पथ के साथी

Wednesday, April 18, 2018

816


1-सूनी घाटियों में
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

मैं सूनी घाटियों में
प्यास से व्याकुल
हिरना -सा फिरा हूँ।
वनखण्ड की आग में
चारों तरफ से
मैं घिरा हूँ।
कहाँ तुम ! मुझको बचा लो!
अपने सीने से लगा लो
मैं तुम्हारी बाँसुरी का गीत हूँ।
स्वप्न तक में खोजते ही
रात बीती
चूमते ही रह गए
प्यासे अधर माथा तुम्हारा।
प्यासे नयन
हर पल तुम्हीं को ढूँढते
चूम पलकें
प्यास ने पाया किनारा।
नींद से मुझको जगा लो
प्रलम्ब बाहों में समा लो
मैं तुम्हारा बीज मंत्र हूँ, गीत हूँ।
व्यथाएँ  हैं तुम्हारी नभ जैसी
तुमसे मिलूँगा,
ताप सारे मैं हरूँगा
वक्त कम है ,
भागते व्याकुल समय का
अनुबन्ध अगले
जनम का भी करूँगा
जो बचा पल,वह तेरे लिए
जो रचा है गीतवह तेरे  लिए।
स्वप्निल पलकों पर सजा लो
हृदय में मुझको छुपा लो
मैं तुम्हारे हर जनम का मीत हूँ।
-0-(16 अप्रैल 18)
-0-

2-एक खत खुद के नाम  
सत्या शर्मा 'कीर्ति '
चित्र: सत्या शर्मा 'कीर्ति'

जाने कितना ही गुजर गया
वक्त कि मैंने तो तुम्हें देखा ही नहीं
कहाँ खो गई तुम

कहाँ गई तुम्हारी वो
निश्छल मुस्कुराहटें
वो चंचल और अल्हड़पन
भरी आहटें
हर बात को समझने की
वो मासूम- सी ललक
हर मुश्किल दूर कर देने
की तुम्हारी वो पहल

दिखता नही वो रूप
अब तुम्हारा कहीं भी
गुम -सी हो गई हो
शायद खुद में ही

क्यों दबाने लगी हो 
चाहतों को अपनी
क्यों करने लगी हो
नजरअंदाज ख्वाइशों को अपनी

क्यों अब बारिशों में
निकलने से डरती हो
क्यों अब शब्दों की भीड़ से
बचकर तुम चलती हो
क्यों करने लगी हो
हर काम सोच -सोचकर
क्यों इच्छाओं को मार
तुम अर्थहीन जीने लगी हो
क्यों नही इतराती हो
खुशियों पर अपनी
क्यों नही हर्षाती हो
उपलब्धियों पर अपनी
क्यों लगी हो डरने
हर छोटी- सी बात पर तुम
क्यों  लगी ही घबराने
हर नई मुलाक़ात पर तुम
चलो फिर से जी लो ना
खुद के लिए भी
फिर से मुस्कुरालो न
अपने लिए भी
कभी पीठ थपथपालो
अपनी अच्छाइयों पर भी
कभी देदो शाबाशी
अपने मन के सच्चाइयों पर भी
चलो फिर मिलते हैं
अपना भी ख्याल रखना
आँखों में सपने और
दिल में खुशियाँ संभाल रखना ।।।
सिर्फ तुम्हारी
वजूद!

 -0-

Wednesday, April 11, 2018

815


1-डॅा.ज्योत्स्ना शर्मा
1
तुमसे उजियारा है
गीत मधुर होगा
जब मुखड़ा प्यारा है।
2
चन्दन है, पानी है
शीतल, पावन -सी
 तस्वीर बनानी है।
3
कुछ नेह भरा रख दो
मन के मन्दिर में
तुम धूप जरा रख दो ।
-0-
मचल रही घनघोर घटा सी नेह सुधा बरसाने को ।
पिहुँ प्यासे चातक बन आना मन मेरा बहलाने को।

हुआ बावरा मन बंजारा दहक रहा मन बंजर है ।
मन आहत चाहत में तेरी व्याकुलता का मंज़र है
पल दो पल को ही आजाते यूँ ही तुम भरमाने को
पिहुँ प्यासे चातक बन आना मन मेरा बहलाने को।

प्रणय-ग्रन्थ नयनो में मेरे खुद नयनों में पढ़ लेना
लेकर अलिंगन मे मुझको खुद को मुझ में गढ़ लेना ।
प्रीति-महक पुरवाई लाई जग सारा महकाने को।
पिहुँ प्यासे चातक बन आना मन मेरा बहलाने को। 

मैंने सार लिया है साजन खंजन से नैनों अंजन।
आकर देखो खुद में सिमटी अनहद प्रियतम की "गुंजन"
ये जीवन अनबूझ पहेली आजाओ सुलझाने को ।
पिहुँ प्यासे चातक बन आना मन मेरा बहलाने को।
अनहद गुंजन 

Friday, April 6, 2018

814-मिट जाएँगी दूरियाँ


रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
1
मिट जाएँगी  दूरियाँ, होगा दुख का नाश।
आलिंगन में बाँधकर,कस लेना भुजपाश।
2
तुम प्राणों की प्यास हो,नम आँखों का नूर।
पल भर कर पाता नहीं,तुमको मन से दूर।
3
जब ,जहाँ और जिस घड़ी,तुम होते बेचैन।
दूर यहाँ परदेस में, भर- भर आते नैन।।
4
खुशी देख पाते नहीं,इस दुनिया के लोग ।
जलने का इनको लगा,युगों -युगों से रोग।।
5
हम तुम कुछ जाने नहीं,कितनी गहरी धार।
गहन प्यार की नाव पर,चले सिन्धु के पार।
6
तेरे दुख में जागते,कटती जाती रात।

तपता माथा चूमते,हुआ अचानक प्रात।।
7
कुछ मैंने माँगा नहीं,बस दो  बूँदें प्यार।
बदले में दे दो मुझे, अपने दुख का भार।।
8
अपनों के आगे बही ,मन की सारी पीर।
हँसी खो गई भीड़ में,मन पर खिंची लकीर
9
झेलूँ सारी चोट मैं ,ना पहुँचाऊँ ठेस।
कितने भी संघर्ष हों, दूँ  नहीं तुम्हें क्लेश।
10
युगों- युगों तक भी रहे, अपना यह सम्बन्ध।
करें टूटकर प्यार हम, बस इतना अनुबन्ध।।

Sunday, April 1, 2018

813


मौन (दुमदार दोहे)
परमजीत कौर'रीत'
1
नयन नीर नि:शब्द  तो ,मन-वाणी भी मौन ।
दोनों निश्छल जानते, भीतर कैसा कौन ।।
वृथा संशय कब करते ।।
2
सब कुछ सहता मौन हो, माना धरती-अक्ष ।
लेकिन इक भूडोल से,कह देता निज पक्ष ।।
सहन की होती सीमा ।।
3
सबने निज अनुसार ही ,उसके ढूँढे अर्थ ।
वो निश्छल का मौन था,कहता क्या असमर्थ ।।
पाप न मन में  था कभी।।
4
सबको मिलता है वही,  भाल लिखा जो अंक ।
यश-अपयश प्रारब्ध हैं, दोषी कहाँ मयंक ।।
भाग्य ,जो हमने पाया ।।
-0-
श्री गंगानगर(राजस्थान)

Tuesday, March 27, 2018

812-जागे सारी रात


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1
‘ पूछेंगे’ हमसे कहा, ‘मन के कई सवाल।’
पूछा फिर भी कुछ नहीं, मन में यही मलाल।।
2
 द्वार -द्वार हम तो गए, बुझे दुखों की आग।
हाथ जले तन भी जला, लगे हमीं पर दाग।।
3
दर्द लिये जागे रहे हम तो सारी रात।
उनकी चुप्पी ही रही ,कही न कोई बात।
4
करना है तो कीजिए,लाख बार धिक्कार।
इतना अपने हाथ में ,आएँगे हम द्वार।।
5
दुख अपने दे दो हमें, माँगी इतनी भीख।
द्वार भोर तक बन्द थे,हम क्या देते सीख।।
6
 हमको करना माफ सब, हम तो सिर्फ फ़क़ीर।
कुछ न किसी को दे सके.ऐसी है तक़दीर।।
7
जाने कैसे खुभ गई,दिल में तिरछी फाँस।
प्राण जीभ पर आ गए,लगी है रुकने साँस।।

8
जब जागोगे भोर में ,खोलोगे तुम द्वार।
देहरी तक भीगी मिले, सिसकी, आँसू धार।।
9
 सबके अपने काफिले,सबका अपना शोर।
निपट अकेले हम चले,अस्ताचल की ओर।
10
 इतना दंड देना नहीं,मुझको अरे हुज़ूर।
छोड़ जगत को चल पडूँ ,होकर मैं मजबूर।।
11
बहुत हुए अपराध हैं,बहुत किए हैं पाप।
मुझको करना माफ तुम,मैं केवल अभिशाप।।


12
आया था मैं द्वार पर,हर लूँ तेरी पीर।
आएगा अब ना कभी,द्वारे मूर्ख फ़क़ीर।
13
 क्रोध लेश भर भी नहीं , ना मन में सन्ताप।
उसको कुछ कब चाहिए,जिसके केवल आप।
14
 झोली भर -भरके मिला,मुझको जग में प्यार।
सबसे ऊपर तुम मिले,इस जग का उपहार।
15
 बस इतनी -सी कामना,हर पल रहना साथ।
दोष हमारे भूलकर,सदा थामना हाथ।।
-0- ( 24 मार्च-18, समय 1.55-5.10)

Sunday, March 25, 2018

811

1-मुक्तक
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु'
हमको कुछ पता नहीं खुशी कहाँ ले जाएगी।
साँझ को तेरी मिली कमी कहाँ ले जाएगी।
आसमाँ से जो गिरा,उसको उठाता कौन है
जिसे किनारा न मिला,  नदी कहाँ ले जाएगी


-0-[ 25 मार्च-18]


2-नन्ही गौरैया
सुदर्शन रत्नाकर

वह जो भूरे-पीले पंखों वाली
     नन्ही गौरैया
हर रोज आती थी
मेरे आँगन में
अब आती नहीं
सूरजमुखी का पराग
चुन चुन खाती नहीं
न ही पेड़ की फुनगी पर
बैठ कर, झूला झूलती है
बैठी रहती है छत की मुँडेर पर
सूर्य उगने के इंतज़ार में, क्योंकि
मेरे घर के सूरजमुखी मुरझा गए हैं
और दीमक लगे पेड़ की शाखाएँ
सूख गई हैं, इसलिए
वो जो पीले भूरे पंखों वाली
नन्ही गौरैया
मेरे आँगन में आती थी
अब आती नहीं।।
-0-
-29, नेहरू ग्राउण्ड ,फ़रीदाबाद 121001
मो.. 9811251135
-0-
3-कविता
 चन्द्रबली शर्मा
1
है विकलता आज कैसी,मैं समझ कब पा रहा हूँ।
भग्न हृदय से मानस-पटल पर,छवि तेरी बना रहा हूँ।
पर न जाने पूर्ण क्यों वह,हो नहीं मुझसे रही है।
तू नहीं रूठी कभी पर,रूठ छवि तेरी रही है।
 2
सोचता हूँ मन भरम जाए किसी विध आज मेरा।
क्या पता आए तेरा सन्देश लेकर शुभ-सवेरा।
और भी कुछ ना सही, कुछ तो अवधि अल्प होगी
रात्रि तेरी विरह-दुःख में,ना मुझे शत-कल्प होगी।
 3
छवि ही तेरी रूठी नहीं,रूठा सभी संसार मुझसे।
नींद रूठी,चैन रूठा और रूठा प्यार मुझसे।
किन्तु मुझको है नहीं,चिन्ता किसी के भी टूटने की
है नहीं शंका तनिक भी,प्रिय तुम्हारे रूठने की।
 4
बस यही मैं सोचता हूँ,कैसे तुमको ये कहूँ
बसते हैं तन-मन में मेरे,तेरी साँसों के सुमन
तू अगर रूठी रही तो,सब बिखर ही जाएँगे
उजड़े उपवन में भला फिर,भौंरे क्या गा पाएँगे।
 -0-

Friday, March 23, 2018

810

1-मै लिखती नहीं 
मंजु मिश्रा ( कैलिफ़ोर्निया)

मै लिखती नहीं
जीती हूँ 
अपने अहसास !
घूँट घूँट पीती हूँ
अपना आस-पास ...

बूँद भर ख़याल 
छलक छलक कर 
कब नदी बन गये 
पता ही नहीं चला !

और फ़िर
कागज की छाती पर 
दौड़ते भागते 
ये स्याही की नदी
कब समंदर बन गयी
ये भी कहाँ जान पाई मै !

मै तो बस 
अपने आप में गुम
अन्दर ही अन्दर 
तलाशती रही 
अपना वजूद
और रचती रही 
शब्दों के पुल 
जीवन पर करने को 
जो न जाने कब कविता बन गये.......

-0-
2-अब की
डॉ सुषमा गुप्ता

शाम ढले
पीछे आँगन में बिसरी चारपाई पर
यूँ ही अलसाए गुम थे
अरसे पुराना चाँद उतरा
मेरे घुटने पर ठुड्डी टिकाए बैठ गया ।
आँखें मुस्काईं
तो चाँद ने चश्मा उतार कर रख दिया मेरे आँचल पर
मैंने झट धुँधली कर ली आँखें अपनी
कहा..
बेज़ारी का  ख़त बाँचना छोड़ दिया कब का मैंने ...
जाओ महबूब
अब की आओ तो ज़िंदा आँखों के साथ आना ।
-0-
-     3-पूर्वा शर्मा
आज चन्द्र भी लजा रहा
लुक-छिप के वो रिझा रहा
प्रियतम से मिलकर है आया
तभी तो उस पल दिख ना पाया
प्रेम अगाध वो पाकर आया
रंग प्रीत का ऐसा छाया 
श्वेत वर्ण से हुआ है मुक्त
रक्तिम दिखे लाज से युक्त
पाकर प्रीत हुआ है पूर्ण
प्रकट हुआ है अब सम्पूर्ण ।
-0-रचना(31 जनवरी 2018)