पथ के साथी

Monday, February 18, 2019

881-दहशत का रास्ता


मंजु मिश्रा  

सरहदों पर यह लड़ाई
न जाने कब ख़त्म होगी
क्यों नहीं जान पाते लोग
कि इन हमलों में सरकारें नहीं
परिवार तबाह होते हैं

कितनों का प्रेम
उजड़ गया आज
ऐन प्रेम के त्योहार के दिन
जिस प्रिय को कहना था
प्यार से हैप्पी वैलेंटाइन
उसी को सदा के लिए खो दिया
एक खूँरेज़ पागलपन और
वहशत के हाथों

अरे भाई!
कुछ मसले हल करने हैं
तो आओ न...
इंसानों की तरह
बैठें और बात करें
सुलझाएँ साथ मिलकर
लेकिन नहीं, तुम्हें तो बस
हैवानियत ही दिखानी है
तुम्हें इंसानियत से क्या वास्ता
तुमने तो चुन ही लिया है
दहशत का रास्ता ....
तुम्हारी मंज़िल तो केवल तबाही है।
-0-
मंजु मिश्रा 
#510-376-8175

Thursday, February 14, 2019

880-मुक्ताकण

डॉ.कुमुद रामानन्द बंसल
  •  
विविधता -भरे जग में मत रोको सृजन
मत बाँधो सीमाओं में हृदय-स्पन्दन
प्रार्थना बना दो इस जग का हर क्रन्दन
तप,सत्य-साधना में बन जाओ कुन्दन
  •  
ज़िन्दगी की ढीली तारों को कस दे
या रब !जीवन में कुछ तो रस  दे ।
  •  
उम्मीद नहीं, मंज़िल नहीं,कारवाँ नहीं
सत्य हो साथ तो किसी की परवाह नहीं
  •  
जग की कटुता ने जब -जब रुलाया
परिन्दे को नई परवाज़ का ख़्याल आया।
-0-

Tuesday, February 12, 2019

879




सुदर्शन रत्नाकर
1
इससे पहले कि
फ़ासले बढ़ते जाएँ
तुम्हारे और मेरे बीच
आओ, तन्हा होने से पहले
मन की दूरियाँ मिटा दें।
2
वक्त ने चेताया था
पर हम ही नहीं सम्भले
और दूरियाँ बढती गईं
पर्वतों, नदियों और
हमारे बीच।
3
तुम भी तन्हा हो
मैं भी तन्हा हूँ
चाँद भी तन्हा है
यादें भी तन्हा हैं
चलो चाँदनी में बैठे
और सब एक हो जाएँ।
4
जीवन भर
मोमबत्ती- सी जलती रही
क्षण क्षण पिघलती रही
अंतिम छोर तक पिघली,
मोमबत्ती की सीमा रेखा थी
जली, पिघली और
अस्तित्वहीन हो गई।।
5
उडना है तो
पंख खोलने होंगे
वरन् , उड़ना तो क्या
धरा के भी नहीं रहोगे
बिना पंख खोले
औंधे मुँह ही गिरोगे ।

-0-ई-29, नेहरू  ग्राउण्ड,फ़रीदाबाद -121001
मो. 9811251135



Sunday, February 10, 2019

878- वसंत


अवनि मैं आऊँगा
कमला निखुर्पा

अवनि मैं आऊँगा
तुम करना इंतजार मेरा
मैं बावरा बसंत  इस बरस भी
तुमसे मिलने आऊँगा।

प्यारी धरा! न हो उदास
जानता  हूँ मैं …
ग्रीष्म ने आकर तेरा तन-मन झुलसाया था
रेतीली आंधियों में तेरा मन-कमल मुरझाया था।

तड़पकर तुमने प्रिय पावस को पुकारा होगा 
पावस ने आकर तुम्हें बार-बार रुलाया होगा
गरजकर बरसकर तुम्हें कितना डराया होगा 
तन को झकझोर, मन में गिराकर बिजलियाँ 
ओ वसुन्धरा…तेरी गोद में छोड़ नन्हे अंकुरों को,
बैरी चल दिया होगा।

लेकर तारों की चूनर फ़िर छलिया शरद भी आया 
माथे पे तेरे  चाँद का टीका सजाकर भरमाया, बहलाया।
चाँदनी रातों मे उसने भी विरहन बना के रुलाया।
तेरी  करुण चीत्कार… पपीहे की पीर बन उभर आई होगी।
ओ मेरी वसुधा…मैंने सुनी है तेरी पुकार
मै आऊँगा।

शिशिर के आने से तू कितना घबराई होगी
छुपकर, कोहरे की चादर तले 
थर-थर काँपी होगी, पाले सी जम गयी होगी।
प्यारी अवनि तू न हो उदास…।
मै आऊँगा …

तेरे ठिठुरते बदन से उतार कोहरे की चादर धवल
मैं तुम्हें सरसों की वासंती चूनर ओढ़ाऊँगा
मैंने नयी-नयी पत्तियों से परिधान तेरा बनाया है।
खिलती कलियों को चुन हार तेरा सजाया है
सुनो…भँवरे की गुनगुन बन तेरे कानो में मुझे कुछ कहना है
यूँ लजाओ मत…कोयल की कूक बन तुम्हे गीत नये सुनाना है।
किसलय के आँचल को लहरा जब तू शरमाएगी
मैं तेरे पूरबी गालों पर लाली बन मुसकराऊँगा।
अवनि मैं आऊँगा।
तेरे मन उपवन में प्रेम के फ़ूल खिला,
त्रिविध बयार से तेरी  साँसों को महकाऊँगा।
तुम जोहना बाट मेरी…
अवनि मैं आऊँगा।
(रचनाकाल-04-02-2011)

Saturday, February 9, 2019

877


अब तुम याद नहीं आते....
डॉ.पूर्वा शर्मा


जीवन में ऐसा मोड़ आ गया है
कि अब तुम याद नहीं आते,
आज भी भोर किरण धरा-मुख चूमती है                       
पुरवाई हौले से छूकर तन को सहलाती है
पर अब तुम याद नहीं आते,
पलाश पर बैठी कोयल मीठे गीत सुनाती है
रंग-बिरंगे कुसुम क्यारियों को सजाते हैं 
पर अब तुम याद नहीं आते,
वर्षा की बूँदों से महकी मिट्टी मन को महकाती है
चाँदनी में नहाई धरा खिलखिला के दमकती है
पर अब तुम याद नहीं आते,
पर अब तुम याद नहीं आते, नहीं आते...
तुम ही बताओ तुम्हें याद कैसे करूँ ?
तुम्हें भूलूँ, तभी तो याद करूँ
तुम्हें भूल ही नहीं पाती क्योंकि
बसे हो मुझमें यूँ मुझसे ज्यादा तुम कि  
प्रत्येक श्वास-प्रश्वास में तुम ही महकते
हरेक धड़कन में तुम ही धड़कते  
इन नैनों में भी केवल तुम ही बसते
कण-कण में बस तुम ही तुम समाते
प्रतिपल सिर्फ तुम मेरे ही साथ रहते 
बसे हो मेरी आत्मा में कुछ इस तरह  
कि तुम्हें भुलाना अब असंभव है
तुम्हें याद करूँ भी तो कैसे?
तुम्हें भूल ही नहीं पाती
तो याद भी नहीं कर पाती
इसलिए अब मैं यही हूँ कहती
कि अब तुम याद ही नहीं आते
-0-
2-अनिता मंडा
1
हाँडी भीतर ऊँट को, ढूँढ रहा संसार।
ऐसी ही गत प्रीत की, पतझड़ हुई बहार।।
2
मुस्कानों का आवरण, भीतर सौ-सौ घात।
होने लगे बसंत में, पीले पीले पात।।
2
मल्लाहों के पास है, कश्ती बिन पतवार।
और दिखायें ख़्वाब वो, कर लो दरिया पार।।
3
होठों पर हैं चुप्पियाँ, भीतर कितना शोर।
सूरज ढूँढे खाइयाँ, कैसे भोर।।
4
परछाई है रात की, बुझी बुझी सी भोर।
उजियारे के भेष में, अँधियारे का चोर।।
5
जुगनू ढूँढे भोर में, पतझड़ में भी फूल।
कुदरत के सब क़ायदे, लोग गए हैं भूल।।
6
प्रतिलिपियाँ सब नेह की , दीमक ने ली चाट।
पांडुलिपि धरे बैर की, बेच रहे हैं हाट।।
7
सूनी घर की ड्योढियाँ, चुप हैं मंगल गीत।
जाने किस पाताल में, शरणागत है प्रीत।।

-0-


Thursday, February 7, 2019

876


ज्योत्स्ना प्रदीप 

01. शृंगार 

रमेश गौतम
नागफनी ने 
अपने बदन को 
कैसा सजाया 
न दिल टूटा 
न कोई 
पास आया !

02. ज़िक्र 

गोरी बदलियों को
फ़िक्र है 
आज 
काले बादलों में 
उनका ज़िक्र है!!

03. अश्क़ 

हाँ मुझे रश्क़ 
होता है 
जब तेरी आँखों में 
किसी के 
नाम का एक 
अनबहा 
अश्क़ होता है!

04.सौगात 

कल रात 
निशिगंधा के फूल 
दे गए थे मुझे 
अँधेरों  में भी 
खिलने की सौगात !
   
05.मेहरबान 

ये मेरे 
सब्र  की इन्तेहाँ  है 
वो जो 
आजकल 
मुझ पर 
इतना  मेहरबान  है!!

O6.चाँदनी 

 आज चाँदनी 
नहीं थी होश में 
उतर रही थी 
दरिया के 
आगोश मे !

07.  क़सक 

माँ बाप की 
गोद में 
लैपटॉप पाकर 
सो गई थी छुटकी 
आँसुओं में नहाकर !
-0-

Tuesday, February 5, 2019

875-मेरा चाँद अकेला है।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’


सूने अम्बर में मेरा चाँद अकेला है।
हिचकी ले रही हवा ये कैसी बेला है।
आँसू भीगी पलकें, उलझी हैं अब अलकें
आँसू पोछे ,सुलझा दे अब हाथ न सम्बल के
उलझन में हरदम जीवन  छूटा मेला है।

सन्देश सभी खोए,किस बीहड़ जंगल में
हूक- सी उठती है ,रोने को पल पल में।
पीड़ाएँ अधरों पर आकरके सोती हैं
बीती बातें भी यादों में आ रोती हैं।
पलभर को रुका नहीं आँसू का रेला है ।

Saturday, February 2, 2019

873-क्या कहें किससे कहें ?



समीक्षा
क्या कहें किससे कहें ?

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
हस्तीमल हस्ती एक ऐसे सशक्त हस्ताक्षर है, जो देश की सभी प्रमुख पत्रिकाओं में छपते रहते हैं । किसी वाद विशेष से प्रतिबद्ध नहीं रहे ,तो भी आदमी और आदमीयत से आपने अपनी प्रतिबद्धता बखूबी निभाई है । इनकी गजलों का फलक बहुत व्यापक है कहीं परिवर्तन की प्रतिध्वनि है, तो कहीं गुमराह करने वाली प्रतिगामी शक्तियों पर प्रहार है। कहीं रास्ते में शक्ति -परीक्षण करती चुनौतियाँ हैं ,तो कहीं व्यवस्था की पंगुता है। कहीं अवमूल्यन- मर्दित समाज की विडंबना है, तो कहीं स्वपोषी छिद्रान्वेषी  क्रूर संस्कृति है । कवि ने सांसारिक छल ,छद्म -त्याग -समर्पण की भूमिका को सूक्ष्मता से परखा  है । बड़ी से बड़ी बात को भी सादगी से कहने की क्षमता इनकी ग़ज़लों की प्राण शक्ति बनी है
यह ढंग इनकी ग़ज़लों को नया आयाम देता है । रिश्तों की कैद ,रूठने से नहीं छूट जाती, क्योंकि ये निर्वाह से बनते हैं  झेलने से नहीं-
रूठे हो तो रूठ लो जीभर ,कैद कहाँ छूटेगी।
 जल -मछली से रिश्ते हैं ये, तेरे मेरे जी के।
रिश्तो के निर्वाह के लिए अहंकार विसर्जित करना पड़ता है अपनी खुशियों को नहीं, वरन् दूसरों की खुशियों को प्राथमिकता देनी पड़ती है -
भूलिए अपनी खुशी अपना गुरूर ।
कोई रिश्ता जब निभाना हो जनाब।
आत्म साक्षात्कार के द्वारा ही वह शक्ति एवं सहिष्णुता मिलती है, जिससे  मानवता की परख होती है। दूसरों की पीड़ा समझने का माद्दा तभी जाग्रत  होता है, जब कोई दुनिया जहान भूलकर आत्म विश्लेषण करने के लिए कटिबद्ध हो-
आसान है फ़रेब  ज़माने से दोस्तों ।
मुश्किल है अपने साथ कभी दग़ा  करें।
संसार के कटु अनुभवों को झेलना  किसी तपस्या से कम नहीं । संन्यास बहुत आसान है, जबकि दुनियादारी निभाना अग्नि परीक्षा है । गैर जरूरी बंधनों ,रस्मों  रिवाज स्वार्थपरता को नकारने वाला शख़्स ही स्वस्थ समाज के निर्माण में सहायक होता है। सामान्यतः स्वार्थी लोग काम निकलने पर  मुँह मोड़ लेते हैं-
आते ही शाम सबकी निगाह मुझ से हट गई
अपना वजूद तो रहा अखबार की तरह।
 दिशाहीन सोच ने समाज को संकीर्ण बनाने के साथ साथ  पंगु एवं  खण्डित कर दिया है इससे आदमी कमजोर हुआ है । अलगाववाद को बढ़ावा देने के लिए अनेक  चबूतरे बन गए हैं-
हर दौर की गवाहियाँ  देते रहे सदा।
झगड़े ,फसाद, खून ,तबाही चबूतरे
जन -समस्याओं से विमुख करने में भी दिशाहीनता उत्तरदायी है यदि गंभीरता से सोचें, तो पता चलेगा कि जनसाधारण की दुर्गति साधनों के अभाव में नहीं हुई है इसका कारण है उभरती हुई बिचौलिया संस्कृति-
ये मुँह , ये कौर ,बीच में कितने बिचौलिए।
बेहाल किस तरह तरह न हो यह पेट बोलिए।
प्रतीक- प्रयोग  एवं उपमान योजना में हस्ती जी ने काफी सजगता बरती है। बिंबों के द्वारा सूक्ष्मतर भाव को ताज़ा स्वरूप प्रदान किया हैकाँटों और फूलों के प्रचलित प्रयोग में नई ऊर्जा भरी है
        काँटों को लंबी जिंदगी जिंदगी ,फूलों को चंद साँस।
क्या-क्या निराले खेल हैं ,परवरदिगार के।
सुख पल भर का मेहमान है सुख के लिए टटके उपमानों  का प्रयोग  हस्ती जी की विशेषता है परिवेश की सजगता एवं स्थिति की विश्वसनीयता बढ़ाने में उपमान सक्षम हैं-
सुख से अपनी भेंट रही यूँ ,जैसे चलती गाड़ी में।
प्यारी सूरत दिखकर कोई ,हो  जाए ओझल बाबा।
अवसरवादिता  से हटकर जीवन मूल्यों की स्थापना की जा सकती है दुख, दर्द ,संताप  सबको नितांत आत्मीय एवं अनिवार्य रूप में ग्रहण किया जाए बच्चों को  काँधे पर लादे हुए बाप का दृश्य बिम्ब व्यावहारिक एवं मार्मिक है ।-
           यूँ अपना किरदार रहे ,दु:ख दर्द हो या संताप कोई
बच्चों को  कंधों पर लादे , घूमे जैसे बाप कोई
इस संसार में दु:ख सर्वव्यापक है हस्ती जी के अनुसार -गौर करें तो हर इंसाँ ,थोड़ा -थोड़ा तो घायल है सुख की क्षणभंगुरता ही इसका कारण है । मुँडेर पर बैठे रहने वाले पक्षियों के द्वारा सुख -दु:ख का सहज एवं प्रभावशाली बिम्ब प्रस्तुत प्रस्तुत किया है-
आने को तो दोनों आते हैं जीवन की  मुँडेरों पर ।
दु:ख अरसे तक बैठे रहते, सुख जल्दी उड़ जाते हैं
प्रेम की तन्मयता संयोग के नहीं वरन् वियोग के क्षणों में ही अधिक घनीभूत होती है स्मृति के पा में  बँधा हुआ मन अपने कार्य से किस प्रकार विराट विरत हो जाता है
वह मुकद्दर वाले हैं हस्ती की नरों में तो बस
याद में जिन की तवे पे रोटियाँ जलती रहीं।
 आस्था का स्वर इनकी ग़ज़लों का प्रमुख स्वर है कवि का विश्वास पलायन में नहीं , रन् संघर्षों से जूझने में है इस विश्वास  नींव में  है चुनौतियों का सामना करने की शक्ति, नाव तूफ़ाँ में बहाकर देखें, यूं भी किस्मत आजमाकर देखें
 कैसी है यह रचनागजल में वर्ग भेद पर कठोर प्रहार किया है। विभिन्न समस्याओं पर कवि ने अपने बेबाक विचार प्रकट किए हैं संघर्ष अनुभव प्रदान करते हैं ,नया दृष्टिकोण बनाने में सहायक होते हैं
 हस्ती जी ने संवेदना और अभिव्यक्ति का संतुलन बनाने का प्रयास किया है । ये ग़ज़लें हिंदी काव्य- चेतना के अधिक निकट हैं। दो टूक बात कना गज़ल की विशेषता होती है सहज एवं प्रवाहमयी भाषा इसे और  निखार देती है । गज़ल संख्या 10, 15, 40 और 41 कुछ शिथिल प्रतीत होती हैं। मुख्यपृष्ठ कलात्मक  एवं सुंदर है अधिकतम ग़ज़लें सबसे मुख़ातिब हैं और बहुत कुछ कह जाती हैं। कहने का ढंग इन्हें और अधिक प्रभावशाली बनाता है-
 लाख भले ही रोचक हो पर ,कहने का गर ढंग नहीं
अच्छी खासी गाथा भी फिर बेमानी हो जाती है
क्या कहें किससे कहें ( ग़ज़ल-संग्रह)-हस्तीमल हस्ती, मूल्य सजिल्द -30/-, पृष्ठ-76, संस्करण: 1989;अभिव्यक्ति प्रकाशन आमेट, उदयपुर
-0-( सैनिक समाचार 18 मार्च 1990 से साभार)