पथ के साथी

Tuesday, March 18, 2014

ज़िन्दगी पहेली


सीमा स्मृति
    1
जिन लम्हों को समझ ज़िन्दगी,
जिया मैंने
आज एक अजब पहेली बन
ज़िन्दगी में हैं छाए ।
2
बरसों साथ जीने से क्या होता है
कुछ तहें साथ जीने से नहीं
वक्त की तपन में ही
खुला करती हैं।
3
गजब पहेली है ज़िन्दगी
जितनी सुलझी लगती है
उतनी ही नई बुनाई
बुन लिया करती है।
4
आज भी कुछ बीते लम्हे
प्रस्फुटित होते है नयी कोंपल बन
मन उल्लास में हिलोरे लेना चाहता है
ठीक उसी क्षण
वो वर्तमान नामक दराती से
काट डालते हैं बेदर्दी से कोंपलें।

-0-

Sunday, March 16, 2014

प्रेम में डूबी मीरा

           
 ज्योत्स्ना प्रदीप

पेण्टिंग:ज्योत्स्ना प्रदीप की माताश्री विमल जी 

प्रेम में डूबी मीरा का,दर्द मतवाला दे दो ।
सुधा समझ जिसे पी लिया,विष का वो प्याला दे दो
बचपन की हल्की धूप में ,
लिये कान्हा संग फेरे,
पावन सुख की आस लिये,
मन से हट गए अँधेरे,
उसी महाज्योति का बस थोड़ा -सा उजाला दे दो।
प्रेम में डूबी मीरा का,दर्द मतवाला दे दो ।
मीरा भटकी यहाँ -वहाँ,
जाने छिपा कहाँ प्रियतम?
चित्तौड़,मेवाड़ के मोड़ ,
द्वारका या फिर वृन्दावन !!
उन्ही भटकते पाँवों का, सिर्फ़ एक छाला दे दो ।
 प्रेम में डूबी मीरा का,दर्द मतवाला दे दो ।
मुग्धा के नयनों में प्रीत का
भरा हुआ था सागर,
पुजारिन के नेह ने ,
विषधर मे देखा वंशीधर
 उस जलधि की लहरों का बस एक उछाला दे दो।
प्रेम में डूबी मीरा का,दर्द मतवाला दे दो ।

मीरा को मिला मोहन ,
अपने मोह का क्या होगा
महामिलन की आस लिये,
इस विछोह का क्या होगा ?
मन में लय ,तानें नही, मुझे वंशीवाला दे दो ।
प्रेम में डूबी मीरा का,दर्द मतवाला दे दो ।

Wednesday, March 12, 2014

दोहा-हाइकु-माहिया और गीत का कचूमर

दोहा-हाइकु-माहिया और गीत का कचूमर
 रामेश्वर काम्बोजहिमांशु
हिन्दी साहित्य कोश में उल्लिखित( डॉ राम सिंह तोमर,हिन्दी विभाग शान्तिनिकेतन) के अनुसार दोहा मात्रिक अर्द्ध सम छन्द है। प्राकृत पैंगलम्के सन्दर्भ से आपने बताया कि  इस छ्न्द  के विषम चरणों ( प्रथम और तृतीय) में 13-13 मात्राएँ एवं सम चरणों ( दूसरे और चौथे चरण) में 11-11 मात्राएँ होती हैं। सम चरण के अन्त में तुकान्त के साथ  गुरु-लघु होना चाहिए । प्रत्येक चरणान्त में यति  होती है। विषम चरणों के आरम्भ में जगण ( 1+2+1) मात्रा क्रम नहीं होना चाहिए। तुलसी दास के दोहे का एक उदाहरण-
दुरजन दरपण सम सदा, करि देखो हिय गौर ।
( प्रथम और द्वितीय चरण-सदातथा गौरके बाद यति)
सम्मुख की गति और है, विमुख भये कछु और ॥
 ( तृतीय और चतुर्थ चरण में हैऔर औरके बाद यति)
यति अर्थात् विराम ( अर्ध विराम/ पूर्ण विराम)
यति के बिना दोहा नहीं होता है । यह यति ही दोहे को चार चरणों में बाँटती है।
कुछ अति उत्साही , यशलोभी  कलाकारों ने हाइकु का भी दोहा बनाना शुरू कर दिया है , जबकि हाइकु की प्रथम और तृतीय पंक्ति में पाँच वर्ण ( अधिकतम 10 मात्राएँ) ही हो सकते हैं। इनकी नीयत के आगे  यति गायब  हो गई और दोहे  की नियति पर संकट  छा गया ।
जूनियर कक्षा के छात्र भी दोहे के अनुशासन को जानते- समझते हैं । एक महाकवि हाइकु की टाँग तोड़कर दोहा बनाने की शल्य क्रिया में लगे थे । कुछ और भी हुआँ-हुआँ करके पीछे दौड़ पड़े कि कहीं वे इस मैराथन दौड़ में पिछड़ न जाएँ। इस भगदड़ में वे यह भी भूल गए कि दोहे के किसी भी चरण में दस मात्राएँ नहीं होती ।  यही नहीं सेदोका के दो भाग ( 5+7+7=कतौता का  आठवी शताब्दी के रूप )को अपना नाम देने का लोभ संवरण न कर पाना  इनकी इसी कलाबाज़ी का एक नायाब नमूना भी देखने को मिल जाएगा।
हाइगा में चित्र की परिधि में ही हाइकु समाया होता है , लेकिन यहाँ भी अति उत्साही लोग कम नहीं । चित्र कहीं तो हाइकु कहीं, यानी चित्र के चौखटे से   हाइकु एकदम बाहर और उसको नाम दे दिया हाइगा । हाइगा की शुरुआत करने वाले जीवित होते तो अपना सिर पीट लेते।
एक मिश्रित वाक्य से एक नहीं दो-दो हाइकु तैयार करने का कमाल भी देखने को मिल जाएगा । जब  वे दो हाइकु किसी अधमरे गीत का हिस्सा बने नज़र आते हैं तो डर लगता है कि कहीं  इनके निष्प्राण गीत को किसी की नज़र न लग जाए। अगर ऐसा हो गया तो पत्रिकाओं के पन्ने काले करने के लिए एक भीड़ उमड़ पड़ेगी , जो  पाठकों पर बहुत भारी पड़ेगी।सबका कचूमर निकल जाएगा ।
इधर कुछ ऐसे ही  लोग माहिया का भी क़त्ल करने के लिए लेखनी की तलवार लेकर खड़े हो गए ,जो हाइकु की दुर्गति पहले ही कर चुके थे । उन्हें न माहिया की लय का ज्ञान है, 12+10+12 मात्राओं के क्रम की और युग्म की  जानकारी, न पहले और तीसरे चरण की तुकान्तता की जानकारी । माहिया के मोह से ग्रस्त श्री काशिनाथ जी निर्मोही  ने  माहियामोह  में जो  उत्साह दिखाया वह पाठकों को गुमराह करने में पर्याप्त सहायक है । इन्हें जो भी कुछ सूझा ,लिख मारा । सोना का तुक दुगुना लिखना सचमुच बहुत बड़ा मज़ाक है। मात्राओं से इनका कुछ भी लेना देना नहीं। ये 12 के स्थान पर 16 और 10 के स्थान पर 14 मात्राओं का प्रयोग करके इतिहास बनाने में लगे हैं ।प्रश्न छपने की भूख का नहीं , बल्कि सबसे बड़ा संकट है पाठकों को गुमराह करने का ।

इन पंक्तियों के माध्यम से मैं कवि हृदय साथियों से यही निवेदन करना चाहता हूँ कि अच्छी रचना अपना जीवन स्वयं रचती है । तिकड़म और छपास की प्यास साहित्य नहीं है । ऐसे बहुत से साथी हैं; जो किसी की एक भी पंक्ति ( अच्छी पंक्ति) की सराहना करने से बचते हैं; लेकिन सीने में भारी हूक लिये फिरते हैं कि उनके कूड़े की भी तारीफ़ की जाए । जो अच्छा लिखता है , उसके लिए आप यदि उत्साहवर्धक दो शब्द लिखेंगे; तो वह और अच्छा लिखेगा । यदि घटिया लेखन का स्तुतिगान किया जाएगा तो उसी तरह के खर-पतवार और गाज़र घास  की फ़सल  गती जाएगी। इससे अच्छे रचनाकर्म की फ़सल भी नष्ट हो जाएगी ।प्रायोजित स्तुतियाँ करना चारण का काम हो सकता है , संवेदनशील साहित्यकार का नहीं। मेरा उद्देश्य केवल अपने साथियों को जागरूक करना है , किसी की निन्दा करना नहीं।

Thursday, March 6, 2014

मेरी नई कविताएँ

मेरी नई कविताएँ –डॉ सुधेश

1-साधक की खोज

ख़ुशामदी अवसरवादी
तोता चश्म यशलोभी
निकले आगे
और आगे और आगे
मैं धिकलता गया पीछे
और पीछे और पीछे
साधक की खोज हुई
आगे बहुत भीड़ थी
पीछे वालों में
सरस्वती की करुण दृष्टि
पड़ गई मुझ पर
बिना याचना के
मैं पाया गया
प्रथम ।
-0-

2-दु:ख कहाँ है

दु:ख सब को माँझता है
पर जो दु:ख को
काली कमाई से माँज कर
सुख की मरीचिका में बदलते
पूछते हैं-
दु:ख कहाँ है
मन का भ्रम है
भक्ति का पर्याय
परोपकार का बीज है ।
  पर उन का क्या होगा
    जो दु:ख की पहाड़ियों में दबे
    मौत माँगते हैं ?
-0-



   

Monday, March 3, 2014

रेत के आशियाँ

 रेनू सिंह  आगरा विश्वविद्यालय से एम. एस –सी. भौतिकी ।
केन्द्रीय विद्यालय आयुध उपस्कर निर्माणी की 2008 बैच  में कक्षा 12 की छात्रा रही है।मुझे कुछ समय हिन्दी शिक्षण का अवसर  मिला । केन्द्रीय माध्यमिक बोर्ड की कक्षा 12 में हिन्दी में 98% अंक लाकर  विशिष्ट प्रमाण –पत्र प्राप्त किया । यहाँ इनकी दो कविताएँ दी जा रही हैं । आशा है इनको आप सबके द्वारा प्रोत्साहन  मिलेगा।
-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
-0-

 रेनू सिंह

सच्चे लोग चले जाते हैं,
कदमों के निशाँ नहीं मिलते।
उनकी धड़कन में बसे हुए,
यादों के जहाँ नहीं मिलते।
कितना सुन्दर सपना था वो,
अक्सर जो देखा करते थे।
कितना सक्षम भव्य भारत था,
वे हरदम सोचा करते थे।
सुख व शांति के अनमोल बीज,
जहाँ-तहाँ वे उगा कर गए.
प्रेम मार्ग सदा अपनाना,
ये सीख हमें बता कर गए.
घृणा-द्वेष सब कुछ दूर हो,
ऐसा जतन किया करते थे।
क्षमादान ह़ी महादान है,
वे यह सीख दिया करते थे।
अनेक सुनहरी पुस्तकों में,
उनके नाम दोहराए जाएँगें।
जिनकी महान गाथा सुनकर,
हम अपना शीश झुकाएँगे।
स्वर्णिम काल गुजर गया है,
पर आगे नया जमाना है।
दफ़न पड़े सपनों को,
हमें अब जी कर दिखाना है।

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1-डर
डर था अगर  अँधेरे में  खोनॆ का,
 तो यूँ हसीन सपने सजा ना  होते।
 परवाह थी इन तेज हवाओं की अगर,
तो रेत के आशियाँ बनाये ना होते।
डर था अगर गिरकर चोट खाने का,
तो अपने कदम आगे  ढ़ाए ना होते
इतने ही पस्त होने थे अगर हौसले,
तो अपने  पंख यूँ फैला ना होते।
डर था अगर हारकर टूट जाने का,
तो दिये उम्मीद के जला ना होते।
थमकर यूँ ही ठहर जाना था अगर,
तो गीत खुशी के गाये ना होते।
2-ज़रूरी है
गुजरते हुए वक़्त के साथ ठहराव जरूरी है,
युग बदलेंगे, लेकिन खुद में बदलाव जरूरी है
तरक्की का परचम लहरा रहा है आसमान में,
चाँद को भी छू रहा है इन्सान ये।
पर अपनी धरती से भी जुड़ाव जरूरी है
गुजरते हुए वक़्त के साथ ठहराव जरूरी है।
मॉडर्न सोच का माहोल यूँ छा रहा है
ये विज्ञान वरदान नए मौके ला रहा है
पर अपनी संस्कृति से भी लगाव जरूरी है
गुजरते हुए वक़्त के साथ ठहराव जरूरी है।
इंसानियत खो ग है इस दौड़ में कहीं,
दिल से तो अब कोई सोचता ही नहीं।
इस बदलती सोच से अपना बचाव जरूरी है
गुजरते हुए वक़्त के साथ ठहराव जरूरी है

-0-

Thursday, February 27, 2014

वह दौर यह दौर

मंजु मिश्रा

(माँ-बाप की तरफ से कुछ शब्द अपने बड़े हो गए बच्चों के लिए आजकल घर-घर में ये फिकरे आम हो गए हैं- "you don't know mom/dad  or you won't understand it"- बस उसी अनुभव से उपजी यह कविता )
हमें नादाँ समझते हो, और ये भूल बैठे हो
हमीं ने उँगलियाँ थामीं तो तुमने चलना सीखा है
                   **
न होते हम अगर उस दौर में तो तुम जरा सोचो
गिरते और सँभलते कितनी चोटें खा गए होते
                   **
मगर ये फर्ज था माँ-बाप का, कर्जा नहीं तुम पर
न रखना बोझ दिल पर और चुकाने की न सोचो तुम
                   **
जहाँ भी तुम रहो खुशहाल बस इतनी- सी ख्वाहिश है
 हमारा क्या है अपनी जिंदगी तो जी चुके हैं हम
                   **



Tuesday, February 25, 2014

जीवन के बहाने -दो कविताएँ

1-कुर्सी और कविता
कमला निखुर्पा
कुर्सी जीने नहीं देती
कविता मरने नहीं देती
चारों पायों ने  मिलकर जकड़ रखा है
उड़ने को बेताब कदमों को

हाथों में थमी कलम
दौड़ने को विकल

कल्पना की घाटी में
जहां फूलों की महक में
कोई सन्देश छुपा है
जहां पंछियों के कलरव में
 मधुर संगीत गूंजा है
 अभी-अभी जहां बादलों ने
 सूरज से आंखमिचौली खेली है

वो प्यारी सी रंगीन डायरी
जाने कब से उपेक्षित है
धूल से सनी कोने पे पड़ी
हर रोज नजर आती है
और मैं नजरें चुरा लेती हूँ

फाइलों के ढेर में डूबती जा रही कविता
टूटती साँसों के बीच
कहीं दूर से इक हवा का झोंका
कानों में कुछ कह जाता है
बंद लिफ़ाफ़े से झाँककर
खिलखिला उठती है किताबें
किताबों में पाकर अपनी खोई सहेलियों को
फिर से जी उठती है कविता

सारे बंधनों  के बीच भी
आजादी के कुछ पल
पा लेती है कविता
जी लेती है कविता |
-0-

इस कविता को पढ़कर कुछ पंक्तियाँ अनायास कलम की नोक पर आईं, कुछ इस तरह-

2-जीने को जी चाहे ।
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

कुछ लोग हैं इतने शातिर
कि जीने नहीं देते
और कुछ है इतने प्यारे कि
प्राण होठों पे   लगे हों
मरने को मन करे
तो प्यार का इतना अमृत उडेल देते हैं कि
मरने नहीं देते ,
क्योंकि दुनिया उन्हीं के दम पर
इतनी खूबसूरत है कि
सदियों जीने को जी चाहे ।

-0-

Sunday, February 23, 2014

खूबसूरत सफ़र

अनिता ललित
1
मेरी दूर की नज़र कमज़ोर,
पास की सही !
तुम्हारी पास की नज़र कमज़ोर,
दूर की सही !
तो चलो फिर !
तुम दूर की ज़िन्दगी सँवार लो...
मैं पास की ज़िन्दगी सँवार लूँ...
अपने 'साथ' के सफ़र को ख़ूबसूरत  बना लें हम ...!!!
       2
       जब भी मेरे दिल में कोई तूफ़ानी लहर उठती है...
       मेरी नज़रें तुम्हें तलाशती हैं...
       हाथ तुम्हारा थामकर
       मैं सुकून से खुद को उस लहर के हवाले कर देती हूँ...
       तुम्हीं मेरी कश्ती, तुम्हीं पतवार..
       तुम साथ हो जब...
       मुझे डूबने का कोई डर नहीं...
       3
       जब तुम पास होते हो ...
       सबकुछ उजला-उजला लगता है,
       मैं भरी-भरी होती हूँ … !
       जब तुम पास नहीं होते...
       सबकुछ फीका-फीका हो जाता है ,
       और मैं.बिलकुल रीती हो जाती हूँ ....
      
       -0-





Wednesday, February 5, 2014

चलो मीत

रामेश्वर काम्बोज  हिमांशु
बहुत रहे हो इस जंगल में
अब तो यारो चलना होगा ।
जिसको समझा शुभ्र चाँदनी
वह सूरज है, जलना होगा ।
सोच-समझकर सदा बनाई
हमने अपनों की परिभाषा
फिर भी खाई चोट उम्रभर
अब हर शब्द बदलना होगा।
सूरज ढलता और निकलता
इसी फेर में ढली उमरिया 
चलो मीत अब बाट पुकारे
हमको दूर निकलना होगा ।
-0-
(25 दिसम्बर-2013)