पथ के साथी

Sunday, January 22, 2017

703



1-डॉ.भावना कुँअर
1
लेकर वे फिरते रहे ,दोनों हाथों पीर।
हमने खुद ही माँग ली, बनकर मस्त फकीर।
2
गर- गर तुम जो करो,रखना इतना ध्यान
देना ना धोखा कभी, जाए चाहे जान।
3
मनवा मेरा हो रहा, पल -पल   आज अधीर
होगा जो पल का मिलन,मिट जाएगी पीर।
4
मैं-मैं करता फिर रहा,बनके तू अनजान
जप ले दो पल राम को,ले जीवन का ज्ञान।
5
तू तो माया में पड़ा,भूला है सब काज
भक्ति करो उस राम की ,सुधरे कल औ आज।
6
प्रेम नदी है आग की , खेल न उल्टे खेल।
बाहर या भीतर रहे,हो जाएगा फेल।
7
विहग बनाए घोंसला,कुछ तो उससे सीख
 हौंसला कर ले बुलंद,माँगे है क्यूँ भीख?
8
खालीपन कैसे भरूँ, करूँ कौन उपचार
कल तक मेरा जो रहा,आज पराया प्यार।
9
पीर भरा दरिया मिला,हो ना पाता पार
जाने कितने कर लिये,नये-नये उपचार।
10
काहे बैठे हो पिया,हमसे इतनी दूर
किसने डाली बेड़ियाँ, क्यों इतने  मज़बूर?
11
मन पंछी उड़ ही चला,आज पिया के गाँव
आँचल में  भर ली  सभी,मधुर प्रेम की छाँव।
12
जो तुम लेकर चल पड़े, प्रेम पगी पतवार ।
करना होगा पार भी,भले तेज़ हो धार॥
-0-
2-ताबीज़--ज्योत्स्ना प्रदीप

उसनें खरीद लिया था
एक तावीज़ की तरह उसको
एक धागे के साथ
गले में बाँधे  भी रक्खा
कुछ समय
पर.....
कुछ मुरादें
पूरी होनें के बाद
सजा दिया
किसी कमरे के आले में
उसी एक धागे  के साथ!!!
-0-
3-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1
जिनको भुला न पाते हैं
वे जनमों के नाते हैं
ख़ुद को हम भूलें  पलभर
 उनको गले  लगाते हैं।
-0-

Saturday, January 7, 2017

702



द्वारिका प्रंग

श्वेता राय


सुदामा-[ सुशीला को समझाते हु सुदामा]

हे भामिनी! प्यारी सुनो मत, लोभ माया में फँसो।
दलदल हृदय को ये करे ,मत  नासिका तक तुम धँसो।।
है धाम प्यारा घर हमारा, प्रेम से इसमें रहो।
मन में लिये तुम नेह -सरिता, अनवरत हिय तक बहो।।

माया जगत् की झूठ सारी, झूठ सब वैभव यहाँ।
हैं झूठ सब रिश्ते यहाँ पर, झूठ है उद्भव यहाँ।।
अब बात मेरी मान कर बस, नाम प्रभु का लो सदा।
तुम भूलकर प्रिय कष्ट सारे, प्रेम ही बाँटो सदा।।

माया अकेली कब रही है, साथ लाती द्वेष ये।
क्षण -क्षण हृदय में व्यर्थ पल पल, है बदलती भेष ये।।
धन -धान्य से मुक्ति सहज ही, कब कहाँ मिलती यहाँ
बस भक्ति ही प्रभु की धरा से, साथ जायेगी वहाँ।।

संसार सारा भ्रम सुनो प्रिय, बात ये तुम मान लो।
प्रभु के चरण बस शीश नत हो, बात ये तुम ठान लो।।
छल- द्वेष से तुम दूर हो ,न्मार्ग पर चलती रहो।
हैं दीन के वो ही सहारे ,नाम प्रभु भजती रहो।।

सुशीला का उत्तर-


हे नाथ! अब मेरी सुनो तुम बात जो मैं बोलती।
प्रतिदिन क्षुधा को मैं कुटी में नीर से हूँ तोलती।।
है धाम प्यारा घर हमारा, मानती इस बात को।
पर क्या करूँ जब सह न पाऊँ, भूख के आघात को।।

सब कष्ट से हैं बिलबिलाते, नींद भी आती नहीं।
चिल्ला रहे छौना सभी हिय चैन मैं पाती नहीं।।
कुछ हैं कहाँ जो दे उन्हें मैं चुप कराऊँ प्यार से।
है सूखती छाती प्रिये भी, गरीबी की मार से।।

मत देर अब स्वामी करो तुम द्वारिका पथ थाम लो।
कहते रहे हो मित्र जिनको अब उन्हीं का नाम लो।।
है दीन के वो तो सहारे, भूप भी अपने हु
यदि देख लें वो भर नयन तो दर्द सब सपने हु।।

मुख से नहीं कुछ बोलना तुम हाथ भी मत खोलना।
सब देख उनका ठाट वैभव मत हृदय से डोलना।।
यदि पा गये हम प्रेम उनका, बात तब ये जान लो।
जीवन करुँ प्रभु के चरण में, दान अपना मान लो।।

विनती तुमसे नाथ है, करो इसे स्वीकार।
प्रभु के दर्शन से प्रिये, लाओ जीवन धार।।

श्वेता राय
विज्ञान अध्यापिका
देवरिया
उत्तरप्रदेश
274001

Monday, January 2, 2017

701-नए साल से दो बातें



नए साल से दो बातें
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

दो बूँद भी
प्यार मिला है
मुझको जिनसे
उनको
भर-भर गागर देना ।
सुख-दु:ख में
जो साथ रहे
परछाई बन
सुख के
सातों सागर देना 
बोते रहे
हरदम काँटे,
प्यार-भरे दिल
तोड़े
उनको भी समझाना ।
फूल खिलाते
रहे जो भी
सपनों में भी
उनको
हरदम गले लगाना।
-0-

Friday, December 30, 2016

700

डा०कविता भट्ट

आजीवन पिया को समर्थन लिखूँगी
प्रेम को अपना समर्पण लिखूँगी l

निज आलिंगन से जिसने जीवन सँवारा
प्रेम से तृप्त करके अतृप्त मन को दुलारा l

उसे आशाओं स्वप्नों का दर्पण लिखूँगी
प्रेम को अपना समर्पण लिखूँगी l

प्रणय निवेदन उसका था वो हमारा
न मुखर वासना थी; बस प्रेम प्यारा l

उससे जीवन उजियार हर क्षण लिखूँगी
प्रेम को अपना समर्पण लिखूँगी l

न दिशा थी, न दशा थी जब संघर्ष हारा
विकट-संकट से उसने हमको उस पल उबारा l

उसमें अपनी श्रद्धा का कण-कण लिखूँगी
प्रेम को अपना समर्पण लिखूँगी l

कौन कहता है जग में प्रेम जल है खारा
मुझे तो जग में सदा प्रेम ने ही उबारा

इस जल पे जीवन ये अर्पण लिखूँगी
प्रेम को अपना समर्पण लिखूँगी l
-0-
दर्शन शास्त्र विभाग
हे०न० ब० गढ़वाल विश्वविद्यालय
श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड






Wednesday, December 21, 2016

699

 1-माँ से कुछ बातें
सत्या शर्मा कीर्ति’  ( राँची)
सत्या शर्मा कीर्ति
माँ कहनी है तुमसे कुछ अनकही- सी बातें
कई बार चाहा कह दूँ  तुमसे हर वो बात
पर कहाँ था वक्त तुम्हारे पास
तुम भागती रही सफलता और
शोहरत के पीछे
और मैं अकेली ही उलझती रही
तुम्हें समझने में ,
जाने कितनी रातें तुम्हें पकड़ कर
सोने के लिए मचली हूँ मैं
जाने कितने गीले तकिये गवाह हैं
मेरे अकेलेपन का
जानें कितनी अँधेरी डरावनी रातें
सिर्फ तुम्हारे मौजूदगी के एहसास से
लिपट कर गुज़ारी  हैं

बहुत ढूँढा तुम्हें माँ
जब बचपन बदल रहा था यौवन में
समझनी थी कितनी अनसुलझी -सी बातें पर ...
नारी स्वतंत्रता की पथगामिनी तुम
देती रही भाषण , लिखती रही लेख
उन्ही लेखों का प्रश्न चिह्न (?)थी मैं
माँ तुम्हारे ही कोख से जन्मी
तुम्हारी पुचकार से दूर
तुम्हारी ममतामयी गोद से महरू
थपकियों के एहसास से परे
माँ द्वारा दी जाने ली सीख से जुदा
ढूँढती रही कार्टूनों और नेट की दुनिया में 
माँ  वाला प्यार...
अभी भी कहनी है तुमसे कुछ बातें ...
-0-
2-कलम
 डॉ मधु त्रिवेदी  ( आगरा)
सूरज की पहली किरण के साथ
कुछ कहने को  कुछ लिखने को
लालायित मैं उत्साहित हो उठी
    
पर कलम चुप थी
कुछ दुनियादारी के बोझ तले मैं
कुछ अप्रकट अहसासों में दबी मैं
अशांत भावनाओं के वेगों में घटी
      
पर कलम चुप थी
कुछ खोज रही थी शून्य में ताकते
जा टिकी दृष्टि पास पड़े अखबार पे
शुरू स्याही बद्ध तथ्यों का मंथन
     
पर कलम चुप थी
नेह -भरी कोमल यादों का चिंतन
अपना -सा कहने बाले शब्दों का जादू
शुरू उद्वेगों का मचलकर उठना
       
पर कलम चुप थी
शब्द भी सिहरकर सिसकने को बेताब
आँसू रोकर कहने को हाल -बेहाल
भावना के वेग में अज्ञात दोहरा पर
         
पर कलम चुप थी

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