रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
मरती है स्त्री
सुबह -शाम
घुट-घुटकर
अटकती हैं साँसें
पसलियों में
दर्द बन जाता शिलालेख
सूखे अधरों का
किससे कहें, कैसे कहें
मर्यादा के ताले
जड़े हैं प्रत्येक शब्द
पर
'किस पथ जाऊँ?'
जकड़ी हैं बेड़ियाँ
हर निर्णय पर।
घर लौटना लगता है -
किसी जंगली जानवर की
गुफा में उतरना
गुर्राहट से कानों का सुन्न होना
जलती नफ़रत- भरी आँखों
का
रोम -रोम में गड़ना
मुँह से निकलते झाग
और बदबू का झोंका
नथुनों को चीरता -सा।
दफ़्तर की हाड़तोड़ थकान
निकम्मे लोगों का साथ
अधमरा कर देता है
फ़ाइलों में जूझते शरीर को,
बॉस की लपलपाती जीभ
कैक्टस के काँटों -सी आँखें
और लार से भीगे भद्दे होंठ
जिनके बीच घिरी वह
पल -प्रतिपल मरती है।
वह जाए, तो कहाँ जाए
घर और बाहर के रौरव नरक
उसे कई-बार मारते हैं,
वह फिर-फिर जिन्दा हो उठती है
साँस लेने के लिए।
उसकी रातें
अतीत के सपनों को उधेड़ते
भीग जाती हैं
घर में होते हुए भी
वह भयभीत हिरनी -सी
कभी बचपन की स्मृतियों
कभी युवावस्था के
उड़ते आँचल को
अनुराग-भरे मन से
केवल कल्पनाओं में जीती है
कभी इस गुंजलक से निकलकर
रात भर छटपटाती है,
वह जीवित है, पर जी नहीं पाती है
वह निष्प्राण-सी है,
पर अपनी मर्यादाओं के कारण
मर भी नहीं पाती है
-0-

सुंदर सृजन
ReplyDeleteअप्रतिम रचना, बधाई आदरणीय। पुरुषोत्तम श्रीवास्तव 'पुरु'
ReplyDeleteअति मार्मिक। हार्दिक साधुवाद।
ReplyDeleteवाह बहुत बढ़िया, स्त्री जीवन की सभी समस्याओं को लिख दिया एक ही कविता में। बधाई आदरणीय
ReplyDeleteडॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
अति मार्मिक, हार्दिक साधुवाद। डॉ कविता भट्ट शैलपुत्री
ReplyDeleteउफ....अति सुंदर! मार्मिक सत्य का सटीक वर्णन .- रीता प्रसाद
ReplyDelete"दर्द बन जाता शिलालेख / सूखे अधरों का..." -
ReplyDeleteबहुत सुंदर, मर्मस्पर्शी रचना!
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ!💐
कई स्त्रियों का सच है यह पुरुष होकर एक स्त्री का दर्द बयां करना आसान तो नहीं रहा होगा आपके लिए भाई साहब बहुत-बहुत बधाई एक सुंदर मार्मिक कविता के लिए। नमिता सिंह
ReplyDeleteअति मार्मिक 🙏बहुत सुन्दर रचना 💐
ReplyDeleteस्त्री के जीवन की चुनौतियों का बहुत अच्छे से पिरोया है.... बेहतरीन कविता है.।
ReplyDeleteसुन्दर रचना।
ReplyDeleteसमाज की बहुसंख्य स्त्रियों के जीवन की गहन पीड़ा ,अपमान ,अन्याय और शोषण का मार्मिक तथा यथार्थ चित्रण करने वाली कविता ।
ReplyDeleteप्रो. स्मृति शुक्ल
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
स्त्री की दिनचर्या और संबंधों का अत्यंत मार्मिक चित्रण।हार्दिक बधाई एक मर्मस्पर्शी कविता के लिए हार्दिक बधाई।
ReplyDeleteविभा रश्मि
यह बेहद सुंदर सच्ची कविता है। महसूस होती हुई।
ReplyDelete'वह जीवित है, पर जी नहीं पाती है/वह निष्प्राण-सी है,/पर अपनी मर्यादाओं के कारण
ReplyDeleteमर भी नहीं पाती है'.. स्त्री जीवन की विडंबना को चित्रित बहुत प्रभावी कविता। बहुत बहुत बधाई 🌷🌷
अज्ञात साथियों सहित सभी का अतिशय आभार ! मेरा उत्साह बढ़ाया आप सबने।
ReplyDeleteबहुत सुंदर, मार्मिक एवं स्त्री जीवन की विडम्बना को दर्शाती कविता।
ReplyDeleteसत्य एवं हृदयस्पर्शी....
ReplyDeleteहृदयस्पर्शी रचना।
ReplyDeleteबहुत बहुत बधाई आपको।
वाह!
ReplyDeleteस्त्री मन की छवि को आईने की तरह हूबहू प्रतिबिम्बित करती अति विशिष्ट कविता...👏🏻👏🏻🙏🏻
बहुत सच्ची मर्मस्पर्शी रचना
ReplyDeleteसच्चाई को बयां करती अत्यंत हृदयस्पर्शी रचना 🙏
ReplyDelete