पथ के साथी

Thursday, October 27, 2016

681



1-प्रमाणिका छन्द
1-डॉ ज्योत्स्ना शर्मा

जगो कि भोर पास है
रहो नहीं निराश भी ।
उमंग संग ले , चलो
मिले तभी प्रकाश भी ।।

कभी थमी नहीं ,बही ,
कि सिन्धु बाँह तो गहे
चली पहाड़ ,पत्थरों ;
सुनो व्यथा नदी कहे !

न पंथ शूलहीन ही,
सुदूर लक्ष्य ज्ञात है
प्रभूत पीर पा चली ;
तपे दिनेश ,रात है !

तपी ,कि क्षीण हो गई,
चली ,कहीं रुकी नहीं
करे निनाद , आँधियाँ -
डरा रहीं ,झुकी नहीं !

सप्रेम कूल सींचती,
तृषा कहीं न शेष हो
खिले कली ,तरे तरी ;
विराग हो न द्वेष हो !

कभी ,कपोल कल्पना-
हरीतिमा दुलारती ।
शनै:-शनै: पली ,बढ़ी
प्रसन्नता पुकारती ।।

समेट धूप हाथ में
चलूँ बिसार ताप को
मिटी ,मिली समुद्र में
मिलूँ, कि लौट आपको ।।

उमंग से भरे मिले
दिनेश देख ,लो जला
विदेह ,देह धारती
बना घटा, बढ़ा चला ।।

दुआ ,कि जिंदगी रहे
सदैव ही महीप- सी
कभी घना अँधेर हो
जलूँ सदा सुदीप सी ।

बढ़े चलो रुको नहीं
यही सुदीप बाल के
उजास बाँटती रही
गए न नेह डाल के ।।

-0-
विजात छंद
डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर।

नज़र का प्यार पढ़ लेना।
सुनो दिलदार पढ़ लेना।।

लुटाती प्रेम हैं पवनें;
किया शृंगार पढ़ लेना।।

सुगंधित फूल उपवन में;
खिले हैं यार पढ़ लेना।।

कसक दिखती जगत में अब;
भरी अख़बार पढ़ लेना।।

सुहानी रात का आँचल;
छिपा दीदार पढ़ लेना।।

घिरी काली घटाओं में;
हवा का वार पढ़ लेना।।

छिपाकर हम करेंगे क्या;
कभी किरदार पढ़ लेना।।

पुकारे  पूर्णिमातम को ;
गगन ललकार पढ़ लेना।।
-0-

Tuesday, October 25, 2016

680-शंकर छंद, प्रमाणिका छन्द



1-शंकर छंद
1-ज्योत्स्ना प्रदीप
1
पीड़ा तो इस जीवन में हम सब ही पाते हैं।
कितनें अधर हैं जो पीड़ा में भी मुस्काते हैं ।।
मन को घन-सा बनाना है।
दुख  मे वो  गा  रहा जबकि उसको मिट जाना है।। 
-0-
2-अनिता मण्डा
जिनको गाकर मनवा झूमे गीत कहाँ हैं वे।
दुनिया के मेले में खोये मीत कहाँ हैं वे।
घुला मन में रंग पीर का।
आँखों से बहता रेला सा आ गया नीर का।
-0-
2-प्रमाणिका छन्द
1-अनिता मण्डा
1
उजास भोर का मिला
सुहास- सा खिला- खिला।
सुवास वात में घुली।
उदासियाँ सभी धुली।
2
उतार थे ,चढ़ाव थे
मिले कई अभाव थे।
प्रयास साध पाँव में।
रुके न धूप छाँव में।
-0-
2-अनिता ललित
1
खिली कली न प्यार की
न आस ही बहार की 
शिकायतें नहीं मुझे
जले नहीं , दिये बुझे।
2
घड़ी -कड़ी न हारिए
बहार को पुकारिए
न अश्क -संग टूटना
न ख़्वाब साथ जूझना ।।
-0-
3-ज्योत्स्ना प्रदीप
1
सिया बड़ी उदास है ।
न आस है न श्वास है।।
अशोक के तले रही 
व्यथा  कहाँ कभी कही ।।
-0-
4- सुनीता काम्बोज
1
उठी -गिरी रुकी नहीं
हवा चली, झुकी नहीं
मिली तभी बहार है
मिला मुझे करार है
2
अधीर गोपियाँ बड़ी
निहारती घड़ी घड़ी
सुगन्ध प्रेम की लिये
जला रही नए दिये
-0-

Tuesday, October 18, 2016

679



1-शृंगार छंद
डॉ ज्योत्स्ना शर्मा

झूमती गाती आई भोर
दिवस लो होने लगा किशोर
थिरकते पुरवाई के पाँव
तृप्त हों तृष्णाओं के गाँव ।।

मिले जब मन से मन का मीत
मौन में मुखरित हो संगीत
अधर पर सजे मधुर मुस्कान
हुई फिर खुशियों से पहचान ।।

जले जब नयनों के दो दीप
लगी फिर मंज़िल बहुत समीप
अँधेरों ने भी मानी हार
किया है स्वप्नों का शृंगार ।।

थामकर हम हाथों में हाथ
चलेंगे जनम-जनम तक साथ
राह में मिलने तो हैं मोड़
कहीं मत जाना मुझको छोड़ ।।
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2-अनिता मण्डा

मैंने चाँद तारे लिखे
आसमान जगमगा उठा
मैंने सूरज लिखा
क़ायनात रोशन हो गई
मैंने फूल लिखा
हवा में ख़ुश्बू बिखर गई
मैंने तुम्हारी खुशियाँ लिखी
हर दिशा उल्लास से भर गई
मैंने खुद को लिखा तो
फिर क्यों मन में वेदना समा गई ?
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3- शिव डोयले

उसने सम्बन्धों को
इस तरह
भुला दिया 
जैसे
यात्रा के दौरान
नदी में सिक्का
डाल दिया 
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