पथ के साथी

Monday, October 16, 2017

767

मुक्तक
डॉ.कविता भट्ट
1
सूखा खेत बरसती बदली हूँ मैं
आसुरी शक्तियों पर बिजली हूँ मैं ।
मुझे इस नीड़ से निकलने तो दो
ये मत पूछना कि क्यों मचली हूँ मैं ॥
2
फूल -पाँखुरी भी हूँ , तितली हूँ मैं
उमड़े तूफ़ानों से निकली हूँ मैं ।
असीम अम्बर में लहराने तो दो
ये कभी मत कहना कि पगली हूँ मै॥
3
गिरी , हौसलों से सँभली हूँ मैं
तभी तो यहाँ तक निकली हूँ मैं ।
शिखर पर पताका फहराने  दो
अभी तो बस घर से चली हूँ मैं ॥

-0-

Monday, October 9, 2017

766

नवलेखन
माटी का मोल (हरियाणवी)
वर्षा राना

वर्षा राना

सत्य अहिंसा ना रहगी इब चालाकी हत्थयार होई
बिन सीढी मंजिल ढुंढै या कैसी पौध त्यार होई।।
खोटी करणी का घारा घलरया बिना न्यार गंड्यासा चलरया
जीन्नस आले खेत खोस कै ईब माटी का मोल रै लगरया।।

ढुंढे तै भी मिलते कोन्या बावन कलिये दामन
घाट बचे है गामां म्ह जनेऊ धारणीये बामण।।
आधी रात शिखर तै ढलगी हुया पहर का तड़का 
घणे मित्र तै दगा कुमागै भुल्ले बाप भाई का धड़का।।
आडै जस्टिन बिबर मुन्नी शीला नै निरे छडदम तारे है
लख्मीचंद रामसिंह की गेट्टी पै इन्है कहवाड़े मारे है।।
जमाकै विदेशी बाणा अर बछेरे की तरिया कूद कूद कै
 गाणां करकै थम कुणसे मैडल पैगे रै
बडे बुडढयां के खड़गे , तुर्रे अर धुन खाप की रुलागे रै।।
पह्लाम अपनी संस्कृति पश्चिमी सभ्यता के नंगे नाच पै रे उडाई
जिब यु सांग रास ना आया फेर बाबया के चकरा म्ह लुटायी।।
सारा करणीया धरणीया हौके क्युं तु अनजान अनबोल रै बणरया
जीन्नस आले .................................................

ब्रह्मा समान पूजनीय था पंचैती फैसलया तै पंचैत लड़ैथा
जेवड़े जिसे सबर आले माणस का साफ नियत तै इंसाफ करै था।।
समय का पहिया कड़थल खा गया किसा गजब यु चाला पटगया 
एके चेहरा सयामी दिखै नौ चेहरे रावण भी गोज म्ह धरगया।।
ठाडा पंचैती इज्जत, पिस्से , शोहरत आला होकै भी 
खोटी नित लालच पै धरगया
मेहनत करणीये का गाढा लहू भी रिशवत की चवन्नी म्ह पिसकै पानी बन गया।।
रै देख कै नै जिभ काढले कदे चवन्नी देणीया ही पैर ना धरजया 
जीन्नस आले .................................................

चलो संस्कृति नै बचान खातर कोई दूसरा राह टोहलयो रै 
छोड कै नै ड्रम, प्यानो, तबले घडूआ बांजु पै कोई देशी रागनी मोहलयो रै।।
जो टक्कर म्ह आवेगा म्हारी ओ जांदा ए खाट पकड़ैगा
नाड़ी जालेगी कुहणी म्ह ओ हफ्ता मुश्कल औटेगा।।
फेर कहवांगे डेठ मारकै हम आ बंशी, छोटूराम,लख्मी ,
हरफूल , तैयार देशी घी दूधां तै होरे है 
आज्यो डटज्यो जे दम हो तो थारे फूफे हरियाणे तै आ रहे है।।
यू ज्जबा , मेहनत , लगन इंद्रधनुष के सातो रंग पलटज्यागा
जूणसे जूणसे माटी पै नजर टिकयारे सारया नै मोल का बेरा पटज्यागा।।
      -0- गाँव/डाकघर-सग्गा, तहसील-निलोखेडी, जिला-करनाल -132001
  ( हरियाणा)                     

                          

Saturday, October 7, 2017

765

समय का समय
 डॉ सुषमा गुप्ता

रात भर वो चेहरा

मेरे हाथों में था...
उसकी आँखों में दिख रही थी
मुझे अपनी उदास आँखें ...
बीते हुए वक्त की राख ...
और
दर्द से उबलते पलों का धुआँ ।
बहुत चाहा मन ने
लौट आए बीता समय
पर
समय का समय बदलना...
आसाँ होता
तो क्या बात थी

एक रोज़
एक ठंडी- सी शाम
जब अचानक चले गए थे तुम..
उस रात मौसम से ज्यादा सर्द
ज़हन था मेरा ..
ठंडा.... ठहरा ...
और लगभग मरा हुआ ।
बहुत महीनों और बहुत सालों
के सूरज ने मिल कर
जद्दोजहद की  ...
तब कहीं कुछ गरमाहट
मेरे वजूद के हिस्से आई ...
पर प्राण  फूँके के नहीं
ये अब भी नहीं पता...
जड़ को चेतन करना
आसाँ होता
तो क्या बात थी

तुमने चाहा था कभी
मेरा
मुझ जैसा न होना...
कुछ ख्वाहिशें जताई थी
और कुछ बंदिशें
जोड़ दी उनके पीछे ....
जैसे यूँ ही आदतन
छोड़ दी जाए थाल में रोटी
तृप्ति के बाद...
कि जो बचा है
लो
वो बस तुम्हारा ....
पर
मन का पेट
बचे टुकड़ों से भरना
आसाँ होता
तो क्या बात थी

मेरे पास कल भी
नहीं थी ..
मेरे पास आज भी
नहीं है ...
वो जादुई स्याही
जो जिंदगी के पन्नों से
सहूलियत से
मिटा दे
आने जाने वाले
खानाबदोशों के
बेतरतीब से लिखे हर्फ़...
और फिर से कोरा कर दे
उसे नई कहानी के लिए ...
काले रंग पे रंग भरना
आसाँ होता
तो क्या बात थी

समय का समय बदलना ....
आसाँ होता
तो क्या बात थी !


-0-

Saturday, September 30, 2017

764

अब लौट आओ न माँ
सत्या शर्मा ' कीर्ति '




इस धरा - गगन के प्राण वायु
हो रहे क्षण- क्षण  कलुषित माँ
भर दो इसे स्नेह अमृत से
मुझमें ही बन ममता रू
लौट आओ न शिवानी माँ ।।

चारों ओर बिखरे महिषासुर
तार - तार करने अस्मत को
शुम्भ - निशुम्भ बढ़ते प्रतिपल
  मुझमें ही बन काल रू
लौट आओ न काली माँ ।।

अशिक्षा और अज्ञान का
है फैला यूँ साम्राज्य यहाँ
मिटा सकूँ जग की अविद्या
मुझमें ही बन विधा रूप
लौट आओ न शारदा माँ ।।

लोभ - लालच का दैत्य बड़ा
करता घोर अनाचार यहाँ
दरिद्रता अग्नि से धरा बचाने
मुझमें ही बन श्री लक्ष्मी रूप
लौट आओ न लक्ष्मी माँ ।।

पापियों का जुल्म बहुत
फैला है तेरे इस जगत में
दुष्टों के छल - बल को हरने
बन चंडी रूप  मुझमें ही
आ लौट आओ न दुर्गा माँ ।।

बच्चों का उद्धार करने
सृष्टि का विस्तार करने
भक्ति का संचार करने
अब लौट आओ न मेरी माँ

-0-

Friday, September 29, 2017

763

डॉ. कविता भट्ट
हे०न०ब०गढ़वाल विश्वविद्यालय
श्रीनगर (गढ़वाल), उत्तराखंड    

1-किसको जलाया जाए 

जब सरस्वती दासी बन; लक्ष्मी का वंदन करती हो    
रावण के पदचिह्नों का नित अभिनन्दन करती हो  
सिन्धु-अराजक, भय-प्रीति दोनों ही निरर्थक हो जाएँ   
और व्यवस्था सीता- सी प्रतिपल लाचार सिहरती हो 
 
अब बोलो राम! कैसे आशा का सेतु बनाया जाए 
अब बोलो विजयादशमी पर किसको जलाया जाए 

जब आँखें षड्यंत्र बुनें; किन्तु अधर मुस्काते हों 
भीतर विष-घट, किन्तु शब्द प्रेम-बूँद छलकाते हों 
अनाचार-अनुशंसा में नित पुष्पहार गुणगान करें  
हृदय ईर्ष्या से भरे हुए, कंठ मुक्त प्रशंसा गाते हों 

चित्र ; गूगल से साभार
क्या मात्र, रावण-दहन का झुनझुना बजाया जा  
अब बोलो विजयादशमी पर किसको जलाया जा   

 विराट बाहर का रावण, भीतर का उससे भी भारी
असंख्य शीश हैं, पग-पग पर, बने हुए नित संहारी
सबके दुर्गुण बाँच रहे हम, स्वयं को नहीं खंगाला    
प्रतिदिन मन का वही प्रलाप, बुद्धि बनी भिखारी  

कोई रावण नाभि तो खोजो कोई तीर चलाया जा
अब बोलो विजयादशमी पर किसको जलाया जा 
-0-

2-नुमाइश ( कविता)
  
सवेरे की ही खिली नन्ही कोंपलों पर
चित्र ; गूगल से साभार
गरजदार ओलों की तेज़ बारिश हुई

जो बुरकता रहा नमक, रिसते जख्मों पर
उसी के साथ नमक-हलाली की सिफारिश हुई

दुश्मन की तरह मिलता रहा जो हर शाम 
उसी के साथ रात गुजारने की साजिश हुई

चुप्पी को समझा ही नहीं कभी जो शख़्स
उसी के सामने दर्दे -दिल गाने की ख्वाहिश हुई

दिन-रात मरहम लगाता ही रहा उसके घावों पर
जिसके हंगामे से उसकी चोटों की नुमाइश हुई

-0-

762


ज्योत्स्ना प्रदीप
1-शैलपुत्री

शैलपुत्री के रूप में पूजित
वृषभ हुई सवार।
कमल विराजे ,पापनाशिनी  
सुन लो ना पुकार।।

अपमान पति का सह न पाईं 
किया  खुद का दाह।
शिव की प्रिया बनीं तुम फिर से
यही थी चिर चाह।।

पार्वती बनकर तुम आईं 
दुहिता शैलराज।
शिव को पाया जप- तप से माँ
करो पूर्ण काज।

माँ की महिमा बड़ी अनोखी
सागर-सा हिलोर।
माता की करूणा का लोगों 
कहीं ओर न छोर।
 -0-

2-ब्रह्मचारिणी


ब्रह्मचारिणी माँ का मिलकर
करें हम आह्वान।
जीवन में संयम आता माँ 
करें हम प्रणाम।।

सूखे पात खाकर शंकरी 
सुखाई थी देह।
तुमसे बुद्धि का  दान मिले हैं 
प्यारी देह -नेह।।

शिव की साध बनी थी माता
जगत -मूलाधार।
पल -पल को कर देती पावन
जगत- पालनहार।

वरद -हाथ हो सर पर शिविका 
जले तेरी ज्योत।
जगमग करती माता जग को 
फैलाती खद्योत।।
 -0-

3-चंद्रघंटा


चंद्रघंटा-साधना पूजन 
शरद ऋतु शृंगार।
नवरात्रि के तृतीय दिवस में
करती हो उद्धार।

अस्त्रों - शस्त्रों से हो विभूषित
दृगों  में अंगार।
असुरों की संहारक आद्या
भू का हरे भार।।

देवी माँ से हो साधक को 
अलौकिक अहसास।
हर दुख में होती बालक के
सदा माता पास।

माँ -उपासना से  साधक का
सधे चक्र मणिपूर।
हर पल मन में वास करे ये
माँ न होए दूर ।।

 -0-
4- कूष्मांडा 


हे माता तुम अब आ जाओ
तुम्हीं मेरी आस ।।
सूरज सा है तेज तुम्हारा
रवि लोक है वास।।

करती शेर सवारी माता
सुनें जयजयकार।।
जग से बैर हटे रे माई
सभी  में हो  प्यार।।

वर दे दो तेजोमय माता 
बनें सबके काम।
नौ निधियों को देनेंवाली
जन्मों-जन्मों प्रणाम । ।

कंज,कमंडल ,गदा ,धनुष ले
देती अमिय -धार।।
तम बंधन से तुम्हीं निकालो
वंदन बारम्बार।।
 -0-

5-स्कंदमाता 


वरमुद्रा में शुभ्र वर्ण वाली,
करें सभी प्रणाम।
स्कंदमाता शाम्भवी हो  तुम,
करती हो कल्याण।।

तेरी साधना -आराधना
भर  दे घर- भण्डार।
नैनों से करुणा  की बहती
तेरे दृगों- धार।।

अनगिन किरणें काया -निकसे,
चमक रहा  ललाट।
दीन- हीन हैं हम पापी हैं,
जगत - बंधन काट।।

माँ के मानस आओ लोगों ,
होते हैं तल्लीन ।
इस माया से विलग पड़ी थी,
बिन जल तृषित मीन।।
 -0-
6-माँ कात्यायनी  

माँ कात्यायनी कमलालया
करूँ तेरा जाप।
श्री अंगों की आभा प्यारी
दूर हो संताप ।।

महिषासुर-कलुषित तन- मनका
तुमने अंत किया।
क्रोध- शोक से  भटके थे जो
मन को संत किया।।

सब  शत्रु - नाशिनी हो माता
तुम्हें है नमस्कार ।
शुभ छवि जो हृदय में विराजे
भागे अहंकार।।

हेम -कलेवर लोहित साड़ी
हाथों में कटार।
पोर-पोर  से बहती आभा 
घनप्रिया की धार ।


 -0-
7-कालरात्रि 


हे  कालरात्रि काली  माता,
काल तेरा ग्रास।
काया काली पर दीपित है,
हृदय में मधुमास।।

क्रिया हीन हूँ ,तेरे वर से 
करें कर्म महान।
बुद्धिहीन, यश हीन हूँ माता
दे दो अमिय - दान ।।

विजयशालिनी ,मोक्षप्रदा  माँ 
तेरे अंशभूत।
शत्रु नाशकर परम गति पाते 
तेरे ही कपूत।।

रौद्रमुखी हो भद्रकाली माँ
कंठ माल -कपाल।
खुले केशों में विकट रातें 
जीभ लोहित ,लाल।।

रौद्री, घुमोरना ,कपालिनी 
करे जयजयकार।
वरद करों को सर पर रख दो,
 दया अपरंपार।।
 -0-

 8-महागौरी 



हे शिवप्रिया कल्याण शोभना
परमपद का भार।
सब शत्रु नाशिनी पापों का
करें माँ संहार।।

तेरे पूजन से माता हम 
रहें सब नीरोग।
तुम ही देती पल में माता 
इस जगत के भोग।।

कैलाश रहती महागौरी 
वर-मुख  है गम्भीर।
इस जग के  हर प्राणी की माँ
तुम्हीं जानों पीर।।।

गौरवर्ण में रजत देह ये
विधु करे शृंगार।
हर पोर सुगंध निकलती  है 
पावन है  अपार।।


माँ गौरी की शुभ छवि से ही
श्रद्धा का संचार।।
माँ शुभ्र ओजस कर देती हैं 
सभी मलिन विचार।।
 -0-

9-सिद्धिदात्री 
  
जो मीठा फ़ल दे देती हो 
सिद्धिदात्री कहाय ।
साधक तप को करते-करते
दया इनकी पाय।।

चार भुजाओं वाली माता
शिव भी करें साध ।
अपनें बालक से ये माता
करें प्रेम अगाध ।।

शंख ,चक्र ,गदा कर में ले कर
कमल विराजमान।
ऐसी मोहक छवि का मन में
करते सभी ध्यान।।

ओज तुम्हारा बड़ा निराला
मिटा विषय -विकार।
ऐसी मोहक छवि को मनवा
पूजें बारम्बार।।

-0-