पथ के साथी

Saturday, September 14, 2019

930


1-मातृभाषा
सत्या शर्मा 'कीर्ति'

अकसर अपनी 
आंतरिक तृप्ति के पलों में
बो देती हूँ अपनी भावनाओं के कोमल बीज
जहाँ निकलते हैं शब्दों के नाज़ुक कोमल-से फूल
उन्हें हौले से तोड़कर
सजाती हूँ पन्नो के ओजस्वी कंधों को

वर्णों के रेशमी धागों को
बाँधती हूँ कलम की सशक्त कलाई पर
और छंदों की नावों संग घूम आती हूँ
गीतिका की लहरों पर
जहाँ  मात्राओं की अनगिनत उर्मियाँ
देती है जन्म
 किसी भावुक सी कविता को
तब अनायास ही खिलखिला
पड़ते हैं हजारों अक्षर
दीपावली के जगमगाते जीवंत दियों-जैसे
तब मेरे मन के पायदान से
उतर आते हैं कदम-दर-कदम
किसी देव पुत्र-से कहानियों के अनेक चरित्र
जो ले जाते हैं मुझे
किसी उपन्यास की खूबसूरत वादियों में

तब मैं और भी हो जाती हूँ समृद्ध  
जब सुसज्जित सी व्याकरणमाला 
करती है  मंगलाचरण हमारी मातृभाषा का
और फिर सौंदर्य से जगमगाती
हमारी तेजस्वी हिंदी
करती है पवित्र हमारी जिह्वा को 
करोड़ों हृदयों को करती है आनन्दित

और देती है आशीष हमें
हिन्दी भाषी होने का।
--0--
 ईमेल -- satyaranchi732@gmail.com

-0-
2-भिगोने के बहाने

डॉ. पूर्वा शर्मा
1.
चलो माना कि सारी ख़ताएँ मेरी,
सजा के बहाने ही सही
तुम एक बार तो रूबरू होते।
2.
कई दिनों से मुलाकात नहीं,
सोचा आज शब्दों से ही छू लूँ।
3.
समझता नहीं ये नादाँ दिल कि तू यहाँ नहीं है मौजूद
तुझसे मिलने की ज़िद पर अड़ा, ढूँढे तुझमें खुद का वजूद।
4.
न कोई आहट, न कोई महक
फिर भी आँखें करती इंतज़ार
हो रहा मन हरपल बेक़रार।
 5.
सब कुछ तो छीन ले गए,
उपहार में इंतज़ार दे गए.
6.
हर बार छूकर चले जाते
क्यों नहीं ठहर जाते
तुम समुद्री लहरों से मनचले
मैं किनारे की रेत-सी बेबस।
7.
इश्क़-सौदा... बड़ा महँगा पड़ा
वो दिल भी ले उड़ा,
बेचैनी देकर फिर ना मुड़ा।
8.
बड़ी कमाल
हमारी गुफ़्तगू
बिन सुने, बिन कहे
सदियों तक चली।
9.
ये बूँदें भी कमाल हैं ना?
भिगोने के बहाने तुझे आसानी से छू गई.
10.
मुझे तो ये बारिश भी तेरे प्रेम की तरह लगती है
थोड़ी-सी बरस कर, बस तड़पा और तरसा जाती है।
11.
तेरे बिन ना जाने ये राहे कहाँ ले जाएँगी
बस इतनी दुआ है कि इन राहों कि मंज़िल तू ही हो।
12.
कितना तड़पाओगे
बारहमासा तो बीत चला
ये बताओ तुम कब आओगे?
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Wednesday, September 11, 2019

929

1-होना मत मन तू उन्मन
डॉ. सुरंगमा यादव

अंधकार का वक्ष चीरकर
चित्र-प्रीति अग्रवाल
फिर चमकेगा नवल प्रभात
अँधियारों की उजियारों से
चलती रहती जंग सदा
रात-दिवस तो बने पताका
बस आते-जाते रहते
पाया है जब सुख का चंदन
यहीं मिलेंगे दुःख के व्याल
गति पवन बदलता  रहता
सदा काल की तरह यहाँ
नदिया का भी यहाँ हमेशा
नहीं समान प्रवाह रहा
जीवन भी नदिया की धारा
कभी सिमटना,कभी बिफरना
और कभी विस्तार मिला
उमड़-उमड़ कर दुःख की लहरें
लाएँगी सुख के मणिगण
होना मत मन तू उन्मन !
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1-फ़रिश्ता
चित्र-प्रीति अग्रवाल
-प्रीति अग्रवाल 'अनुजा'

एहसानों की फ़ेहरिस्त
बड़ी हो रही है,
माथे पे चिंता
घनी हो रही है।

अभावों में डूब,
तिनके ढूँढती हूँ जब,
हौले -हौले कोई आवाज़
कानों में गूँजती है तब,

मेरा खुदा, सकुचाया- सा
मुझसे कहे-
क्या करूँ , ये सारे,
करम हैं तेरे!

पर रुक, कुछ फ़रिश्ते
भी संग कर रहा हूँ,
हिफ़ाज़त के सारे
प्रबन्ध कर रहा हूँ।

पंखों पे सजाकर
ले जाएँ उस पार,
लगी, तो लगी रहने दे
अभावों की कतार!!

सोच में खड़ी है,
क्या कोई असमंजस-
इक फ़रिश्ते ने पूछा
काम से रुककर।

अभाव जितने,
दोगुने फ़रिश्ते,
कर्ज़ कैसे अदा हो
ये दुविधा बड़ी है !

मुस्कुराया, सुझाया,
है यह भी तो सम्भव,
तू फ़रिश्ता हमारी थी
जन्मों जन्म तक!!

एहसान तेरे
चुकाए जा रहे हैं,
न कि कर्ज़
चढ़ा जा रहे हैं!

ऐसा तो पहले
सोचा ही नहीं था,
हुई खुश मैं,
और मेरा खुदा भी खुश था!!!

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2-मुलाक़ा
चित्र-प्रीति अग्रवाल
प्रीति अग्रवाल 'अनुजा'

नहीं है, तो न सही
फुर्सत किसी को,
चलो आज खुद से,
मुलाकात कर लें!

वो मासूम बचपन,
लड़कपन की शोख़ी,
चलो आज ताज़ा,
वो दिन रात कर लें।

वो बिन डोर उड़ती,
पतंगों सी ख्वाहिशें,
बेझिझक, जिंदगी से,
होती फ़रमहिशे,

चलो ढूँढे उनको
कभी थे जो अपने,
पिरो लाएं, मोती से,
कुछ बिखरे सपने।

यूँ तो बुझ चुकी है,
आग हसरतों की,
चिंगारियाँ पर कुछ,
हैं अब भी दहकती,

दबे, ढके अंगारों की
किस्मत सजा दे,
नाउम्मीद चाहतों को
फिर से पनाह दे!

न गिला, न शिकवा,
सब कुछ भुला दें,
खुश्क आंगन में दिल के,
बेशर्त, बेशुमार,
नेह बरसा दें!!

चलो आज खुद से
मुलाकात कर ले.......!
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Saturday, September 7, 2019

928

दीवारें
भावना सक्सैना

दीवारें 
कभी होती नहीं खाली
उनमें होती हैं 
परछाइयाँ युगों की
बसी होती हैं
कहानियाँ कईं
कुछ सूखी, कुछ सीली।

फिर-फिर रँगे जाने पर भी
आँखें खोज लेती हैं 
उनमें बसे चित्र मन के
नेह, ममता और वात्सल्य के,
कहीं-कहीं होते हैं चिकोटे
दर्द भरे किसी दिन के, और
वहीं रह जाती हैं वे छिली।

घुप्प अँधेरे में उभर आती हैं
कुछ दमकती रेखाएँ
रोशन करती हैं जो 
दिनभर अँधेरे में डूबे 
हताश हो आए मन को
कि भीतर की लौ को चाहिए
एक जगह ,जहाँ बाहर की
हवाओं  से आराम हो।

बस इसीलिए
बाँधना मत दीवारों को 
कुछ रंगीन चित्रों में,
टाँगना मत उन पर
चौखुटे फ्रेम में जड़े
किसी और की 
कोरी कल्पनाओं के रूप...

कि उनमें हैं रंग असंख्य
स्मृतियों के, आकांक्षाओं के
और अनगिनत उम्मीदों के।
उनमें चिड़ियाँ हैं
सपनों के सफेद पंखों वाली
जो रह-रह भरती हैं उड़ान
कि उन्हें पाना है एक मुकाम।

उन सफेद पंखों में
इंद्रधनुष के रंग है
इन रंगों को 
बाँधना नहीं खाँचों में
कि कोरों से बह 
एक दूसरे में घुल मिल
बनते हैं रंग नए।

लेकिन जब चढ़ाए जाते हैं
परत -दर -परत
एक दूसरे का अस्तित्व
लील जाने की चाह में
रंगों पर चढ़े रंग 
हो जाते हैं बेरंग...



Thursday, September 5, 2019

927



गुरु का वास
मुकेश बाला

कहता है सारा जहाँ
गुरु बिना ज्ञान कहाँ
ज्योति हृदय में जगा दे
दूर हर डर को भगा दे
गुरु प्रकृति का वरदान 
ये है दूसरा भगवान
जीवन जहाँ से शुरू
माता वो पहला गुरु
कभी पिता का रूप धरे
राह को जो रोशन करे
मिले जब गुरु का ज्ञान
जगत में बढ़े सम्मान
हृदय में हो गुरु का वास
तो खत्म होगी हर तलाश
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Monday, September 2, 2019

926


प्रीति अग्रवाल अनुजा

1-आवारा मन

चित्र; प्रीति अग्रवाल
जाने कौन से
गलियारों मे,
घूमता,
फिर रहा है।

कहो तो उस से
जो माने! ये तो 
अपनी ही,
ज़िद पे अड़ा है।

होगा कुछ भी नही,
यूँ ही,
खाक छानकर
थका लौटेगा,

क्या हुआ?
क्यों हुआ?
ऐसा होता तो??
वैसा न होता तो??

इसी गर्दिश में,
धक्के खाकर,
फिर चुपचाप
सिमट कर बैठेगा।

कहकर देखूं
शायद मान ले-
मन, अब तू बच्चा नहीं
बड़ा हो चला है,”

"जो है, आज और 
केवल आज है,
काल की रट ने
सिर्फ ,
और सिर्फ छला है"!!!
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2- चोरी

मुक़द्दमा, अदालत,
जज और गवाही।
चित्र; प्रीति अग्रवाल
मुद्दा-
मीलॉर्ड, इस शख़्स ने,
मेरी हँसी चुराई!!
पलटवार-
मरते थे हज़ारों
जिस हँसी पे जनाब,
कत्ल हो न दोबारा
सो चुराई!!
क्या ख़ता???
तुकबंदी-
सोलह आने!
कार्यावाही सम्पन्न।
किस्सा हुआ ख़ारिज
सब कुछ सही!!??
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Sunday, August 25, 2019

925


1-बस यूँ ही  
शशि पाधा

जहाँ बर्तन 
 बात न करें 
जहाँ चीज़ें 
 तरतीब न भूलें 
और तस्वीरें 
टेढ़ी न लटकें 
जहाँ फलों की खुशबू
सॉंसों में न समाए
और पौधों को धूप 
 छू न पाए 
जहाँ मुस्कान 
उधारी में आए 
और नेह  
गिरवी हो जाए 
उसे घर कहें 
या ???????????
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2- पथ प्रदर्शक!
डॉ. पूर्वा शर्मा

अरे ओ मार्गदर्शक,
पथ प्रदर्शक!
सदा दूसरों को
राह दिखाने वाला,
हौंसला देने वाला,
क्या हुआ है तुझे?
यूँ आहत न हो तू
हिम्मत न हार तू,
क्या हुआ यदि
मुखौटों उतरने लगे
कुछ मतलबियों के,
किसी के द्वार
बंद कर देने से
सूर्य चमकना
नहीं छोड़ देता,
अरे उन्मुक्त गगन में
विचरण करने वाले
यूँ घसीटकर
नहीं चल सकती
तेरी ये ज़िंदगी
तू दौड़ ख़ुशी से
पकड़ ले फिर
ज़िन्दगी की रफ़्तार,
वैसे भी धुल जाते हैं
कुछ रंग बारिश से,
तो कुछ न रंग
दे भी जाती है ये बारिश
दूसरी ओर देख तू
अब साफ़ है सब कुछ
भर दे अपनी तूलिका से
पसंदीदा रंग
इस ज़िंदगी में,
बहुत हसीन है
ये ज़िन्दगी
तू मुस्कुराकर तो देख।
-0-


Sunday, August 18, 2019

924


प्रीति अग्रवाल 'अनुजा'

1-सिर्फ़ मैं

ये अहं ,
बड़ा दुखदायी है,
अजगर सी ,
कलस्याही है,

जिससे इसको 
दूध पिलाया,
समझो लिखी
जुदाई है!
                              
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2: रज़ामंदी

सोचती हूं क्या माँगू?
जो तूने ,
एक ह का
हकदार किया!

चल,
यों कर मौला-
तेरी रज़ा 
और मेरी रज़ा
एक हो जाए!

कभी तू कहे
तो मैं मान जाऊँ,
और कभी मैं कहूँ
तो तू मान जाए!!
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3-क़्त

समझने लगी हूँ
वक्त को
वक्त की नज़ाकत को !

सोचती तब भी थी
सोचती अब भी हूँ,
बस
ज़ाया हो वक़्त
ये हिमाकत नहीं!!
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4- बधाई

अम्मा जी बधाई
घर आपके,
लक्ष्मी है आई!!
अम्मा हर्षाई।

बाबा तुनके,
बोझा है ढोना
जो सारी उमर,
शर्फ़ी की बोरी
कहने से,
क्या होगा कम!!??
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5-पतंग

मैं रंगीली
और मनचली
नील गगन
की और उड़ी!

फिक्र मुझे
न धरा पड़ूँ,
न शून्य में
खो जाने का।

मैं इतराऊँ
मन मुस्काऊँ,
डोरी तेरे
हाथ थमी !!
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6- श्याम बसेरा (ब्रज भाषा में)

देख ले हरिया-
मोरे मन श्याम बसेरा,
पहले ही दीजू कहाए,
अब ब्याहे ,तो ब्याह ले!!

हरिया हासा -
ले मिल गई जोड़ी
मेरो मन भी श्याम समाए!!!
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7- मैं

ये 'मैं' की अकड़,
ये 'मैं' की तड़ी,
देखो न कितनी 
भारी पड़ी!

मकड़ी हो जैसे
जाल मे फँसी,
दुनिया ये सारी,
अकेली खड़ी!!
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8-सूझबूझ

मिल बैठ ग्वलनियाँ
करे सुझाई,
किसना नाम 
कोई मत राखियों
घनो सतावै!!

राम दुहाई!
कैसी मत बिसराई,
गाँव भर अब,
गोपाल गोविंद,
मुरारी कन्हाई!!
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