पथ के साथी

Wednesday, June 7, 2023

1327- बेबसी

 

भीकम सिंह 

 

राजनैतिक कार्यकर्ता

लड़ना चाहते हैं 

हाथापाई करना चाहते हैं 

राजनेता देखते हैं 

और व्यंग्य से हँसते हैं 

मतदाता गमगीन 

बेबस हैं कि वो

करें तो क्या करें   

 

राजतंत्र बढ़ता जा रहा है 

लोकतंत्र -

हाशिये की ओर

खिसकता जा रहा है 

संवेदनशील ?

निर्वाचन आयोग 

बेबस है कि वो ,

करे तो क्या करे   

 

 

4 comments:

  1. वर्तमान राजनीति के विद्रूप को रेखांकित करतीं सशक्त कविताएँ।बधाई डॉ. भीकम सिंह जी।

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  2. वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य का यथार्थ चित्रण। बहुत-बहुत बधाई सर।

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  3. आज की राजनीति के विकृत रूप का यथार्थ चित्रण करती कविता। बहुत बहुत बधाई। सुदर्शन रत्नाकर

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  4. बहुत सशक्त रचनाएँ...बहुत बहुत बधाई आपको।

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