पथ के साथी

Thursday, May 9, 2024

1415-कृष्णा वर्मा की कविताएँ

 

कृष्णा वर्मा 

1-स्त्री

 


अधखुले दरवाज़े पर खड़ी स्त्री 

केवल इंतज़ार ही नहीं करती 

वह भरती है भीतर उजालों को 

महसूसती है

स्वछंद उड़ती हवाओं के साथ 

लहराकर अपना आँचल

करती है हसास पवन की

उन्मुक्तता का 

भूल जाती है उस पल 

पाँव में पड़ी पाजेब और बिछुए 

दहलीज़ के पार खड़ी स्त्री 

हो जाती है तितली- सी 

विचर कर क्यारी-क्यारी 

भर लाती है सुवासित साँसें 

पंछी- सी उड़कर छू आती है 

अपने आसमानों का छोर 

मन और हृदय करके एक साथ  

बढ़ाती है अंत:करण

का विस्तार 

आलोकित आह्लादित अंतर्मन से 

मुड़कर दहलीज़ के इस पार

महकाती है दरो- दीवार

टाँककर आन्नदानुभूतियाँ।

-0-

2-संकल्प

 

राह में रोड़े बिछाए 

तो किसी ने काँच की किरचें 

किसी ने क्रोध दिलाकर 

कोशिश की लहू तपाने की

कोई जुटा रहा 

मेरे मन को बदगुमान करने को

तो कोई रिश्तों की परिभाषा  

उलटने की कोशिशों में 

कुछ मेरी आँखों में सागर उतारने को 

करते रहे भगीरथ प्रयास 

मेरी दृड़ता की ढिठाई ने 

अपनी आँखों के आसपास 

बाँध लिया घोड़े की भाँति पट्टा 

और मेरा लक्ष्य 

बनाने लगा पहाड़ में रास्ता

मेरा संकल्प  

बिना कोई परवाह किए

फिसलन भरी राहों पर  

बढ़ाने लगा क़दम और 

मिलती गईं राह में कई नेक आत्माएँ 

जो बनीं मेरे एकाकीपन की सराय

जिनकी आँखों में जलते

अपनापे के चिराग़ों ने कर दिया रोशन 

मेरी धुँधली राहों को।

-0-

3-एहसास

 

मिल जाया कर 

यूँही कभी-कभार 

सरे -राह किसी मोड़ पर 

तुझे देखकर जीवित होने का 

भरम बना रहता है

देख लूँ तुझे तो 

पुरसुकून हो जाती है 

मेरी परेशान सोच

दिन हो जाते हैं ख़ुशनुमा 

और रातें सुखवंत  

मिले जो तेरी एक झलक   

तो मुड़ आते हैं फिर से 

वो बीते संदली पल 

ख़ूबसूरत शामें 

शाम के धुँधलके में 

बुझते सूरज की नरम लाली 

और लाली में दमकते हम 

तेरे लहराते दुपट्टे को देख

याद आती है मिन्नी-मिन्नी महकती रुत

रुत की अँगड़ाइयाँ 

कोमल किसलय 

कलियों कीचटकन

भौरों की दीवानगी

रूह को तर करते  

महकी हवाओं के झकोरे

और क़ुदरत को सराहते हम 

मिल जाया कर ना यूँही कभी-कभी 

तुझे देखे से खिल जाता है 

मन का मौसम

निगाहें करती है सौ-सौ बार 

आँखों का शुक्रिया

नींद में डूबें आँखें तो 

तैर आते हैं तेरे स्वप्न 

रंग भरने लगती हैं उनमें 

कल्पनाओं की अप्सराएँ 

उँगली बनके कलम  

उगाने लगती है शब्द 

शब्द-सृजन का अखंड प्रवाह 

रंग देता है मन के पन्ने

बेतार साज़ और अनजाने सुरों से 

गूँज उठता है अनहद नाद 

खड़े पानियों में आ जाती है रवानी 

रोशनी से भर जाता हूँ

सब धुला-धुला निखरा-निखरा नज़र आता है

आ जाया कर अच्छा लगता है 

कभी-कभी मिल जाया कर तू   

किसी मोड़ पर किसी राह पर। 

-0-

Saturday, May 4, 2024

1414-दया धर्म का मूल है

  विजय जोशी  


 पूर्व ग्रुप महाप्रबंधकभेलभोपाल (म. प्र.)

जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू

सो तेहि मिलहि न कछु संदेहु

धर्म कोई शिष्टाचार रूपी पाखंड का प्रतिरूप नहीं है;  इसीलिए तो शास्त्रों में उसकी तदनुसार व्याख्या भी की गई है - धारयति इति धर्मम् अर्थात् जो भी धारण करने योग्य है, वह धर्म है। आदमी जब बड़ा होता है, तो दूसरों को तुच्छ तथा स्वयं को श्रेष्ठ न माने। यह मूल तत्त्व है। वस्तुत: उसे तो ईश्वर का आभारी होना चाहिए कि उसे सेवा का अवसर प्राप्त हुआ।

दया धर्म का मूल हैपाप मूल अभिमान

तुलसी दया न छांड़िये, जब लग घट में प्राण।

धीर गंभीर राम के मन में प्रजाजनों के लिये दया कूट कूट कर भरी हुई थी; इसीलिए उन्हें दया निधान भी कहा गया है। उन्होंने कभी भी सेवकों को आहत नहीं किया; वरन अपनी आकांक्षा को दबाकर उनका मान रखा। उनकी दृष्टि में तो न कोई छोटा है और न कोई बड़ा। न कोई नीच और न कोई उच्च। शबरी एवं केवट इसके साक्षात् उदाहरण हैं। वन गमन के दौरान जब वे गंगा तट पर आए, तो नदी पार करने हेतु उन्हें नाविक की आवश्यकता पड़ी।  उन्होंने केवट से निवेदन कियालेकिन उन्हीं के भक्त केवट ने प्रथम दृष्ट्या उनका अनुरोध स्वीकार नहीं किया

माँगी नाव न केवटु आना

 कहई तुम्हार मरमु मैं जाना

चरन कमल रज कहुं सबु कहई

 मानुष कराने मूरि कछु अहई

केवट ने कहा -आपकी चरण धूल से तो अहल्या पत्थर से स्त्री हो गई थी। फिर मेरी नाव तो काठ की है एवं मेरी आजीविका का एकमात्र सहारा ते। यदि यह स़्त्री हो गई, तो मैं जीवन निर्वाह कैसे करूँगा। प्रसंग बड़ा ही मार्मिक था। केवट ने आगे कहा कि जब तक मैं आपके पैर पखार न लूँनाव नहीं लाऊँगा। राम बात का मर्म समझ गए और सेवक की बात शिरोधार्य करते हुए बोले -

कृपासिंधु बोले मुसुकाई

 सोई करूँ जेहिं तव नाव न जाई

बेगि आनु जब पाय पखारू

होत विलंबु उतारहि पारू

बात का महत्त्व देखिए जिनके स्मरण मात्र से मनुष्य भवसागर पार उतर जाते ,  जिन्होंने 3 पग में पूरे ब्रह्मांड को नाप लिया थावे ही भगवान केवट जैसे साधारण मनुष्य को निहोरा कर रहे हैं और अब आगे देखिए, यह सुन केवट के मन में कैसे आनंद की हिलोरें आकार लेने लगीं और वह चरण पखारने लगा।

 

अति आनंद उमगि अनुरागा

चरण सरोज पखारन लागा

पार उतारकर केवट ने दण्डवत्प्रणाम किया और जब राम की इच्छा जान सीता ने उतराई स्वरूप रत्नजड़ित अँगूठी देने का प्रयास किया, तो उसने नम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया और कहा - आज मेरी दरिद्रता की आग बुझ गई है। मैंने बहुत समय तब मजदूरी की और विधाता ने आज भरपूर मजदूरी दे दी है। हे नाथ आपकी कृपा से अब मुझे कुछ नहीं चाहिए।

अब कछु नाथ न चाहिअ मोरे

 दीनदयाल अनुग्रह चौरे

फिरती बार मोहिजो देबा

 सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा

मित्रो! यही है दया का सच्चा स्वरूप, जो प्रेम में परिवर्तित हो सारे भेद मिटा देता है। आदमी के मन में गहरे उतरकर दिल को दिल से जोड़ देता है। न कोई लेन देनन कोई स्वार्थ केवल निर्मलनिस्वार्थ प्रेम। सारे धर्मों का यही संदेश है

अत्याचारी कंस बन मत ले सबकी जान

दया करे गरीब पर वो सच्चा बलवान

-0-v.joshi415@gmail.com

Friday, April 26, 2024

1413-अंजू निगम की कविताएँ

 

अंजू निगम  की कविताएँ

 1-बरखा


 

बरखा की बूँदों ने जब भी

फैलाया था अपना आँचल

और जब बिखर रहे थे रंग 

मेहँदी के,  मेरे मन के आँगन में

तब लगा जैसे याद किया तुमने

 

रह-रहकर जब थाप पड़ी

मुँडेरों पर या साँस लेती

खिड़की की झिर्रियों पर

या यूँ ही खुले दरवाजों की

दहलीजों पर

तब लगा जैसे याद किया तुमने

 

चमकी जब हिचकी आसमाँ में

 या घुमड़ उठे यादों के बादल

जब भीगी धरती आँखों की

या घुल-घुल जाते वादों की

गीली मिट्टी में धँस चले वक्त की

तब लगा- जैसे याद किया तुमने

 

इस बारिश में जब सज रही

चारों ओर बूँदों की महफिल

और धरा में बिखरा हरापन

जब बहीं कागज की कश्तियाँ

या नहा चुकीं हरे पत्तों की लड़ियाँ

तब लगा- जैसे याद किया तुमने।

 

बारिश जब अपने को लाएँगी हर साल

तब हमेशा लगेगा जैसे याद किया तुमने।

-0-

2- उस दिन जब हम मिले,

 

उस दिन जब हम मिले,
तुमने वही जज्बात की चादर ओढ़ रखी थी,
जिसमें थोड़ा तुम भीगी थोड़ा मैं

उस दिन जब हम मिले,
तुमने रिश्तों के कितने ही धागों से लपेट रखा था अपने को,
फिर कुछ तुमने कुछ मैंने उन बीते लम्हों की सीवन उधेड़ी

 

उस दिन जब हम मिले,
मैं तुम्हें उन गलियों में ले ग थी,
जहाँ यादें बिखरी थी बेतरतीब,
कुछ मैं समेट ला थी कुछ तुम

पर उस दिन मिलने में था,
कुछ छूटा- सा, कुछ अधूरापन लिये,
शायद ये ख्याल साथ था ,
कि वक्त की बंदिश है,
और कल फिर तुम्हारा साथ छूटेगा,
एक बार फिर मिल लेने के लि

तसल्ली- सी भी थी कि रिश्ता तो रहेगा ही,
साथ का न सही यादों का ही सही

-0-

3- मैंने कभी तो नहीं चाहा कि

 

मैंने कभी तो नहीं चाहा कि

उन जागती रातों में अपने ख्वाब तुम्हें पहनाऊँ,

मैंने तो कभी नहीं चाहा कि

जो अनकहा- सा रह गया है वह तुम्हें सुनाऊँ
कभी तो पतझ के गिरते पत्तों में, तुम्हें नहीं गिना मैंने

दिन के उजालों- सी चाँदनी, तुमसे कहाँ माँगी मैंने
मैंने कभी नहीं चाहा कि
अजनबी से तुम मुझे पहचानने लगो
मैंने कभी तुम्हारी आँखों में,
अपने लिये इंतजार नहीं माँगा

मैंने बस यही चाहा कि तुम उम्र-उम्र जीओ,
और मैं बस दुआ-दुआ करूँ
मैंने बस यही चाहा कि तुम मुझे,
मेरे 'मैं' में रखो 'सब'  में नहीं

मैं बस यही चाँहू कि
न बनूँ मैं मीरा' न राधा

,बस मैं रुक्मिणी- रुक्मिणी- सी बनूँ।

-0-

4-राहें हैं जुदा

 

बहुत अजनबी,तन्हा सा लग रहा है यह शहर

यह किस्सा तब का है, जब तुम हिस्सा न रहे

न मेरे, न इस शहर के।

 

हाँ रूठी थी मैं बातों से तुम्हारी

तुम्हारी बातें जो बींधती थीं 

गरम सलाखों- सी जो पिघला जाती थी 

मेरे कानों के कोमल पर्दे पर 

मेरी कमजोर याददाश्त

भूल जाती थी वह सब

जब तुम्हारी परवाह के नर्म फाहें सहला जाते थे मेरा मन

 

इधर तुम बहुत बदल ग थे

तुम्हारे शब्दों के तीर तो बींधते रहे

और तुम्हारी परवाह सुप्त रही

नदी के रुके पानी की तरह हमारा रिश्ता सड़ने लगा 

लगा कि कुछ छटपटाहट है तुम्हारी

 इस रिश्तें से अलग हो जाने की

यह रिश्ता जो गल गया 

अब तलक एक आस, जो रोशनी भर रही थी

नीरवता में लिपट, बुझ ग थी।

बस उसी दिन से,एक उसी दिन से 

वह मर चुका हिस्सा कोई लौ जला न पाया

हमारे बीच चौड़ी हो रही दरारों पर

बना न पाया कोई पुल।

 

उस दिन से यह शहर अजनबी हो गया है बहुत

यह घर , इसकी दीवारें पहचानती ही नहीं मुझे

जिनको सजाने में मैंने दे दि

अपनी जिदंगी के आधे हिस्से

इतना परायापन मैंने कभी नहीं चाहा था अपने लि

और फिर तुम भी तो, न रहकर भी

बहुत बसे हो हर कहीं

तुम्हें हर जगह से खुरचकर कैसे निकालूँ

बस यही  तुम बताकर नहीं ग

 

तुम्हारे बिना जीना बहुत रुखापन लिये है

पर मन अब घुटता कम है, बराबर लगती चोट

बहुत बहुत मजबूत बना गई है

बस अब इंतजार है, कुछ ओस की बूँदों का

जो गिरे मेरे सूखे जीवन में

और भरे नमी, मेरे दग्ध ह्दय में।

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5-दरवाजा

 

उस रोज़ दरवाजे पर जो दस्तक थी,

उन हाथों की थाप अजनबी लगी।

दरवाजा खोला, तो बाहर शोहरत खड़ी थी।

उसके चारों ओर अजीब उजाला भरा था,

मेरी आँखें चुँधियाने लगी थी।

 

मन मेरा हाथ छुड़ा चल दिया,

मन मेरा कोमल था,अजनबी था दुनिया से।

मुझे मालूम था मन भटक जागा, बह जागा,

फिर हुआ भी वही, मेरा मन बह निकला।

बहते हुए मिल गया कामयाबी के समुद्र में,

और खो गया वहीं।

 

मैं और मेरा मन फिर कभी नहीं मिले

अब दरवाज़े पर होती हर दस्तक,

खौफ़ज़दा करती हैं,

जाने इस बार कामयाबी मेरा क्या छीन ले।

     -0-     

Wednesday, April 17, 2024

1412- पता ही खो गया

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’


सब भाव खो गए
जीवन खो गया
अचानक भला ये
क्या-क्या हो गया!

जब भाव थे मरे,
भाषा भी मरी

हर बाट हो गई

काँटों  से भरी।

यूँ कहाँ मैं भला
अब ढूँढूँ तुम्हें
हर  कोई यहाँ
शूल ही बो गया।

 

 सूख गए सब रस

कविता खो गई

पथ भीगा मिला

यूँ साँझ हो गई ।


कंठ भी है रुँधा
स्वर भी गुम हुआ
पास में जो था
पता ही खो गया। 

Wednesday, April 10, 2024

1411

 

अनिमा दास 

 


1.स्त्री का स्वर (सॉनेट)

 

मौनता की भाषा यदि होती..मृदुल -सहज व सरल

द्रुमदल न होते अभिशप्त..आ:! न होता अंत वन का 

न स्रोतवती होती शुष्क,न मेघों में होता अम्लीय जल 

न होता अज्ञात अभ्र में लुप्त एक पक्षी.. मृत मन का।

 

न होती यक्ष-पृच्छा..न मिथ्या विवाद की धूमित ध्वनि 

न कोई करता अनुसरण सदा अस्तमित सूर्य का कभी 

न पूर्व न पश्चिम न उदीची से.. प्रत्ययी पवन की अवनि  

न होती नैराश्य-बद्ध..निगीर्ण ग्लानि में रहते यूँ..सभी।

 

यह जन्म उसी प्राचीन इतिहास का है एक भग्नावशेष 

निरुत्तर निर्मात्री..पुरुष-इच्छा की स्त्री.. मौन-मध्याह्न 

स्वर में नीरव अध्वर..शून्य भुजाओं में अंतिम आश्लेष 

प्रतिक्षण ध्वस्त होते इसके कण-कण,हैं अर्ध अपराह्न।

 

यदि हुई अभिषिक्त यह उर्वि..यदि हुआ नादित अंभोधर 

प्रतिगुंजित होगा अंतरिक्ष में तब अविजित स्त्री का स्वर।

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2. प्रेम पर्व (सॉनेट -30)

 

मंदर पर सप्तरंग का आँचल,सखी,आओ उत्सव गीत गाओ

मदमत्त भ्रमर करे पुष्प संग प्रीत..कृष्ण रास संग रच जाओ

मुग्ध मन नृत्य करता.. है स्निग्ध किरणों में सम्पूर्णतः तन्मय

रूप यौवन का हो रहा तीर्ण...गमक रहा... कर रहा अनुनय।

 

प्रेम हो रहा व्यक्त सखी कि रक्तिम हुआ आह!प्राच्य आकाश 

स्वप्नगुच्छ हुआ स्फुटित..शतदल के सरोवर में आया प्रभास

पीत रंग ने किया स्पर्श.. मुखमंडल हुआ स्वर्ण सा अरुणित

मंद-मंद स्वर में कहा प्रेम ने 'सुनो प्रिया तुममें मैं हूँ प्लावित।'

 

इस नगर में नहीं रहा जीवन यदि... स्वर्गीय -संभव- सरल

यदि वसंतकुंज में भी... समस्त पीड़ाएँ रहीं. सदैव जलाहल 

कोई प्रतिवाद नहीं होगा..न होगा मृदु वेणु-ध्वन. न वंशीवट 

दृगोपांत में अश्रुमिश्रित परागरेणु से सिक्त होगा कालिंदी तट।

 

प्रेम पर्व की वर्तिका हो रही प्रज्वलित.. जीवन हुआ फाल्गुन 

मन के कोण-अनुकोण में गूँज रही गीतप्रिया की..मधुर धुन।

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Tuesday, April 9, 2024

1410

 

 1-कृष्णा वर्मा

 


न कोई कहा- सुनी

न शिकवा न कोई शिकायत 

इक दूजे संग खेल रहे हैं

मैं और समय

वह अपनी ताक़त दिखाता है 

और मैं अपना हौसला 

कभी वह जीत जाता है तो कभी मैं

प्रशंसक हैं हम एक दूसरे के  

मैं कितनी भी बना लूँ योजना 

पर होता है सब 

वक़्त के हिसाब से ही

मैं इतनी नहीं जो दिखाई देती हूँ 

मेरे भीतर बहुत सी पुकारें हैं 

जिसे कोई न सुन सका 

कितनी इच्छाएँ कितने स्वप्न 

और निहित हैं कई कमाल 

ढेरों- ढेर सवाल 

जिन्हें देना है जवाब 

मैं लगी रही तुम्हें 

बनाने और बचाने में

कभी तो देते मेरे 

हौसलों को मान 

बनी जवाब तुम्हारे हर सवाल का 

तुम्हारी तन्हाइयों की साथी

तुम्हारे झुकाने पर झुकी 

तुम्हारे रोकने पर रुकी

तुम्हें जिताने को हारी 

कहीं नाम नहीं मेरा फिर

संग सारी उम्र गुज़ारी 

तुम्हें तुम्हारे अपनों को अपनाया 

किसी आस न उम्मीद पर 

मैंने सारी मोहब्ब्तें वार दीं। 

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गौतमी पाण्डेय 

 

1-सुनहरी चिड़िया 

 

  फुदकती आ गई,

मेरी खिड़की से लगे पेड़ पर,

वह सुनहरी चिड़िया!

 

एक छोटी, सुंदर-सी फुरगुद्दी!

थोड़ी श्याम और थोड़ी 

हरी चिड़िया।

 

इस डाल से उस डाल पर,

ले हरित आभा भाल पर।

झुरमुटों से चहचहाती

अपने अस्तित्व को पुरज़ोर 

तरीके से दर्ज कराती!

 

जीवन का उत्सव मनाती!

 

भार नहीं, कोई संग्रह नहीं,

 कोई बोझ नहीं!

बस, हर क्षण उत्सव!

 

हल्का होना,

हल्के हो जाना ही प्राप्य है,

एक वरदान है, जो

गति को ऊर्जित करता है।

 

उत्साह और स्फूर्ति लिए,

नाज़ुक, पतली टहनियों से 

लटकती चिड़िया।

अपनी ही धुन में मगन 

हर शाख पर मटकती चिड़िया।

 

आ गए कुछ कौवे!

इस थोड़ी सी हरियाली पर दावा करते,

अपने कर्कश स्वर से,

अपनी तथाकथित 

शक्ति  का दंभ भरते।

 

सिमटने लगी झुरमुटों में,

वह परी चिड़िया!

 

कौओं के आतंक से,

अपने घोंसले खोने के डर से,

उसी में छुपती,

वह डरी चिड़िया!

-0-

2- मेरी आवाज़ के आगे

 

मेरी आवाज़ के आगे भी 

क्या, सुन सकते हो मुझे?

मेरे अंदाज़ के आगे भी 

गुन सकते हो मुझे?

 

मैं, मेरे शब्दों से आगे,

और मेरे रूप से परे हूँ...

क्या मेरे मौन से आगे भी,

पढ़ सकते हो मुझे?

 

मैं बरसूँ कभी तो ओस 

और बिगड़ूँ तो हूँ तूफान... 

क्या कभी मेरे जैसा ,

मुझसे ही, लड़ सकते हो मुझे?

 

 

कहा करते हो तुम-

 "बोला और कुछ कहा भी करो"

"तुम्हारे साथ ही तो हूँ

 तुम जहाँ भी रहो"

 

मगर क्या देख सकते हो 

मुझे, मेरे शब्दों से अलग?

समझ सकते हो तुम,

मुझको क्या इस सीमा से परे?

 

जैसे कभी ख़्वाबों की तरह 

मैंने बुना था तुमको,

कई स्वप्नों के सैलाब 

से चुना था तुमको।

 

 

क्या किसी ऐसे इक

सपने सा बुन सकते हो मुझे?

मेरी आवाज़ के आगे भी 

क्या सुन सकते हो मुझे?

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