पथ के साथी

Monday, April 27, 2020

978-कह दो न इक बार


कृष्णा वर्मा
  
ज़रा सोचो तो
तुम्हारी ज़िद के चलते
इस रूठा-रूठी के दौर में
जो मैं हो गई धुँआ
तो कसम ख़ुदा की
छटपटाते रह जाओगे
क्षमा के बोल कहने को
लिपटकर मेरी मृत देह से
गिड़गिड़ाओगे माफ़ी को
पर अफसोस
चाहकर भी कर न पाऊँगी
तुम्हारी इच्छा को पूरा
नाहक ढह जाएगा तुम्हारा पौरुष
हं की टूटी खाट पर
और तुम्हारे दुख का कागा
लगातार करेगा काँय-काँय
तुम्हारे मन की मुँड़ेर पर
अनुताप में जलते तुम
जुटा न पाओगे हिम्मत उसे उड़ाने की
मुठ्ठी भर मेरी राख को
सीने से लगाकर
ज़ार-ज़ार रोएगी तुम्हारी ज़िद
और मेरी असमर्थता
पोंछ न पाएगी
तुम्हारे पश्चात्ताप के आँसू
सुनो, समय रहते अना को त्याग
समझा क्यों नहीं लेते अपनी
छुई-मुई हुई ज़ुबान को कि बोल दे
खसखस -सा लघुकाय शब्द
जिसका होठों पर आना भर
मुरझाते रिश्ते को कर देते है
फिर से गुलज़ार
सुनो, कह क्यों नहीं देते इक बार
सॉरी।


9 comments:

  1. सुंदर प्रवाह पूर्ण कविता। बधाई।

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  2. अच्छी कविता - बधाई,वाकई सॉरी कहना दुनिया का सबसे कठिन कार्य है ।

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  3. अहं ही तो होता है जो सॉरी नहीं कहने देता। बहुत सुंदर कविता कृष्णा वर्मा जी।बधाई ।

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  4. बहुत ही सुंदर कविता, आपको बधाई कृष्णा जी!

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  5. सचमुच छोटा-सा शब्द साॅरी विनम्रता का परिचायक भी है ।लेकिन
    अहं के कारण बोलना कठिन लगता है । कृष्णा जी हार्दिक बधाई सुन्दर सृजन के लिए।

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  6. सुंदर कविता
    कृष्णा जी हार्दिक शुभकामनाएँ

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  7. सुन्दर कविता है कृष्णा जी हार्दिक बधाई |

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  8. बहुत सुंदर कविता,पुरुष के विराट अहम/दम्भ को चित्रित करती प्रभावी कविता।बधाई

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  9. बहुत बढ़िया

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