पथ के साथी

Thursday, August 25, 2011

ताश का घर



 -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

ताश के घर-सी सत्ता,  बिखर जाएगी
नशे में चूर हो गई ,किधर जाएगी ।
भ्रष्ट होने का उन्हें कितना गुमान है
पत्थरों को बाँध सैलाब तर जाएगी ।
जिसके काँधे पर चढ़ ,मिली थी कुर्सियाँ
उसकी पहचान से ही , मुकर जाएगी  ।
किश्ती में छेद और नादान नाखुदा
तूफ़ान से गुज़री तो गुज़र जाएगी ।
समझो वक़्त की नज़ाकत अए रहबरो !
ये जनता भेड़ नहीं जो डर जाएगी ।
देवालय में छुपकर  नहीं दाग़ी बचें
आग भड़केगी जब राख कर जाएगी ।
-0-

Monday, August 22, 2011

कृष्ण की प्रतीक्षा


कमला निखुर्पा

कान्हा तुम आ जाओ ना
बीत गयी हैं कितनी सदियाँ
बाट जोह रही धुँधली अंखियाँ
यमुना तट पर उसी विटप पर
धुन मुरली की सुनाओ ना।
कान्हा तुम आ जाओ ना।

जनमन का मधुबन सूना है
ब्रज की गलियाँ तुम्हे पुकार रहीं
कालियनाग हैं कदम-कदम पर
ये कालिंदी भी पल-पल सूख रही।
यमुना-तीरे फ़िर ग्वाल-बाल संग
कंदुक-क्रीड़ा दिखाओ ना।
कान्हा तुम आ जाओ ना

भूखा है कब से सखा सुदामा
हैं कंस ने खुशियाँ छीनी हैं,
आज राधिका सहमी -सी है,
दुष्ट पूतना हँसती है।
ग्वाल बाल संग उसी गोकुल में
आकर मटकी तोड़ो ना।
कान्हा तुम आ जाओ ना


हर गली बन गयी इंद्रप्रस्थ
हर चौराहे पर है महाभारत
दुर्योधन ने पहना अभेद कवच
हर अर्जुन हुआ है मोहग्रस्त
पांचजन्य का जयघोष सुना
तुम मोहभंग कर दो ना।
जो भूल चुके इतिहास उन्हें
गीता का ज्ञान सिखा दो ना।
कान्हा तुम आ जाओ ना
-0-
कमला निखुर्पा ,देहरादून
22-08-2011

Thursday, August 18, 2011

सन्देसे भीगे [ताँका ]


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

[ कुबेर ने अपनी राजधानी अलकापुरी से यक्ष को निर्वासित कर दिया था ।यक्ष रामगिरि पर्वत पर चला आया ।वहाँ से मेघों के द्वारा यक्ष अपनी प्रेमिका को सन्देश भेजता है । महाकवि कालिदास ने इसका चित्रण 'मेघदूत' में किया है । मैंने ये सब प्रतीक  लिये हैं। ]
1
बिछी शिलाएँ
तपता  है अम्बर
कण्ठ भी सूखा
 पथराए नयन
घटा बन छा जाओ
2
बरसे मेघा
रिमझिम सुर में
साथ न कोई
सन्नाटे में टपकें
सुधियाँ अन्तर में
3
बच्चे -सा मन
छप-छप करता
भिगो देता है
बिखराकर छींटे
बीती हुई यादों के
4
कोई न आए
इस आँधी -पानी में
भीगीं हवाएँ
हो गईं हैं बोझिल
सन्देसा न ढो पाएँ
5
यक्ष है बैठा
पर्वत पर तन्हा
मेघों से पूछे -
अलकापुरी भेजे
सन्देस कहाँ खोए ?
6
कुबेर सदा
निर्वासित करते
प्रेम -यक्ष को
किसी भी निर्जन में
सन्देस सभी रोकें
7
छीना करते
अलकापुरी वाले
रामगिरि  पे
निर्वासित करके
प्रेम जो कर लेता
8
सन्देसे भीगे
प्रिया तक आने में
करता भी क्या
मेघदूत बेचारा
पढ़करके रोया
9
कोमल मन
होगी सदा चुभन
बात चुभे या
पग में चुभें कीलें
मिलके आँसू पी लें

Saturday, August 13, 2011

मेरी बहना -हाइकु और ताँका


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
मन-आँगन
चिड़िया-सी चहके
प्यारी बहना ।
2
हिय-बगिया
फूलों -जैसी महके
प्यारी बहना।
3
सीपी का मोती
इससे शर्माए ये
नैनों की ज्योति ।
4
इससे बड़ा
जग में न था न है
कोई गहना ।
5
इसका प्यार  
है गंगा-सा शीतल
और निश्छल ।
6
ताप हर ले
दहके मन के ये
ऐसा चन्दन ।
7
प्यार के साँचे
प्राण -बहना  ढले
जीवन चले ।
8
भाई की छाया
जो बहन को मिली
ज़िन्दगी खिली।
9
गगन जले
भाई- तरु की छाया
मिलती गले
10
अगले जन्म
भी बनो जो बहना
कर्ज़ उतरे
11
तेरी खुशियाँ
मेरा स्वर्ग बहना
पास रहना
12
ज़हिने आँखें
कब भारी लगती
पाखी को पाँखें ।
13
सच्चा जो प्यार
रहता ही आया है
सदा उधार
14
लेना ही होगा
जनम बारम्बार
चुके उधार
15
यह सम्बन्ध
अनेक जन्मों का है
अटूट बन्ध
16
बहना प्यारी
है नदिया की धारा
भाई किनारा
17
शीतल मन
कर देती हर्षित
सारा जीवन
18
बहिन -संग
सातों जनम मिले
जीवन खिले ।
19
भूलूँगा नहीं
मै इस जनम में
यह है वादा
20
अकेला भाई
बहनों की दुआएँ
आगे बढ़ाएँ ।
21
भाई की चाह-
बहन का  जग में
ऊँचा हो नाम
22
मेरी ताकत
मेरी हैं ये बहना
मेरा कहना 
23
सात जनम
मिल जाएँ हमको
रब जो चाहे
24
भाई -बहन
कर जाएँ जग में
नाम अमर
25
तेरी दुआएँ
महसूसती मेरी
रक्त शिराएँ
26
तुमने जोड़ा
पावन हृदय का
रस निचोड़ा
27
मन में बसी
खोई बहन मिली
मेले में कभी
28
आज का दिन-
ईश्वर ने दिया ज्यों
स्वर्ग का राज
29
असीम प्यार
मुझे मिला  तुम्हारा,
सभी उधार ।
30
जनम पाऊँ
मैं चाहे  बारम्बार
चुका न सकूँ
 31
भीगा है मन
पड़ी ऐसी फुहार
नेह का ज्वार
32
सुधा बरसे
बहन के प्यार से
प्राण हरसें
33
सारे  ही धन
मुझे धूल -से लगे
मिली बहन
-0-
दो ताँका
1
मेरी बहना
कहने को है छोटी
बड़ा गहना
हीरे मोती मन में
शब्दों के कानन में
2
कुछ भी छूटे
चाहे जग ये रूठे
भाई -बहन
नित  प्रेम बिखेरें
ये बन्धन न टूटे
-0-
*मेरे कुछ हाइकु आप हिन्दी हाइकु पर भी पढ़ सकते हैं ।

Wednesday, August 10, 2011

जंगल को गाने दो( हाइकु)


जंगल को गाने दो( हाइकु)

डॉ सुधा गुप्ता
1
मनमौजी है
जंगल को गाने दो
अपना गीत
2
हरे पन्ने पे
रचते आरण्यक
ये वन -ॠषि
3
इन्हें न काटो
पावन वेद-ॠचा-
सी यह सृष्टि
4
ममतामयी
जड़-चेतन प्रति
वत्सल दृष्टि
5
तृषा बुझाने
इनके कारण ही
होती  है वृष्टि
6
गीत बुनती
गहरे सन्नाटे में
कोई गौरैया
7
बोल उठता
अचानक मस्ती में
वो पपीहरा
 8
असंख्य जीव
पाते हैं संरक्षण
इनकी गोद
9
कस्तूरी मृग
निर्भय विचरण
मनाते मोद
10
मत उजाड़ो
सबको कुछ देता
कुछ न लेता
11
कभी न छीनो
वन्य जीवों का घर
भू रही चेता
12
स्वाधीन ,मुक्त
स्वयं की मस्ती डूबा
सबका मीत
13
आत्मविभोर
प्रभु-भक्ति में लीन
सबसे प्रीत
14
मनमौजी है
जंगल को गाने दो
अपना गीत
-0-

[चित्र: रोहित काम्बोज और अंजना काम्बोज ]