पथ के साथी

Wednesday, July 23, 2008

दस नम्बरी दोहे

दस नम्बरी दोहे

 

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

 

नेता  ऐसा चाहिए, डाकू तक घबराय ।

धुआँधार भाषण करे ,ले सबको बहकाय ॥

 

कुर्सी मधु से सौ गुनी,मादकता अधिकाय

वा पीकर बौराय जग ,या पाकर बौराय ॥

 

कुर्सी जननी ,ज़िन्दगी,सबकी इस तक दौर ।

इसके बिन संसार में ,और कहाँ पर ठौर ॥

 

बधिक आज नेता बने ,भरे हज़ारों खोट ।

जिस वोट से विजय मिली ,देते उसको चोट ॥

 

काले ब्रजबिहारी को पूज रहा संसार ।

काले धन को जोड़कर क्यों घबराते यार ॥

 

नेता खड़ा बज़ार में,जोड़े दोनों हाथ ।

जेब हमारी जो भरे ,चले हमारे साथ॥

 

जन-सेवा के नाम की झोंकी  ऐसी धूल ।

जनता झाँसे में फँसी, गई सभी कुछ भूल ।

 

जीवन कच्चा काँच है ,कर लो पक्का काम।

रिश्वत लेकर घर भरो,जपो हरि का नाम ॥

 

मिली  छूट माँ बाप से ,लूट मची दिन-रात ,

गाली देकर और को,खाओ खुद भी लात ॥

फूल कनेर के


फूल कनेर के

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

किसने रोके पाँव अचानक
धीरे-धीरे  टेर  के ।
उजले पीले भर आए-
 आँगन में फूल कनेर के । ।

दिन भर गुमसुम सोई माधवी
तनिक  नहीं  आभास रहा ;
घिरा अँधेरा खूब नहाई
सुगन्ध- सरोवर पास रहा  

पलक बिछाए बिछे धरा पर
प्यारे  फूल कनेर के ।

यह मन बौराया  चैन न पाए
व्याकुल झुकती डाल सा ;
पीपल के पत्ते-सा थिरकता
हिलता किसी रूमाल-सा ।

चोर पुजारी तोड़ भोर में ,
ले गया फूल कनेर के   

Thursday, May 15, 2008

स्वस्थ चिन्तन




1-घर में प्रवेश करने से पहले अपने कपड़ों की धूल झाड़ लीजिए।सोने से पहले मन पर पड़ी नकारात्मक सोच की धूल साफ़ कर लीजिए । तन और मन स्वस्थ रहेगा ।
2-घर की खिड़कियाँ खुली रखिए ताकि ताज़ा हवा आ सके । दूसरे लोग क्या कर रहे हैं, यह देखने के लिए खिड़कियों का इस्तेमाल न करें ।दीर्घायु प्राप्त करेंगे ।
 
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'


Monday, May 12, 2008

लघुकथाएँ


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1-चक्रव्यूह
''मँझले को देखो न, कितना कमज़ोर हो गया है।'' सुबह पत्नी ने कहा।
''देख तो मैं भी रहा हूँ। पर करूँ भी तो क्या? कलकत्ता में रहे हैं। वहाँ गरम कपड़ों की ज्यादा ज़रूरत नहीं पड़ी। अधिक न भी हों तो तीनों बच्चों के लिए एकएक फुल स्वेटर ज़रूरी है। मैं चप्पल पहनकर ही आफिस जा रहा हूँ। कमसेकम दो सौ रुपए हाथ में हों, तब मँझले का इलाज फिर शुरू कराऊँ।''
''मैं पिछले आठ साल से देख रही हूँ कि आपके पास महीने के अन्तिम दिनों में दो रुपए भी नहीं बचते।'' पत्नी तुनक उठी।
कोई खांसीजुकाम का इलाज तो कराना नहीं। लंग्स की खराबी है। सालभर दवाई खिलाकर देख ली। रत्तीभर फर्क नहीं पड़ा। संतुलित भोजन भी कहाँ मिल पाता है मंझले को।
मैंने देखा, पत्नी की आँखें भर आईं–''तीनों बेटों में मँझला ही तो सुन्दर भी लगता है।....'' उसने एक ओर मुँह घुमा लिया। मैं बिना खाए ही आफिस चला गया। मँझले का झुरता हुआ चेहरा दिनभर मेरी आँखों में तैरता रहा। शाम को बोझिल कदमों से घर लौटा। पिताजी का पत्र आया था कि एक हज़ार रुपए भेज दूँ। अब उनको क्या उत्तर दूँ? महीनेभर की कमाई है आठ सौ रुपए। कहीं डाका डालूँ या चोरी करूँ? सालभर में भी कभी एक हज़ार रुपए नहीं जुड़ पाए। वे बूढ़ी आँखें आए दिन पोस्टमैन की प्रतीक्षा करती होंगी कि मैं हज़ार न भेजता, तीनचार सौ ही भेज देता।
एक पीली रोशनी मेरी आँखों के आगे पसर रही है जिसमें जर्जर पिताजी मचिया पर पड़े कराह रहे हैं और अस्थिपंजर सा मेरा मँझला बेटा सूखी खपच्ची टांगों से गिरतापड़ता कहीं दूर भागा जा रहा है। और मैं धरती पर पाँव टिकाने में भी खुद को असमर्थ पा रहा हूँ।

2-धर्म निरपेक्ष
शहर में दंगा हो गया था। घर जलाए जा रहे थे। छोटे बच्चों को भाले की नोकों पर उछाला जा रहा था। वे दोनों चौराहे पर निकल आए। आज से पहले उन्होंने एकदूसरे को देखा न था। उनकी आँखों में खून उतर आया। उनके धर्म अलगअलग थे।
पहले ने दूसरे को माँ की गाली दी, दूसरे ने पहले को बहिन की गाली देकर धमकाया। दोनों ने अपनेअपने छुरे निकाल लिये। हड्डी को चिचोड़ता पास में खड़ा हुआ कुत्ता गुर्रा उठा। वे दोनों एकदूसरे को जान से मारने की धमकी दे रहे थे। हड्डी छोड़कर कुत्ता उनकी ओर देखने लगा।
उन्होंने हाथ तौलकर एकदूसरे पर छुरे का वार किया। दोनों छटपटाकर चौराहे के बीच में गिर पड़े। ज़मीन खून से भीग गई।
कुत्ते ने पास आकर दोनों को सूँघा। कान फड़फड़ाए। बारीबारी से दोनों के ऊपर पेशाब किया और फिर सूखी हड्डी चबाने में लग गया।

3-क्रौंचवध
कहीं से एक बाण तेजी से आया और आकाश में उड़ते क्रौंच पक्षी को जा लगा।
मँडराता हुआ क्रौंच धीरेधीरे ज़मीन पर उतर आया और पीड़ा से छटपटाकर मूर्च्छित हो गया।
वृक्ष के नीचे बैठा निषाद यह दृश्य देख रहा था। उसने दौड़कर क्रौंच को गोद में उठा लिया।
पास में बहती तमसा के शीतल जल से उसका घाव धोया और अपनी पगड़ी का छोर फाड़कर पट्टी बांध दी। क्रौंच की चेतना लौट आई। पीड़ा अचानक गायब हो गई।
निषाद को पास में देखकर क्रौंच भौचक्का रह गया
''क्या तुमने ही मुझे बचाया है?''
''हाँ,मैंने ही तुम्हें बचाया है।'' निषाद बोला।
''लेकिन यह कृपा किसलिए.....?''
''मैं नहीं चाहता कि कोई बाल्मीकि तुम्हें छटपटाता हुआ देखकर महाकाव्य रचे। मैं तुम्हें मरने नहीं दूँगा।'' निषाद ने दृढ़तापूर्वक कहा

4-मुखौटा
नेताजी को चुनाव लड़ना था। जनता पर उनका अच्छा प्रभाव न था। इसके लिए वे मुखौटा बेचने वाले की दूकान में गए। दूकानदार ने भालू, शेर, भेडिए,साधूसंन्यासी के मुखौटे उसके चेहरे पर लगाकर देखे। कोई भी मुखौटा फिट नहीं बैठा। दूकानदार और नेताजी दोनों ही परेशान।
दूकानदार को एकाएक ख्याल आया। भीतर की अँधेरी कोठरी में एक मुखौटा बरसों से उपेक्षित पड़ा था। वह मुखौटा नेताजी के चेहरे पर एकदम फिट आ गया। उसे लगाकर वे सीधे चुनावक्षेत्र में चले गए।
परिणाम घोषित हुआ। नेताजी भारी बहुमत से जीत गए। उन्होंने मुखौटा उतारकर देखा। वे स्वयं भी चौंक उठेवह इलाके के प्रसिद्ध डाकू का मुखौटा था।
5-चक्र
मोना को सुबह ही सुबह खेलते देखकर महेश ने पत्नी को कनखियों से इशारा किया–''देखो, मोना की रात भी कितना समझाया था कि सोने का वक्त हो गया है। खेल बंद करके होमवर्क पूरा कर लो। अब फिर सुबह ही सुबह......'' वह क्रौंध से होंठ चबाता हुआ दूसरे कमरे में चला गया। सहमा हुआ मोना नल पर जाकर ब्रश करने लगा।
आठ बज गए। स्कूल जाने में सि‍र्फ़ आधा घंटा है। महेश की नज़रें मोना को तलाश रही थीं। उड़तीसी नज़र बरामदे की ओर चली गई। पत्नी रसोईघर में व्यस्त थी। मोना दीवार के किनारे इमली के बीज फैलाकर निशाना साध रहा था। महेश इस बार संयम खो बैठा। उसने लपककर मोना को पकड़ लिया। एक के बाद एक थप्पड़ पड़ने लगे। उस पर जैसे पागलपन सवार हो गया था। उसने मोना को लाकर पलंग पर पटक दिया। एक चीख के साथ वह उछलकर खड़ा हो गया । पत्नी रसोईघर से दौड़कर आई। उसने पत्नी को एक तरफ धकेल दिया।
''मत मारो पापा.....'' उसने हाथ जोड़ दिए। डर के मारे पेशाब निकल जाने से उसकी पैण्ट गीली हो गई। सुबकियों के साथ उसका पूरा शरीर पत्ते की तरह काँप रहा था। महेश चीखा–''तुमको रात भी समझाया फिर भी तुम बात क्यों नहीं मानते?'' और थप्पड़ मारने के लिए हाथ उठाया। पत्नी ने हाथ पकड़ लिया–''अब जाने भी दो या जान ही लोगे इसकी।''
दफ्तर पहुचने पर उसका मन और व्याकुल हो गया। जब काम में मन नहीं लगा तो वह छु्ट्टी लेकर घर लौट आया।
मोना को बुखार चढ़ गया था। पत्नी सिरहाने बैठी थी। मोना ने धीरे से आँखें खोलीं। ''पापा''–कहकर फिर आँखें मूँद लीं।
''मैंने आज अपने बेटे को बहुत पीटा है न?'' महेश ने मोना के बालों में उँगलियाँ चलाते हुए कहा।
''मैंने भी तो आपकी बात नहीं मानी?'' मोना ने अपना हाथ पिता की गोद में रख दिया।
दोनों की आँखें भीग चुकी थीं।




Wednesday, March 19, 2008

लिखो


जब लिखो मीत लिखो ।
हार मत जीत लिखो ॥
नफ़रत के द्वार पर
सिर्फ़ तुम गीत लिखो।
……………………………
गाते चलो
अँधेरों को ठोकर लगाते चलो ।
उजालों से दामन सजाते चलो ।
आँसुओं की कहानी जीवन नहीं ।
मत आहें भरो ,गीत गाते चलो ॥
……………………………………
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
19 मार्च 2009

Thursday, March 13, 2008

Jagran-Yahoo! Story

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श्रीहनुमानचालीसा

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Sunday, March 9, 2008

मैं अभी हारा नहीं हूँ ।



मैं अभी हारा नहीं हूँ ।
जग अभी जीता नहीं है

मैं अभी हारा नहीं हूँ ।
फ़ैसला होने से पहले ,
हार क्यों स्वीकार कर लूँ ।
-गीतकार समीर

Saturday, March 8, 2008

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस :थकाने वाला सफ़र




अन्तर्राष्ट्रीय महिला

दिवस :थकाने वाला सफ़र


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'




8 मार्च अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस विश्व भर में मनाया जा रहा है ।महिलाएँ अबला हैं यह धारणा बाहरी तौर पर देखें तो टूट चुकी है । ज्ञान विज्ञान ,खेल का मैदान ,राजनीति का घमासान साहित्य,कला ,संगीत, समाज-सुधार,शिक्षा,व्यापार आदि सभी क्षेत्रों में महिलाओं ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है ।यह सब एक दिन में नही हो गया ,वरन् बरसों के संघर्षों का परिणाम है । लेकिन इन सबके ऊपर एक भोगवादी एवं ढोंगी पीढ़ी हावी है । रूस ,चीन, अमरीका में आज तक किसी महिला को राष्ट्रपति बनने का अवसर नहीं मिल पाया है । भारत इस मायने में सबसे आगे है ।ये ऐसी बाते हैं जिन पर हम गर्व कर सकते हैं।इसी के साथ ऐसा भी बहुत कुछ है ,जो हमें बेचैन कर सकता है

जब शादी की बात आती है तो इस सभ्य समाज का मूर्खतम लड़का भी सुघड़ ,सुन्दर, सुशिक्षित लड़की से महत्त्वपूर्ण हो जाता है ।उस की क़ीमत लाखों में आँकी जाने लगती है ।तमाम ऊँची शिक्षा के बावज़ूद वह बिकने के लिए तैयार हो जाता है।जितना बड़ा पद ;उतनी ऊँची बोली। इसे कौन प्रगति का नाम देगा? इस बाज़ार में बहुत सारे आदर्शवादी अपने खोखले आदर्शों को लालच के वशीभूत होकर चर जाते हैं ।ज़रा अवसर मिलते ही भूखे बाघ की तरह नारी का शोषण करने वाले क्या कर रहें ?गहराई तक जाएँ तो दिल दहलाने वाले तथ्य प्रकाश में आएँगे । कितनी ही नारियों की हूक लाज-शर्म के पर्दे में घुटकर दम तोड़ देती है ।घर-परिवार वाले भी उसका शोषण करने में पीछे नहीं रहते ।इस विषम एवं विडम्बना-भरी परिस्थिति में वह कहाँ जाए ? किसके आँचल में छुपकर अपने आँसू पोंछे ?कामकाजी महिलाओं की स्थिति तो और भी दयनीय है ।

मंचो पर स्त्री की आज़ादी की वकालत करने वाले अपने घरों में कुछ और ही करते नज़र आएँगे ।सुरक्षा को लेकर औरत हमेशा डरी हुई ही मिलेगी ।संभवत स्त्री का बदलता हुआ भोगवादी रूप(नारी की आज़ादी का शायद यही अर्थ हमने समझ लिया है ।) ही इसके लिए ज़्यादा ज़िम्मेदार है ।आज़ादी का सही अर्थ है सुरक्षा एवं सम्मान के साथ काम करने और जीने की आज़ादी,अपनी उन्नति के लिए आगे बढ़ने की आज़ादी ,अपने विचारों को प्रकट करने की आज़ादी।जिस घर और समाज में नारी दुखी रहेगी ;वह सुख की कल्पना करे तो आश्चर्य ही होगा ।हम कथनी और करनी के अन्तर को कम कर सके तो यह थकाने वाला सफ़र सुखद सफ़र में बदल जाएगा ।

Friday, March 7, 2008

संस्कार


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
साहब के बेटे और कुत्ते में विवाद हो गया।
साहब का बेटा कहे जा रहा था–''यहाँ बंगले में रहकर तुझे चोंचले सूझते हैं। और कहीं होते तो एकएक टुकड़ा पाने के लिए घरघर झाँकना पड़ता। यहाँ बैठेबिठाए बढ़िया माल खा रहे हो। ज्यादा ही हुआ तो दिन में एकाध बार आनेजाने वालों पर गुर्रा लेते हो।''
कुत्ता हँसा–''तुम बेकार में क्रोध करते हो। अगर तुम भिखारी के घर पैदा हुए होते तो मुझसे और भी ईर्ष्या करते। जूठे पत्तल चाटने का मौका तक न मिल पाता। तुम यहीं रहो, खुश रहो, यही मेरी इच्छा है।''
''मैं तुम्हारी इच्छा से यहाँ रह रहा हूँ? हरामी कहीं के।'' साहब का बेटा भभक उठा।
कुत्ता फिर हँसा–''अपनेअपने संस्कार की बात है। मेरी देखभाल साहब और मेमसाहब दोनों करते हैं। मुझे कार में घुमाने ले जाते हैं। तुम्हारी देखभाल घर के नौकरचाकर करते हैं। उन्हीं के साथ तुम बोलतेबतियाते हो। उनकी संगति का प्रभाव तुम्हारे ऊपर ज़रूर पड़ेगा। जैसी संगति में रहोगे, वैसे संस्कार बनेंगे।''
साहब के बेटे का मुँह लटक गया। कुत्ता इस स्थिति को देखकर अफसर की तरह ठठाकर हँस पड़ा।
हम सब सुमन एक उपवन के


Thursday, March 6, 2008

हाँफता हुआ बच्चा




हाँफता हुआ बच्चा

-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

सुबह-सुबह !

हाँफता हुआ बच्चा

जा रहा स्कूल

पीठ पर लादे

बस्ता किताबों का ।

गले में झूलती

पानी भरी बोतल

थके हुए कदम

हलक़ सूखा हुआ

थका हुआ बच्चा

चढ़ रहा

स्कूल की सीढ़ियाँ

आगे खड़ा है

मुँह बाए

बाघ-सा क्लास रूम !

क्लास रूम में आएँगे

चश्मे के भीतर से घूरते टीचर

दोपहर हो गई-

छुट्टी की घण्टी बजी

उतर रहा है बच्चा

स्कूल की सीढ़ियाँ-

खट्ट -खट्ट खट्ट- खट्ट

पीठ पर लादे

भारी बस्ता किताबों का

होमवर्क का बोझ

जा रहा बच्चा घर की तरफ

फर्राटे भरता

फूल हुए पाँव

सामने है घर

आँचल की छाया

Sunday, March 2, 2008

मृगजल

अध्ययन-कक्ष
लघुकथा की स्थापना के लिए संगोष्ठियाँ करने और ‘कथानामा’ जैसे संकलन निकालने वाले कथाकार मनीषराय का लघुकथा–संग्रह ‘अनावरण’ तो 1980 में ही छप गया था, लेकिन उनके जोड़ीदार कथाकार–पत्रकार बलराम का लघुकथा–संग्रह ‘मृगजल’ 1990 में जाकर प्रकाशित हुआ, जबकि उनका कहानी–संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है और एक उपन्यास भी। कहानी समीक्षा की भी एक किताब छपी है और यात्रावृत्तों का संग्रह भी। कहने का मतलब ये कि साहित्य की अनेक विधाओं में सक्रिय बलराम लघुकथाएँ भी लिखनेवाले बहुमुखी प्रतिभासंपन्न ऐसे रचनाकार हैं, जिन्होंने लघुकथा को स्थापित करने में भी महती भूमिका निभाई है। ‘हिन्दी लघुकथा कोश’, ‘भारतीय लघुकथा कोश’ , ‘विश्व लघुकथा कोश’ और ‘बीसवीं सदी की लघुकथाएँ’ का संपादन कर उसके राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय आयाम उजागर किए हैं। बलराम का एक लघुकथा–संग्रह ‘मृगजल’ भी छपा है, जिसमें उनकी तीस लघुकथाएँ संगृहीत हैं। साथ में है ‘लघुकथा के बारे में’ नाम से एक आलोचनात्मक लेख भी। ‘मृगजल’ की लघुकथाओं को दो खंडों में बाँटा गया है। पहले खंड में अपेक्षाकृत ज्यादा प्रभावशाली लघुकथाएँ हैं। इस खंड की लघुकथा ‘पाप और प्रायश्चित’ में दिखाया गा है कि धार्मिक संस्थाएँ अनाचार के लिए सहज स्वीकृति देने में तो संकोच नहीं करतीं, लेकिन प्यार को आश्रय देने में ऐसे पाप–कर्म की कल्पना कर लेती हैं, जिसका प्रायश्चित्त संभव नहीं है। प्यार और मातृत्व की उष्मा धर्म की शिला को पिघलाने में असमर्थ है। इस तरह ‘पाप और प्रायश्चित्त’ में कर्मकांड के धर्म बनने की कुरूपता दर्शाई गई है। ‘आदमी’ लघुकथा में अंतरिक्ष मानव का विस्मित होना कम बेधक नहीं है। आदमी के लिए आदमी होने का दावा करना सबसे खतरनाक है, क्योंकि संकीर्ण और अनुदार दृष्टिकोण ही आज के मानव जीवन के पर्याय बन गए हैं।
‘माध्यम’ में फाके के दिनों में लड़नेवाला दिनुवा है, जो चौधरी की तिकड़मों के आगे लाचार होकर उसके यहाँ मजदूरी पर जाने लगता है। दिनुवा जैसे लोग यदि सक्षम होकर पेट भरने लगेंगे तो चौधराहट किसके बलबूते पर की जाएगी? ‘मृगजल’ में सिर्फ़ बनियान और लुंगी पहनकर कड़ाके की ठंड का प्रतिरोध करता किसन का पिता। किसन के भाइयों की हालत भी अभाव की कथा कहती है। माँ–बहनों मजदूरी करती हैं। सुखमय भविष्य की कल्पना में पूरा परिवार अभाव एवं भटकाव का जीवन जी रहा है। उधर किसन अपने चार साल में एम.ए.फाइनल तक पहुँच पाया है। संघर्षरत परिवार की खून–पसीने की कमाई फिल्म और फैशन में फूँक रहा है। न जाने ऐसे कितने किसन स्पप्नजीवी परिवारों को चूस रहे हैं। ग्रामीण परिवेश को जड़ों से उखड़ी गुमराह पीढ़ी के भरोसे, भावी सुखों का रेत महल निर्मित करने वालों की करुण स्थिति को बलराम ने मर्मस्पर्शी भाषा में अभिव्यक्त किया है। यह लघुकथा ग्रामीण परिवेश को बारीकी से उकेरने में सक्षम है। समर्पण और सहिष्णुता के बावजूद युगों–युगों से नारी आरोपों का केंद्र बनी रही है। ‘बहू का सवाल’ की कम्युआइन भाभी पति की नामर्दी को छिपाए रखती हैं। वह चुप्पी तभी तोड़ती हैं, जब काका कम्युआइन भाभी को बाँझ समझने की गलतफहमी के शिकार होकर अपने बेटे की दूसरी शादी की बात करने लगते हैं। ‘बहू का सवाल’ हर युग के समाज के लिए अनुत्तरित ही रहा है।
‘गंदी बात’ बाल मनोविज्ञान की समस्या पर लिखी सशक्त लघुकथा है। निर्मल और वीणा जैसे अभिभावक बच्चे की मानसिक गुत्थियों को समझ पाने में असमर्थ हैं। मुसाफिर उनके बच्चे को आलू–बुखारा दे देता है, लेकिन वीणा आचार्य बच्चे को ‘‘छि :,गंदी बात, कोई किसी से ऐसे चीजें लेता है?’’ कहकर टोक देती हैं। इस टोक की परिणति आगे चलकर बच्चे को गिरी खरीदकर देने से होती है। बच्चा उस गिरी को ‘‘छि :, गंदी बात, रास्ते में कोई कुछ खाता है?’’ कहकर फेंक देता है। बाल–हृदय की गहराइयों को जाने बिना उसका मानसिक विकास नहीं किया जा सकता। गोष्ठियों–सेमिनारों में जाकर रोब झाड़नेवाले अपने गिरेबान में झाँककर देखने का कष्ट कब करते हैं?
‘मृगजल’ के दूसरे खंड में बलराम की व्यंग्य लघुकथाएँ विभिन्न तेवरों के साथ उपस्थित हैं। ‘सिद्धि’ में आरोपित विचारधारा पर कटाक्ष है। इस लघुकथा में लेखक संघों की कपटनीति का पर्दापाश किया गया है। आम आदमी को चर्चा के केंद्र में रखने वाले, आम आदमी की ही उपेक्षा करते हैं। इनके लिए आम आदमी ‘वाग्जाल’ तक ही महदूद है। व्यावहारिक जीवन में उसका कोई स्थान नहीं है। ‘खाली पेट’ में उसी आम आदमी को हाशिए पर खिसका दिया जाता है। लघुकथाओं में मिथक का प्रयोग होता रहा है; परंतु अपेक्षित सावधानी नहीं बरती गई हैं बलराम इसके अपवाद हैं। मिथकीय संदर्भों को हानि पहुँचाए बिना इन्होंने कुछ अच्छे प्रयोग करके आधुनिक जीवन की विवशताओं को उजागर किया है। ‘गुरुभक्ति’ और ‘महाभारत’ लघुकथाएँ समसामयिक बदलाव और राजनीतिक पतनशील को सफलतापूर्वक विश्लेषित करती हैं। अधिकतर लघुकथाओं में व्यंग्य सन्निहित है। प्रथम खंड की रचनाओं में व्यंग्य अधिक धारदार है। ‘आदमी,’ ‘बहू का सवाल’, ‘बेटी की समझ’, ‘पाप और प्रायश्चित्त’, ‘गंदी बात’ जैसी लघुकथाओं में व्यंग्य अंतर्धारा के रूप में समाया हुआ है। ‘अपने लोग’ में अपनत्व का दिखावा करने वालों के बौनेपन एवं बेगानेपन की कलाई खोली गई है। ‘विविधा’ में ‘टेढ़ी खीर’ का प्रसंग सर्वविदित है। ‘नेकी’ में रोचकता का गुण विद्यमान है, परंतु इसे लघुकथा की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। ‘लघुकथा के बारे में’ नामक आलेख में लघुकथा के संबंध में बलराम ने जहाँ शास्त्रीय पक्षों को छुआ है,वहाँ लघुकथा में उठ रहे अनेके मुद्दों पर भी अपने बेबाक विचार प्रकट किए हैं।
बलराम की भाषा परिमार्जित एवं सशक्त है। शिष्ट भाषा लेखकीय संस्कार के बिना संभव नहीं है। जो लेखक गालियों के बिना अपनी रचनाओं का सृजन नहीं कर पाते, उन्हें बलराम की लघुकथाओं से सीखने में हीन भावना नहीं महसूस करनी चाहिए। इनकी लघुकथाओं में वाक्य–गठन कथा की तीव्रता के अनुसार है। ‘शरणार्थी’, ‘मशाल और मशाल’ इसके सार्थक उदाहरण हैं। विषयवस्तु की नवीनता एवं प्रस्तुति की सजगता ने बलराम की लघुकथाओं को बेहद–बेहद पठनीय बना दिया है।

सृजन सम्मान छत्तीसगढ़





सृजन सम्मान छत्तीसगढ़ का अंतर्राष्ट्रीय लघुकथा सम्मेलन रायपुर में संपन्न।
रायपुर (छत्तीसगढ़)में छठे अखिल भारतीय साहित्य महोत्सव का आयोजन 16–17 फरवरी को दूधाधारी सत्संग भवन में किया गया।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता श्री केशरी नाथ त्रिपाठी ने की। इस सत्र के अध्य़क्ष थे श्री कमल किशोर गोयनका। सत्रारम्भ श्री सत्यनारायण शर्मा–अध्यक्ष सृजन–सम्मान के वक्तव्य से हुआ। इस अवसर पर श्री केशरी नाथ त्रिपाठी को राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल सद्भावना सम्मान प्रदान किया गया।
अध्यक्ष मण्डल से श्री मोहनदास नैमिशराय ने कहा –‘मानवता का धर्म सबसे बड़ा धर्म है।
अनुभूति अभिव्यक्ति की सम्पादिका श्रीमती पूर्णिमा वर्मन ने कहा–‘हिन्दी के वैश्वीकरण के लिए वेब से जुड़ने का प्रयास किया जाए।
श्री विश्वनाथ सचदेव (सम्पादक : नवनीत) ने कहा–हिन्दी में लघुकथा की स्थिति ‘लघुमानव’ जैसी है। लघुकथा का अपना महत्त्व है। वह ‘सतसैया के दोहरे’ जैसी है–छोटी–छोटी बातों से बड़े गहरे अर्थ देना।’ श्री केशरी नाथ त्रिपाठी ने कहा–‘लघुकथा के स्वरूप को समझने के लिए वृहद् लक्ष्य सामने रखना पड़ेगा।’ श्री गोयनका ने कहा–‘यह पहला अन्तर्राष्ट्रीय लघुकथा सम्मेलन है। लघुकथा की चिन्ता यह देश और समाज है।
विमर्श (1)सत्र में ‘लघुकथा : विषयवस्तु और शिल्प की सिद्धि’ विषय पर श्री जयप्रकाश मानस ने बीज वक्तव्य प्रस्तुत किया, मानस जी ने कहा–‘लघुकथा गद्य परिवार की सबसे छोटी विधा है, इसलिए लघु है। लघुता उसका शिल्पगत आचरण है–दूब की मानिंद,चन्द्रमा की मानिंद। संक्षिप्तता, व्यंजना इसकी शक्ति है। विषयों का संकट अच्छे लघुकथाकार को कभी नहीं होता।’
लघुकथा की संचेतना एवं अभिव्यक्ति को लेकर अधिकतर वक्ताओं में भ्रम की स्थिति देखी गई,जबकि लगभग दो पहले विभिन्न गोष्ठियों तथा सम्मेलनों में इसका निवारण हो चुका है।
डा. सतीशराज पुष्करणा ने सभी भ्रमों का निराकरण करते हुए कहा–‘रचना अपना आकार स्वयं तय करती है। कालदोष और कालत्व दोष दोनों अलग–अलग हैं। लघुकथा कालत्व दोष स्वीकार नहीं करती। लघुकथा में शीर्षक महत्त्वपूर्ण है। लेखकीय अनुशासन जरूरी है। भाषा का महत्त्व और नियंत्रण और अधिक जरूरी है। श्री नैमिशराय ने कहा–‘लघुकथा समाज को पढ़ने का सशक्त माध्यम है। इसमें कल्पना का महत्त्व अधिक नहीं है।
विमर्श (2) सत्र में ‘लघुकथा का वर्तमान’ विषय पर डॉ. अशोक भाटिया ने बीज वक्तव्य प्रस्तुत किया। श्री भाटिया ने संवेदना से संचालित रचनात्मक विवेक को प्राथमिकता दी। लघुकथा में कुछ अनकहा भी रह जाता है। यह अनकहा लघुकथा को सशक्त बनाता है। इस सत्र में श्याम सखा श्याम, फजल इमाम मलिक, मालती बसंत, अंजली शर्मा, कुमुद अधिकारी, के पी सक्सेना ‘दूसरे’, सुकेश साहनी आदि ने अपने विचार प्रकट किए। मालती बसन्त ने कहा–‘लघुकथा वर्तमान समय का सही दस्तावेज प्रस्तुत करे।’
श्री सुकेश साहनी ने कहा–‘वर्षों पहले का कच्चा माल सही अवसर मिलने पर रचना का स्वरूप धारण करता है। लघुकथा में गम्भीर चिन्तन भी होता है। लेखकीय दायित्व ही विधा को सशक्त बनाता है। लेखक की अनुपस्थिति रहती है। ‘मैं’से तात्पर्य लेखक से नहीं। उन्होंने लघुकथा में कल्पना और फैंटेसी के महत्त्व को रेखाकिंत किया।
अधिकतर वक्ता विषय से हटकर बोले जिसके लिए इस सत्र के संचालक रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ने कई बार टोका। ‘हिमांशु’ ने रचनाकारों से क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर उठकर सोचने के लिए कहा। संकीर्ण सीमाओं में बंधकर वैश्वीकरण की बात नहीं की जा सकती।
लघुकथा गौरव और सृजन श्री सम्मान से अनेकानेक रचनाकारों को सम्मानित किया गया जिनमें प्रमुख हैं–सर्वश्री सतीश राज पुष्करणा, बलराम अग्रवाल, अशोक भाटिया, मालती बसंत, रामकुमार आत्रेय, रोहित कुमार हैप्पी, देवी नागरानी, डॉ.जयशंकर बाबू आदि।
भारती बन्धु के कबीर गायन ने श्रोताओं का प्रभावित किया। आनंदी सहाय शुक्ल –‘तट पर डाल दिया लंगर है।’ हस्ती मल ‘हस्ती’ की ग़जल–‘प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है। नए परिन्दों को उड़ने में वक्त तो लगता है।’ की पंक्तियाँ श्रोताओं के दिलों को छुए बिना कैसे रहती?
अन्तिम सत्र में लघुकथा पाठ किया गया जिसमें सर्वश्री सुकेश साहनी, श्याम सखा श्याम राम पटवा, आलोक भारती, फजल इमाम मलिक, राम कुमार आत्रेय, शल चन्द्रा, कुमुद अधिकारी, रोहित कुमार हैप्पी, सुमन पोखरेल आदि ने अपनी लघुकथाएँ पढ़ी। सत्र का संचालन सद्भावना दर्पण के सम्पादक श्री गिरीश पंकज ने किया।
17 फरवरी को ‘लघुकथा का भविष्य और भविष्य की लघुकथा’ पर गिरीश पंकज ने बीज वक्तव्य प्रस्तुत किया। पंकज जी ने कहा–‘लघुकथा बदलते हुए युग चरित्र के अनुरूप होनी चाहिए। साहित्य केवल समाज को बदलने का प्रयास भी करता है।
इस सत्र का संचालन डॉ.सतीश राज पुष्करणा ने किया। वक्ता विषय से हटकर बोलने का भरपूर प्रयास करते रहे। पुष्करणा जी ने लगाम लगाने का काफी प्रयास किया। सर्वश्री रामकुमार आत्रेय, बलराम अग्रवाल, डॉ. जयशंकर बाबू, नवल जायसवाल, डॉ.अशोक भाटिया डॉ. हरिवंश अनेजा, डॉ. देवी प्रसाद वर्मा ने अपने विचार प्रस्तुत किए। डा राम निवास मानव ने ‘लघुकथा :बहस के चौराहे पर’ तथा अपनी पुस्तक का जिक्र करते हुए कहा कि शास्त्रीय पक्ष पर एक अर्सा पहले बहुत कुछ कहा जा चुका है ।श्री सुकेश साहनी ने कहा–‘लघुकथा के क्षेत्र में निराशाजनक स्थिति नहीं है। खलील जिब्रान की लघुकथाओं की लघुकथाओं का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भविष्य की लघुकथा के लिए रचनाकार के लिए किसी तैयारी की जरूरत नहीं है।
मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह जी ने राष्ट्रीय अलंकरण से विभिन्न रचनाकर्मियों को सम्मानित किया इनमें प्रमुख रहे–सर्वश्री विश्वनाथ सचदेव, कमल किशोर गोयनका, सुकेश साहनी, निर्मल शुक्ल, मोहनदास नैमिशराय, हस्ती मल हस्ती, भैरू लाल गर्ग (सम्पा.बालवाटिका), सुभाष चन्दर, राम निवास मानव, सुश्री पूर्णिमा वर्मन(हिन्दी गौरव सम्मान), रविशंकर श्रीवास्तव आदि।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री डा रमन सिंह जी ने विभिन्न कृतियों का विमोचन भी किया गया। इस आयोजन को सफल बनाने में श्री जयप्रकाश मानस की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण रही है। श्री राम पटवा, श्री राजेन्द्र सोनी हर समय व्यस्त दिखाई दिए। श्री सत्य नारायण शर्मा जी पूरे कार्यक्रम में बने रहे एवं तरोताजा दिखे।
लघुकथा के क्षेत्र में यह सम्मेलन तभी सार्थक माना जाएगा ,जब लेखक वर्तमान समाज की गहनता से पड़ताल करें एवं अपने लेखकीय दायित्व का ईमानदारी से निर्वाह करें। क्षेत्रीयता से ऊपर उठना बहुत ज़रूरी है ।
प्रस्तुति
-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

Thursday, January 31, 2008

महात्मा और डाकू

एक महात्मा जी और एक डाकू को चित्रगुप्त के सामने पेश किया गया । चित्रगुप्त ने अपना बहीखाता खोला। गम्भीर स्वर में बोले–‘‘महात्मा जी, आपने अपने जीवन में तीन–चौथाई पुण्य किए हैं और एक–चौथाई पाप। कौन–सा भोग आपको पहले चाहिए?’’
महात्मा जी संयत स्वर में बोले–‘‘पापों का फल पहले भोग लूँ। उसके बाद तो स्वर्ग का आनन्द प्राप्त होगा ही।’’
चित्रगुप्त ने डाकू की ओर संकेत किया–‘‘अब तुम बतलाओ। तुमने तीन–चौथाई पाप किए हैं और एक चौथाई पुण्य।’’
डाकू चुप रहा।
महात्मा जी मुस्कराए।
‘‘कहिए, तुम्हें पहले क्या चाहिए?’’ चित्रगुप्त ने टोका।
नरक–यातना तो भोगनी ही है। पहले स्वर्ग का आनन्द क्यों न उठा लूँ?’’
‘‘ठीक है। यमराज जी से अन्तिम स्वीकृति लेकर व्यवस्था करा देता हूँ।’’
डाकू ने प्रसन्नता प्रकट की और बढ़कर चित्रगुप्त जी से खुसर–पुसर की।
तत्पश्चात् महात्मा जी को नरक के यातना केन्द्र पर भेज दिया गया और डाकू को स्वर्ग में। आज तक दोनों नरक तथा स्वर्ग भोग रहे हैं।

संस्कार

साहब के बेटे और कुत्ते में विवाद हो गया। साहब का बेटा कहे जा रहा था–‘‘यहाँ बंगले में रहकर तुझे चोंचले सूझते हैं। और कहीं होते तो एक–एक टुकड़ा पाने के लिए घर–घर झाँकना पड़ता। यहाँ बैठे–बिठाए बढ़िया माल खा रहे हो। ज्यादा ही हुआ तो दिन में एकाध बार आने–जाने वालों पर गुर्रा लेते हो।’’
कुत्ता हँसा–‘‘तुम बेकार में क्रोध करते हो। अगर तुम भिखारी के घर पैदा हुए होते तो मुझसे और भी ईर्ष्या करते। जूठे पत्तल चाटने का मौका तक न मिल पाता। तुम यहीं रहो, खुश रहो, यही मेरी इच्छा है।’’
‘‘मैं तुम्हारी इच्छा से यहाँ रह रहा हूँ? हरामी कहीं के।’’ साहब का बेटा भभक उठा।
कुत्ता फिर हँसा–‘‘अपने–अपने संस्कार की बात है। मेरी देखभाल साहब और मेमसाहब दोनों करते हैं। मुझे कार में घुमाने ले जाते हैं। तुम्हारी देखभाल घर के नौकर–चाकर करते हैं। उन्हीं के साथ तुम बोलते–बतियाते हो। उनकी संगति का प्रभाव तुम्हारे ऊपर ज़रूर पड़ेगा। जैसी संगति में रहोगे, वैसे संस्कार बनेंगे।’’
साहब के बेटे का मुँह लटक गया। कुत्ता इस स्थिति को देखकर अफसर की तरह ठठाकर हँस पड़ा।

मुखौटा

नेताजी को चुनाव लड़ना था। जनता पर उनका अच्छा प्रभाव न था। इसके लिए वे मुखौटा बेचने वाले की दूकान में गए। दूकानदार ने भालू, शेर, भेडिए,साधू–संन्यासी के मुखौटे उसके चेहरे पर लगाकर देखे। कोई भी मुखौटा फिट नहीं बैठा। दूकानदार और नेताजी दोनों ही परेशान।
दूकानदार को एकाएक ख्याल आया। भीतर की अँधेरी कोठरी में एक मुखौटा बरसों से उपेक्षित पड़ा था। वह मुखौटा नेताजी के चेहरे पर एकदम फिट आ गया। उसे लगाकर वे सीधे चुनाव–क्षेत्र में चले गए।
परिणाम घोषित हुआ। नेताजी भारी बहुमत से जीत गए। उन्होंने मुखौटा उतारकर देखा। वे स्वयं भी चौंक उठे–वह इलाके के प्रसिद्ध डाकू का मुखौटा था।

Tuesday, January 1, 2008

नव वर्ष








रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
सागर में सब आँसू
बहाकर आ गया ।
सैलाब रौशनी का
जगाकर आ गया ।
किरनों के उजले रथ
पर होकर सवार ,
गागर सुधारस का
छलकाकर आ गया।
पर्वतों- घाटियों में
उछलता –कूदता ,
रूप-नदी में गोता
लगाकर आ गया ।
गुनगुनी धूप बनकर
आँगन में उतरा ;
नव वर्ष सब दूरियाँ
मिटाकर आ गया ।
…………………………
31-12-2007

Saturday, December 22, 2007

विवाह –गीत

अन्दर से लाड्डो बाहर निकलो
कँवर चौंरी चढ़ गयौ
होय लो न रुकमण सामणी ।
-मैं कैसे निकलूँ मेरे कँवर रसिया
लखिया सा बाबा मेरी सामणी ।
तेरे बाबा को अपणी दादी दिला दूँ
होय लो न रुकमण सामणी ।
-मैं कैसे निकलूँ मेरे कँवर रसिया
लखिया सा ताऊ मेरी सामणी
तेरे ताऊ को अपणी ताई दिला दूँ
होय लो न रुकमण सामणी
-मैं कैसे निकलूँ मेरे कँवर रसिया
लखिया सा भाई मेरी सामणी
तेरे भाई को अपणी बाहण दिला दूँ
होय लो न रुकमण सामणी
-मैं कैसे निकलूँ मेरे कँवर रसिया
लखिया सा बाबुल मेरी सामणी
तेरे बाबुल को अपणी अम्मा दिला दूँ
होय लो न रुकमण सामणी ।