पथ के साथी

Tuesday, December 7, 2021

1164

 डॉ.जेन्नी शबनम की क्षणिकाएँ

1.चाँद का दाग़

 


ऐ चाँद! तेरे माथे पर जो दाग़ है 

क्या मैंने तुम्हें मारा था

अम्मा कहती है -मैं बहुत शैतान थी 

और कुछ भी कर सकती थी। 

 

2- शगुन

 

हवा हर सुबह चुप्पी ओढ़ 

अँजुरी में अमृत भर 

सूर्य को अर्पित करती है 

पर सूरज है कि जलने के सिवा 

कोई शगुन नहीं देता।  

 

3- उजाला पी लूँ 

चाहती हूँ दिन के उजाले की कुछ किरणें

मुट्ठी में बंद कर लूँ
जब घनी काली रातें लिपटकर डराती हों मुझे
मुट्ठी खोल, थोड़ा उजाला पी लूँ
थोड़ी-सी, ज़िन्दगी जी लूँ।

 

4-शुभ-शुभ

 

हज़ारों उपायमन्नतेंटोटके 

अपनों ने किए ताकि अशुभ हो,  

मगर ग़ैरों की बलाएँपरायों की शुभकामनाएँ   

निःसंदेह कहीं तो जाकर लगती हैं 
वर्ना जीवन में शुभ-शुभ कहाँ से होता।  

 

5-स्त्री की डायरी

 

स्त्री की डायरी उसका सच नहीं बाँचती    

स्त्री की डायरी में उसका सच अलिखित छपा होता है  
इसे वही पढ़ सकता हैजिसे वो चाहेगी,   
भले ही दुनिया अपने मनमाफ़िक़  
उसकी डायरी में हर्फ़ अंकित कर ले।   

 

6- सुख-दुःख जुटाया है  
  

तिनका-तिनका जोड़कर सुख-दुःख जुटाया है   

सुख कभी-कभी झाँककर   

अपने होने का एहसास कराता है   

दुःख सोचता है कभी तो मैं भूलूँ उसे   

ज़रा देर वो आराम करे 
मेरे मायके की टिन की पेटी में।

-0-

Saturday, December 4, 2021

1163

 

 ज़िन्दगी- प्रीति अग्रवाल


ये नज़र, जाए जहाँ तक, सब धुँआ- सा लग रहा
इस शहर में, हर कोई, क्यों, लापता- सा लग रहा

खोए- खोए हैं सभी, हर शख़्स ही हैरान है
अमन ओ चैन का यहाँ, न नाम, और निशान है

शून्य आँखों में बसा है, सूरतों पर है थकान
दिल हैं झोंपड़ी से, आलिशान, ऊँचे हैं मकान

बेतहाशा दौड़ता, हर आदमी बेहाल है
बेलगाम ख़्वाहिशों का, यह सुनहरा जाल है

किस मोल पर है क्या मिला, ये सोचता, कोई नहीं
मंज़िलों की चाहतों में, खो रहे, खुद को सभी

यूँ तो सब के पास सब है, वक़्त की बस, है कमी
सांस केवल चल रही हो, ज़िन्दगी, ये तो नहीं

कल की रट में आदमी, है आज को झुठला रहा
जो भी है, बस आज है, न समझ, न समझा रहा

बेखबर को जब खबर होगी, कि जीवन क्यों मिला
सांझ करती होगी रस्ता, रात आने के लिए

इक दफा जो रात ने, अपना ठिकाना कर लिया
आएगा 'कल', या न आए, कोई न बतला सका

जो है तेरे पास, ले आनन्द, उसे सम्मान दे
'और' की रट छोड़, जो है, वो बहुत, ये मान ले

कल नहीं है, वो न आएगा कभी, तू जान ले
जो है केवल 'आज' ही है, जान और पहचान ले

कल की रट को छोड़, तू, इस दिन की डोरी थाम ले
जो है, वो ही है बहुत, इस बात को, तू मान ले!!

-0-

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Friday, December 3, 2021

1162-तीन कविताएँ

1-शर्तों के कंधों पर-डॉ.सुरंगमा यादव

रत का हथियार दिखाकर
गीत प्रेम के गाते गाओ
हम बारूद बिछाते जाएँ
तुम गुलाब की फसल उगाओ
लपटों में हम घी डालेंगे
अग्नि- परीक्षा तुम दे जाओ
ठेकेदार हैं हम नदिया के
तुम  प्यास लगे कुआँ खुदवा
हम सोपानों पर चढ़ जाएँ
तुम धरती पर दृष्टि गड़ा
माला हम बिखराएँ तो क्या!
मोती तुम फिर चुनते जाओ
सिंहासन पर हम बैठेंगे
तुम चाहो पाया बन जाओ
फूलों पर हम हक रखते हैं
तुम काँटों से दिल बहलाओ
अधिकारों का दर्प हमें है
तुम कर्त्तव्य निभाते जाओ
करो शिकायत कभी कोई न
अधरों पर मुस्कान सजाओ
मन भरमाया,समझ न पाया

हम समझें कोई जतन बताओ
अब मत शर्तों के कंधों पर

संबंधों का बोझ उठाओ

-0-

 2-सविता अग्रवाल 'सवि' कैनेडा 

1

अनगढ़ी प्रणय की दीवार

टूटी साँसों की लड़ियाँ

मधु यामिनी के स्वप्न रीते

वंचना से, भाव भीगे

सूखे पड़े हैं सुमन सारे

प्रतिकार में वायु बही है

बहती नदी की तीव्र धारा

अभिशाप सिक्त

पथ रोके खड़ी है

2

यंत्रों की मची है दौड़

प्रतिस्पर्धा की होड़

अपनत्व हुआ लुप्त

खोया स्वर्णिम प्रकाश

अभिशप्त हो रहा

मानव अस्तित्व

पाने- खोने की ये

कैसी आँख- मिचौनी

जीवन बन गया है

करुणामय कहानी

-0-

Monday, November 29, 2021

1161- दर्द का अनुवाद

 सुशीला शील राणा



रह-रह कर उठती है हूक

कहाँ रही कमी

कहाँ गए हम चूक

क्यों हैं दूर

दिल के टुकड़े दिल से

 

घण्टों उन्मन- सा बैठा

अकसर सोचता है मन

आँसू ही बोलते हैं

ज़बान तो बैठी है

दिन-महीने-साल से

चुप-चुप-सी

इस एक सवाल पर

बिल्कुल मौन

मूक

 

 

बेटों की दोस्ती

बनाएगी पुल

यही सोच

सरल-सा मन

हुआ प्रफुल्ल

किंतु मिले कुछ दाग़

कुछ बदगुमानियाँ

कुछ इल्ज़ामात

कुछ सजाएँ

उन ग़लतियों की

जो की ही नहीं

कहीं थीं ही नहीं

 

 

थीं तो बस बढ़ती उम्र की 

अकेलेपन की दुश्वारियाँ

नीम अँधेरों में

डरते-डराते सपनों की

डरावनी परछाइयाँ

 

मिला कोई अपना-सा

जागा सोया सपना- सा

चाहा था फ़क़त साथ

उठे बेग़ैरत सवालात

न जाने कहाँ से, क्यों

चले आए कुछ लांछन

ज़मीन-ज़ेवर-जायदाद

 

 

हमने चुना इक मोती

हमदर्द, जीवन-साथी

ख़ुशी-ख़ुशी सौंपी वारिसों को

उनकी ही थी जो विरासत

कार-कोठी-गहने

जो नहीं थे मेरे अपने

  

मेरे अंशी, मेरे वारिसो

हमारी दौलत ही नहीं

हम भी तुम्हारे हैं

सब कुछ सौंपकर तुम्हें

बस अपना बुढ़ापा सँवारा है

फिर क्यों ये परायापन

क्यों खींच दी हैं दूरियाँ

आँखों ही आँखों में

दिन-दिन घुटते आँसू

बेवज़ह की मज़बूरियाँ

 

तुम बिन

दिल का इक कोना

मन का आँगन सूना है

हमारी अधूरी ख़ुशियाँ

देखती हैं राह

कि कभी तो समझेगा 

हमारा ख़ून

हमारे दर्द

कभी तो महसूस करेगा

अवसाद की ओर 

धीमी मौत की ओर धकेलते

तन्हा दिन

डराती-सी लंबी अँधेरी रातें

  

सहेज लो अपने बुजुर्गों को

उसी तरह

जिस तरह

सहेज ली हैं तुमने

उनकी सब निशानियाँ

सब दौलतें

सब विरासतें ।

Saturday, November 27, 2021

1160

 अनिमा दास ( कटक, ओड़िशा)

सॉनेट

1-मैं एवं तुम

 

मैं यदि अदीप्त वर्तिका- सी तुम आलोकमय प्रेम प्रदीप


मैं तीर लाँघती ऊँची लहर यदि
, तुम निश्चल पर्वत अटल

मैं हूँ क्रंदनरत अधरों के अस्पष्ट शब्द का शून्य अंतरीप

हो तुम विस्तृत आकाशगंगा का प्रकाशमान दिव्य पटल

 

तुम हो अनुरक्त ज्योत्स्ना के स्निग्ध स्पर्श से झरते तुषार

सिक्त शैवाल  का भग्न मोह -सा अनासक्त प्राचीन  कवि

मैं शून्य विग्रह में अश्रुत  अंतर्नाद का  विक्षिप्त  आकार

हूँ मैं एकाकी हृदय में क्षुब्ध अरुणी की अर्ध अंकित छवि

 

मैं कालगर्भ में समाहित जीवंत अक्षरों की अपूर्ण कहानी

एक अभाषित कल्पना की हूँ असह्य करुण रिक्त कविता

तुम आद्य सृष्टि में अंतर्हित स्वर्गीय श्लोक के  चिर ध्यानी !

हो तुम जगत विदित नित्य भासित वह्निमय पूर्ण सविता

 

भ्रम मूर्ति को कर त्याग मैं आज, देवालय मुक्त हो जाऊँ

मैं ईश्वर नहीं हूँ, अहं का विश्व हूँ, मृतवत् मैं  भी सो जाऊँ ।

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कविताएँ

1-स्वयंसिद्धा

 

मुझे उच्छृंखल न कहो...

तुम पुरुषत्व की नारीत्व के साथ 

तुलना भी न करो

 

जैसे तुम नहीं अनुभव करते

क्षत का क्षरण

वैसे मुझे भी नहीं होता अनुभूत

स्वेद सिक्त रण

 

तुम किसी भी रूप में

अहंकारी रहोगे; क्योंकि 

यह तुम्हारी है मौलिक प्रकृति 

किंतु मैं रहूँगी

स्वयंसिद्धा किसी भी स्थिति में

 

मैं नहीं होऊँगी निंदित

किन्हीं प्राकृतिक कारणों द्वारा

किंतु तुम्हारा पश्चाताप

शुष्क चक्षु विवर में

विवशता लिये

मेरा अवश्य करेगा

अन्वेषण...

यह मुझे आदिम युग से

है ज्ञात...

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2-क्लांत मैं  

 

पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए

श्रांत- क्लांत मयंक से 

यह प्रश्न न करो

कि आज इस सरोवर में 

क्यों उसका मुखमंडल 

दिखता मलिन 

क्यों अनेकों विचारों में है वह 

तल्लीन

 

कई वर्षों में एक बार 

सुगंधित पारिजात- सा 

जब हृदय- उपवन महक उठे 

तो यह प्रश्न न करो 

कि क्यों आज इस 

तपस्विनी देह पर है 

बासंती मधुरिमा 

क्यों विरही मन में खिल उठी 

पूर्णिमा

 

वारिदों में नित्य होते 

घनीभूत कई जल बिंदु

कई नद होते समर्पित 

उदधि की तरंगों में 

कई कलिकाएँ 

उत्सर्ग होतीं संसर्ग में

ये स्वयं ही आवेष्टित हैं 

अनंत प्रश्नों से

एवं उत्तरित हैं एकांत की शून्यता में।  

 

परंतु, नित्य दिवा-रश्मि में 

तपती स्वर्णिम बालुका को 

कर नहीं पाती यह प्रश्न 

कि क्यों दहनशील हैं 

तुम्हारी आकांक्षाएँ

क्यों करती प्रतीक्षा शीतलता की 

तुम्हारी विवक्षाएँ

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animadas341@ gmail.com

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Friday, November 26, 2021

1159-विलीन हो जाऊँ ऐसे

 रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' 

































विलीन हो जाऊँ ऐसे

बसे रहो सदा मेरी चेतना में
धरती में बीज की तरह
अम्बर में प्रणव की तरह
सिंधु में अग्नि की तरह
हृदय में सुधियों की तरह
कण्ठ में गीत की तरह
नेत्रों में  ज्योति की
परछाई में मीत की तरह
जन्म जन्मांतर तक
कि
जब भी मिलना हो तुमसे
आकाश-सी बाहें  फैलाकर मिलूँ
विलीन हो जाऊँ 
हर जन्म में
केवल तुम में
जैसा आत्मा मिल जाती है
परमात्मा में
(19 -11 -21)














Wednesday, November 24, 2021

1158-हरभगवान चावला की कविताएँ

21 नवम्बर- 2021

आज पत्रकार रामचंद्र छत्रपति का शहीदी दिवस है। मैंने अपनी एक कविता पुस्तक 'जहाँ कोई सरहद न हो' उन्हें समर्पित की है। आज इसी पुस्तक की पहली कविता 'मैं कवि हूँ' प्रस्तुत कर रहा हूँ। इस कविता की पृष्ठभूमि बताना ज़रूरी है। छत्रपति जी की शहादत 2002 में हुई। मेरे शहर के कवियों ने उन पर काफ़ी कविताएँ लिखीं। कुछ ऐसे भी थे, जो उनके हर शहादत दिवस पर आँसुओं में डूबी कविताएँ लिखते और उन्हें महान क्रांतिकारी बताते। शायद 2010 का साल था। हमें पता चला कि जिस धर्मगुरु पर छत्रपति की हत्या का आरोप है और मुकद्दमा चल रहा है (बाद में इसी केस में उसे सज़ा सुनाई गई), उसी के आश्रम में एक कवि सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है और उसमें मेरे शहर के कई कवि शामिल हो रहे हैं। इनमें वे कवि भी शामिल थे, जो छत्रपति पर हर साल कविता लिखा करते थे। ये न केवल शामिल थे, बल्कि उनकी ओर से कवियों को आमन्त्रित भी कर रहे थे। ज़ाहिर है कि गुस्सा आता। आया। इन लोगों से सीधी मुठभेड़ हुई। स्वर्गीय पूरन मुद्गल जी हम लोगों का नेतृत्व कर रहे थे। इन कवियों के तर्क बड़े बचकाना थे। उनके अनुसार साहित्य को सब चीज़ों से निर्लिप्त होना चाहिए। क़िस्सा कोताह यह कि उनके लिए यह आयोजन गुनाह बेलज़्ज़त साबित हुआ, क्योंकि ठीक उसी दिन कोई और कांड हो गया और कवि सम्मेलन हुआ ही नहीं। जिस दिन मुझे इस संभावित आयोजन की जानकारी मिली थी, स्वाभाविक रूप से ग़ुस्सा आया था। उसी ग़ुस्से की उपज है यह कविता :

 

मैं कवि हूँ

 

मैं कवि हूँ

और जैसी कि कहावत है

मैं वहाँ भी पहुँच जाता हूं

जहाँ रवि नहीं पहुँचता

मैं पहुँच जाता हूँ उस गहन गुफ़ा में भी

जहाँ पहुँच सकने का सपना

धूप भी नहीं देखती

 

मैं कवि हूँ

मुझमें कुलबुलाती हैं मानवीय संवेदनाएँ

इन्सानियत के लिए लड़ते हुए

जब मारा जाता है कोई सच्चा इन्सान

तो मैं ज़ार-ज़ार रोता हूँ

लिखता हूँ उसके लिए शोक-गीत

अगले ही दिन हत्यारे के दरबार में

हत्यारे को ईश्वर बताकर

ऊँची आवाज़ में गाता हूं प्रशस्ति-गान

और तरसता हूँ कि हत्यारे के मुख से

मेरे लिए निकले आह! वाह!

 

मेरे भीतर

किनारे तोड़कर बहती है

संवेदना की नदी

हर समय इस्तेमाल के लिए

तत्पर है इस नदी का जल

फिर इस्तेमाल करने वाला

कोई हत्यारा भी हो तो क्या

 

मैं कवि हूँ

बढ़कर हूँ रवि से

रवि अँधेरे का सिर्फ़ हरण करता है

मैं तो अँधेरा उगलता भी हूँ

पर कभी-कभी उस अँधेरे में

अचानक दुस्वप्न सा कौंध जाता है सूरज

मुझे तब कुछ दिखाई नहीं देता

सिर्फ़ सुनाई देती है एक आवाज़-

'धिक्कार है कि तुम कवि हो।'

-0-

2-क्षणिकाएँ

हरभगवान चावला

1-चुप

 

चुप

निश्चल और निरंतर चुप

पथरा हुई चुप पर

तुम्हारा ख़याल

पानी की बूँद की मानिंद आता है

और टप से टपककर

पथरा चुप को

उदास कर जाता है।

2

तुम बिन

 

मैं चाक़ू से पहाड़ काटता रहा

अँजुरियों से समुद्र नापता रहा

हथेलियों से ठेलता रहा रेगिस्तान

कंधों पर ढोता रहा आसमान

यूँ बीते

ये दिन

तुम बिन।

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