पथ के साथी

Saturday, April 6, 2024

1409-प्रकृति और मनुज की रागात्मकता से अनुप्राणित शब्द चित्रावलि ‘बोलो न निर्झर'


बोलो न निर्झर ( काव्य-संग्रह ) श्रीमती सुदर्शन रत्नाकर,आवरण व रेखांकन  जैस्मिन जोविअल, प्रकाशन वर्षः 2024  मूल्यः 320 पृष्ठ संख्याः 116, प्रकाशकः अयन प्रकाशन नयी दिल्ली

  सुकवि नीरज ने कहते हैं कि मनुष्य होना भाग्य है तो कवि होना सौभाग्य… सम्भवतः इसलिए कि कवि अनुपम उपलब्धि व अंतःदृष्टि-सम्पन्न होता है कि वह जीवन और परिवेश के प्रति बटोरे अपने अनुभवों, अनुभूतियों तथा दृष्टिकोणों को कविता के माध्यम से व्यक्त करने में सक्षम होता है; वह भी हर सूक्ष्म स्थूल का गहनता से चिन्तन-मनन करके, अपने भावों में कल्पना के अनूठे रंगों का सम्मिश्रण करके, उसके अनुपम और बेजोड़ स्वरूप में…। ख्यातिलब्ध साहित्यकार व हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ महिला तथा अति-प्रतिष्ठित सूर सम्मानऔर अनेक महत्त्वपूर्ण पुरस्कारों से अलंकृत श्रीमती सुदर्शन रत्नाकरजी का सद्य प्रकाशित काव्य-संग्रह बोलो न निर्झर’कुछ अपनी में वह कहती हैं यह संसार या कहूँ पूरा ब्रह्मांड कितना विस्तृत, कितना विचित्र है। इसकी थाह पाना कठिन है और मनुष्य के मन की थाह पाना और भी कठिन। वह कब क्या सोचता है, कैसा सोचता है और क्यों सोचता है; उसके मन में उथल-पुथल मची रहती है। सोच सकारात्मक हो, भाव कोमल हो, ह्रदय संवेदनशील हो, तो उसकी आँखें बाह्य-जगत् का जो कुछ देखती हैं, मन की आँखें उसे महसूस करती हैं और फिर वही भाव और विचार अभिव्यक्ति पाकर कविता बन जाते हैं। प्रकृति के उपादान नदियाँ, पहाड़, झरने, सागर, लहरों का नर्तन, झरनों का अनवरत बहना, बादल, बादलों की गोद में निकलती नन्ही-नन्ही बूँदों का पायल झनकाते पृथ्वी पर आना, चांद, सितारे, सूर्य, आकाश, लहलहाते फूल, वल्लरियाँ, पत्ते आदि सभी कुछ तो हमारी आँखों का उत्सव हैं।

बोलो न निर्झरमें कवयित्री सुदर्शन रत्नाकरजी ने प्रकृति वर्णन के साथ आध्यात्मिक-चिंतन, सामाजिक सरोकारों से सम्बन्धित लघुकविताएं भी सम्मिलित की हैं। मानवीय संवेदनाओं से सराबोर उत्सव के इन अनुपम क्षणों की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति की निर्बाध झरती एक शतकीय शब्द-चित्र-शृंखला है; काव्य-संग्रह बोलो न निर्झर’। इन शब्द-दृश्यों से साक्षात्कार करते-करते मेरे पाठक ने उनसे जो जुड़ाव और आत्मीयता का अनुभव किया…मन हुआ कि अपनी अदना-सी प्रतिक्रिया को आप सबसे भी साझा करूं।

संग्रह के पृष्ठ 18 पर प्रतीक्षा कविता में वह अपने हिस्से की उजली धूप और हरी दूब से स्निग्ध अपनत्व-भरे स्पर्श और प्रेम की प्रतीक्षा में हैं, जो कवयित्री के हिमखंड से मन को पिघलाकर, उसे गतिवान ऊर्जामय और प्रेममय कर दे…अपने सुख के लिए नहीं, बल्कि अँजुरी भर प्यार सब में बांटते हुए, बहते हुए अंततः सागर की गहराइयों में समा जाने के लिए…एक सार्थक जीवन के उपरान्त अंतिम विश्राम के लिए…।

 मैं बरसों से प्रतीक्षा कर रही हूँ/ उस उजली धूप और हरी दूब के लिए/ जहाँ एक नदी बहती हो/ और… मैं भी हिमखंड-सी पिघलती  नदी बन जाऊं/ निरन्तर गतिशील बहती/ अँजुरी - अँजुरी प्यार बाँटती/ सागर की गहराइयों में कहीं खो जाऊँ। (पृष्ठ18)

एक और नदी भाव और भावनाओं की… जिसे सुदर्शन रत्नाकरजी ने एक नदी एहसास कीकहा है। एहसास और रिश्तों के बन्धनों की गहन अनुभूति के अद्वितीय रंग निरूपित हैं इस कविता मेंः बाहर से नदी की तरह उथले बहते दिखाई देने वाले रिश्ते वास्तव में हमारे भीतर बन्धनों के द्वीपों जैसे सघन होते हैः उनमें कहीं काँटों जैसी चुभन है तो कुछ रिश्ते ऐसे भी हैं जिनमें फूलों की सुगन्धित स्निग्धता और सौम्यता है। ये रिश्ते स्वतः नहीं पनपे बल्कि उन्हें अपनों द्वारा दिये दुख झेलकर, बदले में दूसरों को सुख ही बाँटकर उपजाया है। इस लघुकाय कविता में मानो समस्त जीवन-दर्शन ही प्रस्तुत कर दिया है कवयित्री ने….

एक नदी बाहर बहती है रिश्तों की/ नदी के भीतर कुछ द्वीप हैं बन्धनों के/ कुछ बंधन हैं काँटों के/ कुछ रिश्ते हैं फूलों के…मैंने जीवन जो बोया है/उसको ही काटा है/दुख झेला है/ सुख बाँटा है/अपनों का दिया विष पी- पीकर/अमृत के लिए मन तरसा है(पृष्ठ 19 से)।

पृष्ठ 69 पर कैसे हैं ये बन्धनतथा पृष्ठ 115 पर रिश्ते’आदि कविताओं में भी कवयित्री ने नए और अलग कोणों से बंधनों की वास्तविकता और ताब को व्याख्यायित किया है। अहा! एक ही संवेदन को देखने-कहने के कितने ढंग, कितने आयाम हो सकते हैं। ये कविताएँ  निश्चित ही कवयित्री की बहुआयामी दृष्टि और विस्तृत वैचारिक फलक की द्योतक हैं।

अपने प्रकृति-प्रेम और जीवन की विडम्बनाओं, विसंगतियों, विद्रूपताओं को कवयित्री ने अनायास ही बहुत सहजता से, सरल और ग्राह्य लेकिन भावपूर्ण भाषा और शैली में सशक्तता के साथ प्रस्तुत किया है; उसके साथ कहीं मनुष्य के मन में उमड़ती इच्छाओं के अधूरे रह जाने की विवशताओं और अफसोस को भी….कुछ-कुछ यों व्यक्त किया है–इन पंक्तियों में देखें तो…

 'काश मैं पाखी होती/ और् आसमान में उड़ती रहती/ काश! में मछली होती तो/ सागर में तैरती रहती/ पर मैं तो आदमजात हूँ/ और/ धरती पर चल भी नहीं सकती (पृष्ठ 20)

 दबे पाँव/हर मौसम की धूप छाँव…/उदास चेहरों के जमघट में/ हर बीते क्षण के दर्द को/ झेलते हुए/ मैंने कई बार सोचा है/ कौन बीत गया है/  मैं या मौसम(पृष्ठ25)

 

माँ और ममत्व ऐसे मंवेदन है जो प्रकृति और समस्त भूमण्डल पर सबसे अधिक आत्मीय और बेजोड़ हैं; पृष्ठ 23 पर माँ, 24 पर बेटियाँ और पृष्ठ 26 पर मीठी सी याद’…

मीठी-सी याद/ अब भी भीतर कचोटती है/  ठंडे हाथों का स्पर्श होता है मुझे/ हवा जब छूती है मेरे माथे को… ।

 समय अविरल निर्बाध बहती धारा…गुज़र ही जाता है….कभी खुशियाँ देकर तो कभी पीड़ा देकर….भले ही उसे मुट्ठी में से रेत की मानिंद फिसल जाता है; परन्तु वह देह-मन पर की सलवटों में दर्ज़ हो जाता है। तुमने कहा था में प्रतीक्षारत मन समय का दस्तावेज़ हृदय को कुछ यों भिगो जाता हैंः

 तुमने कहा था लौटकर आओगे/ मृगमरीचिका के पीछे भागते-भागते जान पायी/ जिस वक्त को मैंने मुट्ठी में बाँधा था/ वो तो कब का मेरी गिरफ्त से निकल/ मेरे चेहरे की झुर्रियों में समा गया है …पर तुम नहीं आए।(पृष्ठ 29)

 ऐसा ही एक बेबस सा जीवन गीत है; गतिवान न था’ में

तुम्हारे इंतज़ार में/न चाँदनी ही पी/न तारों की छटा देखी/नदियाँ रुकीं नहीं मेरे पास/ रुकती भी क्यों जब मैं ही गतिवान न था(पृष्ठ35)     

प्रकृति के अप्रतिम सौंदर्य को मन के नयनों से पीने का हुनर है कवयित्री के पास; ज़रा सुनिये तो आसमान से उतरती बूँदों की मधुर झंकार में इस कौशल की अनुपम बानगी…कविता नन्ही बूँदेंमें–

'उतर रही हैं/ आसमान से नन्ही–नन्ही बूँदें/ पैंजनिया झनकातीं/ परियाँ हों जैसे/ सावन की। बिछुड़ रहीं बादल से/ आँसू्/ज्यों छलकातीं/ उतर रहीं मेरे अँगना/ मिल धरा से गीत गातीं (नन्ही बूँदें पृष्ठ41)।

दिल की देहरी पर(पृष्ठ 43) छलावा(पृष्ठ 44) सूरज के पास(पृष्ठ 45) चार दिन की ज़िंदगी थी (पृष्ठ 47) हश्र तो होना ही था(पृष्ठ 48) सत्यता(पृष्ठ 49) आदि कविताओं के लघु मगर मजबूत ताने-बाने में मानो प्रकृति और मनुज, जड़ में चैतन्य और चेतन में जड़ता के भावों और जीवन का यथार्थ को ही बुन दिया है…कवयित्री ने…

चाँद सितारों को पकड़ने की/ चाहत में जीती रही/ क्षितिज को छूने के लिए/भटकती रही… .वो मृगतृष्णा मुझे छलती रही/ पर जो मेरे सामने था/ उसे तो मैंने नज़र उठाकर देखा ही नहीं।(छलावा पृष्ठ44)

हर दिन एक नयी उम्मीदका सकारात्मक संदेश लेकर आता है गौरैयाकविता की पंक्तियों का संदेश-

रोज आती है/ गौरैया पेड़ पर/ गीत गाती है/ कोई भाषा नहीं/  पर मन में बसी/ एक आशा है/ जीवन बहुरेगा/ मौसम बदलेगा/ फूल खिलेंगे।(पृष्ठ 46)

बोलो न निर्झरकाव्य-संग्रह की शीर्षक कविता जीवन की वास्तविकता की वह तस्वीर है जिसके माध्यम से समूची प्रकृति की दात्री-प्रवृत्ति, कठोर-नियति, चोटिल-हश्र और मनुज की उसके प्रति उथली-सी कृतज्ञता को भी कवयित्री ने बहुत सुंदरता के साथ रेखांकित किया है।

बोलो न निर्झर/दूध-सा नीर/ सँकरे गलियारों से निकल/ कहाँ से आते हो तुम! उत्तुंग शिखरों के उस पार/ कौन रहता है तुम्हारा/ पत्थरों की चोटें सहते हो/ फिर भी हमारे लिए बहते हो। (पृष्ठ51) यकीनन गतिशीलता ही जीवन का प्रतीक और यथार्थ है।

कविता कौन है वह ’(पृष्ठ 53)में वह सदा मदद को तत्पर एक अदृश्य ताकत के प्रति अपना आह्लादपूर्ण आभार व्यक्त करती हैं।

जीवन है तो संघर्ष भी शाश्वत है। जीना है तो सपने देखना भी ज़रूरी है। सपनेकविता में कवयित्री की सोच है कि सपने पूरे न हों यह जुदा बात है लेकिन सपनों को निरन्तर देखते रहना और उन्हें जगाए रखना उनके पूरे होने से अधिक आवश्यक और महत्वपूर्ण हैः

बुनती रही सपने जिंदगी भर/ पर धागे सदा उलझते रहे/  न ही गाँठ खुली और न ही धागे सुलझे/ सपने आँखों में रहे पर/ और सपने   लोरियाँ सुन-सुन कर आँखों में सोते रहे।(पृष्ठ56)

मुखौटे’ कविता में सुदर्शन रत्नाकरजी ने समाज के मुखौटों तले छिपे ढके वीभत्स मुख- असली चेहरे का निरावरण किया है।

गली–गली में/ घूम रहे हैं लोग/ मुँह छुपाए/ मुखौटे लगाए/ लूट–खसोट, भ्रष्टाचार/ झूठ-फरेब का व्यापार/ खत्म इंसानियत/ पतन समाज का/ अंधी दौड़ रुकेगी कहाँ। (पृष्ठ 65)

स्वार्थपरता हवस लोभ और विकास की अंधी दौड़ में मानव निर्मित त्रासदियाँ किस तरह ईश्वर प्रदत्त प्रकृति उसके अनुपम साधनों और संसाधनों को नष्ट करती जा रही हैं और किस क्रूरता से मानव ने जंगलों और हरे-भरे क्षेत्रों को अपनी पूर्ति के लिए प्रकृति व भावना-विहीन शहरों में तब्दील कर दिया है। कवयित्री पृष्ठ 71 पर जलजला  72 पर सड़क और आदमी पृष्ठ 114 में सिर उठाना होगाआदि कविताओं में बखूबी अपने इन सामाजिक सांस्कृतिक और मानवीय सरोकारों को ब्यान करती हैं।

संग्रह की कविता उस रात कवयित्री का अत्यन्त सशक्त और मार्मिक सृजन है जिसमें उसने समूची प्रकृति की पीड़ा और क्रन्दन को बरगद के बूढ़े पेड़ के माध्यम से अभिव्यक्त कर दिया है। कविता का पठन करते हुए सारा दृश्य मानो सामने चलचित्र-सा जीवंत और परिदृश्यित होकर ह्रदय पर आघात करने लगता है -ओह, यह संवेदनहीन दुष्ट-प्रवृत्ति और लोभी-मानव स्वयं के अतिरिक्त प्रकृति के किसी अन्य घटक को बेजान और जड़ मानना कब बन्द करेगा। नष्ट होती प्रकृति और कटते पेड़ों की मर्मान्तक पीड़ा को कवयित्री ने इस प्रकार अभिव्यक्ति दी है–

 

'वह रोया था/ बरगद का बूढ़ा पेड़/ रात-भर पक्षी नहीं सोये थे/ उस रात चाँद भी नहीं निकला था/ आया था एक झंझावात/ कटती रहीं बरगद की जड़ें/ और वह जड़वत हो/ सहता रहा/ कुल्हाड़ी की तेज़ धार।' (उस रात(पृष्ठ116)

काव्य-संग्रह में कवयित्री ने बहुत से कोमल, आत्मिक, खुशगवार और सुकून भरे मानवीयतापूर्ण संवेदनों मसलन प्रेम, स्मृतियाँ, मां, बेटियाँ, तितलियाँ, अंश, पहचान, ऋतुओं आदि को भी फागुन की ऋतु बचपन यादों की अमराइयों मेंआदि कविताओं में अत्यन्त खूबसूरती मार्मिकता और जीवन्तता के साथ शब्द-चित्रित किया है।

उपर्युक्त के अतिरिक्त भी निष्ठा, इंसान, वजूद, जंगल की तरह, बुद्धत्व, शरीफों की बस्ती आदि बहुत-सी मर्मस्पर्शी कविताएँ  हैं; जिनमें कवयित्री ने विभिन्न संवेदनाओं के विविध क्षितिज छुए हैं।

     किसको छोड़ूँ, किसको सराहूँ, किसकी बात करूँ; मुझको तो संग्रह के सारे ही मिसरे बेजोड़ मिले।

 अब और क्या कहूँ; बस इतना ही कि सिरसा के प्रतिष्ठित और वरिष्ठ साहित्यकार प्रो रूप देवगुण और कवयित्री के प्रेरणा स्रोतों को समर्पित इस काव्य-संग्रह 'बोलो न निर्झर' में सँजोई-सहेजी प्रकृति और मानव की रागत्मकता से अनुप्राणित इन कविताओं का फलक बहुआयामी है। जो सृष्टि के प्रत्येक घटक को गम्भीरता और गहनता से सँजोता, देखता और व्याख्यायित करता है। कविताओं की भाषा, शैली सहज-सरल होते हुए भी बिम्बात्मक और चित्रात्मक है, जो भावों व अनुभूतियों को उनके यथेष्ट अर्थ के साथ सम्प्रेषित करने में सक्षम है। त्रुटिहीन प्रकाशन हेतु प्रकाशक को भी बधाई। जैस्मिन जोविअल द्वारा निर्मित सुन्दर आवरण और रेखांकन ने संग्रह की खूबसूरती को बढ़ा दिया है।

विश्वस्त हूँ कि बोलो न निर्झर’ काव्य-संग्रह की कविताएँ  पाठकों को अपने मदिर-मदिर प्रवाह में बहा ले जाएँगी।

-0-डॉ. इन्दु गुप्ता, 348/14 फरीदाबाद, हरियाणा मो 9871084402

Friday, April 5, 2024

1408-महाभारत : ‘मैं’ से मुक्ति

                   - विजय जोशी, पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल

 


       पौराणिक प्रसंग किसी भी धर्म ग्रंथ में समाहित हों, उनकी प्रासंगिकता स्वयं सिद्ध है। इनमें एक ओर जहाँ सरल भाषा में अपनी बात आम जन तक पहुँचाने का भाव होता है, वहीं दूसरी ओर मंतव्य भी। इस दौर में कहें, तो शाब्दिक प्रसंग हार्डवेयर तथा संदेश सॉफ्टवेयर। सो एक मित्र से प्राप्त अद्भुत विचार।

        महाभारत ग्रंथ से सभी परिचित हैं। यह मात्र दो परिवार या दो विरोधी संस्कृतियों के टकराव में सत्य के विजय का मंत्र ही नहीं, अपितु अंतस् के युद्ध का सफ़रनामा भी है।  आइए इसे पात्रों के माध्यम से समझा जाए : 

 1-धृतराष्ट्र: यह है हमारा मस्तिष्क, जो सारी सूचनाओं को संगृहीत कर सोच को कार्यरूप में परिवर्तित करता है। निर्भर हम पर करता है कि अपने विवेक से सही निर्णय लेते हैं या स्वार्थनिहित फैसला।


 2 संजय: हमारे वे मित्र या शुभचिंतक, जो ठकुर सुहाती से ऊपर उठकर न केवल हमें सच्चाई से अवगत कराते हैं, बल्कि सही मार्गदर्शन भी प्रदान करते हैं।

 3- कौरव: ये हैं अंतस्में उभरने वाली मोह माया रूपी वे भावनाएं जो हमें पथभ्रष्ट करने का पूरा प्रयास करती हैं। तुच्छ स्वार्थ या बाहरी आकर्षण की परत हमारी बुद्धि के कुमार्ग से कदमताल का प्रयोजन बनती हैं।

 4- शकुनि: वे अवसरवादी मित्र, जो हमें कुमार्ग की ओर ढकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ते। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।

 5- पांडव: ये हैं हमारी पाँच इंद्रियाँ  नेत्र, नाक, जीभ, कान और त्वचा यानी दृश्य, सुगंध, स्वाद, श्रवण और स्पर्श, जो हमारी सहायता करती हैं नीर क्षीर उर्फ़ दूध और पानी को अलग कर निर्णय पर पहुँचने में। ईश्वर का अद्भुत उपहार बशर्ते हम इनका सदुपयोग कर सकें।

 6- द्रौपदी: हमारी नैसर्गिक प्रतिभा, इच्छा, चाह या जुनून, जो हमारी 5 इंद्रियों वाली क्षमता को एक सूत्र में बाँधकर उद्देश्य प्राप्ति के साथ ही जीवन में आनंद का प्रयोजन भी बनती है। एक बात और कि यह कौरवी माया जाल से लड़ने हेतु हमारे संकल्प का सूत्र भी बनती है।  

 7- कृष्ण: तो फिर कृष्ण क्या हैं। यह है हमारी आंतरिक चेतना< जो आजीवन हमारी सारथी बनकर साथ निभाती है। इसकी आवाज सुन कार्य करना हमारा नैतिक दायित्व और सफलता की कुंजी है।

 8- कर्ण: परिवार के अग्रज होने के बावजूद राज्याश्रय के लोभ में कुमार्ग पथिक बन काल कवलित हो गए। यही है हमारा अहंका<र जो पद, प्रतिष्ठा, पैसे की चमक मिलते ही सिर चढ़कर बोलने लगता है। कुपथ की ओर धकेल देता है। 

        अहंकार हमारे सारे गुण निगल जाता है। ईश्वर से विमुख कर देता है। कहा ही गया है EGO यानी Edging God Out हृदय में कोई एक ही रह सकता है। अहंकार आते ही ईश्वर बाहर। यदि आपने इसे समाप्त नहीं किया, तो यह आपको समाप्त कर देगा।

         कुल मिलाकर भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर में महाभारत के माध्यम से उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने का एक अद्भुत संदेश दिया है। यह केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि अनाचार, अत्याचार के विरुद्ध एक जंग है, जो हमारे चेतन और अवचेतन मन दोनों के सार्थक जीवन जीने का प्रयोजन है। अब यह हम पर निर्भर है कि हम कौन सा मार्ग अंगीकार करें।

अहंकार में तीनों गए धन, वैभव और वंश ।

ना मानो तो देख लो< रावण, कौरव, कंस।

 

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Sunday, March 31, 2024

1407

 

1-आदर्श स्त्री/ मंजूषा मन

 


हर ख़्वाहिश के साथ

थोड़ा मर जाती है स्त्री।

स्त्री के भीतर का थोड़ा हिस्सा

हर बार मर जाता है,

ख़्वाहिश के मरने से।

 

ऐसे ही थोड़ा- थोड़ा मरकर

एक दिन

स्त्री पूरी मर जाती है।

फिर स्त्री में

कहीं नहीं बचती स्त्री।

 

रह जाती है बस

एक मिट्टी की गुड़िया

संवेदनाओं से रिक्त।

नहीं करती

किसी बात का विरोध,

नहीं रूठती कभी,

न कभी करती है जिद,

कुछ माँगती भी नहीं,

जो कहो सब करती है।

 

आदर्श स्त्री

समझी जाती है

मरी हुई स्त्री।

-0-

2-दोहे- रश्मि लहर

1

पद की गरिमा के बने, झूठे दावेदार

प्रिय है मिथ्या चाटुता, मिथ्या ही सत्कार

2

गलियाँ सब सूनी पड़ीं, चौराहे भी शान्त

बच्चे गए विदेश में, ममता विकल नितांत

3

थाली के बैंगन सदृश, कभी दूर या पास

आखिर उनकी बात पर, कैसे हो विश्वास

4

उनकी बातें चुभ रहीं, चुभता हर संदेश

पद- मद में जो चूर हैं, बढ़ाते वही क्लेश

 5

करते वे अपमान हैं, खुद बनकर भगवान

याद न क्यों रहता उन्हें? समय बड़ा बलवान

6

संस्कृति निर्वसना मिली, उच्छृंखल परिवेश

बच्चों को भाता नहीं, अब पुरखों का भेस

7

औरों की आलोचना, करते हैं भरपूर

आत्म-मुग्ध होते रहें, रख दर्पण को दूर

8

अवसादी फागुन मिला, चिंतित मिला अबीर

खूनी होली देखकर, व्याकुल हुए कबीर

9

जर्जर होते पट मुँदे, घर सूना दिन- रैन

है खंडहर होता भवन, ढहने को बेचैन

-0-इक्षुपुरी कॉलोनी लखनऊ-2 उत्तर प्रदेश

Sunday, March 24, 2024

1406-वे हुरियारे दिन

 

1-वे हुरियारे दिन.../ डॉ.शिवजी श्रीवास्तव


 

मन पाँखी फिर ढूँढ रहा है

वे हुरियारे दिन।

 

अम्मा की गुझियाँ

भाभी की

सरस ठिठोली, होली

शोर मचाती गली गली में

हुड़दंगों की टोली

कोई नर्म हथेली

हमको रंग लगा यूँ बोली

भूल न जाना रंग भरे ये

प्यारे-प्यारे दिन।

 

रूठा- रूठी

झगड़े लफड़े

होली में जलते थे

फगुआ,चैता रसिया सुन-सुन

सबके मन खिलते थे

जुम्मन मियाँ गुलाल लगाते

गले सभी मिलते थे

सपनों जैसे लगते हैं अब

वे उजियारे दिन।

 

गाँव गली के छोरे-छोरी

खूब धमाल मचाते

ढोल नगाड़ों की ढम-ढम पर

ठुमके सभी लगाते

इतने रंग उड़ाते नभ में

इंद्रधनुष बन जाते

अल्हड़ मस्त अदाओं वाले

वे फगुआरे दिन।

-0-

2-रश्मि विभा त्रिपाठी

ऋतुपति मुझको इतना वर दे

अबकी फागुन ऐसा कर दे

कुछ टेसू

और

मुझे

अपना कुछ रंग अम्बर दे

धरती अपनी हरीतिमा से

चुनकर हरा रंग

ले जाए, 

उनके द्वार पर धर दे

चटख लाल, हरा, पीला, गुलाबी-

ये एक- एक रंग

मेरे प्रिय के जीवन में

इन्द्रधनुष के सब रंग भर दे।

-0-

Wednesday, March 20, 2024

1405

 

सिलसिला

डॉ. सुरंगमा यादव

 

मुझे अकेला पाकर

अकसर

तुम आ जाते हो

मेरे पास

फिर शुरू होता है

तुम्हारी बातों से निकलती

बातों का सिलसिला

भाने लगता है मुझे

ये अकेलापन

पहले भी नहीं

और अब भी नहीं

ऊबती ही नहीं

डूबती ही जाती हूँ

तुम्हारी बातों की गहराई में

ढूँढ लाती हूँ कई मनके

दुनिया से छुपके

सहसा चौक जाती हूँ !

किसी के पुकारने पर

गड्ड-मड्ड हो जाता है

मन की झील में उभरा हुआ

तुम्हारा अक्स

फिर शुरू होता है

तुम्हें सोचने का सिलसिला।

-0-

Wednesday, March 6, 2024

1404-कविताएँ

 

रश्मि विभा त्रिपाठी

1-आत्मा के तल में



मेरे मन के मरुथल में
तुम
बादल का एक टुकड़ा
जब- जब दुख की आग में तपना पड़ा
एक पल में
कर दी रिमझिम बरसात
तुम्हारी हर एक बात
अमृत का घड़ा
मैं जी उठी
उत्साह हो गया
उठकर खड़ा
तुम
मेरी आत्मा के तल में
असल में
मेरे जीवन में तुम्हारा स्थान है
ईश्वर से बड़ा।

2- अर्थ

बेकार से खोखल बाँसों को
जब कृष्ण ने
अपने अधरों से छुआ
वो
उस पल से
बाँसुरी
हो गए,
सो गए
मेरे भाग को
मेरे मीत
तुमने ऐसे ही जगाया है
जिस पल
मुझे गले लगाया है
फैलाकर अपनी बाहों को
छूकर मेरी साँसों को
जो बीत रहा था
व्यर्थ,
मेरे उस जीवन को
तुमने दे दिया एक सुन्दर अर्थ।

3- आओ

बहुत ढूँढा
मगर
किसी किताब में
कहीं नहीं मिल पाया
वो लफ़्ज
कि जिसमें मैं पिरो देती
तुम्हारे अहसास के वो फूल
जिनसे हुई है
मेरी ज़िन्दगी सरसब्ज़
तुम जानना चाहो मुझसे कुछ
अपने बारे में
अगर
तो किसी पल आओ
मेरे सिरहाने बैठो
और टटोलो मेरी नब्ज़।

4- इबादत

मेरी आँखों के झरोखे में
तुम झाँककर देखो
ये जो बहुत ऊँची
मेरे ख्वाबों की गगनचुम्बी इमारत है
इसे भला कौन तोड़ सकेगा?
इसकी बुनियाद
तुम हो
कोई कहर
किसी पहर
टूट नहीं सकता
मेरे हाथों से
खुशी का दामन अब छूट नहीं सकता
मुझपर तुम्हारी इनायत है
तुम्हारे दम से
मेरी खंडहर पड़ी ज़िन्दगी में
आज फिर से
रौनक है,
दिल के दरीचे में
मैं
तुम्हारे सजदे में हूँ
तुम्हारा प्यार मेरी इबादत है।

5- रूह

तड़के उठते ही
आज मुझे
पापा की याद आ गई
मेरी आँखों में
अचानक नमी छा गई
काश! आज वो यहाँ होते...
ये सोचकर
मैंने
आसमान की ओर देखा
और सच मानो
तबसे
अब तक लगातार
बारिश हो रही है
बिजली भी कड़क रही है बार- बार
जैसे
बादल कह रहा हो
कि
दुनिया में इन्सान ही नहीं,
अपनों से बिछुड़कर
जन्नत में
रूह भी
हुड़ककर रोती है ज़ार- ज़ार।

-0-