पथ के साथी

Wednesday, March 21, 2018

809-काव्य -भूमिकाएँ


एक पाठक के तौर पर मैंने कुछ पुस्तकों की भूमिकाएँ लिखी हैं। उनके लिंक नीचे दिए गए हैं।   आशा करता हूँ कि जब भी समय मिले , ज़रूर पढ़ेंगे ताकि सृजन के समय जो कुछ अच्छा हो उसे ग्रहण किया जा सके। मेरे ये लेख  उबाऊ हो सकते हैं, फिर भी पढ़िएगा-  


Monday, March 19, 2018

808-शुभ जन्मदिवस !!


 सुनीता काम्बोज 
जन्म-दिवस ये आपका , जैसे हो त्योहार 
माँगू खुशियाँ आपकीरब से बारम्बार ।।
दिल है गंगा नीर -सापावन मन के भाव 
बन जाते  पतवार होखेते सबकी नाव ।।
उड़ने को अम्बर दियाभरी परों में जान ।
ऐसा लगता हो गया, हर रस्ता आसान ।।
आप सभी की राह सेचुनते आए शूल ।         
गुरुवर अर्पित आपकोये भावों के फूल ।।
आप सभी की राह सेचुनते आए शूल ।
सदा बुराई से लड़ेझुकना नहीं कबूल .........

हिमांशु जी के प्रति -
ज्योत्स्ना प्रदीप

पूर्ण चंद्र  सा जिसका हृदय
पवित्र नयनों  में स्नेह -संचय
हिम के जैसा शीतल -शीतल
विरल प्रीत का ले गंगाजल
सुकर्मों का रामेश्वरम-सेतु
नमित हो मन ऐसे गुरु हेतु ..................

आदरणीय  भैया जी को जन्म-दिवस के अवसर पर सब प्रकार से सुखी , स्वस्थ , यशस्वी , दीर्घायु जीवन की हार्दिक शुभकामनाएँ !!

  -सुनीता काम्बोज , ज्योत्स्ना प्रदीप एवं सभी बहनें




                             




807



कविताएँ
प्रियंका गुप्ता

कविता- 1

प्रियंका गुप्ता
शोर था वहाँ
बेइंतिहा शोर
और मेरे अंदर थी
खामोशी
किसी सुनसान रास्ते सी
या फिर अभी अभी जला के गए
एक शव की चिटकती चिता वाले
मरघट सी खामोशी
सुनसान रास्ते पर तो फिर भी
कभी कभी गुज़र सकती है
कोई गाड़ी
भन्न से दनदनाती हुई
खुद अंदर से डरी हुई
पर निडर बन  निकल पड़ने को आतुर;
पर मरघट का क्या?
वहाँ तो  अपनी मर्ज़ी से 
कोई नहीं आता न
उसी तरह
जैसे अब
मेरे भीतर
यादों ने भी आना छोड़ दिया है ।
--
 कविता- 2

फ़र्क पड़ता है...
क्या फ़र्क पड़ता है
कि मैंने
तुम्हें कितना प्यार किया;

क्या फ़र्क पड़ता है
कि तुम्हारी एक आवाज़ पर
मैं कितनी दूर से भागती आई;

क्या फ़र्क पड़ता है
कि तुम्हारी एक मुस्कुराहट पर
मैंने अपने कितने दर्द वारे;

क्या फ़र्क पड़ता है
कि तुम में रब को नहीं
मैंने खुद को देखा;

सच तो ये है 
कि अब किसी बात से
कोई फ़र्क नहीं पड़ता;
क्योंकि
तुमको तो जाना ही था
यूँ ही हाथ छुड़ाकर,
ग़लत कहा,
हाथ छोड़कर
पर सुनो,
जाने से पहले
अपने वजूद से झाड़ पोंछ देना मुझे
फिर ग़लत-
अपने वजूद से झाड़ पोंछ दूँगी तुम्हें;
क्योंकि
तुम्हें पड़े न पड़े
मुझे बहुत फ़र्क पड़ता है
तुम्हारा कुछ भी रहा मुझमें
तो खुल के साँस कैसे आएगी मुझे
आज़ादी की...।
-0-
कविता-3

सुनो,
एक बार फिर तुम्हारे पास
कुछ रख के भूल गई हूँ
यादों की कुछ कतरनें,
थोड़ी -सी धूप
और
गुच्छा भर बादल;
मिले तो बताना
सीलन से कतरनें गली तो नहीं न?
और धूप 
अब भी उसी लिफ़ाफे में रखी होगी
जिस पर तुम्हारा पता लिख आई थी मैं
बादल का गुच्छा
बड़ा आवारा- सा था,
जाने फिर से
बरस न गया हो कहीं
बड़ी भुलक्कड़ हो गई हूँ मैं भी
देखो न,
तुमसे हाथ छुड़ाकर भी
जाने कहाँ खोई हुई हूँ 
शायद एक बार फिर
तुम्हारे पास
खुद को भूल आई हूँ मैं...।
-0-
कविता-4

कल रात
एक नज़्म टूटी थी कहीं
और जा गिरी ओस पर
सबने सोचा
बारिश हुई रात भर
और भीगी हैं पत्तियाँ;
नर्म घास की चादर पर
सिलवटें थी बहुत
जैसे 
दर्द से कराहते हुए
किसी ने बदली हों करवटें
हाँ,
एक नज़्म जो टूटी थी
बिखरी थी वहीं
देखना तो,
उसे बुहार कर
कहीं फेंक न दे कोई
बस टूटी भर है वो
पर ज़िंदा है अभी...।

Saturday, March 17, 2018

806-काँच की चूड़ियाँ



डॉ० कविता भट्ट

घोर रात में भी खनखनाती रही
पीर में भी  मधुर गीत गाती रही ।

लाल-पीली-हरी काँच की चूड़ियाँ
आँसुओं से भरी काँच की चूड़ियाँ ।


उनके दाँव - पेंच में, टूटती रही
ये बिखरी नहीं, भले  रूठती  रही ।

प्यार में  थी मगन काँच की चूड़ियाँ
खुश रही हैं सदा, काँच की चूड़ियाँ ।

माना चुभी है इनकी प्यारी चमक
ये खोजती  नई रोशनी का फ़लक ।

नभ में छाएँगी काँच की चूड़ियाँ
इन्द्रधनुषी सजी काँच की चूड़ियाँ ।

कोई नाजुक इन्हें भूल कर न कहे
इनका ही रंग-रूप रगों में बहे।

सीता राधा-सी काँच की चूड़ियाँ
अनसूया-उर्मिला काँच की चूड़ियाँ ।
-0-
हे० न० ब० गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड 

Monday, March 12, 2018

805


गायत्री

[गायत्री हरियाणा साहित्य अकादमी की परिष्कार शाला की प्रबुद्ध विद्यार्थी रही है]
1- महिलाओं की स्थिति( चिन्तन)
महिलाओं की स्थिति को लेकर एक दिन तो काफ़ी हंगामा होता हैं।जहाँ देखो वहाँ औरतो का ही ज़िक्र होता हैं।बड़े बड़े लोग टी.वी.चैनलों पर आते हैं औऱ पूरा दिन काफ़ी ज़ोर ज़ोर -शोर से महिलाओं के अधिकारों और इज्जत की बात करते हैं। फिर कुछ दिनों बाद वही लोग महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार या टिप्पणी करते हुए पाएँ जाते है। वे क्यों भूल जाते है कि कल आप भरी पंचायत में महिलाओं की पैरवी कर रहे थे। उनको देखकर तो ऐसा लगता है ,जैसे वे आठ मार्च का बुखार था और अगले दिन पहले जैसा हो जाता हैं।                                         
मुझे एक बात समझ में नहीं आती कि सरकार महिलाओं के लिए इतने कानून बनाती हैं। नए -नए कार्यक्रम चलाती हैं ,फिर भी लोगों औऱ सरकार को यह क्यों दिखाई नहीं देता कि मीडिया के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया जा रहा है। मीडिया जिसे समाज का आईना कहा जाता हैं,जिसके द्वारा जन जागरण किया जाता है। आज वहीं अपने कर्तव्य से भटक चुका है। आज ऐसे-ऐसे कार्यक्रमों को दिखाया जाता हैं, जिसे देखकर हर कोई प्रभावित होता हैं । कहने का अभिप्राय यह है कि सीरियल के द्वारा ऐसी  तकनीकों को दिखाया जाता है कि वे अच्छे भले इंसान को भी अपराधी बना सकती कुछ ऐसे शो है, जो लोगो को अच्छी चेतना जगाने की बजाय उन्हें गुमराह करने व ग़ुनाह करने की नई-नई तरकीबें सुझाती हैं।जिस जे द्वारा मीडिया का ग़लत तरीके से प्रयोग किया जा रहा है।ऐसा नहीं होना चाहिए क्योंकि मीडिया समाज में नेकी का स्रोत है ना कि अपराधों का।                                    
हिंदुस्तान के अंदर या यूँ कहें कि यहाँ के लोगों के द्वारा फ़िल्म निर्माता निर्देशक औऱ गायकों को बहुत मान सम्मान दिया जाता हैं ।यहाँ के जन-जन पर फिल्मों औऱ गानों की झलक देखने को मिलती हैं; किन्तु क्या आप ने कभी सोचा है कि इन गानों की शब्दावली औरतों को क्या इज्जत देती हैं।लोग बड़े चाव से इन गानों को सुनते औऱ गुनगुनाते हैं ।क्या कभी इन शब्दों के भाव को समझा है।गानों में लड़कियों के लिए आइटम ,पटाका, पटोला जैसे शब्दों का प्रयोग बड़े अभिमान के साथ होता है।तो  आप ज़रा सोचिए कि क्या ऐसे सम्बोधन  महिलाओं की गरिमा मैं चार-चाँद लगाते हैं? ये शब्द ऐसे हैं जो स्त्री को एक वस्तु के रूप में देखते हैं।ह मे इस बात के लिए आवाज़ उठानी चाहिए।इस पर कानून बनाया जाना चाहिए ताकि भविष्य में इन शब्दों का चलन बंद हो। जो इस प्रकार के तुच्छ मानसिकता का प्रदर्शन करें ,तो उसे अपराध माना जाए।अतः महिलाओं को एक आकर्षण औऱ उपभोग की वस्तु न समझकर उसके उत्थान के लिए आगें आना चाहिए ताकि वो भी एक खुशहाल जीवन जी सके।।              
  -0-
2- बहुत याद आती है
बहुत याद आती है तेरी माँ,
जब कोई कहता है मेरी माँ , मेरी माँ
मेरा भी दिल करता है , उड़कर पल में तेरे पास चली  आऊँ मैं 
तेरे सीने से लिपट जाऊँ मैं
बहुत याद आती है तेरी माँ
जब खाना- खाने आऊँ मैं
जी करता है तेरे आँचल में छुप जाऊँ मैं
तेरी ममता के पल्लू में कहीं खो जाऊँ मैं
बहुत याद आती हैं तेरी माँ
जब कॉलेज से घर आऊँ मैं मेरी आँखें बस तुम्हे ही ढूँढे और ढूँढती ही रह जाए माँ
न पाकर के तुम्हे वहाँ मेरे कदम वही रुक जाए माँ
तेरी याद में माँ हर पल बिता जाए  तेरे बिन जिंदगी भी रूखी नज़र आये माँ
 बहुत याद आती है तेरी माँ
-0-भट्टू कलाँ , जिला -फ़तेहाबाद -125052 

Thursday, March 8, 2018

804


मेरे हिसाब से महिला दिवस हमारे मन में ,आत्मा में ,खून में बसा होना चाहिए सम्मान और प्यार के रूप  में। प्यार भी करें तो उसमें सम्मान की खुशबू भरी हो,आदर करें तो उनमें वही भाव भरा हो ,जो ईश्वर के लिए होता है,मित्र रूप में माने तो अटूट विश्वास हो। जो भी माने ,वह नारी के होंठों पर मुस्कुराहट लाए। किसी नारी के मन में दुःख या विषाद हो तो, हम उसे दूर कर सकें। कभी नारी के सम्मान पर आँच आए तो हम उसके लिए अपने प्राण दे सकें। यही मेरे लिए प्राणों की ,जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता है कि हम अवसर आने पर उसके लिए मिट जाएँ,जिसने हमें दो पल भी प्यार , सम्मान,ममता से छुआ हो।
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’


स्त्री-सत्या शर्मा

कल मेरी कविता से निकल
कहा स्त्री ने
अहा ! कितना सुखद
कितनी तृप्ति
आओ तोड़ दें बंदिशें
हो जाएं मुक्त
गायें आजादी के मधुर गीत

और नाच उठी स्त्री
उन्मुक्त बहती नदी में
धोये अपने बाल
बादलों का लगाया काजल
टांक लिया जुड़े में
चाँद सितारों को
तेजस्वी स्त्री
दमकने लगी अपने
व्यक्तित्व और सौंदर्य की
आभा से

कुछ गीत गुनगुनाए
मेरी  कानों में
आगोश में लिया और
डबडबाई आँखों से देखा मुझे
स्नेह भरे हाँथ रखे मेरे सर पे
और पुनः समा गई
पन्नों में...

ताकि रच सके एक नया इतिहास
स्त्री की निखरते -दमकते
व्यक्तित्व का....
-0-

Thursday, March 1, 2018

803


1-दोहा-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
ग़म की चादर फेंक दो  जब अपने हों साथ।
तन -मन जब डगमग करे,कसकर पकड़ो हाथ।
-0-
2-कुण्डलियाँ -ज्योत्स्ना प्रदीप 
1
बोली करुणा से भरी, पिता बड़े ही नेक ।
मिला नहीं फिर से कभी ,वो संबोधन एक।।
वो संबोधन एक ,न उनका कोई सानी।
बिन उनके बेचैन, भरा आँखों में पानी ।।
पिता बसे हैं दूर ,माँ की मौन है होली।
सुनता है दालान ,अभी तक उनकी 'बोली'।।
2
काया बनी पलाश  है ,कहाँ  सजे  हैं रंग।
बाट जोहते  नैन ये  ,नहीं पिया का संग।।
नहीं पिया का संग ,हृदय है सीला- सीला।
राधा तकती राह, वसन है जिसका पीला।।
मन पर डाले  रंग, करे वो कैसी' माया।
 संग मेरे नाचे ,माना दूर  है 'काया'।।
3
यामा लेकर आ गई ,चंदा अपने साथ
निखर गई पिय संग से ,तेजोमय है माथ।।
तेजोमय है माथ ,छटा ये बड़ी  निराली।
युगों चाँद के साथ ,उसने प्रीत है पाली।।
देख सजन  का रंग ,रात नें मन को थामा।
तभी तो चंद्र वदन ,लगाती काजल  'यामा'।।
-0-
3- जिन्दगी की तस्वीर-सुनीता शर्मा
सोच रही जिन्दगी तेरी तस्वीर बनाऊँ ,
तेरे विविध रंगों का संसार सबको दिखलाऊँ !

कभी  नटखट  बचपन का चेहरा बन जाऊँ ,
कभी अल्हड मस्ती की फुहार बन जाऊँ ,

कभी सपनो का महकता उपवन बन जाऊँ ,
कभी धुंध  में सिमटी यादें बन जाऊँ !

सोच रही जिन्दगी तेरी तस्वीर बनाऊँ ,
तेरे विविध रंगों का संसार सबको दिखलाऊँ !

कभी आकाश सा विराट स्वरूप बन जाऊँ ,
कभी हरियाली धरती की सौंधी खुशबू  बन जाऊँ ,

कभी निरंतर बहती सरिता का प्रतीक बन जाऊँ ,
कभी अपूर्णता से पूर्णता का अक्ष बन जाऊँ !

सोच रही जिन्दगी तेरी तस्वीर बनाऊँ ,
तेरे विविध रंगों का संसार सबको दिखलाऊँ !

कभी वर्तमान की चिंता बन जाऊँ ,
कभी भविष्य के सपने बन जाऊँ,

कभी कल के छूटने का दर्द बन जाऊँ,
कभी आने वाले कल की उमंग बन जाऊँ  !

सोच रही जिन्दगी तेरी तस्वीर बनाऊँ ,
तेरे विविध रंगों का संसार सबको दिखलाऊँ !

कभी अपने वजूद के मिटने की कसक बन जाऊँ ,
कभी  स्वयं  को  दोहराने की उमंग बन जाऊँ ,

कभी वृक्षों  की शीतल छाया बन जाऊँ,
कभी सुनामी जैसे अस्तित्व  की सूचक  बन जाऊँ !

सोच रही जिन्दगी तेरी तस्वीर बनाऊँ ,
तेरे विविध रंगों का संसार सबको दिखलाऊँ !
-0-
4-इस बार यूँ होली- सत्या शर्मा 'कीर्ति '


कुछ सतरंगी-सी चाहत
यूँ आज मचल रही है
जैसे इस फागुन होली
अनकही भी कह रही है
मेरी हसरतों को तुम
यूँ निखार देना
ले सूरज की धूप सुनहरी
मेरे गालों पे लगा देना
सजा देना माँग मेरी
पलाश कि सुर्ख लाली से
जो चूनर ओढ़ लूँ मैं धानी
रंग बासंती भी मिला देना।

गुलाबों की पंखुड़ियों को
गर  लगा लूँ  अपने ओठों पर
मेहँदी -सा रंग मुहब्बत का 
मेरे हाथों में सजा देना

रातों से काजल ले अपनी
आँखों में जो भर लूँ मैं
शाम सुनहरी को मेरी पलकों
पे उतार देना तुम
जब महकने लगूँ मैं
बन चम्पा और जूही -सी
जूड़े में मेरे तुम बेला की
लड़ियों को लगा देना
गेंदे के रंग पीले भर लूँ अगर
आँचल में अपने मैं
लाल - लाल महाबर से पैरों को
खिला देना
हाँ , इस बार होली को
इस तरह बना देना
छूट न पाये रंग जो प्रीत का
उस इंद्रधनुषी रंग
भिगा देना तुम
हाँ , इस बार होली में...
मुझे अपने ही रंग, रंग लेना तुम
-0-