पथ के साथी

Monday, June 26, 2023

1335

 

डॉ. सुरंगमा यादव

(  एरिक जेम्स टकर कैप्टन एरिक जेम्स टकर ,  (21 अक्टूबर 1927 - 2 अगस्त 1957) भारतीय सेना के एक अधिकारी थे, जिन्हें मरणोपरांत नागालैंड में वीरतापूर्ण कार्य के लिए सर्वोच्च वीरता पुरस्कार, अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था।)



1

दिन न् सत्ताईस का, अक्टूबर था मास।

 ‘जेम्स टकर’ के जन्म से, घर में हुआ उजास।।

2

वीर ‘टकर’ के शौर्य का, चमक रहा दिनमान।

सत्तावन में हो गया,  भले देह अवसान।।

3

 ‘वीरा’ के वे पुत्र थे, ‘एरिक’ उनका नाम।

 साँसें अपनी कर गए, भारत माँ के नाम।।

4

वीर शिरोमणि थे टकर, शत्रु ना पाया पार।

 दुश्मन को ललकार कर, विफल किया हर वार।।

5

आजादी के बाद का, पहला था विद्रोह।

 नागा दल से भिड़ ग, छोड़ ‘टकर’ सब मोह।।

6

 नागा विद्रोही बड़े, गुरिल्ला हैवान।।

 उनके सर्वविनाश का, जेम्स लिया मन ठान।।

7

दुश्मन की घुसपैठ थी, नागा हिल्स के पास।

एरिक ने कौशल किया, हुआ विद्रोह हताश।।

8

दुश्मन को ललकारते, ठहरे ना एक ठाँव।

 देह हताहत थी मगर, बढ़ते जाते पाँव।।

9

 प्राणों की चिंता नहीं, पथ बीहड़ अंजान ।

 शीश हथेली पर रखा, मातृभूमि का मान।।

10

 भूखे प्यासे लड़ रहे, सरहद पर जो वीर।

 उनके कारण ही सजे, दीपक और अबीर।।

11

 वीरों के वीरत्व से, भारत माँ का मान।

  वक्त पड़े चूके नहीं, अर्पण कर दें प्राण।।

12

दृढ़ता और संकल्प से, किया सफल नेतृत्व।

 अचरज में जग देख कर, मूर्तिमान वीरत्व।।

13

चेहरे पर आभा नई, रक्त रगों में वीर।

 दुर्गम पथ, जंगल घने, हुआ न विचलित वीर।।

14

 पदक वीरता का मिला, शौर्य प्रतीक ‘अशोक’।

 अंबर पर गाथा लिखे, उनका यश आलोक।।

15

भूल गया इतिहास जो, वीरों का बलिदान।

 व्याकुल चैन न पाएँगे, भारत माँ के प्राण।।

16

सैनिक ही वह था नहीं, था माँ का भी लाल।।

 उसका भी परिवार है, इसका रहे ख्याल।।

-0-

1334-संघर्ष

पूजा शर्मा

गिरना - उठना, उठकर चलना, ये जीवन की रीत है।
संघर्षों में गाया जाए, वो ही सच्चा गीत है।।

 


संघर्ष की दास्ताँ चंद पंक्तियों मे सुनाई जा सकती नहीं।
जिसने इसे अपनाया,पराजित न हुआ किसी हाल में कहीं।।
प्रत्येक सफलता के हृदय में गूँजा, ये तो वही संगीत है।
संघर्षों में गाया जाए, वो ही सच्चा गीत है।।

 

रोज़ अँधियारी रात को, चीर सवेरा आता है।
हार-जीत का आपस में, जन्मों-जन्मों का नाता है।।
घोर तिमिर के बाद ही तो, नए उजाले की भीत है।
संघर्षों में गाया जाए, वो ही सच्चा गीत है।।

 

क्या हुआ! जो तुम आज थके हो, कोई सहारा पास नहीं।
जीवन में खुशियाँ तो क्या, जीने की भी आस नहीं।।
अथक परिश्रम किया जिसने, विधाता भी उसका मीत है।

संघर्षों में गाया जाए, वो ही सच्चा गीत है।।

 

असफलता कहीं बार तुझे, राह में आ डराएगी।
तू मत घबराना कभी, राह स्वयं ही बन जाएगी।।
निडर हो आगे बढ़ते रहना, डर के आगे जीत है।
संघर्षों में गाया जाए, वो ही सच्चा गीत है।।

-0-
पूजा शर्मा ---  कैथल(हरियाणा)
poojamukesh82@gmail.com

Thursday, June 22, 2023

1332-प्रकृति के विविध रंगों में डूबी हृदयस्पर्शी कविताएँ : 'अनुगूँज'

 

डॉक्टर उपमा शर्मा


समय के साथ, साहित्य में परिवर्तन अवश्यंभावी है। मनुष्य के रुझान समय- समय पर बदलते हैं। साहित्यिक रुझान बदलना भी कोई आश्चर्य का कारण नहीं। छंदों के माधुर्य और सम्मोहन से निकल हिंदी में नई कविता का अवतरण हुआ। किसी भी भाषा में नई विधा का आविर्भाव अर्थात् किसी विधा में नए रूपों का उद्भव एक शुभ संकेत है। यह उस भाषा के निरंतर सृजनशील सामर्थ्य का परिचायक है। हिंदी कविता भी इसका अपवाद नहीं। यह सत्य है कि अनुशासन में रहकर प्रायः उत्तम कार्य संभव है; परंतु उतना ही बड़ा सच यह भी है कि कठोर अनुशासन की मर्यादा- सीमा को लांघकर ही कुछ नया कुछ आश्चर्यजनक रचा जा सके।

नई कविता के साहित्य- जगत् में आगमन से ऐसा ही हुआ। पाठकों को इस नई अतुकांत कविता का तीखा- कसैला स्वाद रुचिकर लगा। एक के बाद एक अनेक रचनाकारों की रचनाओं ने पाठक वर्ग को अपनी और खींचा। अनुपमा त्रिपाठी की कविताओं में पाठकों को गीत का माधुर्य और अतुकांत का तीखापन दोनों ही बखूबी मिलते हैं। उनकी प्रत्येक कविता अनुभव की तपती भट्टी से गुजरी हुई प्रतीत होती है। कवयित्री को प्रकृति से बेहद प्रेम है। उन्होंने अपनी कविताओं में बारिश,बादल ,सागर और पर्यावरण पर खुलकर कलम चलाई है। वे मानव के विभिन्न आडम्बरों पर भी कटाक्ष करती हैं। 

कभी पूजा

कभी इबादत कभी आराधन

जब भी मिलती है मुझे

भेस नया रखती क्यूँ है

ए बंदगी तू मुझे

नित नये रूप में मिलती क्यों है।

 

यूँ तो इस संग्रह की सभी कविताएँ दिल को छूती हैं। कवयित्री की कलम ने जिंदगी के कोमल और तीखे दोनों एहसासों को बड़ी कुशलता से पृष्ठों पर उकेरा है। कविता का बुनियादी उसूल है कि आपबीती को जगबीती और जगबीती को आपबीती बनाकर किसी भाव को पन्नों पर उतारा जाता है। लेकिन अनुपमा त्रिपाठी ने जगबीती को बहुत कुशलता से शब्दों में ढाला है। जीवन के हर रंग उनकी कविता में द्रष्टव्य होते हैं। उनकी रचनाएँ सीधी सरल भाषा में हैं जो सीधे मन को छूती हैं

 

उठती हुई पीड़ा हो

या हो 

गिरता हुआ

मुझ पर अनवरत बरसता हुआ

सुकूँ

 

उनकी कविता 'चमेली के क्षुप को' पाठक के मन को सीधे छूती है-

कुछ प्रयत्न ऐसे भी होते हैं

समूचे जीवन को जो गढ़ते हैं

कुछ आशाएँ ऐसी भी होती हैं

नित सूर्य संग उठती हैं।

 

 कवयित्री की कविता की भाषा सहज परिमार्जित है। अतुकांत कविता की विशेषता यही होती है कि इसमें सिर्फ भावनाओं को महत्त्व दिया जाता है। इस कविता में कोई नियम की पाबंदी नहीं होती; लेकिन लिखने का तरीका महत्व रखता है। अतुकांत कविता छंदमुक्त कविता के अंतर्गत आती है। अतुकांत कविता हमेशा सरल शब्दों में लिखी जाती है, जिसमें रचनाकार सीधी सरल भाषा में अपने भाव रखता है। इस कविता को पढ़ते-पढ़ते पाठक जब अंत में आते हैं, तो अंत का हिस्सा पढ़कर उन्हें इस कविता के पूर्ण होने का अहसास हो जाता है। यही अतुकांत कविता की बहुत बड़ी विशेषता होती है। अनुपमा की कविताओं में यह विशेषता स्पष्ट द्रष्टव्य है। अंत तक आते आते पाठक पूरी तरह कविता के भाव में खो जाता है। यथा

सुबह से शाम होती हुई जिंदगी को

लिख भी डालो लेकिन

रात तलक सूर्योदय न हो हृदय का

रात की सियाही को

उजाले से जोड़ोगे कैसे… . . ?

 हाइकु  एक ऐसी कविता है जिसमें अर्थ ,गंभीरता एवं भावों का सम्प्रेषण इतना गहन एवं तीव्र होता है कि वह पाठक के सीधे दिल में उतर जाता है। तीन पंक्तियों की पाँच सात पाँच के वर्णक्रम में लिखी जाने वाली इस कविता में भावों की उच्चतम सम्प्रेषण क्षमता एवं अति स्पष्ट बिम्बात्मकता स्थापित होती है। 

हाइकु केवल तीन पंक्तियों और कुछ अक्षरों की कविता नहीं है; बल्कि कम से कम शब्दों में लालित्य के साथ लाक्षणिक पद्धति में विशिष्ट बात करने की एक प्रभावपूर्ण कविता है।’

जिस हाइकु में प्रतीक खुले एवं बिम्ब स्पष्ट हों वह हाइकु सर्वश्रेष्ठ की श्रेणी में रखा जाता है। हाइकु अपने आकर में भले ही छोटा हो किन्तु घाव करे गंभीर चरितार्थ करता है। यह अनुभूति का वह परम क्षण है जिसमें अभिव्यक्ति ह्रदय को स्पर्श कर जाती है।कवयित्री के हाइकु इस कसौटी पर खरे उतरते हैं-

खिली लालिमा//देती अब संदेश/मिटी कालिमा

पर्यावरण को/दूषित नहीं करो/सचेतो जन

कुसुम खिले/पंखुड़ियाँ बोलतीं/खिलता मन

महके मन/भीगी सी है पवन /गुनगुनाऊँ

प्रेम जगाए /अनछुई भावना/सुनो तो सही

ये जिजीविषा/साथ नहीं छोड़ती/जियो तो सही

चाहे मनवा/आस घनेरी जैसी/शीतल छाँव

तपन बढ़े/कैसे दुखवा सहूँ/जियरा जले

सुनो न तुम/मेरी मन बतियाँ/नैना बरसे

ढलक जायें/आँसू रुक न पायें /छलके पीर

कविता का पूर्ण माधुर्य समेटे इन हाइकु में अनेक संकेत और बिम्ब छुपे हैं जो कवयित्री की प्रांजल काव्य-भाषा में मार्मिक ढंग से ध्वनित और अभिव्यक्त हुए हैं। पुस्तक में संग्रहित सारे ही हाइकु में , उसकी काव्यात्मक, मार्मिकता के साथ महत्ता उजागर हुई है । प्रथम हाइकु प्रकृति-बोधक है। यह सूरज, रोशनी और अँधेरी रात के अंतर्संबंध और प्रकृति-सौंदर्य का सुन्दर चित्र है । कवयित्री ने फूलों के खिलने पर मन प्रसन्नता को सुंदरता से बिम्बित किया है। प्रकृति मानव मन को आह्लादित करती है । कवयित्री इसे यूँ कहती हैं कि सुगंधित पवन से महका मन गुनगुना रहा  है । इन हाइकु से सिर्फ प्रकृति चित्रण के नहीं अपितु इससे अधिक के संकेत ध्वनित होते हैं - गहरे मानवीय संबंध जन्य दुःख-सुखानुभूति भी बिम्बित होती है। वियोगाकुल डबडबाई आँखों विरह वेदना दीख पड़ती है। इन हाइकु के तीनों पद अलग-अलग होकर भी एकार्थ केंद्रित हैंसाथ ही, प्रथम और तृतीय पद ईकारांत होने के कारण अतिरिक्त भाषागत लय का सुख भी देते हैं। इसी प्रकार अन्य उद्धृत हाइकु भी कवयित्री की क्षण की अनुभूति में गहरे और व्यापक सत्य के दर्शन कराते हैं। कवयित्री पर्यावरण सहेजने पर भी भरपूर ध्यान दिलाती हैं।उनके ये हाइकु निर्विवाद रूप से उत्तम हाइकु कविता की कोटि में आते हैं। स्थानाभाव के कारण सबका विश्लेषण यहाँ सम्भव नहीं है, फिर भी उद्धृत छठे हाइकु से ध्यान नहीं हटता जिसमें कवयित्री जिजीविषा का सुंदर बिम्ब खींचती हैं।

 


अनुपमा त्रिपाठी के संग्रह 'अनुगूँज' की कविताओं में अभिव्यक्ति के मुखर स्वर हैं।इन कविताओं में समय का एक तीखा बोध भी है। कविताओं में निहित प्रश्नों की आकुलता, संवाद, आश्चर्य और विस्मय की खूबियां उन्हें बार बार पढ़ने और सोचने पर मजबूर करती हैं।

अनुगूँ ( काव्य-संग्रह): अनुपमा त्रिपाठी,  मूल्य:250, पृष्ठ संख्या:127,प्रकाशन संस्थान 4268बी-3, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110011 - 23253234/43549101/43704384

-0-डॉक्टर उपमा शर्मा,बी-1/248, यमुना विहार, दिल्ली110053


 

Tuesday, June 20, 2023

1331

 1-सुनो बादलो !

सुरभि डागर 

     

सुनो बादल! कहाँ हो तुम

सूरज‌ के तेज से 

व्याकुल हूँ

उभरने लगीं हैं 

दरारें हृदय में,

क्षीण होती जा रही है 

हरियाली, पीले पड़ रहे हैं

वृक्षों के पात, आषाढ़ की 

गर्म दोपहरी में पाखी भी

तिलमिला उठते हैं।

उम्मीद से आसमान की ओर

देखता है किसान और 

हताश हो जाता था ।

आम की बगिया में

कोयल, मोर, पपीहा का राग भी

फीका हो चला ।

तेज़ लू में राहगीर भी 

झुलस उठता है

सुनो‌ बादलो! .....

बरस जाओ झमाझम,

जो‌ शान्त हो मेरा चित

निकल‌ आएँ नई कोपलें

हृदय में उग आएँ नई हरी-हरी

नरम मुलायम घास,

नाच उठे मोर ,पपीहा सब

खिल उठे मुख किसान, राहगीरों का ।

निकल‌ आएँ बच्चे घरों से

कागज की नाव लेकर ,

छ्लें उठें बूँदों की भाँति,

खिल उठे चारों ओर हरियाली 

अब बरस भी जाओ बादलो!

-0-

2-मरुस्थल सरीखी आँखों में

 अनीता सैनी 'दीप्ति'

 

उसने कहा-

मरुस्थल सरीखी आँखों में

मृगमरीचिका-सा भ्रमजाल होता है,

क्योंकि बहुत पहले

मरुस्थल, मरुस्थल नहीं थे,

वहाँ भी पानी के दरिया,

जंगल हुआ करते थे

गिलहरियाँ ही नहीं उसमें

गौरैया के भी नीड़ हुआ करते थे

हवा के रुख़ ने

मरुस्थल बना दिया

 

अब

कुछ पल टहलने आए बादल

कुलाँचें भरते हैं

अबोध छौने की तरह

पढ़ते हैं मरुस्थल को

बादलों को पढ़ना आता है

जैसे विरहिणी पढ़ती है

उम्रभर एक ही प्रेम-पत्र बार-बार

 

वैसे ही

पढ़ा जाता है मरुस्थल को

मरुस्थल होना

नदी होने जितना सरल नहीं होता

सहज नहीं होता इंतज़ार में आँखें टाँना

इच्छाओं के

एक-एक पत्ते को झरते देखना;

बंजरपन किसी को नहीं सुहाता

मरुस्थल को भी नहीं

वहाँ दरारें होती हैं

एक नदी के विलुप्त होने की।

-0-

Saturday, June 17, 2023

1330-अपने नज़दीक

रश्मि विभा त्रिपाठी

 


खुद को मन ही मन

मैं

तुम्हारी सुहागन मान चुकी हूँ

तुम मेरे जीवनसाथी हो

मुझको ये सपना

गढ़ने मत देना

देखना

मुझे

सूनी माँग

सूने हाथ लिये

पहले से

विधवा के लिबास में ही

मेरे हाथों में

अपने नाम की मेहँदी का रंग

चढ़ने मत देना

तुम्हारी अपनी एक अलग ज़िन्दगी है

तुम अपनी जिन्दगी में

कोई खलल

मेरी वजह से

कभी पड़ने मत देना

फाड़ देना वो सारे के सारे पन्ने

जिन पर

तुम्हारे नाम

मैंने

जो कुछ लिखा है

तुम्हारे नाम का कशीदा

मुझको तुम

औरों के सामने पढ़ने मत देना

होठों पर ताले

पाँव में छाले

लिये

मैं चुपचाप चलूँगी

अकेली ही अपनी राह पर

तुम अपना हाथ

मुझको पकड़ने मत देना

मैं

तुम्हारी सोच में

तुम्हारे जितने पास

और खुद से जितनी दूर चली आई हूँ

बस!!!

यहीं तक रखना मुझे

मुझे हद से आगे

अपने नजदीक अब बढ़ने मत देना

मगर सुनो-

एक तुमसे ही

आबाद है मेरे खयाल की दुनिया

तुमसे से ये आरजू है

कि मेरे खयाल की बसी- बसाई दुनिया

उजड़ने मत देना।

-0-