डॉ . पूनम चौधरी
तुम बिन नैहर छूटा पापा....
सारे उत्सव फीके तुम बिन,
मन के कोष भी रीते तुम बिन
नेह के बंधन टूट गए सब
बदली हर परिभाषा
तुम बिन नैहर छूटा पापा
तुमसे हर विश्वास जुड़ा था,
जीवन का उल्लास जुड़ा था,
तुम से थी रौनक उस घर की
मायके का एहसास जुडा था।
तुम रूठे तो रूठ गया सब
रूठ गई हर आशा,
तुम बिन नैहर छूटा पापा
तुम थे तो सुख-साज बड़े थे,
आशीषों से भाग्य जड़े थे ,
आँसू, पीड़ा, हार,
व्यथा सब
ड के हमसे दूर खड़े थे,
छोड़के बंधन, मोड़ के मुख को,
तोड़ गए हर
नाता,
पापा, बहुत कठिन है जीना,
कैसे धरु दिलासा,
तुम बिन नैहर छूटा पापा
मन में साहस भरा था तुमने
सही गलत का भेद सिखाया।
कभी डाँट और कभी प्रेम से
जीवन कुंदन सा चमकाया
बिना तुम्हारे सब बदले है
बदली सबकी भाषा,
अब ना रहा अधिकार भाव ही,
ना कोई अभिलाषा।
तुम बिन नैहर छूटा पापा।
तुम बिन नैहर छूटा पापा।
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बहुत ही मार्मिक भावपूर्ण रचना है। सच में बिन पापा के पीहर अधुरा होता है। जितनी जिद एक लड़की पिता के सामने कर लेती है हक़ से पति के सामने भी नहीं कर पाती। डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
ReplyDeleteधन्यवाद वंदना जी 🙏
Deleteपिता के प्रति इतनी मार्मिक एवं भावपूर्ण रचना शायद ही पहले पढ़ी हो, मुझे स्मरण नहीं। डॉ. पूनम ने हृदय की अनुभूतियों को बहुत सहज रूप में अभिव्यक्त किया है। बहुत बहुत बधाई डॉ. पूनम.
ReplyDeleteशुक्रिया सर 🙏
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