राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह का आयोजन
पथ के साथी
Sunday, November 16, 2008
राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह का आयोजन
राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह का आयोजन
Tuesday, November 11, 2008
रूबाइयाँ-
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
17
हाथ सब्रो-क़रार का छूटा तेरी गली में ।
पैमाना छलकते प्यार का फूटा तेरी गली मे॥
जब मिले आज तुम मुझे अजनबी की तरह ।
टूटा हुआ साज़ और टूटा तेरी गली में ॥
18
बेमुरव्वत पर हम अपनी जाँ निसार क्या करें ।
चन्द लम्हात को भला झूठा प्यार क्या करें ॥
झुककर जिसकी फिर उठ नहीं पाई नज़र ।
पत्थर के उस बुत का दीदार क्या करें ॥
19
ज़िन्दगी के सब अहसास मिटा दिए मैंने ।
अपने मज़ार के चिराग़ खुद बुझा दिए मैंने ॥
मौत से छूटे तो हमें ज़िन्दगी ले डूबी ।
बुते काफ़िर पर सभी सज़दे लुटा दिए मैंने ॥
20
अफ़साना आँसुओं का सुनता रहा ज़माना ।
अफ़सोस कि तुम भी बेरहम हो गए हो ।
मुझको नहीं गवारा तेरा नज़रेंचुराना॥
21
चार घड़ी की ज़िन्दगी में जुल्मो-सितम ढाता है तू॥
बन सका न गर तू किसी के दर्द की मीठी दवा ।
जन्म देने वाली माँ की गोद क्यों लजाता है तू ॥
22
सिर्फ़ ईश्वर का नाम ही दु:ख-दर्द भागा देता है।
पशु को करें प्यार तो बाजी जान की लगा देता है ॥
कितना ही करो उपकार चाहे प्राण भी दे दो ।
पर हाय रे पापी इंसान तू फिर भी दगा देता है ॥
23
रोने में क्या धरा और क्या फ़रियाद करने में ।
क्या मिलेगा चाँद तुझे किसी को याद करने में ॥
अपने हाथों आशियाँ को तू लगादे आग ।
तड़पना ही मिलेगा तुझे दिल को आबाद करने में ॥
24
गहन अँधियारे में भी दीपक सदा अकेले जलता ।
नीरव नीले महाकाश में सूरज इकला चलता॥
सोता है संसार रात में चाँद जागता इकला ।
शैल-शृंग पर हिमखण्ड भी चुपके-चुपके गलता ॥
साहब का क्लर्क
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
फ़ाइलों को उलट-पलटकर
लक्ष्यबेध करता हूँ,
कुछ कागज़ चुपचाप
साहब के आगे धरता हूँ।
रहता हूँ मस्त, दिखता हूँ व्यस्त
काम न छटांक करता हूँ।
बात करता हूँ हँसकर
दूसरों के दिल में बसकर,
रोज़ खाली ज़ेब भरता हूँ ।
दस बार मुफ़्त की
चाय पीता हूँ
हूँ तो क्लर्क लेकिन
साहब की ज़िन्दगी जीता हूँ।
भगवान से डरता हूँ
सुबह उठकर पूजा करता हूँ,
दिल और दिमाग से बिल्कुल रीता हूँ ।
Tuesday, November 4, 2008
आम आदमी
आम आदमी
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
आम आदमी-
जिसे हर किसी ने
आम समझकर चूसा है ।
आम आदमी-
जिसके कन्धों पर चढ़कर
भवन बनते हैं
जिसके कन्धों पर चढ़कर लोग
सत्ता की कुर्सी पर टँगते हैं
आम आदमी-
जिसका अन्तिम कौर
गिद्ध ,कौवे और चील
जब चाहे झपटते हैं;
रिरियाने पर ऊपर से और डपटते हैं।
आम आदमी-
चौराहों पर
बेवज़ह मार खाता है
शामत किसी की आती है पर
अचानक वह मारा जाता है।
आम आदमी-
जुलूस में झण्डा उठाकर
आगे-आगे चलता है
डण्डे खाकर बीच सड़क पर गिरता है
सुखद भविष्य का सपना सँजोए
सदा बेमौत मरता है ।
वह सबका भाई
सबका सगा होता है;
इसलिए हरेक ने
केवल उसी को ठगा होता है ।
‘जागो-जागो’ कहकर
सो जाते हैं कर्णधार
कभी आकर कोई देखे-
केवल आम आदमी ही
जगा होता है ।
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
आम आदमी-
जिसे हर किसी ने
आम समझकर चूसा है ।
आम आदमी-
जिसके कन्धों पर चढ़कर
भवन बनते हैं
जिसके कन्धों पर चढ़कर लोग
सत्ता की कुर्सी पर टँगते हैं
आम आदमी-
जिसका अन्तिम कौर
गिद्ध ,कौवे और चील
जब चाहे झपटते हैं;
रिरियाने पर ऊपर से और डपटते हैं।
आम आदमी-
चौराहों पर
बेवज़ह मार खाता है
शामत किसी की आती है पर
अचानक वह मारा जाता है।
आम आदमी-
जुलूस में झण्डा उठाकर
आगे-आगे चलता है
डण्डे खाकर बीच सड़क पर गिरता है
सुखद भविष्य का सपना सँजोए
सदा बेमौत मरता है ।
वह सबका भाई
सबका सगा होता है;
इसलिए हरेक ने
केवल उसी को ठगा होता है ।
‘जागो-जागो’ कहकर
सो जाते हैं कर्णधार
कभी आकर कोई देखे-
केवल आम आदमी ही
जगा होता है ।
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