पथ के साथी

Friday, August 8, 2008

जब तक बची दीप में बाती

जब तक बची दीप में बाती

-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

 

जब तक बची दीप में बाती

जब तक बाकी तेल है ।

तब तक जलते ही जाना है

साँसों का यह खेल है॥

 

हमने तो जीवन में सीखा

सदा अँधेरों से लड़ना ।

लड़ते-लड़ते गिरतेपड़ते

पथ में आगे ही बढ़ना ।।

 

अनगिन उपहारों से बढ़कर

बहुत बड़ा उपहार मिला ।

सोना चाँदी नहीं मिला पर

हमको सबका प्यार मिला ॥

 

यही प्यार की दौलत अपने

सुख-दुख में भी साथ रही ।

हमने भी भरपूर लुटाई

जितनी अपने हाथ रही ॥

 

ज़हर पिलाने वाले हमको

ज़हर पिलाकर चले गए ।

उनकी आँखो में खुशियाँ थीं

जिनसे हम थे छले गए ॥

 

हमने फिर भी अमृत बाँटा

हमसे जितना हो पाया ।

यही हमारी पूँजी जग में।

यही  हमारा  सरमाया

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(गोमती एक्सप्रेस 27-7-2008)

 

इसे ध्यान में रखना

 

इसे ध्यान में रखना

-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

जो करना है  सो कर ।

जब मरना है तब मर॥

अहसानों का बदला जग में

कुछ भी हो सकता है॥

जिसकी खातिर फूल बिछाए

काँटे बो सकता है ।

इसे ध्यान में रखना ॥

 

ये   बेटे  ये भाई

इतनी हुई  कमाई ।

समझो आने वाले कल में

सब कुछ ढह सकता है।

सम्बन्धों का यह प्रासाद

पल में बह सकता है ।।

इसे ध्यान में रखना ॥

 

ये  मुस्काकर  मिलते

सदा कमल से खिलते ।

मुखड़े पर आभा उतरी है

दिल में दाग़ भरे हैं।

वाणी में मिसरी घोली है

मन में कपट धरे हैं ॥

इसे ध्यान में रखना ॥

 

अपनेपन की बातें

झूठे रिश्ते-नाते ।

मंज़िल तक तो जाना होगा

तुमको निपट अकेले।

साथ तुम्हारे नहीं रहेंगे

ये जीवन के मेले॥

इसे ध्यान में रखना ॥

 

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-10-4-2008(ग्वालियर)

पत्र

पत्र

 प्रभु जोशी

4, संवाद नगर,

नवलखा, कै़दी बाग़ के पास,

इन्दौर (म.प्र.)452 001

मोबाइल : 9425346356

E-mail- prabhu.joshi@gmail.com

प्रिय महोदय,

आप सब अपनेअपने टेलिविजनों पर रोज देख रहे होंगे, कि इन दिनों एक विज्ञापन में देशभक्ति से भरे आदमी का गुस्सा उफनकर बाहर आता है, जिसमें वह कहता है, 'देश बदल रहा है, भेष कब बदलोगे ?' उसका वश नहीं चलता, वरना भेष नहीं बदलने वाले को वह खुद ही ऐसे पीटता जैसे कि वह क्रिकेट के मैदान में अपने बल्ले से गेंद को पीटता है। लेकिन, वह भेष न बदलने वाले को कार पार्किंग के चौकीदार से पिटता हुआ, बताता है।

एक होर्डिंग शहर में कई दिनों तक दिखता रहा, जिसमें वह इस शहर के नामुरादों को ललकारता रहा कि 'आखिर इन्दौर कब तक चायपोहे पर अटका रहेगा ?' मतलब यह कि अब मैक्डोनाल्ड तो आ ही चुका है न!

मित्रों! अब आप बहुत जल्दी ही टेलिविजन के पर्दे और अखबारों के पन्नों पर देश को विकास के रास्ते पर ले जाने वाले आदमी के गुस्से से उफनती एक नई धमकी पंच लाइन की तर्ज पर देखनेपढ़ने के लिए तैयार रहिये वह होगी – 'देश की आशायें बदल रही है, (नामुरादों) भाषायें कब बदलोगे ?'

कहने की जरूरत नहीं कि हम भारतीय नामुरादों को भाषायें बदलने के एक खामोश षड्यंत्र में शामिल कर लिया गया है। और विडम्बना यह कि दुर्भाग्यवश हम इसके लिए धीरेधीरे तैयार भी होने लगे हैं।

अंग्रेजों की बौद्धिक चालाकियों का बखान करते हुए एक लेखक ने लिखा था – ''अंग्रेज़ों की विशेषता ही यही होती है कि वे आपको बहुत अच्छी तरह से यह बात गले उतार सकते हैं कि आपके हित में आप स्वयं का मरना बहुत ज़रूरी है। और, वे धीरेधीरे आपको मौत की तरफ ढकेल देते हैं।'' ठीक इसी युक्ति से हिंदी के अखबारों के चिकने और चमकीले पन्नों पर नई नस्ल के चिंतक, यही बता रहे हैं कि हिंदी का मरना, हिन्दुस्तान के हित में बहुत ज़रूरी हो गया है। यह काम देशसेवा समझकर जितना ज़ल्दी हो सके करो, वर्ना, तुम्हारा देश सामाजिकआर्थिक स्तर पर ऊपर उठ ही नहीं पाएगा। परिणाम स्वरूप, वे हिंदी को बिदा कर देश को ऊपर उठाने के काम में जीजान से जुट गए हैं।

ये हिंदी की हत्या की अचूक युक्तियाँ भी बताते हैं, जिससे भाषा का बिना किसी हल्लागुल्ला किए 'बाआसानी संहार' किया जा सकता है।

वे कहते हैं कि हिंदी का हमेशाहमेशा के लिए ख़ात्मा करने के लिए आप अपनाइये। 'प्रॉसेस आॅफ कॉण्ट्राग्रेज्युअलिज़म'। अर्थात्, बाहर पता ही नहीं चले कि भाषा को 'सायास' बदला जा रहा है। बल्कि, 'बोलने वालों' को लगे कि यह तो एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है। हिंदी को हिंग्लिश होना ही है। और हिंदी के कुछ अख़बारों की भाषा में, यह परिवर्तन उसी प्रक्रिया के तहत इरादतन और शरारतन किया जा रहा है। बहरहाल, वे कहते हैं कि इसका एक ही तरीक़ा है कि आप अपने अख़बार की भाषा में, हिंदी के मूल दैनंदिन शब्दों को हटाकर, उनकी जगह अंग्रेज़ी के उन शब्दों को छापना शुरू कर दो, जो बोलचाल की भाषा में (शेयर्डवकैब्युलरि) की श्रेणी में आते हैं। जैसे कि रेल, पोस्ट कार्ड, मोटर, टेलिविजन आदिआदि। यानि कुल मिलाकर जिस भी हिन्दी शब्द का आप अंग्रेजी जानते हैं, उस हिन्दी के शब्द को हटाकर उसकी जगह अंग्रेजी का इस्तेमाल करना शुरू कर दीजिये। अंतत: धीरेधीरे उनकी तादाद इतनी बढ़ा दीजिए कि मूलभाषा के केवल कारक भर रह जायें। क्योंकि कुल मिलाकर, रोज़मर्रा के बोलचाल में बस हज़ारडेढ़ हज़ार शब्द ही तो होते है।

भाषा को परिवर्तित करने का यह चरण, 'प्रोसेस ऑव डिसलोकेशन' कहा जाता है। यानी की हिंदी के रोज़मर्रा के मूल शब्दों को धीरेधीरे बोलचाल के जीवन से उखाड़ते जाने का काम।

ऐसा करने से इसके बाद भाषा के भीतर धीरेधीरे 'स्नोबॉल थियरी' काम करना शुरू कर देगी अर्थात् बर्फ़ के दो गोलों को एक दूसरे के निकट रख दीजिए, कुछ देर बाद वे एक दूसरे से घुलमिलकर इतने जुड़ जाएँगे कि उनको एक दूसरे से अलग करना संभव नहीं हो सकेगा। यह 'थियरी' (सिद्धान्तकी) भाषा में सफलता के साथ काम करेगी और अंग्रेज़ी के शब्द, हिंदी से इस क़दर जुड़ जायेंगे कि उनको अलग करना मुश्किल होगा।

इसके पश्चात् शब्दों के बजाय पूरे के पूरे अंग्रेज़ी के वाक्यांश छापना शुरू कर दीजिए। अर्थात् 'इनक्रीज द चंक ऑफ इंग्लिश फ़्रेज़ेज़'। मसलन 'आऊट ऑॅफ रीच/बियाण्ड डाउट/नन अदर देन/ आदि आदि। कुछ समय के बाद लोग हिंदी के उन शब्दों को बोलना ही भूल जायेंगे। उदाहरण के लिए हिंदी में गिनती स्कूल में 

 

बंद किये जाने से हुआ यह है कि यदि आप बच्चे को कहें कि अड़सठ रूपये दे दो, तो वह अड़सठ का अर्थ ही नहीं समझ पायेगा, जब तक कि उसे अंग्रेज़ी में 'सिक्सटी एट' नहीं कहा जायेगा। इस रणनीति के तहत बनते भाषा रूप का उदाहरण एक स्थानीय अख़बार से उठाकर दे रहा हूँ।

'मार्निंग अवर्स के ट्रेफिक को देखते हुए, डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन ने जो ट्रेफिक रूल्स अपने ढंग से इम्प्लीमेंट करने के लिए जो जेनुइन एफर्ट्स किये हैं, वो रोड को प्रोन टू एक्सीडेंट बना रहे है; क्योंकि, सारे व्हीकल्स लेफ्ट टर्न लेकर यूनिवर्सिटी की रोड को ब्लॉक कर देते हैं। इन प्रॉब्लम का इमीडिएट सोल्यूशन मस्ट है।'

इस तरह की भाषा को लगातार पाँचदस वर्ष तक प्रिंटमाध्यम से पढ़ते रहने के बाद जो नई पीढ़ी इस कि़स्म के अख़बार पठनपाठन के कारण बनेगी, उसकी यह स्थिति होगी कि उसे कहा जाय कि वह हिंदी में बोले तो वह गूंगा हो जायेगा। उनकी इस युक्ति को वे कहते हैं 'इल्यूज़न ऑफ स्मूथ ट्रांजिशन'। अर्थात् हिंदी की जगह अंग्रेज़ी को निर्विघ्न ढंग से स्थापित करने का सफल छद्म।

हिंदी को इसी तरीक़े से हिंदी के अखबारों में 'हिंग्लिश' बनाया जा रहा है। समझ के अभाव में अधिकतर हिंदी भाषी लोग और विद्वान भी लोग इस सारे सुनियोजित एजेण्डे को भाषा के 'परिवर्तन की ऐतिहासिक प्रक्रिया' ही मानने लगे हैं और हिंदी में इस तरह की व्याख्या किए जाने का काम होने लगा है। गाहेगाहे लोग बाक़ायदा अपनी दर्पस्फीत मुद्रा में वे बताते हैं जैसे कि वे अपनी एक गहरी सार्वभौमप्रज्ञा के सहारे ही वे इस सचाई को सामने रख रहे हों कि हिंदी को हिंग्लिश बनना अनिवार्य है। उनको तो पहले से ही इसका इल्हाम हो चुका है और ये तो होना ही है।

एक भली चंगी भाषा से उसके रोज़मर्रा के सांस लेते शब्दों को हटाने और उसके व्याकरण को छीन कर उसे 'बोली' में बदल दिये जाने की 'क्रियोल' कहते हैं। अर्थात् हिंदी का हिंग्लिश बनाना एक तरह का उसका 'क्रियोलीकरण' है। और 'कांट्राग्रेजुअलिज्म' के हथकंडों से बाद में उसे 'डिक्रियोल' किया जायेगा। अर्थात् विस्थापित करने वाली भाषा को मूल भाषा की जगह आरोपित करना।

भाषा की हत्या के एक योजनाकार ने अगले और अंतिम चरण को कहा है कि 'फायनल असाल्ट आॅन हिंदी'। बनाम हिंदी को 'नागरीलिपि' के बजाय 'रोमनलिपि' में छापने की शुरूआत करना। अर्थात् हिंदी पर अंतिम प्राणघातक प्रहार। बस हिंदी की हो गई अन्त्येष्टि। चूँकि हिंदी को रोमन में लिख पढ़कर बड़ी होने वाली पीढ़ी में वह नितांत अपठनीय हो जायेगी। हिंग्लिश को 'रोमनलिपि' में छाप देने का श्रीगणेश करना। यही कहा जाता रहा है, भाषा को पहले 'क्रियोल' बनाने के बाद, 'डिक्रियोल' करना। अब यह काम भारत में होने जा रहा है, जिसकी शुरूआत कोकणी को रोमनलिपि में लिखे जाने के निर्णय से शुरू हो चुका है। इसी युक्ति से गुयाना में, जहाँ 43 प्रतिशत लोग हिंदी बोलते थे 'डिक्रियोल' कर दिया गया और अब वहाँ देवनागरी की जगह रोमनलिपि को चला दिया गया है।

यह आकस्मिक नहीं है कि इन दिनों तो हिंदी में अंग्रेज़ी की अपराजेयता का बिगुल बजाते बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के दलालों ने, विदेशी पूँजी को पचा कर मोटे होते जा रहे हिंदी के लगभग सभी अख़बारों को यह स्वीकारने के लिए राजी कर लिया है कि इसकी 'नागरीलिपि' को बदल कर, 'रोमन' करने का अभियान छेड़ दीजिए और वे अब तनमन और धन के साथ इस तरफ कूच कर रहे हैं। उन्होंने इस अभियान को अपना प्राथमिक एजेण्डा बना लिया है। क्योंकि बहुराष्ट्रीय निगमों की महाविजय इस सायबर युग में 'रोमनलिपि' की पीठ पर सवार होकर ही बहुत ज़ल्दी संभव हो सकती है। यह विजय अश्वों नहीं, चूहों की पीठ पर चढ़कर की जानी है। जी हाँ, कम्प्यूटर माऊस की पीठ पर चढ़कर। यही काम त्रिनिदाद में इसी षड्यंत्र के ज़रिए किया गया है।

बहरहाल, किसी भी देश की संस्कृति के तीन बाहरी तौर पर पहचाने जाने वाले मोटेमोटे आधार होते हैं भाषा, भूषा और भोजन। इन तीनों की अराजक होकर तोड़ते ही हम नए सांस्कृतिक उपनिवेश बन जाएंगे। यह प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। जिसमें भारतीय भाषा, भूषा और भोजन को निबटाया जा रहा है। निस्संदेह इसके चलते बहुत जल्द हमारे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर फिर एक नया विज्ञापन आयेगा – ''देश का ढंग बदल रहा है, कमबख्तों रंग कब बदलोगे ?''

इसके बाद भारतीय नागरिकों की ''कलर्ड कास्ट'' को कहा जायेगा अपनी आने वाली नस्ल को गोरा बनाने के लिए दौड़ो और अपनी नस्ल का रंग गोरा करने के लिए आज ही जीन बैंक से शुक्राणुओं की खरीदी के लिए अपना नाम लिखाओ। यह भूमण्डलीकरण की अंतिम सीढ़ी होगी।

क्या आप इस सीढ़ी तक पहुंचने के लिए तैयार हैं ? वक्त निकालकर इस विषय पर कुछ सोचिए...... और अगर अपने स्तर पर भी जितनी प्रखर असहमति लिखकर और मौखिक भी प्रकट की जा सकती है, प्रकट कीजिये ताकि आप अपनी भाषा के प्रति जरूरी ऋण अदा कर सकें। यह पत्र आप अपने मित्रों और इसके पक्ष में तमाम अखबारों को भी भेजें। 

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(साभार)

Wednesday, July 23, 2008

कलियुगी एकलव्य


कलियुगी एकलव्य
कलियुग में बोले द्रोणाचार्य एकलव्य से-
'प्रसन्न हूँ तुम्हारी भक्ति से
जो चाहते सो माँगो ।'
एकलव्य बोला –'गुरुदेव ,
यदि प्रसन्न हैं मुझसे
तो एक काम कीजिए-
द्वापर में आपने
कटवाया था  अँगूठा
यह कलियुग है
अपना दायाँ हाथ
काटकर दे दीजिए ।
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'



दस नम्बरी दोहे

दस नम्बरी दोहे

 

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

 

नेता  ऐसा चाहिए, डाकू तक घबराय ।

धुआँधार भाषण करे ,ले सबको बहकाय ॥

 

कुर्सी मधु से सौ गुनी,मादकता अधिकाय

वा पीकर बौराय जग ,या पाकर बौराय ॥

 

कुर्सी जननी ,ज़िन्दगी,सबकी इस तक दौर ।

इसके बिन संसार में ,और कहाँ पर ठौर ॥

 

बधिक आज नेता बने ,भरे हज़ारों खोट ।

जिस वोट से विजय मिली ,देते उसको चोट ॥

 

काले ब्रजबिहारी को पूज रहा संसार ।

काले धन को जोड़कर क्यों घबराते यार ॥

 

नेता खड़ा बज़ार में,जोड़े दोनों हाथ ।

जेब हमारी जो भरे ,चले हमारे साथ॥

 

जन-सेवा के नाम की झोंकी  ऐसी धूल ।

जनता झाँसे में फँसी, गई सभी कुछ भूल ।

 

जीवन कच्चा काँच है ,कर लो पक्का काम।

रिश्वत लेकर घर भरो,जपो हरि का नाम ॥

 

मिली  छूट माँ बाप से ,लूट मची दिन-रात ,

गाली देकर और को,खाओ खुद भी लात ॥

फूल कनेर के


फूल कनेर के

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

किसने रोके पाँव अचानक
धीरे-धीरे  टेर  के ।
उजले पीले भर आए-
 आँगन में फूल कनेर के । ।

दिन भर गुमसुम सोई माधवी
तनिक  नहीं  आभास रहा ;
घिरा अँधेरा खूब नहाई
सुगन्ध- सरोवर पास रहा  

पलक बिछाए बिछे धरा पर
प्यारे  फूल कनेर के ।

यह मन बौराया  चैन न पाए
व्याकुल झुकती डाल सा ;
पीपल के पत्ते-सा थिरकता
हिलता किसी रूमाल-सा ।

चोर पुजारी तोड़ भोर में ,
ले गया फूल कनेर के   

Thursday, May 15, 2008

स्वस्थ चिन्तन




1-घर में प्रवेश करने से पहले अपने कपड़ों की धूल झाड़ लीजिए।सोने से पहले मन पर पड़ी नकारात्मक सोच की धूल साफ़ कर लीजिए । तन और मन स्वस्थ रहेगा ।
2-घर की खिड़कियाँ खुली रखिए ताकि ताज़ा हवा आ सके । दूसरे लोग क्या कर रहे हैं, यह देखने के लिए खिड़कियों का इस्तेमाल न करें ।दीर्घायु प्राप्त करेंगे ।
 
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'


Monday, May 12, 2008

लघुकथाएँ


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1-चक्रव्यूह
''मँझले को देखो न, कितना कमज़ोर हो गया है।'' सुबह पत्नी ने कहा।
''देख तो मैं भी रहा हूँ। पर करूँ भी तो क्या? कलकत्ता में रहे हैं। वहाँ गरम कपड़ों की ज्यादा ज़रूरत नहीं पड़ी। अधिक न भी हों तो तीनों बच्चों के लिए एकएक फुल स्वेटर ज़रूरी है। मैं चप्पल पहनकर ही आफिस जा रहा हूँ। कमसेकम दो सौ रुपए हाथ में हों, तब मँझले का इलाज फिर शुरू कराऊँ।''
''मैं पिछले आठ साल से देख रही हूँ कि आपके पास महीने के अन्तिम दिनों में दो रुपए भी नहीं बचते।'' पत्नी तुनक उठी।
कोई खांसीजुकाम का इलाज तो कराना नहीं। लंग्स की खराबी है। सालभर दवाई खिलाकर देख ली। रत्तीभर फर्क नहीं पड़ा। संतुलित भोजन भी कहाँ मिल पाता है मंझले को।
मैंने देखा, पत्नी की आँखें भर आईं–''तीनों बेटों में मँझला ही तो सुन्दर भी लगता है।....'' उसने एक ओर मुँह घुमा लिया। मैं बिना खाए ही आफिस चला गया। मँझले का झुरता हुआ चेहरा दिनभर मेरी आँखों में तैरता रहा। शाम को बोझिल कदमों से घर लौटा। पिताजी का पत्र आया था कि एक हज़ार रुपए भेज दूँ। अब उनको क्या उत्तर दूँ? महीनेभर की कमाई है आठ सौ रुपए। कहीं डाका डालूँ या चोरी करूँ? सालभर में भी कभी एक हज़ार रुपए नहीं जुड़ पाए। वे बूढ़ी आँखें आए दिन पोस्टमैन की प्रतीक्षा करती होंगी कि मैं हज़ार न भेजता, तीनचार सौ ही भेज देता।
एक पीली रोशनी मेरी आँखों के आगे पसर रही है जिसमें जर्जर पिताजी मचिया पर पड़े कराह रहे हैं और अस्थिपंजर सा मेरा मँझला बेटा सूखी खपच्ची टांगों से गिरतापड़ता कहीं दूर भागा जा रहा है। और मैं धरती पर पाँव टिकाने में भी खुद को असमर्थ पा रहा हूँ।

2-धर्म निरपेक्ष
शहर में दंगा हो गया था। घर जलाए जा रहे थे। छोटे बच्चों को भाले की नोकों पर उछाला जा रहा था। वे दोनों चौराहे पर निकल आए। आज से पहले उन्होंने एकदूसरे को देखा न था। उनकी आँखों में खून उतर आया। उनके धर्म अलगअलग थे।
पहले ने दूसरे को माँ की गाली दी, दूसरे ने पहले को बहिन की गाली देकर धमकाया। दोनों ने अपनेअपने छुरे निकाल लिये। हड्डी को चिचोड़ता पास में खड़ा हुआ कुत्ता गुर्रा उठा। वे दोनों एकदूसरे को जान से मारने की धमकी दे रहे थे। हड्डी छोड़कर कुत्ता उनकी ओर देखने लगा।
उन्होंने हाथ तौलकर एकदूसरे पर छुरे का वार किया। दोनों छटपटाकर चौराहे के बीच में गिर पड़े। ज़मीन खून से भीग गई।
कुत्ते ने पास आकर दोनों को सूँघा। कान फड़फड़ाए। बारीबारी से दोनों के ऊपर पेशाब किया और फिर सूखी हड्डी चबाने में लग गया।

3-क्रौंचवध
कहीं से एक बाण तेजी से आया और आकाश में उड़ते क्रौंच पक्षी को जा लगा।
मँडराता हुआ क्रौंच धीरेधीरे ज़मीन पर उतर आया और पीड़ा से छटपटाकर मूर्च्छित हो गया।
वृक्ष के नीचे बैठा निषाद यह दृश्य देख रहा था। उसने दौड़कर क्रौंच को गोद में उठा लिया।
पास में बहती तमसा के शीतल जल से उसका घाव धोया और अपनी पगड़ी का छोर फाड़कर पट्टी बांध दी। क्रौंच की चेतना लौट आई। पीड़ा अचानक गायब हो गई।
निषाद को पास में देखकर क्रौंच भौचक्का रह गया
''क्या तुमने ही मुझे बचाया है?''
''हाँ,मैंने ही तुम्हें बचाया है।'' निषाद बोला।
''लेकिन यह कृपा किसलिए.....?''
''मैं नहीं चाहता कि कोई बाल्मीकि तुम्हें छटपटाता हुआ देखकर महाकाव्य रचे। मैं तुम्हें मरने नहीं दूँगा।'' निषाद ने दृढ़तापूर्वक कहा

4-मुखौटा
नेताजी को चुनाव लड़ना था। जनता पर उनका अच्छा प्रभाव न था। इसके लिए वे मुखौटा बेचने वाले की दूकान में गए। दूकानदार ने भालू, शेर, भेडिए,साधूसंन्यासी के मुखौटे उसके चेहरे पर लगाकर देखे। कोई भी मुखौटा फिट नहीं बैठा। दूकानदार और नेताजी दोनों ही परेशान।
दूकानदार को एकाएक ख्याल आया। भीतर की अँधेरी कोठरी में एक मुखौटा बरसों से उपेक्षित पड़ा था। वह मुखौटा नेताजी के चेहरे पर एकदम फिट आ गया। उसे लगाकर वे सीधे चुनावक्षेत्र में चले गए।
परिणाम घोषित हुआ। नेताजी भारी बहुमत से जीत गए। उन्होंने मुखौटा उतारकर देखा। वे स्वयं भी चौंक उठेवह इलाके के प्रसिद्ध डाकू का मुखौटा था।
5-चक्र
मोना को सुबह ही सुबह खेलते देखकर महेश ने पत्नी को कनखियों से इशारा किया–''देखो, मोना की रात भी कितना समझाया था कि सोने का वक्त हो गया है। खेल बंद करके होमवर्क पूरा कर लो। अब फिर सुबह ही सुबह......'' वह क्रौंध से होंठ चबाता हुआ दूसरे कमरे में चला गया। सहमा हुआ मोना नल पर जाकर ब्रश करने लगा।
आठ बज गए। स्कूल जाने में सि‍र्फ़ आधा घंटा है। महेश की नज़रें मोना को तलाश रही थीं। उड़तीसी नज़र बरामदे की ओर चली गई। पत्नी रसोईघर में व्यस्त थी। मोना दीवार के किनारे इमली के बीज फैलाकर निशाना साध रहा था। महेश इस बार संयम खो बैठा। उसने लपककर मोना को पकड़ लिया। एक के बाद एक थप्पड़ पड़ने लगे। उस पर जैसे पागलपन सवार हो गया था। उसने मोना को लाकर पलंग पर पटक दिया। एक चीख के साथ वह उछलकर खड़ा हो गया । पत्नी रसोईघर से दौड़कर आई। उसने पत्नी को एक तरफ धकेल दिया।
''मत मारो पापा.....'' उसने हाथ जोड़ दिए। डर के मारे पेशाब निकल जाने से उसकी पैण्ट गीली हो गई। सुबकियों के साथ उसका पूरा शरीर पत्ते की तरह काँप रहा था। महेश चीखा–''तुमको रात भी समझाया फिर भी तुम बात क्यों नहीं मानते?'' और थप्पड़ मारने के लिए हाथ उठाया। पत्नी ने हाथ पकड़ लिया–''अब जाने भी दो या जान ही लोगे इसकी।''
दफ्तर पहुचने पर उसका मन और व्याकुल हो गया। जब काम में मन नहीं लगा तो वह छु्ट्टी लेकर घर लौट आया।
मोना को बुखार चढ़ गया था। पत्नी सिरहाने बैठी थी। मोना ने धीरे से आँखें खोलीं। ''पापा''–कहकर फिर आँखें मूँद लीं।
''मैंने आज अपने बेटे को बहुत पीटा है न?'' महेश ने मोना के बालों में उँगलियाँ चलाते हुए कहा।
''मैंने भी तो आपकी बात नहीं मानी?'' मोना ने अपना हाथ पिता की गोद में रख दिया।
दोनों की आँखें भीग चुकी थीं।