पथ के साथी

Saturday, May 9, 2020

984


1-इन दिनों
मंजूषा मन

इन दिनों 
हवा कुछ अधिक झूम रही है
किसी महँगे परफ्यूम में भी नहीं है ऐसी महक
जिस महक से महमहा रही है हवा।

इन दिनों
आसमान के अंतिम कोने में
लटका सबसे छोटा तारा भी
चमक रहा है अपनी पूरी चमक से,
कुछ अधिक ही जगमगा रहा है
चाँद 

इन दिनों
चिड़ियों की चहचहाहट में
साफ सुनाई देने लगे हैं
इनके गीत,
पेड़ों की कोटर से निकल
रंग बिरंगे पंछी 
अठखेलियाँ करने लगे हैं 
इस डाल से उस डाल।

इन दिनों
बीच सड़क पर
ऊँघ रहे 
शहर के सभी पशु 
कुचले जाने के डर से मुक्त।

इन दिनों
धरती ले रही है साँसें
शुद्ध साफ हवा में।

इन दिनों
लहलहा रहे हैं पड़े
मिल रही है पूरी ऑक्सीजन
पत्तियों को 
प्रकाश संश्लेषण के लिए,

इन दिनों
आदमी बन्द है घरों में
नहीं देख पा रहा 
प्रकृति के निखरे रंग,

इन दिनों
सहमा हुआ है आदमी
डर रहा है आदमी से,

इन दिनों
घर में रह
आदमी कर रहा है दुआ
जीवित बचे रहने की।
-0-
2-मुकेश बेनिवाल
1
कल रफ़्तार से शिकवा था
आज ठहरने से शिकायत है
हर वक़्त जिन्दगी से गिला
हाँ तक जायज़ है…....
2

सोचा नहीं था 
कि मुलाकातें .....
इतनी महँगी हो जाएँगी
अपनी एवज़ में
जिन्दगी माँने लगेंगी।
-0-
- मुकेश बेनिवालmukeshbeniwal94415@gmail.com

-0-
3-बिखराव
सत्या शर्मा ' कीर्ति '

बिखरी पड़ी थी
पटरियों पर रोटियाँ
अनाथ -सी
पर कहीं नहीं था कोई अपने गमछे में 
छुपा कर 
सहेजने बाला
नहीं था  
दो वक्त की उसकी जुगाड़ में पूरे परिवार को छोड़ 
हाड़ तोड़ मेहनत करने बाला

नहीं था अब कोई मीलों चलकर घर पहुँचने बाला

हाँ , यह तो
बुद्ध पूर्णिमा की रात की गोद से निकलती सुबह थी

आकाश अब भी भरा था सोलह कलाओं  से युक्त
चमकते चाँद की  अद्भुत चाँदनी से

या सभी मजदूर
अनवरत चलते - चलते गहन ज्ञान की प्राप्ति कर
बोधिसत्व को प्राप्त हो गए।

पर इस अनचाही हत्या का गवाह चाँद क्यों बादलों में मुह छुपा बैठा रहा ?

क्यों नहीं नन्हा सूरज जल उठा देख भयावह मंजर ?

बुद्ध क्यों नहीं जाग गए 
बिखरी रोटियों के चीत्कार से 

आकाश का कलेजा क्यों नहीं काँप गया

रोटियों के आँसू बार - बार पूछ रहे हैं अनेकों सवाल

हाँ ,सिसक रही हैं रोटियाँ
क्योंकि वो जानती हैं इन मजदूरों की नजर में अपनी इज्ज़त
रोटियाँ जानती हैं उन्हें पाने के लिए मजदूरों के अथक मेहनत
रोटियाँ पहचानती है अपने प्रेमी को
आज सच में विधवा 
हो गयी रोटियाँ 
पर इनकी सुबकियों की गूँज दूर तक 
पीछा करती रहेगी 
मेरा , तुम्हारा
हम सभी का
--0--

Tuesday, May 5, 2020

983


1-तीन कविताएँ

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

1-लिखूँगा गीत मैं इसके 05-08-1980( आकाशवाणी गौहाटी से प्रसारण-18-8-1980)


1
लिखूँगा गीत मैं इसके
खुद तलवार बनकरके।
बगावत की हज़ारों आँधियाँ,रोकेंगी राहों को।
सीने में, ठोंककर कीलें,दबाएँ मेरी चाहों को
जब तक लहू की एक बूँद,शेष है शिराओं में
मोड़ सकता है तब तक कौन बज्र-सी भुजाओं को
काट दोगे चरण भी तो
मैं ललकार बनकरके  ।
कौन है जो माता को टुकड़ों में बाँटेगा
कौन -सा कुपूत माँ के हाथ काटेगा
गंगा-ब्रह्मपुत्र की जो पहने हुए माला
कौन इसके प्रेम की गहराई पाटेगा!
सिर को काट दोगे तो
रुधिर की धार बनकरके।
भारतभूमि का हर कण, हमें है जान से प्यारा
हरेक धर्म बहाता यहाँ पर , प्रेम की धारा
हिमालय से सागर तक,पूरब से पश्चिम तक
एक हृदय, एक आवाज़, सभी का एक है नारा
झोंक दोगे ज्वाला में
तो अंगार बनकरके।
-0-
2- पूजा करके देखी है(08-08-1980आकाशवाणी गौहाटी से प्रसारण-18-8-1980)

फूलों के सौरभ से पूजा करके देखी है
सिरों की भेंट देकरके,सत्कार होना चाहिए ।
भारत माँ की चन्दन-धूल साँसों में समा जाए
इसकी राह में अपनी हस्ती तक मिटा जाएँ ।
उठाने की करे कोशिश इस पर जो नज़र तिरछी
बिजलियों की तड़प बनकर, कहर उस पर ढा जाएँ ।
झरने की कल-कल के सारे राग बासी  हैं
लपलपाती लहरों से अब प्यार होना चाहिए ।
हिन्दू क्या, मुस्लिम क्या, हैं सब एक माला के मोती
भाव होते अनेकों तो, माला टूट गई होती
कहा कश्मीर मस्तक  से पूर्वोत्तर की बाहु ने
मन और कर्म की एकता ही प्यार है बोती ।
          विभीषण और जयचन्द तो हमेशा जन्म लेते हैं
          हमें शिवा, प्रताप बनने को तैयार होना चहिए।
-0-
3-इस अब लेखनी से
(08-08-1980(आकाशवाणी गौहाटी से प्रसारण-18-8-1980)
  
कंचन -सी कामिनी के झिलमिलाते रूप पर लाखों
लिखकर गीत रातों में तारों को सुनाए हैं,
फूलों के रस में बोरकरके , साथ भौंरों के
चाँदनी के साथ सब वन-पर्वत हँसाए हैं ।
इस अब लेखनी से सिन्धु की अग्नि जगाने दो
कोटि-कोटि कण्ठों को प्रयाण गीत गाने दो ।
गतिमय द्रुत चरणों को , शिखर तक पहुँच जाने दो
मिल फ़ौलादी बाहों को महासेतु बनाने दो
फिर देखें ये तूफ़ानी इरादे कौन मोड़ेगा !
‘भारत एक है’ के सूत्र को फिर कौन तोड़ेगा !
ऐसे हर इरादे को जलाकर राख कर देंगे,
टकराने वाली हर ताकत को ख़ाक़ कर देंगे।
-0-

5-आईना
प्रीति अग्रवाल ( कैनेडा)


कई दिनों बाद
अपने आप को आज
आईने में देखा
कुछ अधिक देर तक
कुछ अधिक ग़ौर से!

रूबरू हुई-
एक सच्ची सी सूरत
और उस पर मुस्कुराती
कुछ हल्की सीं सलवट,
बालों में झाँकती
कुछ चाँदी की लड़ियाँ,
आँखों में संवेदना
शालीनता की नर्मी,
सारे मुखमंडल पर
एक मनोरम सी शान्ति!

फिर अनायास ही
खुद पर
बहुत प्यार आया,
आज, मुझे मैं
अपनी माँ_ सी लगी!!

          -0-
          
4-वक़्त के पास वक़्त
सविता अग्रवाल 'सवि' ( कैनेडा)

वक़्त के पास वक़्त
आज वक़्त के पास वक़्त है
मुझसे बातें करने का
मुझे मुझसे मेरी पहचान कराने का
घर में अक्सर मेरे पास बैठता है
उलझी रहती हूँ जब स्वयं में
मुझे मेरे पास रखे वक़्त से
मेरा परिचय कराता है
नए-नए शौक पैदा करवाता है
अधूरे जो शौक थे मेरे
उनसे फिर मिल जाने का
प्रयास कराता है
शर्त भी वह एक साथ में रखता है
घर की चारदीवारी में रह कर ही
मुझे सब कुछ कर लेने
और आसमाँ तक घूम आने का
सपना दिखा देता है
वक़्त के पास आज वक़्त है
मुझसे मेरी पहचान कराने का |
-0-

Sunday, May 3, 2020

982-सारा आकाश भरें




रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'


छोटी-सी
अँजुरी में हम
सारा आकाश भरें ।
पोर -पोर में
सौ-सौ सूरज-
 का उजियार भरें ।
आँसू की
धरती से निकलें
मुस्कानों की कोंपल
अंगारों की
खिलें गोद में
संकल्पों के शतदल
पलक-कोर पर
उतर चाँदनी
नित सिंगार करे ।
बन्धन के
महलों में घुटता
पाखी
व्याकुल मन का
मिल जाए बस
कोई कोना
हमको निर्जन वन का
जितना हो
सुख दे दें
जग को
          जीभर प्यार करें ।
-0-
( सन्दर्भ:  रचना 25 मई 1992, प्रकाशन:तारिका मासिक-अप्रैल-93,विश्व ज्योति-अप्रैल -मई 93, देशबन्धु-22-9-94, प्रसारण:आकाशवाणी-अम्बिकापुर 31-10-1998)
-0-

Friday, May 1, 2020

981-बहुत याद आती है

(विदेश में रह रहे एक मज़दूर की मनोव्यथा का वर्णन)
 सुदर्शन रत्नाकर


जब भी मै , तपती दोपहरी में
चारकोल- सने पाँवों से
चलता हूँ या
ऊँचाइयों पर टँगी
टूटी कड़ियों को जोड़ता हूँ,
जहाँ नीचे झाँकने पर भी
रूह काँपती है।
गहरे कुओं में उतरता हूँ
ज़िंदगी का भार ढोने के लिए
ज़िंदगी से लड़ता हूँ।
तब मुझे मेरा बेटा याद आता है,
जो अपनी भोली बातों से मुझे चेताता है
अपना ध्यान रखना पापा,
आपकी कमी महसूसता हूँ मैं
बच्चे जब चलते हैं अपने पापा के साथ
पकड़कर उनका हाथ
मैं उन्हें चुपके से देखता हूँ,
वे उनके मज़बूत कंधों पर झूलते हैं
तब मुझे आपकी बहुत याद आती है।
तुम तो दूर हो पापा
बतियाता हूँ माँ के संग
कभी करता नहीं उन्हें तंग
पर पापा तुम जल्दी आना
मुझे बहुत याद आती है।

परिवार से दूर रहकर
क़ीमत जानता हूँ
परिवार का क्या महत्त्व है
मानता हूँ
जिसका बोझ अकेली पत्नी उठाती है
मेरे बिन हर कष्ट झेलती है
दंश तन्हाई का सहती है।
मेरे बूढ़े माँ-बाप को भी सम्भालती है
फिर भी खुश रहती है
माथे पर शिकन नहीं लाती है।
पर उसके मन में एक डर
समाया रहता है,
परिवार के लिए विदेश में रहते हो
अकेले ही कष्ट सहते हो
पत्र लिखती है, तो देती है हर बार ज्ञान
देखोजी, तुम रखना अपना ध्यान
तुम हो तो है दुनिया
तुम बिन सब टूट जाएँगे
ज़िंदगी के सब रंग,बदरंग हो जाएँगे।

चोट लगती है तो बूढ़ी माँ याद आती है
बचपन में ज़रा-सा गिर भी जाता था तो
माँ भागकर आँचल में छुपा लेती थी
माथे को चूमकर मुझे बहलाती थी

सच में पाकर माँ का स्पर्श
भूल जाता था पीड़ा का दंश।
अब गिरता हूँ तो स्वयं ही उठता हूँ

पत्नी का प्यार नहीं
माँ का दुलार नहीं।।

बापू जब ख़त भेजते हैं
आँसुओं से शब्द भीगते हैं
कंधे मेरे हो गए हैं शिथिल
बोझ उठा सकते नहीं
तेरे कंधों का सहारा है
चोटिल करना नहीं
इनके बिना गुज़ारा नहीं
मेरी दुआएँ तेरे साथ हैं
अब यही मेरे पास हैं।

सब की बहुत याद आती है
पिता के कंधे नहीं
बच्चों की मनुहार नहीं
अपनी धरती नहीं
अपना आसमान नहीं
जीना इतना आसान नहीं
पर मुझे जीना है उनके लिए
जिनके साथ बँधा है मेरा जीवन
दूर रहकर आशाओं के दीप जलाने हैं
उनकी मुस्कानें बनी रहें
अपने जीवन की साँसें बचानी है.
-0-

980-क्या यही है तुम्हारे श्रम का मूल्य !



डॉ. सुरंगमा यादव

हाँ कई बार देखा है मैंने तुम्हें
ऊँची-ऊँची इमारतें बनाते
कैसे चढ़ जाते हो तुम
पतली-पतली बल्लियों में
रस्सी बाँधकर इतने ऊँचे
देह को तपाकर
दीवारों पर करते हो तरी
लेकिन कभी-कभी
बिगड़ जाता है तुम्हारा संतुलन
टूटे पेड़ की तरह
 जमीन पर गिर पड़ते हो तुम

 तुम्हारी मौत का रूप बदल दिया गया
चन्द रुपयों और भारी शक्ति से
परिवार का मुँह बंद कर दिया गया
घर के नाम पर
अधूरी इमारतों में पाकर ठिकाना
बड़े खुश होते हो
पूरी होते ही वहाँ से
बाँध लेते हो बर्तन भाण्डों की गठरी
तुम अपनी ही बना इमारतों के लिए
तुच्छ और हेय हो जाते हो,

हाँ कई बार देखा है मैंने
उन हाथों को भी
जो मल -मल कर धोते हैं
साहबों के कीमती वस्त्र
जिन्हें पहनकर वे विराजते हैं
ऊँचे आसनों पर
तुम्हारे बना बिछौने पर
लेते हैं सुख की नींद;
लेकिन फिर भी तुम बने रहते
उनके लिए तुच्छ और हेय
 मैंने तो उसे भी देखा
जो पेट भरने के लिए
ईटों के चट्टे हाथों से सँभाले
सिर पर ढोती है
हाथों को ऊपर उठाने से
अधिक उन्नत हुआ उसका वक्ष
मालिक की लोलुप निगाहें
बड़ी धृष्टता से स्पर्श करती रहतीं है
मौका पाते ही वासना का गिद्ध
झपटने को तैयार
ये ऊँचे लोग रात के  अँधेरे में
स्त्री को  जाति-धर्म से परे 
मात्र देह समझते हैं
 तुम खामोश सह जाते हो
अपमान का एक और घूँ
क्या यही है तुम्हारे श्रम का मूल्य !
-0-

Thursday, April 30, 2020

979-अनुभूतियाँ


प्रीति अग्रवाल
1.
पाबन्दी गुनहगार ठहरा रही है
चलो हम ही कह दें कि फ़ुरसत नहीं है!!
2.
दे चुका है बहुत, जो दिया वही काफ़ी
ऐ परवरदिगार! कुछ न दे, बस दे माफ़ी।
3.
ज़्यादा है या कम, खुशी है या ग़म
तेरे हिस्से का जो है, तुझे मिल रहा है।
4.
प्यार के बदले, मैंने सिर्फ प्यार माँगा
'सिर्फ' नहीं पगली, तू माँग बैठी खज़ाना!
5.
हसरत बहुत थी, इक बार करके देखें
इश्क आग दरिया, हम डरे डूबने से!
6.
हम अकेले भले या दुकेले भले
आज़माइश सफ़र में, चलो आज कर लें!
7.
ऐ सुकूँ तू न जाने, कहाँ जा बसा है
पूछा करूँ सबसे, किसी को न पता है!
8.
ऐ दोस्त तू हौले से, दिल पे दस्तक़ दिया कर
जाग जाती हैं यादें, फिर सोने नहीं देतीं!
9.
राहें सिर्फ दो, पर दोराहे गज़ब हैं
कहाँ को ले जाएँ, ये किस्से अजब हैं।
10.
बातों में चली बात, ज़िक्र तेरा भी आया
हमनें नज़रें झुका लीं, कोई पढ़ न पाया!
11.
क्या हुआ जो तुमने अलग राह चुनी है
तुम्हारी खुशी, अब भी मेरी खुशी है!
12.
मजबूर ये हालात, उधर भी थे इधर भी
तुम्हें बेवफ़ा मैं, भला कैसे कह दूँ!
13.
छलनी हो रहे हैं, हम सहते सहते
तुम्हारी तरकश के तीर न थके हैं!
14.
वो बचपन का राजा, वो बचपन की रानी
बड़े मज़े की होती थी उनकी कहानी।
15.
आपबीती का छोटा-सा इतना फ़साना
'सहा भी न जाए, कहा भी न जाए'!!
-0-

Monday, April 27, 2020

978-कह दो न इक बार


कृष्णा वर्मा
  
ज़रा सोचो तो
तुम्हारी ज़िद के चलते
इस रूठा-रूठी के दौर में
जो मैं हो गई धुँआ
तो कसम ख़ुदा की
छटपटाते रह जाओगे
क्षमा के बोल कहने को
लिपटकर मेरी मृत देह से
गिड़गिड़ाओगे माफ़ी को
पर अफसोस
चाहकर भी कर न पाऊँगी
तुम्हारी इच्छा को पूरा
नाहक ढह जाएगा तुम्हारा पौरुष
हं की टूटी खाट पर
और तुम्हारे दुख का कागा
लगातार करेगा काँय-काँय
तुम्हारे मन की मुँड़ेर पर
अनुताप में जलते तुम
जुटा न पाओगे हिम्मत उसे उड़ाने की
मुठ्ठी भर मेरी राख को
सीने से लगाकर
ज़ार-ज़ार रोएगी तुम्हारी ज़िद
और मेरी असमर्थता
पोंछ न पाएगी
तुम्हारे पश्चात्ताप के आँसू
सुनो, समय रहते अना को त्याग
समझा क्यों नहीं लेते अपनी
छुई-मुई हुई ज़ुबान को कि बोल दे
खसखस -सा लघुकाय शब्द
जिसका होठों पर आना भर
मुरझाते रिश्ते को कर देते है
फिर से गुलज़ार
सुनो, कह क्यों नहीं देते इक बार
सॉरी।