पथ के साथी

Friday, January 30, 2026

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मृगतृष्णा

 सुदर्शन रत्नाकर

पाठकीय प्रतिक्रिया-डॉ. सुशीला ओझा


-बहुत सुन्दर कहानी.. आज के यथार्थ को शब्दों में बुनती भावपूर्ण... बच्चों की परवरिश, पढ़ाई के बाद आदमी किस्तों में घर बनाता है.. अगर पत्नी अच्छी मिल जाती है.. गृहस्थी के पावन धूप में जलकर घर को संवारती है, निखारती है , संस्कार, परिष्कार करती है.. अर्थाभाव में भी धीरे-धीरे सुख, शान्ति श्री समृद्धि आने लगती है.. बेटे की पढ़ाई नौकरी बेटी की शादी.. सब दायित्वों से मुक्त.सेवा निवृत्त होकर  कुछ सोचने का समय मिलता है..एक मृगतृष्णा मन में बैठ जाती है.. सुख सुविधा की ओर उन्मुख होने  की फड़फड़ाहट.. सावित्री जानती हैं .अपनी धरती का सुख, अपनी माटी की सोंधी महक, अपने मुँडेर पर आते सूरज की प्रथम किरणों का अवगाहन, बाग में सुबह चिड़ियों की चहचहाहट। अभी -अ भी तो इस कलात्मक सौन्दर्य को महसूस करने का समय मिला है.. उसे  अपनी माटी में ही  सुख की अनुभूति हो रही है.. स्त्रियाँ पुरुषों से ज्यादा सहिष्णु होती है. . बेटे के पास जाने की बात पति करता है तो सावित्री अस्वीकार करती है.. पुरुष मन भावुक होता  है  राम के वनगमन का  दु:ख  दशरथ के मृत्यु का कारण हो गया.. पति मृगतृष्णा में है.. उसे नाभि की कस्तुरी की गंध  से आत्मज्ञान नहीं मिलता है.. बेटे के यहाँ जाता है जहाँ उसकी  अपनी पहचान पीले पत्तो की तरह  झरकर मिट्टी मे मिल गई है..वहाँ किसीको बाबूजी से बात करने का समय नहीं है.. बुढ़ापा में बच्चों का साथ मन को ऊर्जस्वित करता है.. जीवंतता, जिजीविषा, सकारात्मकता के अंकुरण से मन में उल्लास का अंकुरण होता है.. वहाँ जाने पर पति ठंढ़ा खाना, अपने से परस कर खाना.. सावित्री की स्मृति मलयानिल बयार की तरह वसंत का एहसास कराती है.. सावित्री कितना स्नेह, प्रेम से खिलाती थी. हमलोग मिल-बैठकर अपना दु:ख सुख साझा करते थे.. एक सकारात्मकता, प्रवाहमयता बनी रहती है.. यहाँ का जीवन यांत्रिक जीवन है.. सहृदयता, आत्मीयता, अपनत्व, मिठास की सारी अर्गलाएँ बन्द है .बर्फ की एक चादर सा ओढ़ा स्टैच्यु सा मन.. इसी उधेड़ बुन में विचारों की ठंढी उड़ान के लिए चिड़िया फलक पर उड़ने के लिए बेताब है..फलक कितना ऊँचा है उसे ज्ञान नहीं है.. मृगतृष्णा का कोई आधार नहीं है..बालुओं में चलतो रहो पानी की खोज में पिपासा शांत नहीं होती है और एक दिन पंखविहीन होकर घोसलों से दूर जीवनलीला  के अभिनय का पटाक्षेप हो जाता है.. 

1 comment:

  1. डॉ सुशीला ओझा जीआपकी विस्तृत प्रतिक्रिया से मेरा मनोबल बड़ा है। आभार आपका । सच में आज मनुष्य भौतिक सुखों में इतना लीन हो गया है कि उसका अस्तित्व ही कहीं खोता जा रहा है
    । सच्चा सुख तो अपनी जड़ों से जुड़े रहने में है, जो मिला है, उसी में सन्तुष्टि की भावना में है।सुदर्शन रत्नाकर

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