1-नवगीत
मौसम का अभिमान / विज्ञान व्रत
पता नहीं अब
क्या कर डाले
मौसम का अभिमान
दहशत में हैं जंगल सारे
सहमे - सहमे
पेड़ बिचारे
मन ही
मन में
घुटते हैं
बस
अब इनके
अरमान
जड़ी - बूटियाँ काँप रही
हैं
इसके रुख़ को भाँप
रही हैं
आज दाँव
पर
लगी हुई
है
इन सबकी
पहचान
पशु - पक्षी भी बहुत विकल हैं
सभी युक्तियाँ आज विफल हैं
सन्नाटे में
और डराएँ
अनचाहे अनुमान
-0-
2- मन बेचारा/ डॉ.सुरंगमा यादव
आगत
और विगत में उलझा
वर्तमान से उदासीन मन
कभी भविष्य के सपने गढ़ता
कभी अतीत में ढूँढे सुख- क्षण
जिसने पाया सहज- सहज सब
उसको भी विश्राम नहीं है
भौतिकता की नेति-नेति में
जाने क्या पाने की धुन में
भटका फिरता मन बेचारा
अधिक,अधिकतर और अधिकतम
गति
का कोई ध्यान नहीं है
हर पथ पर है गति की सीमा
गति की लय खोना है-
जीवन की लय
खोना
संघर्षों के फेज़ में है जो
सवालिया नजरों में है वो
राह नहीं जब मिल पाती है
खीज बहुत खुद पर आती है
मन कितना विचलित होता है
विश्वास नहीं खुद पर होता है
न समझेंगे दुनिया वाले
उँगली महज उठाने वाले।
-0-
2-क्षणिकाएँ/ डॉ.सुरंगमा यादव
1
जिसने होठों को सिया है
दम घुटने का अनुभव
उसने किया है।
2
उजियारों के बीच खड़ा
अँधियारों में डूबा मन
अपनी ही छत और दीवारों से
न पाता मन अपनापन ।
3
चाहा बहुत भुलाना
लेकिन
अतीत खड़ा किरदार नया बन
चोट पर फिर- फिर चोट पड़े तो
कब तक बिखरेगा न मन।
-0-
3-कविता जीवन का मर्म/ डॉ.वंदना शर्मा
लिखा है क्या हाथों की लकीरों में
छुपा है क्या इन तकदीरों में
मिलता है वही, होता है जो नसीबों में
सिर्फ मेहनत करने से नहीं मिलती सफलता
खेल विधाता का कोई नहीं समझ सकता
होना था जिस दिन राम का राज तिलक
हुआ वनवास उसी दिन, लगा कैकेयी पर कलंक
होनी थी हो गई टाल सका ना कोई
भविष्य की गर्त में राज छिपे हैं कई
चक्र है ये कर्मिक फल का
हिसाब है ये कई जन्म का
नहीं ज्ञात कौ-न सा कर्म
बदल देगा अगले जन्म का मर्म
रहता है इंसान इसी भ्रम
'मैं' करता ना समझता कर्म-
कर्ता करे ना कर सके
बाल ना बाँका होय।
जिसकी किस्मत महाकाल लिखे
उसकी बिगाड़ सके ना कोई
कब किससे कैसे मिलना है
कर्मों का फल जरूर मिलना है
दीन सेवा ही परम धर्म है
अक्षर नाद ही परम ब्रह्म है
तप वाणी का जिसने किया
मोह छोड़ पर उपकार किया
सुधारा उसने अपना कर्म है
यही जीवन का मर्म है।
-0-डॉ. वंदना शर्मा पांडव नगर नई
दिल्ली
-0-
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4-अनुरोध/ रश्मि
लहर
व्यर्थ-सा लगने लगा है,
वर्जनाओं का सघन
पथ
सारथी
जीवन के रथ के तुम!
तनिक अब ध्यान रखना।
हाथ में वल्गा तुम्हारे, दीखते घबराए हो तुम।
साथ में सहचर लिये पर, लग रहे अकुलाए क्यों तुम?
ज्ञात तुमको हो गए हैं,
दुःसह सच संबंध
के पर;
हो सके
तो समर्पण की
वेदना का मान रखना।
सुर तुम्हीं ने तो दिया था, स्वप्न की उद्विग्न लय को।
फिर नया जीवन दिया था, शुष्क- सी निस्तेज वय को।
तोड़ सकते तंतु हो विश्वास के,
अनुबंध के पर;
प्रणय
के मृतवत अधर पर,
चेतना का गान रखना।
सारथी जीवन के रथ के तुम, तनिक अब ध्यान रखना।।
सारथी जीवन के रथ के तुम, तनिक अब ध्यान रखना।।
-0- इक्षुपुरी कॉलोनी, लखनऊ-226002
मोबाइल नंबर -9794473806
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सभी रचनाकारों को बधाई। मेरी स्वलिखित कविता जीवन का मर्म को समझने और स्थान देने के लिए आदरणीय संपादक महोदय को बहुत बड़ा धन्यवाद 🙏
ReplyDeleteसभी कविताएँ एक से बढ़कर एक हैं । मन को छू गईं। सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई । सुदर्शन रत्नाकर
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