को पोर्टल पर रख सकते हैं। पोर्टल के लिए सामग्री भेज सकते हैं। यह सामग्री शिक्षण विधियों, स्कूल के अनुभवों, आजमाए गए शैक्षिक नवाचारों या नए विचारों के बारे में हो सकती है।
विभिन्न शैक्षिक विषयों, मुद्दों पर लेख, शिक्षानीतियों से सम्बंधित दस्तावेज,शैक्षणिक निर्देशिकाएँ, माडॅयूल्स आदि पोर्टल से सीधे या विभिन्न लिंक के माध्यम से प्राप्त किए जा सकते हैं।
शिक्षक विभिन्न स्तम्भों के माध्यम से पोर्टल पर भागीदारी कर सकते हैं।
माह के शिक्षक पोर्टल का एक विशेष फीचर है। इसमें हम ऐसे शिक्षकों को सामने ला रहे हैं,जिन्होंने अपने उल्लेखनीय शैक्षणिक काम की बदौलत न केवल स्कूल को नई दिशा दी है, वरन् समुदाय के बीच शिक्षक की छवि को सही मायने में स्थापित किया है। पोर्टल पर एक ऐसी डायरेक्टरी भी है जो शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रही संस्थाओं की जानकारी देती है।
आप सबसे अनुरोध है कि कम से कम एक बार इस पोर्टल पर जरूर आएँ। खासकर वे साथी जो शिक्षक हैं या फिर शिक्षा से किसी न किसी रूप में जुड़े हैं। अगर आपका अपना कोई ब्लाग है तो इस जानकारी को या टीचर्स आफ इंडिया के लिंक को उस पर देने का कष्ट करें।
तो मुझे आपका इंतजार रहेगा।
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Saturday, August 15, 2009
जागरूक भारत
चुनाव के समय इनका असली प्रकोप देखा जा सकता है । अच्छे लोकतन्त्र के लिए ये सबसे बड़ा खतरा हैं । इनका सहारा लेकर जब तक वोट माँगने का सिलसिला बरकरार रहेगा ; तब तक ये राष्ट्र को कुतरते रहेंगे । इस अवसर पर जैसे भी जीत मिले ; उसी तरह के हथकण्डे अपनाए जाते हैं ।
आर्थिक शक्तियाँ कुछ लोगों तक सीमित होती जा रही हैं ।भ्रष्टाचार शिष्टाचार का स्थान लेता जा रहा है । शिक्षा समर्पित लोगों के हाथ में न होकर व्यापारियों के हाथ में चली गई है ।यह ख़तरा देश का सबसे बड़ा ख़तरा है । भू माफिया की तरह शिक्षा माफिया का उदय इस सदी की सबसे बड़ी विडम्बना और अभिशाप हैं । भारत की बौद्धिक सम्पदा का एक बड़ा भाग उच्च शिक्षा से निकट भविष्य में वंचित होने वाला है । इसका कारण बनेंगी लूट का खेल खेलनेवाली धनपिपासु शिक्षा संस्थाएँ; जहाँ शिक्षा दिलाने की औक़ात भारत के ईमानदार 'ए' श्रेणी के अधिकारी के बूते से भी बाहर हो रही है । सामान्यजन किस खेत की मूली है ।
एक वर्ग वह है जो सरकार की तमाम कल्याणकारी योजनाओं को अपनी तिकड़म से पलीता लगाने में माहिर है । वह सारी सुविधाओं को आवारा साँड की तरह चर जाता है । तटस्थ रहकर काम नहीं चल सकता । हमें समय रहते चेतना होगा; अन्यथा हम भी बराबर के कसूरवार होंगे । समृद्ध भारत के लिए हमें सबसे पहले जागरूक भारत बनाना होगा । सोया हुआ उदासीन भारत सब प्रकार की कमज़ोरियों का कारण न बने ; हमें यह प्रयास करना होगा । हमें आन्तरिक षड़यन्त्रों पर काबू पाना होगा; तभी हम देश के बाहरी दुश्मनों का मुकाबला कर सकते हैं । हम यह बात गाँठ बाँध लें कि कोई देश किसी का सगा नहीं होता , सगा होता है उनका राष्ट्रीय हित । हम राष्ट्रीय हितों की बलि देकर सम्बन्ध बनाएँगे तो धोखा खाएँगे, जैसा अतीत में खाते रहे हैं ।
15 अगस्त 09
Wednesday, July 22, 2009
मैं उजाला हूँ
मैं उजाला हूँ
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
मैं उजाला हूँ ,उजाला ही रहूँगा ।
अँधेरी गलियों में ज्योति-सा बहूँगा ।
चाँद मुझे गह लेंगे कुछ पल के लिए ,
पर मैं रोशनी की कहानी कहूँगा ॥
XXXXXX
पल जो भी मिले हैं मुझे उपहार में ।
उनको लुटा दूँगा मैं सिर्फ़ प्यार में ।
नफ़रत की फ़सलें उगाई हैं जिसने;
मिलेगा उसे क्या अब इस संसार में ॥
[22 जुलाई 2009]
Sunday, June 21, 2009
Thursday, June 18, 2009
महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ-1
महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ
शब्दशिल्पियों के
आसपास
सम्पादक : राजुरकर राज
वार्षिक: 60 रुपये
सम्पर्क: एच-3,उद्धवदास मेहता परिसर
नेहरू नगर भोपाल -462003
चलित वार्ता : 09425007710
ई-मेल-shabdshilpi@yahoo.com
यह पत्रिका पूर्णतया साहित्यिक समाचारों के लिए समर्पित है । जून 09 के इस अंक में अगाथा संगमा के हिन्दी में शपथ –ग्रहण को महत्त्व प्रदान किया है ,जो सर्वथा उचित है ।पत्रिका का यह बारहवाँ वर्ष है ।साहित्यिक गतिविधियों के प्रति सजग रहनेवाले पाठकों को यह पत्रिका ज़रूर पढ़नी चाहिए ।
भारतीय वाङ्मय [मासिक]
संस्थापक एवं पूर्व प्रधान सम्पादक
स्व पुरोषत्तमदास मोदी
सम्पादक: परागकुमार मोदी
वार्षिक शुल्क : 50 रुपये
विश्वविद्यालय प्रकाशन ,विशालाक्षी भवन पो बा 1149
चौक वाराणसी -221001[उ प्र]
पिछले दस वर्षों से निरन्तर प्रकाशित हिन्दी तथा
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