पथ के साथी
Monday, August 15, 2022
Sunday, August 14, 2022
तिरंगा प्यारा
डॉ. सुरंगमा यादव
तिरंगा प्यारा है
स्वाभिमान हमारा
इसकी खातिर मिट जाएँ
सौभाग्य हमारा है
सरहद पर लहराता है
शत्रु सदा घबराता है
वीर जवानों के तन-मन का
भूषण प्यारा है
हर घर ये लहराएगा
कोटि कंठ जय गाएगा
इसके रंग में रँगा हुआ
भूमण्डल सारा है
प्रेम-सुधा बरसाता है
सबको गले लगाता है
एक सूत्र में हमको बाँधे
जन-गण दुलारा है।
Saturday, August 13, 2022
1214
ये उदासी के बादल छँटते क्यों नहीं
अंजू खरबंदा
रात भर ठीक से सो नहीं पा रही आजकल
घर के छोटे- मोटे काम निबटा
सुबह से लेटी हूँ शिथिल तन मन से
बाहर सब्जी वाले की आवाज़ पड़ रही है कानों में
सोचती हूँ-
उठूँ जाऊँ ताजी
सब्जियाँ खरीद लाऊँ
पति मुझे अक्सर कहते हैं गाय
जो हरी भरी ताजी सब्जियाँ देखते ही खिंची चली
जाती है
ये बात मैं सभी को बताती हूँ खूब हँस- हँसकर
पर आज ये बात याद कर
एक हल्की सी मुस्कुराहट भी नहीं आई चेहरे पर!
आखिर
ये उदासी के बादल छँटते क्यों नहीं!
कुछ देर बाद गली से आती आवाजें बदलने लगती हैं
नारियल पानी....फल....!
सोचती हूँ उठूँ जाऊँ
कुछ फल ही खरीद लाऊँ
डॉक्टर भी कहते है रोज खाने चाहिए
किसी न किसी रंग के फल
पर लगता है जान ही नहीं शरीर में
उठूँ और जाऊँ बाहर
आखिर
ये उदासी के बादल छँटते क्यों नहीं !
बीच -बीच में
आवाजों का शोर रंग बदलता है
कबाड़ी वालाssss
जिप ठीक करवा लोssss
चाकू छुरी तेज करवा लोssss
कुकर रिपेयर करवा लोssss
लेटे- लेटे याद
आते है कितने ही काम
पर निर्जीव-सी पड़ी रहती हूँ पलंग पर
बस यही सोचती
आखिर
ये उदासी के बादल छँटते क्यों नहीं!
शाम गहराने लगी है
छत की ओर तकती आँखें दुखने लगी है
सोचती हूँ गुलाब जल डाल लूँ आँखों में
शायद कुछ राहत मिले
हाथ से टटोलकर
पास रखी टेबल से उठाती हूँ गुलाब जल
ड्रापर से बूँद- बूँद कर निकलती है ठंडक
मूँद लेती हूँ आँखें
चलो कुछ पल तो चैन मिलेगा
आँखों को भी और दिमाग़ को भी
सुकून की चाहत में
आँखें बंद करते ही
सोचने लगती हूँ फिर वही
ये उदासी के बादल छँटते क्यों नहीं आखिर!
-0-
Tuesday, August 9, 2022
1213-मृत्यु - कलिका
अनिमा दास
1-मृत्यु कलिका-सॉनेट -11
तुम्हारी प्रतीक्षा में समस्त विविक्षाएँ, त्याग दिए श्वास
तुम्हारे स्वागत में सुशोभित किया निर्जीव शरीर
यात्रापथ भी सुमनित होगा,शून्य होगा स्व कुटीर
प्रबल वेग में पवन,उड़ा ले जाएगा शेष कपास।
तुम्हारी प्रतीक्षा में, क्यों मूक- सी रहूँ मैं
भू-लग्ना?
तुम नर्तकी- सी मोहित कर मेरी समस्त भाव भंगिमा
करो अचल-स्थिर-वेगहीन— ऐ! मेरी सौंदर्य
प्रतिमा
मेरी कोठरी की कृष्णछाया रहेगी अब
स्मृतिमग्ना।
न करो अविश्वास मेरा; मैं अब यात्रा हेतु हूँ प्रस्तुत
हाँ देखो! मंदराचल पर है अद्भुत प्रकाश
की छवि
निश्चिह्न हो जाएगा एक काव्य-मेघ; एक प्रिय कवि
तुम्हारी प्रतीक्षा में..प्रकृतिमयी धरा
भी है परिप्लुत।
ऐ! मेरी मृत्यु कलिका..प्रस्फुटित ईशान्य
की मल्लिका
तुम्हारी सुगंध से सुगंधित हो रही मेरी
तनु तंत्रिका ।।
मृत्यु कलिका -12 सॉनेट
प्रातः विभास में तुम्हारा मुख्यमंडल ; दिवस भर की प्रतीक्षा
शून्य शिविर में ढहते आश्वासन की
तीर...मन का पीर
बढ़ जाता है क्षण क्षण में हृदय -कोटर का
स्वर असह्य अधीर
स्थूल शरीर में निशा गरजती..निद्रा में
जाती एक अन्वीक्षा।
वही अन्वीक्षा..कालरात्र में.. कालकोष्ठ
में .. युगों से मुक्ति की
तुम एक विद्युत्- सी चमकती हो, हो जाती अदृश्य कोलाहल में
शुष्क शाखाओं के तुहिन कणों में.. होती
हो विलीन कोंपल में
तुम रुद्ध करती छल का कपाट,मैं सुनती ध्वनि अभियुक्ति की।
समस्त सरोवर हैं शोभित शतदल से.. है
स्वर्गपथ आलोकित
भ्रम इस मिथ्या जगत का,हो रहा आकाश में चूर्ण-विचूर्ण
स्वल्प समय का यह उपन्यास दे रहा तुम्हे
उपसंहार भी पूर्ण
आओ! इस अतृप्त आत्मकल्प को करो स्पर्श..करो
मुदित।
हो पुष्पित तुम,ऐ मृत्यु कलिका!क्योंकि हूँ मैं अनंत अभिशप्ता
क्या अमर्त्य-अमृत में नहीं होगी लीन,मेरी शेष कथा-परितप्ता?
-0- कटक, ओड़िशा
Wednesday, August 3, 2022
1212-दोहे
दोहे
आशा पाण्डेय
1
जीवन पल-पल बीतता, बुझी न मन की प्यास,
हर
पल नश्तर चुभ रहे, पर आँखों
में आस।
2
जीवन
सारा होम कर, पाई केवल
राख,
पाई-पाई
दे दिया, फिर भी
बिगड़ी साख।
3
अक्षर-अक्षर
ब्रह्म है, बोलो सोच
विचार
कभी
तरल करते हृदय, करते कभी
प्रहार।
4
बया
बनाती घोंसला, डाली- बेर, बबूल
घर
बुनने में है मगन, काँटे जाती
भूल।
5
शब्द-शब्द
में विष भरा, उतरे दिल
के पार
जीवन
भर आहत करे, एक बार
का वार।
6
थोड़ी-सी
हो वेदना, थोड़ा-सा
अनुराग
पर-दुःख
से दिल हो दुखी, तब सोहे
वैराग।
7
पीकर
अश्रु हँसे नयन, मजबूरी
की बात
वरना
किसकी चाह है, रोते बीते
रात।
8
दुनियादारी
सीख ली, पाकर इतने
घात
कोमल
मन पीछे छुपा, अब तौलूं
हर बात।
9
सींचा
जिसको प्रेम से, माली ने
दिन रात
वही
चुभाता है उसे, काँटों
की सौगात।
10
बादल
घिरते देख कर, होता खुशी किसान
बरखा
में कैसे हँसे, जिनके नहीं
मकान।
12
किया
नयापन शहर का, सारे पेड़
कटाय
घर
से है बेघर हुआ, उड़ि-उड़ि
पंछी जाय।
13
कल-कल
की ये सुखद धुन, संगम तट
की शाम
भारद्वाज
ऋषि से मिले, यहीं कहीं थे राम।
14
दिवस
ठिठुरने अब लगा, संझा हुई
उदास
जला
आग बतिया रहे, घुलने लगी
मिठास।
15
दिन
छोटा होने लगा, रातें लम्बी
होंय
तनकर
रहना है कठिन, ठिठुरे
हैं सब कोय।
16
हर
रिश्ते नाते यहाँ, करते आज
हिसाब
गणना
में कमजोर मैं, कैसे होऊँ
पास।
17
जो
अपनों से दूर हैं, वह जाने
हैं मोल
अपनों–सा
कोई नहीं, चाहे कड़ुवे बोल।
18
कुछ
रिश्तों की नोंक में, होता तीखापन
जीवन
भर चुभते रहे, मिले ना
अपनापन।
19
घर
की दीवारें ढहीं, दरक उठा दालान
आँगन
में चूल्हे बँटे,
सिसक रहा खलिहान।
20
लिख-लिख
कागज फाड़ते, लिख ना
पाई बात
कैसे
अक्षर बोलते, खाए दिल आघात।
21
जगा
न पाई मैं कभी, अंतर में
विश्वास
भले
ओढ़ते तुम रहे,
अधरों पर मृदु हास।
22
दिया
जलाती लेखनी, अक्षर-अक्षर
तेल
बाती
बन लेखक जले, नहीं सरल
यह खेल।
23
यह
संसार जगा रहे, लेखक करे
प्रयास
सोए ना संवेदना, मानवता की आस।
24
जिस
पथ अँधियारा घिरा, नहीं रोशनी
शेष
वहीं
दीप बन जल उठे, लेखनी यह
अशेष।
25
पानी
सूखा आँख का, डूब गया
संसार
हार
गई संवेदना, घातक है
यह मार।
26
मौन
बड़ा मारक हुआ, शब्द हुए
बेकार
मोटी
पलकें हैं झुकी, करतीं कड़ा
प्रहार।
27
साँझ
हुई पक्षी उड़े, अपने घर
की ओर
बच्चे
रस्ता देखते, बंधी हुई
है डोर।
28
शांति
दिलाती झोपड़ी, महल दुखों
की खान
प्रेम
गरीबी को मिला, धन को झूठी
शान।
29
टहनी
से टूटा हुआ, पत्ता पड़ा
उदास
बस
इतने दिन ही लिखा, अपना यहाँ
निवास।
30
पग-पग
ठोकर मिल रहा और घाट-प्रतिघात
बीच
इसी के खोज तू, प्रेम पगी
दो बात।
-0-आशा
पाण्डेय, अमरावती, महाराष्ट्र
Tuesday, August 2, 2022
1211- पंचतत्त्व और विचार
एक
ने दूजे से कहा-
जीवन की डोर का क्या ?
कब
समाप्त हो जाए ?
दूसरे
ने कहा- सही बात है
मगर
मैं तो सदा यहीं रहूँगा
सृष्टि
के कण- कण में
तुम्हारे
बिल्कुल क़रीब
मुझे
देख सकोगे, कभी फूल देखोगे,
तो
उनमें मुस्काता,
महकता
नज़र आऊँगा
कभी
सूर्य की किरणें बनकर
तुम्हारे
चेहरे को छू लूँगा
और
चेहरे पर अरुणाभा बनके
बिखर जाऊँगा।
कभी
सरसराती हवा का झोंका बनकर
तुम्हारे
इर्द-गिर्द
मँडराया करूँगा
और
हौले से छेड़ जाया करूँगा
गुदगुदी
करके बारिश के मौसम में
कानों
में सरगोशी करके
रचूँगा बचे हुए
कई ग्रन्थ,
जब
बूँदे पड़ेंगी मिट्टी पर
उनसे
मेरे तन की
महक
आएगी तुम्हें ,
अपनी साँसों
के क़रीब ही
महसूस
करोगी मुझे।
सृष्टि
के कण-कण में
मेरे ही तत्व घूमा करेंगे..
तुम्हारे
वजूद के आसपास ।
मैं
तुम्हारे शब्दों में लिखा जाऊँगा
जाने
कितने विचार
मुझसे
होकर गुज़रेंगे
तुम्हारे
मानस- पटल तक पहुँचेंगे
जब-जब
शब्दों की माला
गुम्फित
होकर सबको
महकाएगी
मैं
अनन्त छोर से मुस्काकर
ओंस
बनकर बरसूँगा
चूमने
को तुम्हारे
कलात्मक, नीलदेवी
अनुकम्पित
हाथ।
हर
दृश्य में मैं समा जाऊँगा
बोलो
मुझसे कहाँ तक
बच
पाओगे भला?
मैं
तो पंच तत्व से निर्मित हूँ
बिखर
कर फैल जाऊँगा हर जगह पर,
तुम
मुझे भूल ही नहीं सकते
शब्दों
से शब्दों का अटूट
नाता
है, ये जानते हो
तो
भविष्य का सोचकर कोई
भी
शोक क्यों ?
जो
चीज़ सदा ही पास रहनी है
उसकी
चिंता ही क्यों ?
मैं
अमर हूँ,अजर हूँ क्योंकि
पंच
तत्व में विलीन हूँ
मुझे महसूस करोगे,
तो स्वयं के निकट ही पाओगे।
-0-
Thursday, July 28, 2022
1210
माँ
-रश्मि विभा त्रिपाठी
अपने सारे सुख- आराम
तुमने मेरे लिए छोड़े
सारे के सारे पैसे
मेरे लिए जोड़े
और खरीदी हैं मेरे लिए
खुशियाँ तमाम
माँ तुम्हें मेरा सलाम!
मुझे जनम देकर
नई दुनिया दिखाई
तुम्हारे लिए मैं
परियों के देश से आई
मैं राजकुमारी तुम्हारे महल की
बेटी नहीं हूँ आम
माँ तुम्हें मेरा सलाम!
मेरी आवाज में
घुला तुम्हारा स्वर है
मुझे बस इतनी खबर है
कि तुम खिल उठती हो फूलों- सी
दोहराकर मेरा नाम
माँ तुम्हें मेरा सलाम!
मेरी आँखों ने जो देखा
पलकों पे पढ़के सपनों की रेखा
उन सपनों को पूरा करना
होता तुम्हारा काम
माँ तुम्हें मेरा सलाम!
मुझे आगे बढ़ाने में
शिखर पर चढ़ाने में
तुमने कितनी कड़ी मेहनत की है
दिन- रात, सुबह- शाम
माँ तुम्हें मेरा सलाम!
मिली मुझे जो कामयाबी
उसकी तुम एक चाबी
तुम्हारे सागर- से गहरे प्यार का है माँ
ये सीप के मोती- सा ईनाम
माँ तुम्हें मेरा सलाम!





