पथ के साथी

Saturday, June 10, 2023

1329-छह कविताएँ

 रश्मि विभा त्रिपाठी

 1-इतने अरसे में

 


इतने अरसे में पहली बार

मुझे उसकी बहुत याद आई

आज मैं उसके लिए

पहली बार हुड़की

मैं आसमान से लुढ़की

जिसने सात फेरे लिये

जिसने जलाए दिए

एक नई जिन्दगी

रोशन करने को

उसी दीप की लौ में

मैं अपनी रौ में

चलती जाती

उसके पीछे-पीछे

ज़िन्दगी के रास्ते पर

मायके की मर्यादा

सर पर लादे

वहीं पर मेरी उम्र ढलती

ससुराल से मेरी अर्थी निकलती

मगर

उसने त्याग दिया मुझे

सीता की तरह

क्या वो राम था?

नहीं!

वो मेरी कहानी का

बुरा अंजाम था

फिर भी

मेरे नाम के संग उसका नाम था

कि मैं अकेली नहीं

उसे पता था

कि जब उसका हाथ छूटेगा

तो तमाम लोग

तपाक से

गले मिलने को लपकेंगे

अकेली स्त्री को देखकर

पलक न झपकेंगे

क्या वो कर सकेंगे

उसकी कमी पूरी?

नहीँ

आज मैं खुद ही

नापना चाहती हूँ

उसके मेरे बीच की दूरी

क्योंकि

वो मेरी माँग का सिंदूर था

वो मेरी चमक-दमक

वो मेरा नूर था

उसी से थे सोलह सिंगार

वही परमेश्वर था,

करता भव से पार

वो चूड़ियाँ वो बिन्दी

वो आलता

मन को बड़ा सालता

वो कैसा भी था

पापा ने चुना था

मेरी खुशहाल ज़िन्दगी का

सपना बुना था

करके कन्यादान

वो था मेरी गरिमा मेरा मान

आज सोचती हूँ

पापा का वो सपना पूर करूँ

जाऊँ उसी चौखट पर

वहीं मरूँ

उसके हाथों मरी

तो सुहागन मरने का

सुख पाऊँगी

रोज-रोज के मरने से तो

अच्छा है

एक बार में छूट जाऊँगी

एक छोड़ी हुई स्त्री पर

सब झपटना चाहते हैं

काश वो फिर आए

अपने खूँटे से मुझे फिर से बाँध दे

तो फिर कोई मुझे

घास में मैदान में चराने  ले जाए।

 

-0-

2-मैं सूखी लकड़ी- सी

 

चिंगारियों की ज़द में थी मैं

और किसी ने हवा दे दी

मैं सूखी लकड़ी-सी

जल गई हूँ

गम की भारी

बारिश के आसार हैं

मैं बूँदा-बाँदी में ही

कागज- सी गल गई हूँ

जवानी के

रपटीले रास्ते पर

पाँव रखते ही फिसल गई हूँ

उसकी बाहों में

जाकर

उसके अहसास की आँच से

मैं मोम-सी पिघल गई हूँ

उसकी यादों ने

रुलाया जब-जब

उसके ख्वाबों से

बहल गई हूँ

वो एहतियातन

मुझसे बच निकला

उसके लिए

मैं इक हादसा थी

जो टल गई हूँ

अब न वो पहले-सा रहा

मेरा सबके आगे रोना

लोग कहते हैं

कि मैं बदल गई हूँ

उसके गले लगकर

उसके लम्स की ख़ुश्बू चुरा ली

मैं पहली बार

उससे चाल चल गई हूँ

कभी उसके लिए

सुबह का सूरज थी

आज शाम-सी ढल गई हूँ।

-0-

3-सब्र टूट रहा है

 

अब सब्र टूट रहा है

ज़िन्दगी का जिन्दादिली से

दामन छूट रहा है

खून के रिश्तों का

यही मजमून

कि

जिन्हें खून से सींचा

पीते रहे वे खून

 

जिन्हें पूजा

उन्होंने ही लूटा

वे पत्थर थे

सर पटक- पटककर

मेरा माथा फूटा

गीत सारे खो गए

गम के हवाले हो गए

तकदीर के

सितारे सो गए

मेरे अपने ही

मेरी राह में काँटे बो गए

अब कहाँ

कोई भी सुर, साज है

तबीयत अब बड़ी नासाज है

बस

मेरा एक ही राज है

उसके बारे में तुम

भूलकर भी

किसी से कुछ न कहना

तुम्हें कसम है

कल मुझे कुछ हो जाए तो

चुप ही रहना

ये काम दुनिया पे छोड़ देना

मेरा दिल मत तोड़ देना

लोग कहेंगे

उसपे लानत थी

या वो बेकार औरत थी

या उसकी गलत सोहबत थी

कहने देना

सुनो

तुम ये सच न मान लेना

मेरी इतनी ही ज़िन्दगी थी

सोच लेना

कोई तकलीफ

कभी उसने नहीं दी

उसने तो हमेशा मुझको दुआ दी

जितनी खुशी थी

उसकी ही बदौलत थी

वो जो मेरी एकतरफ़ा मुहब्बत थी।

-0-

4-जिस दिन तुमने

 

जिस दिन तुमने

मुझे

गले लगाया

मैंने

तुम्हारी धड़कन को

छुआ

उसी दिन

भाग्य उदय हुआ

तुम्हारा दिल

गंगा की धारा

धड़कन लहर सी

जब मुझे छूकर गुजरी

मेरी नासाज तबियत सुधरी

तुम्हारी बाहों के घेरे में

मुझे यूँ लगा

चाँद सितारे मिले

उजाले में अँधेरे में

तुम्हारा साथ मिल गया

तो एक जीवन नया

तुमने दिया

और तुमने

अपने स्पर्श से

मेरे रोम- रोम की सिहरन को

अपने भीतर भर लिया

मेरा माथा चूमकर

हर शिकन मिटाकर

दिया

अपना चंदन सा अहसास

जिसमें खो गई हूँ

मैं विष से मुक्त हो गई हूँ

-0-

5-लकड़ियाँ

 

बचपन में

व्याकरण की अशुद्धि के कारण

मैं कई मर्तबा

लड़कियों को लकड़ियाँ

बोल देती थी

फिर माँ समझाती -

लकड़ियाँ नहीं लड़कियाँ

 

बड़े होने पर

मुझे

वो बचपन की गलती

याद आई

तो

लगा

कितना सही बोलती थी मैं

लकड़ियाँ और लड़कियाँ

दोनों ही

सुलगती हैं

जलती हैं

राख होती हैं

एक घर के चूल्हे में

एक ज़िन्दगी की भट्ठी में

एक रोटी के लिए

एक बोटी के लिए

 

काश कोई तो इनको बुझा दे

कोई रास्ता सुझा दे।

-0-

 

6-आत्मा से जुड़ी

 

जिस दिन मैं नहीं रहूँगी

तो मेरे न होने पर

तुम आँसू मत बहाना

जब तुम्हें पता चले

कि

मेरी साँस थम गई

मेरे होंठ जम गए

मेरे शब्द मौन हो गए

तुम मत रोना

 

मैं तुम्हारे लिए

इस आभासी दुनिया की

खोज नहीं थी

 

तुम थे मेरी अमृता

मैं तुम्हारी इमरोज़ नहीं थी

 

हाँ

जिस पल

तुमको

मुझे याद करते ही

तुम्हारे भीतर ऐसा लगे

कि कुछ फड़का है

दिल जोर से धड़का है

होंठ थरथरा गए

और तुमने मेरा नाम लेकर

चीखना चाहा

 

उस पल

कुछ मत करना

न घबराना, न डरना

बस

महसूस करना

 

क्योंकि

किसी को याद करते पल

तुम्हारे तन- बदन में

बिजली- सी कौंधी

हवा में तैरकर

तुम्हारे पास आई हो

उसकी यादों की

महक सौंधी

अचानक

एक बादल का टुकड़ा

तुम्हारी आँखों में बिन मौसम

बरस गया

 

मेरा नाम याद आते ही

अगर आत्मा में

कुछ पल को

कुछ फड़कता है

दिल जोर से धड़कता है

तो समझना

मैं तुम्हारे ही भीतर हूँ

तुम्हारी आत्मा से जुड़ी हुई

बेशक थीं

हमारी राहें मुड़ी हुई।

-0-

Wednesday, June 7, 2023

1327- बेबसी

 

भीकम सिंह 

 

राजनैतिक कार्यकर्ता

लड़ना चाहते हैं 

हाथापाई करना चाहते हैं 

राजनेता देखते हैं 

और व्यंग्य से हँसते हैं 

मतदाता गमगीन 

बेबस हैं कि वो

करें तो क्या करें   

 

राजतंत्र बढ़ता जा रहा है 

लोकतंत्र -

हाशिये की ओर

खिसकता जा रहा है 

संवेदनशील ?

निर्वाचन आयोग 

बेबस है कि वो ,

करे तो क्या करे   

 

 

Tuesday, June 6, 2023

1326-ओ मेरे मीत

रश्मि विभा त्रिपाठी

 

तुम ज़िन्दगी का दूसरा नाम हो

मेरा सुख-चैन, मेरा आराम हो

 तुम फूल, तुम कली

तुम पराग, तुम खुश्बू की डली

तुम एहसास मखमली

तुम बागबान,

आई

अभिसिंचित चली

तुम तितलियों की धुन में

तुम भँवरों की गुनगुन में

तुम गीत में, तुम गति-लय-यति में

तुम दिखते हो मुझको रघुपति में

तुम सागर, तुम नदिया

अतृप्त कभी रहने न दिया

तुम सीकस में मीठा झरना

जिंदगी की धूप से

अब भला क्या करना!

तुम तपन में छाँव हो

तुम मेरे सपनों का गाँव हो

तुम बादल-नर्म रुई के फाहे

तुम स्वाति बूँद, तुम्हें पपीहा चाहे

तुम किरन, तुम चाँदनी

मेरे आँगन में बिखरी हीरे की कनी

तुम पूनम की रात हो,

तुम सुनहरा प्रात हो

तुम एक सीधी, सरल,

सच्ची बात हो

तुम फरहाद, तुम मजनूँ ,

तुम राँझा,

तुम एक घर के दो परिवारों का

चूल्हा साँझा

तुम मोनालिसा हो, तुम कला हो

मुझको तुमसे मिलाया,

तकदीर का भला हो!

तुम मूरत हो अजंता की

तुम सुंदर रचना नियंता की

तुम झील, तालाब, कुँआँ, बाबड़ी

तुम पानी भरने को एक पनिहारिन खड़ी

तुम जाड़े की गुनगुनी धूप

तुम हल्दी की रस्म के बाद

होने वाली दुलहिन का निखरा रूप

तुम स्वेटर बुनती

माँ की सलाई पर लूप

तुम शगना दे गीत,

तुम पावन प्रीत

तुम मेह, तुम पुरवाई

तुम सावन की घटा छाई

तुम नीम की डाल पर झूला

तुम हर गम भूला

तुम बच्चे की किलकारी

तुम माँ देवकी, यशोदा, तुम गिरधारी

तुम शास्त्र, तुम वेद ऋचा

तुम माता की चौकी पर आसन बिछा

तुम ज्ञात, तुम अज्ञात

तुम जल प्रपात

सुलगते विरह की आग ठण्ठी

तुम संस्कृत साहित्य के महाकवि दण्डी

तुम सफर के साथी

तुम हाथ में हाथ लिये

मैं चलती जाती

तुम विभावरी, तुम चंदा

तुम इस धरती पर एक नेक बंदा

तुम माँग के सिंदूर में

मेरे चेहरे के नूर में

कोई गलती, कुसूर में

माफी देना ही तुम्हारे दस्तूर में

तुम जंगल पहाड़ में

मेरे पीछे- पीछे चलते

सुरक्षित मुझे करते

कौन धँसेगा बाड़ में

तुम पतंग, जिसका माँझा हूँ मैं

तुम्हें कटने नहीं दूँगी, पूरी ढील देती रहूँगी

तुम धागा, तुम सुई, तुम इंचटेप

रिश्तों को मापते, कुतरे रिश्तों पर थिगड़ी लगाते तुम

तुम कविता में, तुम छंद में

तुम रस की परिभाषा, आनंद में

तुम एक उत्कृष्ट विधा हो

लक्षणा, व्यंजना, अभिधा हो

तुम बचपन का जमाना

बच्चों का बारिश में नहाना

पानी की कश्तियाँ चलाना

और अपने आप पर इतराना

तुम सुबह मेरी, तुम सुरमई शाम हो

दिन भर जो मैंने किया, तुम वो खास काम हो

तुम पहाड़ के पीछे दुबका सूरज

तुम रात पूरनमासी की

तुम खुशी, मिटी उदासी

तुम देव मेरे, मैं तुम्हारी दासी

तुम पहली नजर का पहला प्यार

तुम मेरी उम्मीद, मेरी हसरत और इंतजार

तुम आरती के दीप में

तुम जैसे- मोती सीप में

तुम मेरे मन्दिर के देवता

अपनाओगे- ठुकराओगे नहीं पता

तुम माँ की लोरी

तुम गोदान का होरी

तुम दीवाली होली

तुम आँगन की रंगोली

तुम इंद्रधनुष

मेरे लिए तुम महापुरुष

 

तुम इस फिजा में

बहार हो खिजाँ में

तुम नाव, तुम पतवार

ले ही चलोगे मुझे उस पार

तुम मेरे माथे की बिंदी

तुम भाषाओं में हिन्दी

शबरी के बेर खाते राम हो

तुम नयनाभिराम हो

तुम निष्काम

तुम राधा के श्याम

तुम खनकता साज हो

मेरी चुप्पी की तुम आवाज हो

तुम दाल में नमक,

तुम बेहतरीन स्वाद

आवश्यकतानुसार नहीं

आवश्यक रूप से

हर पल चूल्हे में पकती है

तुम्हारी याद!

तुम कल्पना कवि की

तुम रश्मि हो रवि की

तुम एक नादान बच्चा

जिसके लिए सब सच्चा और  अच्छा।

जो खेलता है आइस पाइस धप्पी

तुम जादू की झप्पी

तुम तीज त्योहार, तुम सोलह सिंगार

तुम चूड़ियाँ की खनक

तुम हथेली पर

मेंहदी के रंग की धनक

तुम शरीर, मन, आत्मा तक

तुम पाँव का आलता

तुम हो तो, कहाँ कोई दुख सालता?

तुम सुहाग मेरे, मैं तुम्हारी सुहागन

तुम आह्लाद, तुम उमंग, मैं हैँ मगन

तुम बन्दिगी,  तुम हर खुशी

और

तुम ख्वाब, तुम हकीकत

तुम न जाने

कब और कैसे आँखों में आ बसे,

और बन गए मेरी अकीदत

तुम मेरी आत्मा और मन

तुम धड़कन का स्पंदन।

 

तुम मैं

मैं तुम

 

जहाँ देखूँ

जिधर देखूँ

तुम्हें हर जगह  मैं पाती

ओ मेरे मीत! तुम मेरे प्राण की थाती।

-0-

Monday, June 5, 2023

1325-बच्चे और पौधे

 रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

 


लहलहाते रहेंगे

आँगन की क्यारियों में

हिलाकर नन्हे-नन्हे पात

सुबह शाम करेंगे बात

प्यारे पौधे।

पास आने पर

दिखलाकर पँखुड़ियों की

नन्ही-नन्ही दन्तुलियाँ

मुस्काते हैं

फूले नहीं समाते हैं

ये लहलहाते पौधे।

 

मिट्टी पानी और उजाला

इतना ही तो पाते

फिर भी रोज़ लुटाते

कितनी खुशियाँ....

बच्चे....

ये भी पौधे हैं

इन्हें भी चाहिए -

प्यार का पानी

मधुर -मधुर स्पर्श की मिट्टी

और दिल की

खुली खिड़कियों से

छन-छनकर आता उजाला

तब ये भी मुस्काएँगे

अपनी किलकारियों का रस

ओक से हमको पिलाएँगे

जब भी स्नेह -भरा स्पर्श पाएँगे

बच्चे पौधे, पौधे बच्चे

बन जाएँगे

घर आँगन महकाएँगे।

-0-