पथ के साथी

Sunday, June 8, 2014

कविता का इन्तजार


 कमला निखुर्पा

कविता कहाँ हो तुम ?
पता है  तुम्हे ?
कितनी अकेली हो गई हूँ मैं तुम्हारे बगैर .
आओ ना ...

कलम कब से तुम्हारे इन्जार में सूख रही है और मैं भी ...
ये नीरस दिनचर्या और ये मन पर मनों बोझ तनाव का ..
हर रोज गहरे अँधेरे कुंए में धकेलते जाते हैं ..
आओ ..उदासी के गह्वर से निकाल , कल्पना के गगन की सैर कराओ ना ...

ये शहर, ये कोलाहल, धुआँ उगलती ये चिमनियाँ
हर रोज दम घोट रही हैं
आओ .. भावों की बयार बहा जीवन शीतल कर जाओ ना .....

देखो वो डायरी , धूल से सनी, सोई पड़ी है कब से 
शब्दों के सितारों से सजा उसे जगाओ ना ..
आओ छंदों की पायल पहन 
गुंजा दो मन का सूना आँगन 

कि कलम भी नाचे
भावना भी बहे
कल्पना के पंख सैर कराएँ त्रिभुवन की
कविता अब आ भी जाओ
मैं जोह रही हूँ बाट तुम्हारी
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Saturday, June 7, 2014

आत्ममुग्ध मौन साधक



रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
आँख का आपरेशन होना है । नन्हे हाइकु ने चश्मा न तोड़ दिया होता तो  पता ही नहीं चल पाता कि मोतियाबिन्द विस्तार पा चुका है । अच्छा ही हुआ जो चश्मा टूटा  और आँखों का भ्रम भी । सुबह सुबह अन्तिम मेल देखी । सम्पादित संग्रह का कवर आज ही आया था और  परिचय आदि जुड़कर  तथा फ़ाइनल होकर प्रेस में जाना था । मैंने मेल अपने एक अन्तरंग मित्र  को अग्रेषित कर दी  कि आज जो भी  मेल आएगी , वह  केवल आपके पास आएगी ।आपको ही   कवर फ़ाइनल करना है  और आज ही प्रकाश को भेजना है ।
गाड़ी में बैठकर घर से निकला ही था कि एक आत्ममुग्ध  कवि  का फोन आ गया । उनका आग्रह था कि मैं उनकी  प्रकृति विषयक कविताओं  पर लेख लिखकर दो-चार दिन में रवाना कर दूँ । वे अपनी कविताएँ   भेजने को  भी  तैयार न थी । मैं खुद ही उनके संग्रहों से छाँटूँ । इनको अपने बारे में लिखवाने का बहुत पहले से व्यसन रहा है । किसी के बारे में लिखना , लिखे हुए को पढ़ना , अच्छी रचनाओं  की प्रशंसा करना खुद का अपमान समझते हैं। मैंने उनको ऑपरेशन की बात कही और साफ़-साफ़ कह दिया कि पूरे महीने मैं लेखन आदि काम नहीं कर सकूँगा। इनसे मैं एक वरिष्ठ  लेखक   के साहित्य  पर लिखने के लिए कह चुका था ।ये सबको अनसुना करके केवल  अपने बारे में लिखने पर ही ज़ोर दे रहे थे  । कानों  का इस्तेमाल  इन्होंने सीखा ही नहीं था       
सुना था  साँप के कान नहीं होते ,लेकिन हम सबको साँप ही नहीं,बिना कान के  लाखों इंसान मिलेंगे ।ये बीमार और कराहते हुए वृद्ध  व्यक्ति को भी अपनी तुर्श आवाज़ में यह कहते सुने जा सकते हैं-आपने हमारे  बारे में लेख नहीं  लिखा। सचमुच इतनी हेकड़ी दिखाना ठीक नहीं है। हम पर नहीं लिख पाएँगे तो आप अमर कैसे होंगे ?’’ साथ ही आपको यह भी समझाने की कोशिश करेंगे कि इन पर क्या लिखा जाए और कितना लिखा जाए। आप एकाध पृष्ठ लिखकर इनको बेवकूफ़ नहीं बना सकते । अगले साल ये 60 वर्ष के हो जाएँगे। आप स्मारिका में लिखने के लिए अभी से सोचना शुरू कर दीजिए।
 ये मरने से पहले अमर होना चाहते हैं।आप इन निरीह आत्ममुग्ध साहित्यकारों ( बेचारों) की मदद ज़रूर करें; क्योंकि इनके मरने पर आपके लेख हाथों हाथ लिये जाएँगे । यह बात दूसरी है कि हाथों-हाथ लेने वाला कोई कबाड़ी हो और जाकर चाय बनाने वाले को बेच दे । हर भूमिका में इनका नाम होना चाहिए, भले ही इन्होंने भूमिका लिखने तक अपनी  रचनाएँ न भेजी हों ।आप कवर पर भी इनका उल्लेख ज़रूर करें । अगर आप इनको भूल जाएँगे तो ये आपको भूल जाएँगे । सहयोगी संग्रह के लिए इनको धनराशि ज़रूर भेज दीजिए । नहीं भेजेंगे ,तो ये आपकी खबर ज़रूर लेंगे। जो भेज देंगे ,वे इनके पीछे भागते रहेंगे , लेकिन ये राणा प्रताप का चेतक बन जाएँगे । आप भले ही हिरन बन जाएँ पर ये आपके हाथ नहीं आएँगे ।
आप इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते ; क्योंकि ये आत्मनिर्भर हैं। ये अपना साक्षात्कार खुद लिख सकते हैं ।स्वयं टाइप कराकर मित्रों के नाम से सम्पादकों को अपनी प्रशंसा में धारावाहिक पत्र लिख सकते हैं । अभी कुछ नहीं  बिगड़ा है ।आप इनसे कुछ तो सीख लीजिए । अपने निकटतम कुछ अच्छा लिखें ;तो आप चुप्पी मार जाइए । तारीफ़ करेंगे तो उनका महत्त्व बढ़ जाएगा ,आपका घट जाएगा । अनजान कूड़ा-कचरा भी लिखे तो आप सराहना कीजिए । वह आपकी मूर्खता पर हँसेगा और आपकी लच्छेदार (?)भाषा पर सिर धुनता रह जाएगा।इन आत्ममुग्ध  मौन साधकों के बारे में बाकी बातें फिर ! तब तक आप
अपना ख्याल रखना । आप भी अपना ख्याल नहीं रखेंगे तो फिर कौन रखेगा !

Thursday, June 5, 2014

बूँद -बूँद लम्हें-



समीक्षा
बूँद -बूँद लम्हें-   
सुदर्शन रत्नाकर
       मनसा प्रकाशन लखनऊ से प्रकाशि  'बूँद बूँद लम्हें' कवयित्री अनिता ललित का पहला काव्य संग्रह है जिसे पढ़ कर सुखद अनुभूति का एहसास हुआ ।वेब साइट एवं पत्र-पत्रिकाओं में कुछ समय से रचनाएँ पढ़ने का अवसर मिलता रहा है ।लेखनी में दम लगता था पूरा संग्रह पढ़ने पर इसकी पुष्टि भी हो गई है
          किसी रचना का वृहदाकार होना या लघु आकार का होना महत्व नहीं रखता महत्त्व होता है पाठकों की संप्रेणीयता का ।वे उसके साथ एकाकार हो पाए हैं या नहीं ।उनके मनमें वह अपनी बात पहुँचा पाया है या नहीं ।जै से प्रकृति में अनेक रंग बिखरे हैं भावाभिव्यक्ति के भी अनेक रूप  हैं,अनेक विधाएँ हैं ।केनवस बड़ा हो तो उसमें अभिव्यक्ति के लिए स्पेस भी बड़ा होता है लेकिन इससे छोटे केनवस के महत्व को कम नहीं आँका जा सकता। विधा कोई भी हो यदि उसमें निहित विचार,संवेदना,भावप्रेषणता दिल में उतरती है और रूह में समा जाती है, जिसका प्रभाव लम्बी अवधि तक रहता है। तो चार पंक्तियाँ भी अभिव्यक्ति के लिए सक्षम होती हैं जो, पाठकों को झकझोर देती हैं ।
         अनिताजी की कविताओं में जीवन की सच्चाई है,बचपन की स्मृतियाँ हैं,रिश्तों की गहराई है,प्रेम की सघन अनुभूति है तो सामाजिक सरोकार भी है।नारी की अस्मिमता के प्रति भी कवयित्री सचेत है ।
          प्रेम जीवन का सत्य है,जिसके अनेक रूप हैं।कवयित्री कभी निश्चल  ,मर्यादित प्रेम की नदी में डुबकी लगाती है तो कभी अवसाद में घिर जाती है ।कहीं उदासी है,कहीं छटपटाहट,बेबसी है ,समर्पण है आत्मसम्मान की भावना है ।प्यार उसके जीवन की धरोहर है जिसे संजो कर रखना चाहती है ।उसकी सोच सकारात्मक है और यही सृजनात्मकता को शाश्वत बनाती है ।
 प्यार के विविध रूपों को उकेरती क्षणिकाएँ-------
      अपने वजूद से मैं
         तुझको तलाशती रह गई
        अब जाकर पता चला
          मेरा वजूद ही मेरा न था ।
          * *
       तुम अगर साथ दो
          तो मैं दुनिया जीत सकती हूँ
          तुमने मुँह मोड़ा
          तो ख़ुद से हार जाती हूँ ।
                    **
          जिस ओर रास्ता न हो
          जिस मंज़िल का क्या करूँ
          जिस छोर मंज़िल न हो
          उस रास्ते का क्या करूँ ।
          * *
          मेरे दिल के ज़ख़्मी गुल बूटे चुभते हैं
          मैँ क्यों कर ओढ़ूँ-- चादर
          तेरी मुस्कानों की।
**
बचपन लौट कर नहीं आता लेकिन उसकी स्मृतियाँ सदैव बनी रहती हैं ।धरोहर के रूप में मन पटल पर विराजमान रहती हैं ।कवयित्री का मन उस बचपन के लिए छटपटाता है ।इस क्षणिका में उसका स्वाभाविक वर्णन है--
        काश लौट आए वो बचपन
           बिन बात हँसना,खिलखिलाना
           हर चोट पे जी भर कर रोना ।
वृहदाकार कविताओं में माँ,पिता,ओ स्त्री कविताएँ मार्मिक एवं भावपूर्ण हैं जिनका सजीव चित्रण किया गया है।हर रचना में गम्भीर अर्थ निहित है ।कवयित्री यूँ ही भटकती नहीं ।
     कुछ कविताएँ नियमों के बंधनों से मुक्त होकर ग़ज़ल,मुक्तक का एहसास कराती हैं ।
भाषा मधुर एवं संयतित है ।प्रतीकों,बिम्बों का सफल प्रयोग किया गया है।
क्षणिका के क्षेत्र में कवयित्री से बहुत सारी आशाएँ हैं।
बूँद -बूँद लम्हे  (काव्य संग्रह) : अनिता ललित,  प्रकाशक :  मनसा         पब्लिकेशन्स,गोमती नगर,लखनऊ;   संस्करण :  2014;  मूल्य 175 रुपये;           पृष्ठ:122

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Wednesday, June 4, 2014

इस बस्ती में

 
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
जब-जब छुपकर वार करेगा
तब-तब वो मुस्काएगा ।
बैठ सामने  चारण बनकर
गुण जीभर कर गाएगा ।।

दौर मुसीबत का जब होगा
साथ  रहेंगे  बेगाने ।
वह अपनों का लगा मुखौटा
दूर कहीं छिप जाएगा ।।

घाव -लगे तन-मन पर लाखों
बैरी  मरहम  ला देंगे ।
उसके वश में जितना होगा
उतना नमक लगाएगा ॥

इस बस्ती में बैठके प्यारे
प्यार वफ़ा की बात न कर ।
बंजर दिल की इस धरती पर
उपवन कौन खिलाएगा ॥

अपनी चादर कितनी मैली
समय नहीं जो देख सके ।
उजली चादर जिनकी दिखती
उस पर दाग़ लगाएगा ॥    
0-(14-12-2007)