पथ के साथी

Tuesday, December 15, 2015

602



1-अपनापन
कृष्णा वर्मा

समझ लेता
कभी थोड़ा- सा
जो मेरे मन को
तुम्हारा
सलीकेदार अपनापन
मिट जाती
मेरे दिल की सलेट पे
लिखी शिकायतें
थाम लेता यदि
भूले से कभी
मेरे काँधे को
तुम्हारा
विश्वास- भरा हाथ
सिकुड़ जातीं
मेरी परेशानियाँ
और फूल जाता
गर्व से
मेरी तसल्लियों का सीना
बिछ जाती
पाँव के नीचे
नर्म धूप
रोज़ रात
मेरी खिड़की की
सलाखों पे
आ टिकता चाँद
और रचने लगती
मेरी रिक्तता
फिर
कोई अभिनव गीत।
-0-
2-डॉ कविता भट्ट
द्रुपदा अब भी रोती है

बाल पकड़कर मुझे घसीटा आज कहाँ रनिवास गया
सम्मान गया, विश्वास गया, आशा का प्रश्वा गया

रक्त बिन्दुओ की धारा- सा, हाय! ये सिंदूर धधकता है
जो कंगन तुमने पहनाया, वही उपहास तुम्हारा करता है

हे आर्य! अर्धांगिनी तुम्हारी विवश विलाप ये करती है
एक नारी पर कौरव शत्रु सभा आज प्रलाप ये करती है
  
सिंहासन सत्ता के मद का इतिहास कलुषित रोता है
किन्नर है वह स्त्री कलुषक उसमे पौरुष नहीं होता है

लाज मेरी नही, ग तुम्हारी, क्यों बैठे हो मौन धरे
चीर नही जब बचा पाए तो, फिर तुम मेरे कौन अरे

कोई महल की वस्तु समझकर, नारी पर दाँव लगाते हो
शत्रु नहीं दोषी तुम हो, पौरुष दंभ में गोते खाते हो     

धर्मराज धिक्कार पांचों पर, जुआरियों का धर्म निभाया
स्त्री का मान सामान बना, पुरुषों ने कीच में कर्म डुबाया

भरतवंश, नारीपूजन ग्रन्थ का पन्ना काला करने वालों
चीखती-रोती द्रुपदा अभी भी है, सभ्यता का दम भरने वालो
-0-
दर्शनशास्त्र विभाग,हे न ब गढ़वाल विश्वविद्यालय
श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड
संपर्क सूत्र- mrs.kavitabhatt@gmail.com
-0-

3-मंजूषा 'मन'

दरिया थे
मीठे इतने कि
प्यास बुझाते
निर्मल कि पाप धो जाते
अनवरत बहे
कभी न थके
निर्वाध गति से
भागते रहे
सागर की चाह में
मिलन की आस में
न सोचा कभी
परिणाम क्या होगा
मेरा क्या होगा।
अपनी धुन में
दुर्गम राहें,
सब बाधाएं
सहीं हंस के
और अंत में
जा ही मिले
सागर के गले।
पर हाय!!
स्वयं को मिटाया
क्या पाया
ये क्या हाथ आया
कि
खारा निकला सागर
खाली रह गई
मन की गागर।
-0-

Tuesday, December 8, 2015

601



1-मंजूषा मन

दरिया थे
मीठे इतने कि
प्यास बुझाते
निर्मल कि पाप धो जाते
अनवरत बहे
कभी न थके
निर्बाध  गति से
भागते रहे
सागर की चाह में
मिलन की आस में
न सोचा कभी
परिणाम क्या होगा
मेरा क्या होगा।
अपनी धुन में
दुर्गम राहें,
सब बाधाएँ
सहीं हँस।के
और अंत में
जा ही मिले
सागर के गले।
पर हाय!!
स्वयं को मिटाया
क्या पाया
ये क्या हाथ आया
कि
खारा निकला सागर
खाली रह गई
मन की गागर।
-0-
2- कचरा बीनते बच्चे
-कमला घटाऔरा


 हे ! प्रभु ,
यह कैसी छबि
मेरे देश के नौनिहालों की।
माँ के कोमल कर नही जगातें उन्हें
दे कर वात्सल्य भरा मृदुल स्पर्श।
उठ जातें हैं अपने आप
उदित होती सूर्य -किरणों के साथ।
पेट की भूख गुद -गुदा देती है उन्हें
कर देती है विवश उठने को
एक झपकी और ले लें
नहीं चाह सकते इतना भी।
पलने वाले हैं झुँगी झोपड़ियों के
अभावों के आँगन में ,
ध्येय जीने का उन्हें लगता है
बस पेट की  भूख मिटाना।
रात कटती है जैसे तैसे
लम्बी पहाड़- सी तारे देखते
सोचते कब हो उजाला
चलें काम पर।
भोर उगते ही देख नभ में लाली
चल पड़ते कर्मयोगी की तरह
कन्धों पर उठाये
खाद के फटे पुराने बोरे।
भरना है जिनमें उन्हें
टूटा-फूटा काँच,बेकार लोहा
चिथड़ी हुई प्लास्टिक की बोतलें ,
उनके पैरों में गति भर देती है
चढ़ती सूर्य - किरणें।
मन में उठने वाली चिंता
कहीं उन से पहले पहुँच न जा
कचरा उठाने वाली गाड़ी।
उन्हें खाली हाथ लौटा दे।
और उन्हें -आज का दिन
बिताना पड़े भूखे रहकर 
प्रतीक्षा में अगले दिन की।
नहीं लिखा नसीब में उनके
जाएँ स्कूल, उठायें बस्ते
खेले -कूदें मस्ती से जियें
हीं जानते मायने बचपन के।
उनका रुखा सूखा मुरझाया चेहरा
पूछता हो अपने आप से जैसे,
हमें इतनी भूख क्यों लगती है ?
-0-

Saturday, December 5, 2015

600




1-एक शिकायत भागते समय से
कमला निखुर्पा


समय,चलो ना संग मेरे

कहाँ छिपे हो तुम ?



साथ रहते हो हर पल

पर साथ क्यों नहीं चलते ?



हर बार हाथ छुड़ाकर

निकल जाते हो बेवफा की तरह ।



भागती रहती हूँ तुम्हारे पीछे

पर तुम हो कि...

पीछे मुड़कर देखते ही नहीं ।



हमेशा हार जाती हूँ रेस

जीवन के मैदान में ।

केवल इसलिए

कि तुम कभी पास होते ही नहीं ।

कि तुम कभी साथ देते ही नहीं ।



क्या पता

रिश्तों की भीड़ में

अनजाने से अपनों के संग।

कदम से कदम मिला कर चलने की नाकाम कोशिश

हो ना जाए भंग ।



बिखर ना जाए

नाजुक सा अस्तित्व...

केवल इसीलिए

पुकार रही कब से ...



कि ओ समय रे !

साथ चलो ना मेरे

जता सकूँ सबको

बता सकूँ सबको

हाँ समय है मेरे पास ।

आओ बैठो भी साथ

कह भी दो मन की बात ।



ख़त्म होंगे सारे शिकवे

समय चलो ना संग मेरे ।
-0-
प्राचार्या , केन्द्रीय विद्यालय नं 2, कृभको, सूरत ( गुजरात)
04 दिसंबर 2015