पथ के साथी

Monday, February 23, 2026

1495

 

मन की देहरीशीला मिश्रा



मेरे मन की देहरी पर,
             वे चुपके -चुपके आते हैं।
आस बँधाते, मनुहार करते,
              हौले से कुछ कह जाते हैं।
जब होता मेरा रीता -सा मन,
         साँसों की उखड़ती लय व स्पंदन,
जीवन से क्षुब्ध हो विकल नयन,
               वे आशा के दीप जलाते हैं।
मेरे मन की देहरी पर ,
              वे चुपके-चुपके आते हैं।

जब संवेदनाएँ आहत होतीं,
                  तब शब्दों में ढलने लगती हैं।
गीतों के शब्दों में गुँथी भावना,
                    पीड़ा प्रतिबिंबित करती है।
होता आंदोलित तन और मन,
               व्यर्थ- सा लगता यह जीवन।
बन उन गीतों की सुरम धुन,
                वे जीवन को महका जाते हैं।
मेरे मन की देहरी पर ,
                 वो चुपके -चुपके आते हैं।

एकांत प्रिय साथी बन जाता,
             स्वसंवाद की गठरी खुलती है।
अनवरत बहती अश्रुधारा,
               मुझसे गलबहियाँ करती है।
झिलमिल-झिलमिल बूँदे बन,
              बहती जाती मन की तड़पन।
तब सुखद समीर का झोंका बन,
                 वे कानों में गीत सुनाते हैं।
मेरे मन की देहरी पर,
                    वे चुपके-चुपके आते हैं।
    -0-

शीला मिश्रा,बी-4, सेक्टर -2,रॉयल रेसीडेंसीशाहपुरा थाने के पासबावड़ियाँलाँ ,भोपाल(म.प्र.)- 462039

-0-

3 comments:

  1. भावुक सृजन -सपना सी.पी. साहू 'स्वप्निल'

    ReplyDelete
  2. प्रभावशाली सृजन हेतु बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏
    अनुपमा त्रिपाठी
    'सुकृति '

    ReplyDelete
  3. बहुत सुंदर भावपूर्ण अभिव्यक्ति । हार्दिक बधाई । सुदर्शन रत्नाकर

    ReplyDelete