जब लिखो मीत लिखो ।
हार मत जीत लिखो ॥
नफ़रत के द्वार पर
सिर्फ़ तुम गीत लिखो।
……………………………
गाते चलो
अँधेरों को ठोकर लगाते चलो ।
उजालों से दामन सजाते चलो ।
आँसुओं की कहानी जीवन नहीं ।
मत आहें भरो ,गीत गाते चलो ॥
……………………………………
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
19 मार्च 2009
नाकारात्मक सोच वाले आज के वातावरण में ऐसी ही सकारात्मकता की ज़रूरत है। "नफरत के द्वार पर, सिर्फ़ तुम गीत लिखो" की जगह ऐसा हो - नफ़रत के द्वार पर, सिर्फ़ प्रेम-गीत लिखो…" तो कैसा रहे।
ReplyDelete-सुभाष नीरव
प्रेम शब्द लिखने से एक मात्रा बढ़ जाएगी । यदि 'प्रेम का गीत लिखो' तो सही होगा।
ReplyDelete'हिमांशु'