पथ के साथी

Thursday, April 21, 2022

1199

  1-अनुपमा त्रिपाठी सुकृति’ की कविताएँ

1

शब्द अपने कितने स्वरूपों में


अवतरित ,

खटखटाते हैं

मन चेतन- द्वार ,

लिये निष्ठा अपार ,

झीरी से फिर चली आती है

धरा के प्राचीर पर

रक्तिम .....

पलाश वन- सी ....

रश्मि  की कतार

नवल वर्ष  प्रबल  विश्वास

सजग  है मन

रचने नैसर्गिक उल्लास,

हँसते मुसकुराते से

 भीत्ति चित्र ,

प्रभात का स्वर्णिम  उत्कर्ष,

शबनमी वर्णिका का स्पर्श ,

एक विस्तृत आकाश का विस्तार ,

बाहें पसार ...

चल मन उड़ चल पंख पसार ....!!

-0-

2

उमड़ते हुए भावों की वीथी से ,

चुनते हुए शब्द की प्रतीति से ,

रचना से रचयिता तक ,

खिलते कुसुमों से अनुराग लिये ,

पल- पल बढ़ता है मन ,

गुनते हुए क्षण क्षण ,

अभिनव  आरोहण ,

बुनते हुए रंग भरे कात से ,

रंग भरा ,

उमंग -भरा जीवन ....!!

-0-

3

विजन निशा की व्याकुल भटकन ,

थिका का ऐसा जीवन,

मलयानिल का वेग सहनकर ,

मुख पर कुंतल करें आलिंगन ,

बढ़ती जाती पथ पर अपने ,

 

उषा का स्वागत करता मन

रात्रि की निस्तब्धता में

कुमुदिनी कलिका का किलक बसेरा

प्रातः के ललाम आलोक में

उर सरोज- सा खिलता सवेरा !!

री पथकिनी तू रुक मत

नित  प्रात चलती चल ,

धरा पर सूर्य की आभा से

मचलती चल !!

-0-

4

आज भी .. ...

आज भी सूर्यांश की ऊष्मा  ने

अभिनव मन के कपाट खोले ,

देकर ओजस्विता

सूरज किरण चहूँ दिस  ,

रस अमृत घोले ..!!

आज भी चढ़ती धूप  सुनहरी ,

भेद जिया के खोले ,

नीम की डार पर आज भी

चहकती है गौरैया ,

आज भी साँझ की पातियाँ

लाई है संदेसा पिया आवन का ,

आज भी खिलखिलाती है ज़िन्दगी

गुनकर जो रंग ,

बुनकर- सा हृदय आज भी

बुन लेता है  अभिरामिक शब्दों को

आमंजु अभिधा में ऐसे ,

जैसे तुम्हारी कविता

मेरे हृदय  में विस्थापित होती है ,

अनुश्रुति- सी ,अपने

अथक प्रयत्न  के उपरान्त !!

हाँ ..... आज भी ..!!

-0-

2- भीकम सिंह 

1-खेतों के सवेरे

 

पौ फटते ही


कुछ  झाड़ियाँ 

कुछ खरपतवार 

मिल जाते हैं 

खेतों की देह को घेरे हुए।

 

थुलथुल खर-पतवार 

खेतों की देह पे थिरकें

रसायनों के नशे में 

फसलों की बाँह पकड़े

मूर्ख मुद्रा में  ठहरे हुए 

 

दिनचर्या के नीचे 

दबे हुए खेत

गिरवी के डर से 

चुपचाप  -

सहते रहते हैं अँधेरे हुए 

 

धीरे-धीरे 

पुरवा आती 

दिन भर के थके खेत

झाड़ियों के ही कंधे ढूँढते

पर वो खड़ी रहती मुँह फेरे हुए 

 

फिर चाँदनी रात में 

झाड़ियों के साये तले 

साँसें  छोड़ते 

किलकारी मारते 

खेतों के सवेरे हुए।

2-दूब

दूब-1

 

दूब आएँगी 

आँखों में पानी भर देगी

दुर्लभ छींटों से 

सबको धन्य कर देगी 

 

दूब- 2

 

दूब के बारे  में सोचा 

काँपते हुए आती है 

पूजा की थाली में बैठ जाती है 

पालथी मार ।

 

और जंगली घास 

छुपा लेती है 

तपती धूप में 

वैदिक युग  का आर्तनाद 

 

दूब  - 3

 

गाँव में दूब

मिट्टी में मुँह छिपाती 

सोने को ज्यों लेती सहारे 

फैलती जाती पैर पसारे 

 

दूब - 4

 

लॉन की दूब

उगने का अधिकार बताने 

ज्यों ज्यों अपना मुँह उठाती

बेरहमी से काट दी जाती 

 

दूब - 5

 

हरी दूब पर 

नंगे पड़े पैरों के 

बाहर और भीतर 

एक खामोशी-सी ठहरी ।

 

जिसे ऊबकर

यहाँ वहाँ आते-जाते 

चौरस्तों पर

फेंक रहे हैं शहरी 

-0-

3-कपिल कुमार

नभ के नीचे बैठ लिखें प्रेम-विधान प्रिये! 

सबसे पहले दुःख लिखें फिर समाधान प्रिये!

 

नदी का विलाप लिखें रवि का ताप लिखें

समुद्र का मौन लिखें फिर प्रेम-व्यवधान प्रिये!

 

चिड़ियों की चहक लिखें फूलों की महक लिखें

तारों की चमक लिखें सितारों का गुणगान प्रिये! 

 

गालों की चमक लिखें बालों का लिखें गजरा

नयनों का काजल लिखें होठों का आख्यान प्रिये! 

 

नायक का मिलाप लिखें मेघों का आलाप लिखें

इंद्रधनुष के सातों रंग कोयल सा व्याख्यान प्रिये! 

 

जवानी की पीड़ा लिखें बचपन की क्रीड़ा लिखें

हृदय जो बिल्कुल खाली है भर दे खाली स्थान प्रिये

 

नए-पुराने गाँव लिखें पीपल की सी छाँव लिखें

हरा भरा हरियाणा लिखें सूखा राजस्थान प्रिये!

 

हृदय की व्यथा लिखें प्रेमचंद की कथा लिखें

गाँधी जी का अहिंसा युक्त नया हिंदुस्तान प्रिये!

नभ के नीचे बैठ लिखें प्रेम-विधान प्रिये! 

सबसे पहले दुःख लिखें  फिर समाधान प्रिये!

 

-0-

Friday, April 1, 2022

1196-जीवन के किस्से

 भीकम सिंह 

 

 मैंने जब-जब

जिस-जिसके

जूते उठाए

मेरे पैरों के लिए 

छोटे पड़े 

 

आत्म-सम्मान पर

पुनर्विचार की शक्ति भी 

क्षीण करते रहे वे 

दिखा-दिखाकर मुझे 

अतीत की जड़ें 

 

मैं आरती का दीया 

बन न पाया कभी 

इसलिए मरियल झोंके सभी 

हड़काते रहे मुझे 

आँधी के पीछे होकर खड़े 

 

आज सुख में 

दु:ख भरे 

स्मृतियों के पन्ने 

पलटता जा रहा हूँ 

यूँ ही बस पड़े-पड़े 

-0-

2-क्षणिकाएँ

  कृष्णा वर्मा 

1

बड़ी लाइल्म होती हैं 

साजिशें 

जिसे सहारा देती हैं 

उसी को कर देती हैं

तबाह।

2

लहजों पर ना

कर लेना विश्वास 

कुछ लहजे 

बड़े माहिर होते हैं

झूठे किस्सों को भी 

सच में बदल देने में। 

3

लाख मारें टक्करें

लहरों को कहाँ 

होता है नसीब किनारा  

लौट कर जाना ही पड़ता है 

समुंदर की पनाहों में। 

4

कब से लगा है 

पगला ज़माना 

हवाओं को कैद करने में 

कौन समझाए उन्हें 

मुठ्ठियों से कहीं बड़ा होता है 

हवाओं का कद। 

5

बिना किसी सहारे के 

एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुए 

दम फूलने का अहसास 

और घुटनों की ऐंठन के बाद 

ऊँचाइयाँ छूने का 

अपना ही परम आन्नद होता है।

6

निराली होती है 

आँसुओं की फ़ितरत

पलकों पे रहें तो 

पानी के कतरे

गिर जाएँ तो 

लगा देते हैं आग। 

7

औरत को  

विरासत में मिला होता है

झूठ बोलना 

कितना सहज कर देते हैं 

औरत के छोटे-छोटे झूठ 

मैं ठीक हूँ, मुझे भूख नहीं,

आँख में कुछ गिर गया था इत्यादि।

8

राजा की 

जयजयकार करने वाले 

भूल जाते हैं कि वे 

खो रहे हैं अपनी आज़ादी 

और भीड़ को भीड़ से भिड़ाने का 

दे रहे हैं राजा को बल।

9

भटकते फिसलते धसते 

पाँवों को

चाहें यदि उबारना 

तो कसकर थाम लें 

एक दूजे का हाथ।

10

हवाओं सा होता है 

माँ का साथ 

चली जाए तो 

घुटने लगता है दम।  

 

Saturday, March 19, 2022

1194-सुख-दुख

प्रीति अग्रवाल

 दुःख में, जाने ऐसा क्या है

एक बार की अनुभूति भी
बरसों तक साथ रहती है
उसी शिद्दत से बार- बार,

हर बार मिलती है...


सुख में वो बात नहीं...
उसकी यादें
धुँधली हो जाती हैं
बिसरी अनूभूति पाने की धुन
फिर सवार हो जाती है
दर -दर घुमाती हैं
होड़ लगवाती
फिर भी
उस भूले सुख को
दोहरा नहीं पाती है...

कैसी विडंबना है,
दुख कोई नहीं चाहता
पर वो चाहे कितना ही पुराना हो,
साथ निभाता है
जब भी याद आता है
उसी गुज़रे दौर में ले जाता है,
सारी बारीकियाँ
एक बार फिर दोहराता है।

सुख, सब चाहते है
पर, वो चाहे
कितना ही नया क्यों न हो
असन्तुष्ट ही रखता है
'बस, एक बार और '
इस अनबूझ, अतृप्त चाह में
दौड़ाए रखता है...

कहीं ऐसा तो नहीं
दुख, चिरकालिक है
स्थायी है,
सुख, क्षणभंगुर है
अस्थायी है...?

आखिर कुछ तो कारण है
कि दुख याद रहता है
सुख भूल जाता है.... !


Thursday, March 17, 2022

1193

 डॉ. सुरंगमा यादव

दोहे

1

होली के उल्लास का, कुछ मत पूछो हाल
हर मुखड़े पर रंग है, सब मिल करें धमाल।।
2
होली की यह रीत है, बरसे सब पर प्रीत
देख कमाल गुलाल का, रूठे मन लें जीत
3
साजन से अँखियाँ मिलीं, मुखड़ा हुआ अबीर
मन तेरे ही रंग रँगा अब मत करो अधीर।।
4
फागुन मस्ती में भरा,मादकता चहुँओर
मन सौरभ-सौरभ हुआ, ठहरे न एक ठौर

-0-

2-कुण्डलिया

डॉ. उपमा शर्मा

होली बिन खेले हुई, मैं ते ऐसी लाल।

तुमने जब से है भरा, उर ये प्रेम-गुलाल।

उर ये प्रेम गुलाल,धूम होली की न्यारी।

रंगों की भरमार,रँगी प्रियतम की प्यारी।

पिचकारी की मार, और ये हँसी -ठिठोली।

भूली सब कुछ आज, सजन,मैं तेरी हो ली।

-0-
3-वसंत और फागुन

 डॉ. सुरंगमा यादव



वसंत और फागुन ने देखो
मिलकर रंग जमाया!
दोनों हैं रंगरेज सखी
एक ने पहले मन रंग डाला
दूजे ने फिर तन भी
इनके आने की आहट से 
सबका मन हर्षाया
आँखों में सरसों की आभा
साँसों में अमराई
कोयल गाती पंचम स्वर में
सोया राग जगा है मन में
फागुन है मनभाया
कंत गये परदेस सखी री!
दहक उठे यादों के टेसू
चटक रंग भी फींके लगते
उन बिन सूने घर-आँगन में
रह-रह मन अकुलाया
शिशिर  विदा की है बेला
सुमन गुच्छ ले उसे भेंटने
खिला वसंत नबेला
धूप सयानी देखकर
दिवस मगन मुसकाया
ऋतु आयी अनुकूल बड़ी
होली का उल्लास बढ़ा
वन-बागों ने भी उत्सव में
पहने वसन  नवीन
धरा मगन,जड़-चेतन झूमे
उर आनंद समाया

-0-

Sunday, March 13, 2022

1192-युद्ध केन्द्रित कविताएँ

 डॉ. नूतन गैरोला

 

युद्ध के बीच -1

 

वे जो मारे जा रहे हैं

और वे जो मार रहे है


दोनों मर रहे हैं

मारते- मरते वे खुद को मरने से बचाते

मार रहे है क्योंकि वे मरना नहीं चाहते

उन्हें झोक दिया गया है युद्ध के मैदान में

जो नफ़रतों के लिए नहीं

प्रेम के लिए जीते हैं |

वे अपनी आवाज पहुँचाना चाहते हैं 

अपनी माँ, पिता, भाई, बहन, प्रेमिका के पास

उनकी सुरक्षित गोद में वे एक झपकी लेना चाहते हैं

जानते हैं वे कि उनके अपने भी ना सो पाए होंगे

वे कहना चाहते हैं उनसे

कि फिक्र मत करना

पर वे अपनी बात दिल मे दबाए

धमाके के बाद चुप्पे से रक्तपुंज में ढल जाते हैं

किसी को नहीं पता वे कौन थे

चिरनिद्रा को प्राप्त उनकी देह किधर गई?

कब रुकेगा युद्ध

कब लौटेंगे सैनिक अपने घरों को?

 -0-

 

 युद्ध के बीच – 2

 

वे

लोग जो अपने देशों को

जाना चाहते थे

शहर में बमबारी की चेतावनी के बीच

उन्हें रेलों से उतार दिया गया

सीमाओं पर रोका गया

चमड़ी के रंगों के आधार पर

बंदूक की बट से पीटा गया

युद्ध के मैदान में जबरन उन्हें रोका गया।

 

उनका देश दूर से उन्हें पुकारता है

सुरक्षित लौट आओ मेरे बच्चों।

पर कुछ हैं कि उन्हें शहरों में जकड़ लिया गया।

 

क्योंकि

जब मानवता का ह्रास होता है, तभी युद्ध शुरू होते हैं

और युद्ध होने  पर मानव ही नहीं मरते

बची-खुची मानवता भी मर जाती हैं।

 -0-

 

  युद्ध के बीच 3 ( मैं और जंग )

 

 

मैं टेलीविजन के आगे

थरथराती रही

बीते कई दिनों से,

देर रात तक, अलसुबह  और फिर दिन ढलने तक सतत

मुझे सुनाई देती रही हैं हजारों चीखें क्रंदन

जिन्हें रौंदते रहे बख्तरबंद टैंक, युद्धपोत,

हवाईजहाज के कोलाहल और धमाके।

टैंक और जहाज भी जमींदोज होते हुए

 

शहर में मौत का ऐलान करती सायरन की आवाजें

और विचलित करता दबा हुआ  सन्नाटा,

धुआँ- धुआँ - सा फैला हुआ

कि जल, थल, वायु

सुरक्षित नहीं वहाँ

चिथड़ा- चिथड़ा धमाकों से फटते- जलते शहर

 

बर्फीले बंकरों में छुपे भूखे प्यासे निरीह बच्चे

माँ की गोद में सर रख कर सोने को आकुल बच्चे

बारूद और मिसाइलों की आसमानी बरसात

जैसे बरस रहे हो ओले

उनके बीच

जान हथेली पर रख  मीलों तक भागते

अनजाने ठिकानों पर रुक

इंतजार करते हों किसी देवदूत का

किसी राहत का

कब खत्म होगा युद्ध ..

 

मेरा दिल यकायक रुकता है

डर से

मुझे सुनाई देती हजारों माँ-बहनों की पुकार आँसू

दिखाई देती है पिता भाई के माथे पर

गहराती चिंता की रेखाएँ,बेसब्र इंतजार

वे भी अपने बच्चों की नाउम्मीदी में

उम्मीदों की राह पर मन के दीये जलाते राह तक रहे हैं

जिनके बच्चे युद्ध के लिए भेजा ग

वे भी जिनके बच्चे अध्ययन  के लिए भेजा ग

जो

क्या वे सब लौट पाएँगे युद्ध की भयानकताओं के बीच से

 

इधर कमरे में ही मेरी रूह काँप जाती है

मैं टीवी देखते रोज युद्धभूमि में पहुँच जाती हूँ

मैं अब टेलीविजन नहीं देख पाऊँगी

हृदय फटता है।

कब सब सुरक्षित होंगे?

कब रुकेगा युद्ध?

-0-