पथ के साथी

Sunday, September 4, 2022

1240-तीन कविताएँ

 1-ओ मेरी प्यारी गुड़िया-  रश्मि विभा त्रिपाठी

 

दीप एक दुआ का


उजियार रही हूँ

इस दिन के इंतजार में

मैं हर बार रही हूँ

आओ मेरे पास

मैं तुम्हें पुकार रही हूँ

प्रेम से बैठी

कबसे सँवार रही हूँ

तुम्हारे लिए एक तोहफा

तुम्हारे जन्मदिन पर

तुम्हारे लिए है

मेरे आशीष की पुड़िया

रख लो

मुट्ठी में बन्द करके

ओ! मेरी प्यारी गुड़िया

मैं चुपके- से

अपनी उम्र के

दिन- महीने- साल

तुम पर वार रही हूँ

तुम जुग-जुग जियो

अपराजिता रहो

दुनिया की फिक्र छोड़ो

अपनी धुन में बहो

माँ के सपनों को लेके

तुम क्षितिज तक जाओ

पापा की उम्मीदों से

तुम अपना एक आसमान बनाओ

मैं तुम्हारे रास्ते के काँटे

अपने आँचल से बुहार रही हूँ

तुम बिन रुके

चलती रहो अपने लक्ष्य पर

तुम्हें बनाना है

औरों के लिए

एक मील का पत्थर

दोस्त बुरे या भले

कोई खुश हो या जले

तुम न देखो

मैं हर पल

दुआ के दीप से

तुम्हारी नजर उतार रही हूँ

तुम्हारे हाथ में हो

कामयाबी की रोशर्स

तुम्हारे कदमों में हो अर्श

तुम्हारे सामने आई

हर चुनौती को

आगे बढ़कर

मैं ललकार रही हूँ

तुम्हारे सुख के लिए

हर त्याग को तैयार रही हूँ

दीप एक दुआ का

उजियार रही हूँ।

 

-0-

2-दुआ का पौधा- रश्मि विभा त्रिपाठी

 

मेरे आगे

तनकर खड़ा था

क्या करती

पाँव छूने को चली

दुख मुझसे बड़ा था

अचानक

उसकी आँखों में

उतर आई खीज बड़ी

पल में टूटी अकड़

भीतर तक जल-भुन गया

और लौटना पड़ा

उसे

मुँह की खाए

अपनी हार से चिड़चिड़ाए

आदमी की तरह

करते हुए बड़-बड़, बड़-बड़

सुनो

उसने देख लिया

कि

तुमने जो रोपा था

द्वार पर

दुआ का पौधा

उसने अब कसकर पकड़ ली है जड़।

 

3- इस धरती पर

 

इस धरती पर

लोग

बेवजह, बिना बात के

बगैर सोचे समझे

लड़ रहे हैं

हाल में हुए युद्ध का

उद्देश्य

मुझे अब मालूम हुआ

जब सब अपने-अपने घरों की ओर

विजयी होकर बढ़ रहे हैं

और मेरे घर की बगल में रहने वाली

एक छोटी- सी बच्ची

संजय- सा

कर रही है गली में वर्णन

विस्मयकारी

धृतराष्ट्र- सी सभी की सोच सारी

सोचा-

लोग मानवता के

कितने अच्छे प्रतिमान गढ़ रहे हैं

जब मैंने

बच्ची को ये बोलते सुना-

दयाराम का कुत्ता

उसके पड़ोसी शांतिस्वरूप पर

अभी कुछ देर पहले ही

भौंक पड़ा था

उसकी बड़ी बेइज्जती हो गई

अब इसी बात पर

दयाराम के ऊपर तड़ातड़ जूते पड़ रहे हैं।

-0-

Saturday, September 3, 2022

1239

-प्रीति अग्रवाल

क्षणिकाएँ

1.

ज़र्रा हूँ

ख़ाक में मिलकर

खुश हूँ,

आफ़ताब बनाकर

मुझे, अकेला न करो।

2.

एक दूजे की मंज़िल

हम दोनों ही हैं,

सफर खूबसूरत

यूँ हीं नहीं...!

3.

मैं दर्द की पोटली

छुपाती फिरूँ,

कौन हो तुम

तुम, सब टोहते हो,

कौन हो तुम

तुम, गिरह खोलते हो।

4.

माना

हुस्न फूलों का

दिलकश है

अज़ीम है,

मुझे कुछ और

जीनों दो,

मुझे

दूब ही रहने दो...!

5.

ऐ हवा

इक सन्देशा

मेरा भी लेजा

उसी तरफ होकर

तू है गुज़रती,

कहना कि साँस चलती है

यूँ तो हूँ ज़िंदा,

मगर ज़िंदगी है

उसी ओर बसती।

6.

आँसू,

अपनी कहानी

लिखने पर हैं आमादा,

परेशान है मगर

कि

धुली जा रही है।

7.

बानगी इश्क की

जब इबादत

हो गयी,

तन, मन

घुलता रहा,

और धुआँ

मैं हो गई... !

8.

जी रही हूँ मैं

बेखौफ

बेधड़क,

जी रहे हो तुम

बेखौफ

बेधड़क,

उसी

महफूज़ पते पर-

एक दूसरे का दिल!

9.

नेह की

बरसात में

मैं घुलती चली गयी,

केवल

तुम ही तुम रहे

मैं जाने कहाँ गयी!

10.

सोचती हूँ

जिसे सह गई,

उसे कह देती

तो क्या होता...

जवाब-

नीला आकाश

उन्मुक्त उड़ान

क्षितिज के पार

नईं मंज़िलें

नया जहान!

-0-

2-कपिल कुमार

1

सिन्धु के तट

उपद्रष्टा रहे

युद्धों की विभीषिका के

रणभेरी की नादों से

भयभीत हुआ होगा

हृदय किस-किसका

युद्धों के परिणाम

दर्ज करती

तटों पर रुक-रूक कर

सिन्धु दशकों तक

आलेखों में

कभी

किसी ने नही पढ़ा

इनको पढ़े बिना

लग जाते है,

नए युद्ध की तैयारी में। 

2

युद्धों की पृष्ठभूमि

कौन लिखता है

हृदय पर 

पत्थर रखकर। 

3

उतारे हैं

प्रेम के

सभी प्रारूप

हृदय-पटल पर

ध्यान से सुनते

सिन्धु के खामोश तट

तुम्हारी बातें

इसके विपरीत भी। 

4

हे बुद्ध!! 

"अहिंसा के प्रवर्तक"

क्या तुमने कभी सोचा

यशोधरा ने लड़े

मन के विरुद्ध

कितने युद्ध

-0-

Wednesday, August 31, 2022

1237

 1-प्रेम -ज्योति   (सॉनेट ) / प्रो.विनीत मोहन औदिच्य

 


चाल गज की चले मान से वो भरी

कर नदी पार वो धार से अति डरी

रूप की राशि से ये मुदित मन हुआ

गात कंपित हुआ भाल उसने छुआ।

 

नैन हैं मद भरे होठ भी अधखुले

केश बिखरे हुए  चाँदनी में धुले

लाल अधरों सखी लाज- सी खेलती

काम का तीव्रतम वार- सा झेलती ।

 

हाल बेहाल कर ज्वार जब- जब उठा

प्रेम का पत्र भी कामना ने लिखा 

तीव्र साँसें चलीं बढ़ गई धड़कनें

मैल मन का धुला मिट गई अड़चनें ।

 

 रात भर श्याम ने नृत्य जीभर किया 

प्रीति निष्काम की ज्योति से भर दिया।।

 -0-प्रो.विनीत मोहन औदिच्य,ग़ज़लकार एवं सॉनेटियर,सागर, मध्यप्रदेश 

--0-

2-दोहे- रश्मि विभा त्रिपाठी 

1

1
तुमसे ही है स्वर मिला
, अधरों को संगीत।

कभी न गाते मैं थकूँतुमको हे मनमीत।।

2

मधुर मिलन को हम प्रिये, क्या होंगे मजबूर।

तन- मन एकाकार हैंकभी न होंगे दूर।।

3

मन से मन का जब बँधे, रिश्ता खूब प्रगाढ़।

लेता प्रेम उछाह यों, ज्यों नदिया में बाढ़।।

4

रूप तुम्हारा देखतीरजनी हो या भोर।

तुम आकरके बस गएइन आँखों की कोर।।

5

पीर जिया में जो उठे, हो पल में उद्धार।

प्रिये तुम्हारा प्रेम हीएकमात्र उपचार।।

6

साँसों में आनंद है, जीवन मेरा स्वर्ग।

मन के पन्ने पे रचे, तुमने सुख के सर्ग।।

7

जग का मेला घूमती, पकड़े तेरा हाथ।

हर वैभव से है मुझे, प्यारा तेरा साथ।।

9

मोल नहीं कुछ माँगता, तेरा भाव समर्थ।

मेरे जीवन को दिया, तूने सुन्दर अर्थ।।

10

मन- मरुथल उमड़ी घटा, झरी नेह की बूँद।

आलिंगन में रोज ही, भीगूँ आँखें मूँद।।

11

फूल दुआ के साथ ले, तुम आए हो पास।

मुझको होता ही नहीं, अब दुख का अहसास।।

-0-

Monday, August 29, 2022

1236_बुद्धिजीवी


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

 

गुलामों की ज़िन्दगी जीने  वाले

अपमान को चुपचाप पीने वाले

 अवसर की पूँछ पकड़कर

बटोरकर सबके हिस्से का सम्मान

सजा रहे अपनी दुकान

माँग-माँगकर भीख

भर लेते अपनी झोली,

जिनकी नैतिकता को

लकवा मार गया

साफ़गोई स्वर्ग सिधार गई

बुद्धि को सुविधाएँ चर गईं

जेब नोटों से भर गई

आत्मा घुटकर मर गई;

जो अंधकार को बुलाते रहे

उजालों को कब्र में सुलाते रहे

सरेआम व्यवस्था को

पेड़ से लटकाकर

कोड़े लगाते रहे-

ऐसे लोग बुद्धिजीवी कहलाते रहे।

-0-रचनाकाल 20-2-82(किशोर प्रभात, अप्रैल 1984)

Wednesday, August 24, 2022

1235

 

































2-पर्वतों की तंद्रा- सॉनेट अनिमा दास

 

तरल तंद्रा बह गई थी,पर्वतों से.. सिक्त हुआ था वन

रुधिर झर गया था वक्ष से.. रिक्त हुआ था यह मन।

नदी हुई थी चंचला.. समुद्र से संगम की थी व्यग्रता

किंतु नैश्य द्वीप में सहस्र उष्ण कामनाओं की थी आर्द्रता।

 

स्वरित हो रही थी कदम्ब कुंज में कृष्ण वर्णा कादंबरी


ऊषा के पूर्व हो रहा था ध्वनित क्रंदन, थी सुप्त विभावरी ।

मंथर था समीरण...मुक्त हो चुका था धरणी का केश

किंतु अब भी मौन देह में था ग्लानि का अपूर्ण क्लेश।

 

मृदु भाव में तीक्ष्ण पीड़ा का चुम्बन.. अतीत से कहा,

"स्मृति एक नहीं..अनेक हैं। कैसे कहूँ क्या -क्या है सहा!"

निरुत्तर अतीत हुआ अदृश्य.. वर्तमान के अंतर्जाल में

अंतरिक्षीय ध्वनि में हुआ विलीन शेष हुआ काल में।

 

 

तरल तंद्रा बह गई थी पर्वतों से... रक्तिम ऊषा थी आई

मालविका की काया शिशिर बूँद लिए मंद- मंद लहराई।

-0-अनिमा दास हिंदी सॉनेटियर,कटक, ओड़िशा